अनुष्टुप छन्द  

अनुष्टुप छन्द को 'श्लोक' भी कहते हैं। इसमें चार पद होते हैं। अनुष्टुप छन्द संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयुक्त होता है। हिन्दी में जो लोकप्रियता और सरलता दोहा की है, वही संस्कृत में अनुष्टुप की है। इसका अर्थ काव्यात्मक विशेष गठन से माना जाता है।

प्रयोग

अनुष्टुप संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। रामायण, महाभारत तथा गीता के अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छन्द में ही हैं। हिन्दी में दोहा की लोकप्रियता के समान ही संस्कृत में अनुष्टुप की पहचान है। वैदिक काल से ही इस छन्द का प्रयोग मिलता है। प्राचीन काल से ही सभी ने इसे बहुत आसानी के साथ प्रयोग किया।

रचना

इस छन्द में चार पद होते हैं। प्रत्येक पद में आठ अक्षर या वर्ण होते हैं। इस छन्द के प्रत्येक पद/चरण का छठा अक्षर/वर्ण गुरु होता है और पंचम अक्षर लघु होता है। प्रथम और तृतीय पद का सातवाँ अक्षर गुरु होता है तथा दूसरे और चौथे पद का सप्तम अक्षर लघु होता है। इस प्रकार पदों में सप्तम अक्षर क्रमश: गुरु-लघु होता रहता है, अर्थात् प्रथम पद में गुरु, द्वितीय पद में लघु, तृतीय पद में गुरु और चतुर्थ पद में लघु। 'गीता' के श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं। आदि कवि वाल्मीकि द्वारा उच्चारित प्रथम श्लोक भी अनुष्टुप छन्द में है।

अनुष्टुप के अनेक भेद हैं, परंतु जिसका अधिकतर व्यवहार हो रहा है, उसका लक्षण इस प्रकार से है-

श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुः पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥

उदाहरण

संस्कृत में लिखे गए कुछ अनुष्टुप छन्दों के उदाहरण निम्नलिखित हैं[1]-

श्रीमद्भगवदगीता से

धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव।
मामका पांडवाश्चैव किमि कुर्वत संजय।।

ध/र्म/ क्षे/त्रे/ कु/रु/क्षे/त्रे/ स/म/वे/ता/ यु/युत्/स/व ।
मा/म/का/ पां/ड/वाश्/चै/व/ कि/मि/ कु-र/व/त/ सं/ज/य।।

ऋग्वेदांतर्गत श्रीसूक्त से

गंधद्वारां दुराधर्शां नित्य पुष्टां करीषिणीं ।.
ईश्वरीं सर्व भूतानां तामि होप व्हये श्रि/यं।।

गं/ध/द्वा/रां/ दु/रा/ध-र/शां/ नित्/य/ पुष्/टां/ क/री/षि/णीं ।.
ई/श्व/रीं/ सर्/व/ भू/ता/नां/ ता/मि/ हो/प/ व्ह/ये/श्रि/यं।।

पंचतंत्र/मित्रभेद से

लोकानुग्रह कर्तारः, प्रवर्धन्ते नरेश्वराः।
लोकानां संक्षयाच्चैव, क्षयं यान्ति न संशयः॥

लो/का/नु/ग्र/ह/कर/ता/रः/, प्र/वर/धन्/ते/ न/रे/श्व/राः ।
लो/का/नां/ सं/क्ष/याच्/चै/व/, क्ष/यं/ यान्/ति/ न/ सं/श/यः ॥


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अनुष्टुप छन्द (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 07 मई, 2013।

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