अंग्रेज़  

अंग्रेज़
अंग्रेज़ गवर्नर रॉबर्ट क्लाइव
विवरण 'अंग्रेज़' इंग्लैण्ड मूल के अंग्रेज़ी भाषी लोगों को कहा जाता है। साफ रंग, भूरे बाल और सफ़ेद व गोरी चमड़ी के कारण इन्हें प्राय: 'गोरे लोग' भी कहा जाता है।
कुल जनसंख्या 100 मिलियन (विश्वभर)
मुख्य निवास क्षेत्र संयुक्त राजशाही इंग्लैण्ड और वेल्स - 37.6 मिलियन

संयुक्त राज्य - 25 मिलियन
ऑस्ट्रेलिया - 7.2 मिलियन
कनाडा - 6.6 मिलियन
दक्षिण अफ़्रीका - 1.6 मिलियन
न्यूजीलैण्ड - 44,000–282,000

मुख्य भाषा अंग्रेज़ी
संबंधित लेख ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत में गवर्नर-जनरल
अन्य जानकारी पुराने समय से अंग्रेज़ ग्रेट ब्रिटेन के अन्य भागों में और उत्तरी आयरलैण्ड में बसने लगे थे, लेकिन उस समय उनकी संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था, क्योंकि ब्रितानी जनगणना में ऐतिहासिक रूप से इस तरह का ध्यान नहीं रखा जाता था।

ब्रिटेन में रहने वाले निवासियों को अंग्रेज़ कहा जाता है। इनका रंग साफ, बाल भूरेसफ़ेद और चमड़ी गोरी होती है, इसीलिए इन्हें प्राय: 'गोरे लोग' भी कहा जाता है। काफ़ी पुराने समय से अंग्रेज़ लोग ग्रेट ब्रिटेन के अन्य भागों में और उत्तरी आयरलैण्ड में बसने लगे थे, लेकिन उनकी संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि ब्रितानी जनगणना में ऐतिहासिक रूप से इस तरह का ध्यान नहीं रखा जाता था। भारत के इतिहास में अंग्रेज़ों का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। भारतीय इतिहास के ना जाने कितने ही अध्याय अंग्रेज़ों की कूटनीति, धोखेबाज़ी और लालची गतिविधियों से भरे पड़े हैं। ब्रिटेन के सम्राट 'जेम्स प्रथम' ने पहले 1608 ई. में हॉकिन्स को और फिर 1616 ई. में टॉमस रो को जहाँगीर के दरबार में अपना राजदूत बनाकर भेजा था। अजमेर के क़िले में टॉमस रो ने मुग़ल सम्राट जहाँगीर के सामने खड़े होकर एक याचक के रूप में भारत में व्यापार करने की अनुमति माँगी थी। जहाँगीर से टॉमस रो का व्यापारिक समझौता तो नहीं हो सका, किंतु उस समय गुजरात के सूबेदार 'ख़ुर्रम' (बाद में शाहजहाँ) ने उसे व्यापारिक कोठियाँ खोलने के लिए फ़रमान दे दिया था। उसी दिन से भारत की ग़ुलामी की इबारत लिख दी गई।

भारत में प्रवेश

इंग्लैण्ड की रानी एलिजाबेथ प्रथम के समय में 31 दिसम्बर, 1600 को भारत में 'दि गर्वनर एण्ड कम्पनी ऑफ़ लन्दल ट्रेडिंग इन्टू दि ईस्ट इंडीज' अर्थात् 'ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी' की स्थापना हुई। इस कम्पनी की स्थापना से पूर्व महारानी एलिजाबेथ ने पूर्व देशों से व्यापार करने के लिए चार्टर तथा एकाधिकार प्रदान किया। प्रारम्भ में यह अधिकार मात्र 15 वर्ष के लिए मिला था, किन्तु कालान्तर में इसे 20-20 वर्षों के लिए बढ़ाया जाने लगा। ईस्ट इंडिया कम्पनी में उस समय कुल क़रीब 217 साझीदार थे। कम्पनी का आरम्भिक उद्देश्य भू-भाग नहीं, बल्कि व्यापार था।

