अक्षर अनन्य  

अक्षर अनन्य के विषय में प्रसिद्ध है कि ये सेनुहरा (दतिया) के महाराज पृथ्वीचंद के दीवान थे। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों के अनुसार इनका जन्म सन्‌ 1710 वि. (1653 ई.) में सेनुहरा के एक कायस्थ परिवार में हुआ। विरक्ति के कारण इन्होंने दीवान का पद त्याग दिया और पन्ना में रहने लगे। प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल इनके शिष्य बन गए थे। ज्ञानयोग, विज्ञानयोग, ध्यानयोग, विवेकदीपिका, ब्रह्मज्ञान, अनन्य प्रकाश, राजयोग, सिद्धांतबोध आदि ग्रंथों के ये प्रणेता माने जाते हैं। इनमें अद्वैत वेदांत के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। दुर्गा सप्तशती का हिंदी पद्यानुवाद भी इन्होंने किया है। ये संत कवि माने जाते हैं लेकिन संतों की सभी प्रवृतियाँ इनमें नहीं मिलतीं। इनके ग्रंथों में वैष्णव धर्म के साधारण देवताओं के प्रति आस्था के साथ-साथ कर्मकांड के प्रति झुकाव भी मिलता है। इनके काव्य ग्रंथों में दोहा, चौपाई, पद्धरि इत्यादि छंदों का प्रयोग हुआ है।[1]


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

कृष्णा सोबती · निर्मला जैन · मन्नू भंडारी · उषा प्रियंवदा · मृणाल पाण्डे · ममता कालिया · मृदुला गर्ग · राजी सेठ · पुष्पा भारती · चित्रा मुद्गल · नासिरा शर्मा · सूर्यबाला · मैत्रेयी पुष्पा · चंद्रकांता · सुनीता जैन · रमणिका गुप्ता · अलका सरावगी · मालती जोशी · कृष्णा अग्निहोत्री · मेहरुन्निसा परवेज · सरोजनी प्रीतम · गगन गिल · सुषम बेदी · प्रभा खेतान ·नीलम सक्सेना चंद्रा · निर्मला देशपांडे · अचला नागर · सरस्वती प्रसाद · पूर्णिमा वर्मन · रश्मि प्रभा · कमला दास · सुमित्रा कुमारी सिन्हा · स्नेहमयी चौधरी · वेदवती वैदिक


अनामिका · फ़िरदौस ख़ान · ज्योत्स्ना मिलन · प्रीति सिंह · वंदना गुप्ता · किरण मिश्रा · कीर्ति चौधरी · सीमा सिंघल 'सदा' · डेम अगाथा क्रिस्टी

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 70 |

संबंधित लेख