इन्द्रद्युम्न  

इन्द्रद्युम्न पौराणिक महाकाव्य महाभारत के अनुसार प्राचीन नगर काशी के राजा थे। काशी नरेश होने के कारण इन्हें 'काशीराज' कहा जाता था।

  • महाभारत के अनुसार काशीराज इन्द्रद्युम्न की तीन कन्या- अम्बिका, अम्बा तथा अम्बालिका थी।
  • भीष्म ने अपने दो सौतेले छोटे भाईयों- विचित्रवीर्य और चित्रांगद के विवाह के लिए काशीराज की पुत्रियों का अपहरण किया था। भीष्म के पराक्रम के कारण वे उन पर मुग्ध थी और उनसे विवाह करना चाहती थीं। किन्तु भीष्म आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा कर चुके थे, अत: यह विवाह सम्पन्न न हो सका। इस अपहरण की घटना के पूर्व इनका विवाह शाल्व के साथ होना निश्चित हो चुका था। परन्तु इस घटना के कारण उन्होंने भी अम्बा से विवाह करना अस्वीकार कर दिया। प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर अम्बा ने कठिन तपस्या की और शिव का वरदान प्राप्त कर आगामी जन्म में शिखण्डी के रूप में अवतीर्ण होकर अर्जुन के द्वारा भीष्म को जर्जर कराकर बदला लिया।

वेदों में अग्नि, इन्द्र, मित्र, अर्यमा, उषा, अश्विनौ आदि देवताओं के मन्त्रों मे द्युम्न शब्द प्रकट हुआ है। लेकिन पुराणों में इन्द्रद्युम्न नाम रखकर द्युम्न को केवल इन्द्र के साथ जोड़ा गया है। इसका कारण यह है कि इन्द्र में सब देवताओं का समावेश हो जाता है। इसी कारण से वैदिक ऋचाओं में 'द्युम्न' के जो गुण कहे गए हैं, वह सब इन्द्रद्युम्न के चरित्र में प्रकट होते हैं।

इन्द्रद्युम्न द्वारा पुरुषोत्तम क्षेत्र की यात्रा करते समय सर्वप्रथम विद्यापति नामक पुरोहित पुरुषोत्तम क्षेत्र की यात्रा करके नील माधव के दर्शन करता है। नील माधव के दर्शन वाली कथा, जहां इन्द्रद्युम्न द्वारा जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति व तुरीय अवस्थाओं के प्रतीक वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्नअनिरुद्ध की दारुमयी प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है, को यश का विस्तार मान सकते हैं। सर्वप्रथम कूर्म पुराण में भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण करके राजा इन्द्रद्युम्न को सुनाया था।


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