हॉकिन्स की जहाँगीर से भेंट

भारत में व्यापारिक कोठियाँ खोलने के प्रयास के अन्तर्गत ही ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने 1608 ई. में कैप्टन हॉकिन्स को अपने राजदूत के रूप में मुग़ल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। 1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत माँगी, परन्तु पुर्तग़ालियों तथा सूरत के सौदाग़रों के विद्रोह के कारण उसे स्वीकृति नहीं मिली। हॉकिन्स फ़ारसी भाषा का बहुत अच्छा जानकार था। कैप्टन हॉकिन्स तीन वर्षों तक आगरा में रहा। जहाँगीर ने उससे प्रसन्न होकर उसे 400 का मनसब तथा जागीर प्रदान की। 1616 ई. में सम्राट जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रो को अपना राजदूत बनाकर जहाँगीर के पास भेजा। टॉमस रो का एकमात्र उदेश्य था - 'व्यापारिक संधि करना'। यद्यपि उसका जहाँगीर से व्यापारिक समझौता नहीं हो सका, फिर भी उसे गुजरात के तत्कालीन सूबेदार 'ख़ुर्रम' (बाद में शाहजहाँ के नाम से प्रसिद्ध) से व्यापारिक कोठियों को खोलने के लिए फ़रमान प्राप्त हो गया।

व्यापारिक कोठियों की स्थापना

टॉमस रो के भारत से वापस जाने से पूर्व सूरत, आगरा, अहमदाबाद, भड़ौंच में अंग्रेज़ों की व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कर ली गईं। 1611 ई. में दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट पर सर्वप्रथम अंग्रेज़ों ने 'मसुलीपट्टम' में व्यापारिक कोठी की स्थापना की। यहाँ से वस्त्र का निर्यात होता था। 1632 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान ने एक सुनहरा फ़रमान दिया, जिसके अनुसार 500 पगोड़ा सालाना कर देकर गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की अनुमति मिल गयी। 1639 ई. में मद्रास में तथा 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक कोठियाँ खोली गईं। 1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तग़ाल की राजकुमारी 'कैथरीन' से हुआ, तथा चार्ल्स द्वितीय को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने 1668 ई. में दस पौण्ड वार्षिक किराये पर इसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया। पूर्वी भारत में अंग्रेज़ों ने अपना पहला कारख़ाना उड़ीसा में 1633 ई. में खोला। शीघ्र ही अंग्रेज़ों ने बंगाल, बिहार, पटना, बालासोर एवं ढाका में अपने कारखाने खोले। 1639 ई. में अंग्रेज़ों ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लेकर कारखाने की स्थापना की तथा कारखाने की क़िलेबन्दी कर उसे 'फ़ोट सेंट जार्ज' का नाम दिया। 'फ़ोर्ट सेन्ट जार्ज' शीघ्र ही कोरोमण्डल समुद्र तट पर अंग्रेज़ों की बस्तियों के मुख्यालय के रूप में मसुलीपट्टम से आगे निकल गया।

व्यापार कर में छूट

1651 ई. में बंगाल में सर्वप्रथम अंग्रेज़ों को व्यापारिक छूट प्राप्त हुई, जब 'ग्रेवियन वांटन', जो बंगाल के सूबेदार शहज़ादा शाहशुजा के साथ दरबारी चिकित्सक के रूप में रहता था, कम्पनी के लिए एक फ़रमान प्राप्त करने में सफल हुआ। इस फ़रमान से कम्पनी को 3000 रुपये वार्षिक कर के बदले बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने की अनुमति मिल गयी। शहज़ादा शाहशुजा की अनुमति से अंग्रेज़ों ने बंगाल में अपनी प्रथम कोठी 1651 ई. में हुगली में स्थापित की। 'ब्रिजमैन' को 1651 ई. में हुगली में स्थापित अंग्रेज़ों की फ़ैक्ट्री का प्रधान नियुक्त किया गया। हुगली के बाद अंग्रेज़ों ने कासिम बाज़ार, पटना और राजमहल में अपने कारखाने खोले। 1656 ई. में दूसरा फ़रमान मंजूर किया गया। इसी प्रकार कम्पनी ने 1672 ई. में शाइस्ता ख़ाँ से तथा 1680 में औरंगज़ेब से व्यापारिक रियायतों के संबंध में फ़रमान प्राप्त किया।

