अद्भुत रस

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अद्भुत रस ‘विस्मयस्य सम्यक्समृद्धिरद्भुत: सर्वेन्द्रियाणां ताटस्थ्यं या’। [1] अर्थात विस्मय की सम्यक समृद्धि अथवा सम्पूर्ण इन्द्रियों की तटस्थता अदभुत रस है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब किसी रचना में विस्मय 'स्थायी भाव' इस प्रकार पूर्णतया प्रस्फुट हो कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उससे अभिभावित होकर निश्चेष्ट बन जाएँ, तब वहाँ अद्भुत रस की निष्पत्ति होती है।

साहित्यकारों द्वारा परिभाषा

‘आहचरज देखे सुने बिस्मै बाढ़त।
चित्त अद्भुत रस बिस्मय बढ़ै अचल सचकित निमित्त’[2]

‘रसे सारश्चमत्कार: सर्वत्राप्यनुभुयते। तच्चमत्कारसारत्वे सर्वत्राप्यद्भुतो रस:।
तस्मादद्भुतमेवाह कृती नारायणो रसम्।’ [5] अर्थात सब रसों में चमत्कार साररूप से (स्थायी) होने से सर्वत्र अद्भुत रस ही प्रतीत होता है। अतएव, नारायण पण्डित केवल एक अद्भुत रस ही मानते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार

मनोविज्ञानियों ने भी विस्मय को प्रधान भावों में गृहीत किया है तथा उसकी प्रवृत्ति ‘जिज्ञासा’ से बताई है। वास्तव में आदिम मानव को प्रकृति की क्रीड़ास्थली के संसर्ग में भय एवं आश्चर्य अथवा विस्मय, इन दो भावों की ही मुख्यतया प्रतीति हुई होगी। कला एवं काव्य के आकर्षण में विस्मय की भावना सर्वाधिक महत्त्व रखती है। कवि एवं कलाकार जिस वस्तु का सौन्दर्य चित्रित करना चाहते हैं, उसमें कोई लोक को अतिक्रान्त करने वाला तत्व वर्तमान रहता है, जो अपनी असाधारणता से भाव को अभिभूत कर लेता है। अंग्रेज़ी साहित्य के रोमांटिक कवियों ने काव्य की आत्मा विस्मय को ही स्वीकार किया था। अतएव, अद्भुत रस का महत्त्व स्वयं सिद्ध है। साहित्य शास्त्रियों ने रस के विरोध एवं अविरोध का व्याख्यान किया है।

रस के विरोध एवं अविरोध
आलम्बन विभाव

आलौकिकता से युक्त वाक्य, शील, कर्म एवं रूप अद्भुत रस के आलम्बन विभाव हैं,

उद्दीनपन विभाव

आलौकिकता के गुणों का वर्णन उद्दीनपन विभाव है,

अनुभाव

आँखें फाड़ना, टकटकी लगाकर देखना, रोमांच, आँसू, स्वेद, हर्ष, साधुवाद देना, उपहार-दान, हा-हा करना, अंगों का घुमाना, कम्पित होना, गदगद वचन बोलना, उत्कण्ठित होना, इत्यादि इसके अनुभाव हैं,

व्यभिचारी भाव

वितर्क, आवेग, हर्ष, भ्रान्ति, चिन्ता, चपलता, जड़ता, औत्सुक्य प्रभृति व्यभिचारी भाव हैं।

अद्भुत रस का वर्णन

‘जहँ अनहोने देखिए, बचन रचन अनुरूप।
अद्भुत रस के जानिये, ये विभाव स्रु अनूप।।
बचन कम्प अरु रोम तनु, यह कहिये अनुभाव।
हर्श शक चित मोह पुनि, यह संचारी भाव।।
जेहि ठाँ नृत्य कवित्त में, व्यंग्य आचरज होय।
ताँऊ रस में जानियो, अद्भुत रस है सोय।’ [6]

ज्ञान के प्रकार
  1. यथादृष्ट (देखा हुआ),
  2. श्रुत (सुना हुआ),
  3. अनुमानज (अनुमति)।

अद्भुत रस के विभाव इन त्रिविध रीतियों से गोचर होते हैं। लेकिन वैष्णव आचार्यों ने एक चौथी रीति भी बताई है। यह है संकीर्तन अर्थात किसी वस्तु का प्रभावक वर्णन-विवरण, जिससे बोधव्य को उसका सम्यक् ज्ञान हो जाए। इस प्रकार, अदभुत रस चार प्रकार का होता है-

  1. दृष्ट,
  2. श्रुत,
  3. अनुमति एवं
  4. संकीर्तित।

‘ब्रज बछरा निज धाम करि फिरि ब्रज लखि फिरि धाम। फिरि इत र्लाख फिर उत लखे ठगि बिरंचि तिहि ठाम’ (पोद्दार : ‘रसमंजरी’)। वत्सहरण के समय ब्रह्मा द्वारा गोप बालकों तथा बछड़ों को ब्रह्मधाम में छोड़ आने पर भी वे ही गोप और बछड़े देखकर ब्रह्मा को विस्मय हुआ। अतएव यहाँ दृष्ट अद्भुत रस की प्रतीति हो रही है।

उदाहरण -

चित अलि कत भरमत रहत कहाँ नहीं बास।
विकसित कुसुमन मैं अहै काको सरस विकास [7]

यहाँ अनुमिति अद्भुत की प्रतीति हो रही है। विकच कुसुमों में ईश्वर की प्रभा के अनुमानज ज्ञान से उत्पन्न ‘विस्मय’ पुष्ट होकर अद्भुत रस में व्यक्त हो गया है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ‘भानुदत्त : रसतरंगिणी’
  2. ‘भवानी विलास’ देव
  3. साहित्यदर्पण 3:3 वृ.
  4. जो चित्त का विस्ताररूप विस्मय ही है
  5. साहित्यदर्पण, 3:3 वृ.
  6. रस-रहस्य, आचार्य कुलपति
  7. हरिऔ‘ध : ‘रसकलस’
  8. वर्मा, धीरेंद्र हिन्दी साहित्यकोश, भाग-1, मई 2007 (हिन्दी), वाराणसी: ज्ञानमण्डल प्रकाशन, 15।

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