अष्टमूर्ति  

अष्टमूर्ति शिव का नाम। भविष्यपुराण में शिव की आठ मूर्तियाँ बतलाई गई हैं: पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, यजमान, सोम और सूर्य। कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतल के नांदीश्लोक में इनका उल्लेख किया है। शैव सिद्धांत में पंच महातत्वों के बने महासाकार पिंड से शिव की निम्नलिखित आठ मूतियों की उत्पति मानी गई है: शिव, भैरव, श्रीकंठ, सदाशिव, ईश्वर, रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा।[1]

उपनिषदों के अनुसार निराकर ब्रह्म ही जड़चेतनात्मक प्रपंच में साकार होकर प्रतिभासित रहता है। विराट् ब्रह्मंड को पंचतत्व, काल के प्रतीक सूर्य चंद्र तथा आत्मा के यजमान के रूप में विभाजित किया गया है। गीता में यजमान, सोम और सूर्य के स्थान पर मन, बुद्धि, अहंकार की गणना हुई है। इस गणनामें कालतत्व का समावेश नहीं होता। अत: काल के प्रतीक सूर्य चंद्र का ग्रहण करना आवश्यक हो गया। मन, बुद्धि, अहंकार ये जीव के धर्म हैं अत: जीव के प्रतीक यजमान में इनका अंतर्भाव हो जाता है। इन तत्वों के अतिरिक्त ब्रह्मंड कुछ भी नहीं है और ब्रह्मांड का ब्रह्म से अभेद है, इसलिए शैवों ने निराकार शिव को इन आठ तत्वों की मूर्ति धारण करनेवाला माना है।[2]


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 296 |
  2. सं० ग्रं - गीता 7.4; अभिज्ञानशाकुंतलम 1.1; सिद्ध-सिद्धातं-ग्रह मुंड्कोपनिषद्‌2.1।

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=अष्टमूर्ति&oldid=630197" से लिया गया