मुग़ल राजनीति में हस्तक्षेप

धीरे-धीरे अंग्रेज़ों का मुग़ल राजनीति में हस्तक्षेप प्रारम्भ हो गया। 1686 ई. में हुगली को लूटने के बाद अंग्रेज़ और मुग़ल सेनाओं में संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सूरत, मसुलीपट्टम, विशाखापत्तनम आदि कारखानों से अपने अधिकार खोने पड़े, परन्तु अंग्रेज़ों द्वारा क्षमा याचना करने पर औरंगज़ेब ने उन्हें डेढ़ लाख रुपये मुआवजा देने के बदले पुनः व्यापार के अधिकार दे दिये और 1691 ई. में एक फ़रमान निकाला, जिसमें 3000 रुपये के निश्चित वार्षिक कर के बदले बंगाल में कम्पनी को सीमा शुल्क देने से छूट दे दी गई। 1698 ई. में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार 'अजीमुश्शान' द्वारा कम्पनी ने तीन गाँव- सुतानाती, कलकत्ता और गोविन्दपुर की ज़मीदारी 12000 रुपये भुगतान कर प्राप्त कर ली। 1700 ई. तक 'जॉब चारनाक' ने इसे विकसित कर कलकत्ता का रूप दिया। कलकत्ता में फ़ोर्ट विलियम की स्थापना हुई। इसका पहला गर्वनर 'चार्ल्स आयर' हुआ।

औरंगज़ेब से क्षमा

बंगाल में सूबेदार शाहशुजा के फ़रमान के बाद भी अंग्रेज़ों को बंगाल में बल-पूर्वक चुगिंयाँ अदा करनी पड़ती थीं, जिसके कारण कम्पनी ने अपनी सुरक्षा खुद करने के उद्देश्य से थाना के मुग़ल क़िलों पर अधिकार कर लिया। 1686 ई. में मुग़ल सेना ने अंग्रेज़ों को हुगली से पलायन करने एवं ज्वारग्रस्त फुल्टा द्वीप पर शरण लेने के लिए मजबूर किया। फ़रवरी, 1690 में एजेंट जॉब चारनाक को बादशाह औरंगज़ेब से क्षमा मांगनी पड़ी। बाद में कम्पनी को पुनः उसके अधिकार प्राप्त हो गए। लेकिन कम्पनी को क्षतिपूर्ति के लिए 1 लाख पचास हज़ार रुपया हर्जाना देना पड़ा।

फ़र्रुख़सियर का फ़रमान

1715 ई. में जॉन सर्मन के नेतृत्व में एक व्यापारिक मिशन तत्कालीन मुग़ल बादशाह फ़र्रुख़सियर से मिलने गया। इस व्यापारिक मिशन में 'एडवर्ड स्टीफ़ेंसन', 'विलियम हैमिल्टन' (सर्जन) तथा 'ख़्वाजा सेहुर्द' (अर्मेनियाई द्विभाषिया) शामिल थे। डॉक्टर विलियम हैमिल्टर, जिसने सम्राट फ़र्रुख़सियर को एक प्राण घातक फोड़े से निजात दिलाई थी, की सेवा से ख़ुश होकर 1717 ई. में सम्राट फ़र्रुख़सियर ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए निम्नलिखित सुविधाओं वाला फ़रमान जारी किया-

  1. बंगाल में कम्पनी को 3000 रुपये वार्षिक देने पर निःशुल्क व्यापार का अधिकार मिल गया।
  2. कम्पनी को कलकत्ता के आस-पास की भूमि किराये पर लेने का अधिकार दे दिया गया।
  3. कम्पनी द्वारा बम्बई की टकसाल से जारी किये गये सिक्कों को मुग़ल साम्राज्य में मान्यता प्रदान की गई, और
  4. सूरत में 10,000 रुपये वार्षिक कर देने पर निःशुल्क व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया।

जेराल्ड आंगियर

इतिहासकार 'ओर्म्स' ने फ़र्रुख़सियर द्वारा जारी किये गये इस फ़रमान को 'कम्पनी का महाधिकार पत्र' कहा। 1669 ई. से 1677 ई. तक बम्बई का गर्वनर 'जेराल्ड आंगियर' ही वास्तव में बम्बई का महानतम संस्थापक था। 1687 तक बम्बई पश्चिमी तट का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बना रहा। जेराल्ड आंगियर ने बम्बई में क़िलेबन्दी के साथ ही गोदी का निर्माण कराया तथा बम्बई नगर की स्थापना और एक न्यायालय और पुलिस दल की स्थापना की। जेराल्ड आंगियर ने बम्बई के गर्वनर के रूप में यहाँ से तांबे और चाँदी के सिक्के ढालने के लिए टकसाल की स्थापना की। जेराल्ड आंगियर के समय में बम्बई की जनसंख्या 60,000 थी। उसका उत्तराधिकारी 'रौल्ट' (1677 - 1682 ई.) हुआ था।


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