इब्रानी भाषा  

इब्रानी भाषा और साहित्य सामी (सेमेटिक) परिवार की भाषाओं में से एक जो यहूददियों की प्राचीन सांस्कृतिक भाषा है। इसी में उनका धर्मग्रंथ (बाइबिल का पूर्वार्ध) लिखा हुआ है; अत: इब्रानी का ज्ञान मुख्यतया बाइबिल पर निर्भर है।

'सामी' शब्द व्युत्पत्ति की दृष्टि से, नौह के पुत्र सेम से संबंध रखता है। सामी भाषाओं की पूर्वी उपशाखा का क्षेत्र मेसोपोटेमिया था। वहाँ पहले सुमेरियन भाषा बोली जाती थी; फलस्वरूप सुमेर की भाषा ने पूर्वी सामी भाषाओं को बहुत कुछ प्रभावित किया है। प्राचीनतम सामी भाषा अक्कादीय की दो उपशाखाएँ हैं, अर्थात्‌ असूरी और बाबुली। सामी परिवार की दक्षिणी उपशाखा में अरबी, हब्शी (इथोपियाई) तथा साबा की भाषाएँ प्रधान हैं। सामी वर्ग की पश्चिमी उपशाखा की मुख्य भाषाएँ इस प्रकार हैं: उगारितीय, कनानीय, आरमीय और इब्रानी। इनमें से उगारितीय भाषा (1500 ई. पू.) सबसे प्राचीन है; इसका तथा कनानीय भाषा का गहरा संबंध है। जब यहूदी लोग पहले पहल कनान देश में आकर बसने लगे तब वे कनानीय से मिलती जुलती एक आरमीय उपभाषा बोलते थे; उससे उनकी अपनी इब्रानी भाषा का विकास हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि 'इब्रानी' शब्द हपिरू से निकला है; हपिरू (शब्दार्थ 'विदेशी') उत्तरी अरबी मरुभूमि की एक यायावर जाति थी, जिसके साथ यहूदियों का संबंध माना जाता था। बाबीलोन के निर्वासन के बाद (539 ई. पू.) यहूदी लोग दैनिक जीवन में इब्रानी छोड़कर आरमीय भाषा बोलने लगे। इस भाषा की कई बोलियाँ प्रचलित थीं। ईसा भी आरमीय भाषा बोलते थे, किंतु इस मूल भाषा के बहुत कम शब्द सुरक्षित रह सके।

अन्य सामी भाषाओं की तरह इब्रानी की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं। धातुएँ प्राय: त्रिव्यंजनात्मक होती हैं। धातुओं में स्वर होते ही नहीं और साधारण शब्दों के स्वर भी प्राय: नहीं लिखे जाते। प्रत्यय और उपसर्ग द्वारा पुरुष तथा वचन का बोध कराया जाता है। क्रियाओं के रूपांतर अपेक्षाकृत कम हैं। साधारण अर्थ में काल नहीं होते, केवल वाच्य होते हैं। वाक्यविन्यास अत्यंत सरल है, वाक्यांश प्राय: 'और' शब्द से सहारे जोड़े जाते हैं। इब्रानी में अर्थ के सूक्ष्म भेद व्यक्त करना दु:साध्य है। वास्तव में इब्रानी भाषा दार्शनिक विवेचना की अपेक्षा कथासाहित्य तथा काव्य के लिए कहीं अधिक उपर्युक्त है।

प्रथम शताब्दी ई. में यहूदी शास्त्रियों ने इब्रानी भाषा को लिपिबद्ध करने की एक नई प्रणाली चलाई जिसके द्वारा बोलचाल में शताब्दियों से अप्रयुक्त इब्रानी भाषा का स्वरूप तथा उसका उच्चारण भी निश्चित किया गया। आठवीं 10वीं सदी में उन्होंने समस्त इब्रानी बाइबिल का इसी प्रणाली के अनुसार संपादन किया है। यह मसोरा का परंपरागत पाठ बतलाया जाता है और पिछली दस शताब्दियों से इब्रानी बाइबिल का यह सबसे प्रचलित पाठ है। इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध संस्करण बेन ह्यीम का है जो 1524 ई. में वेनिस में प्रकाशित हुआ था। सन्‌ 1947 ई. में फिलिस्तीन के कुमराम नामक स्थान पर इब्रानी बाइबिल तथा अन्य साहित्य की अत्यंत प्राचीन हस्तलिपियाँ मिल गई। इनका लिपिकाल प्राय: दूसरी शताब्दी ई.पू. माना जाता है विद्वानों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बाइबिल की ये प्राचीन पोथियाँ मसोरा के पाठ से अधिक भिन्न नहीं हैं। पश्चिम के विश्वविद्यालयों में आजकल इब्रानी का अध्ययन अपेक्षाकृत लोकप्रिय है।

मध्यकाल में एक विशेष इब्रानी बोली की उत्पत्ति हुई थी जिसे जर्मनी के वे यहूदी बोलते थे जो पोलैंड और रूस में जाकर बस गए थे। इस बोली को 'यहूदी जर्मन' अथवा 'यिद्दिश' कहकर पुकारा जाता है। वास्तव में यह एक जर्मनी बोली है जो इब्रानी लिपि में लिखी जाती है ओर जिसमें बहुत से आरमीय, पोलिश तथा रूसी शब्द भी सम्मिलित हैं। इसका व्याकरण अस्थिर है, किंतु इसका साहित्य समृद्ध है।

प्रथम महायुद्ध के बाद फिलिस्तीन (यहूदियों का इज़रायल नामक नया राज्य) की राजभाषा आधुनिक इब्रानी है। सन्‌ 1925ई. में जेरूसलम का इब्रानी विश्वविद्यालय स्थापित हुआ जिसके सभी विभागों में इब्रानी ही शिक्षा का माध्यम है। इज़रायल राज्य में कई दैनिक पत्र भी इब्रानी में निकलते हैं।

साहित्य

(1) बाइबिल-रचनाकाल की दृष्टि से बाइबिल का प्रामाणिक रूप इब्रानी भाषा का प्राचीनतम साहित्य है। इसका दृष्टिकोण मुख्यतया साहित्यिक ने होकर धार्मिक ही है; कलात्मक अभिव्यंजना की अपेक्षा शिक्षा का प्रतिपादन या उपदेश इसका प्रधान उद्देश्य है (द्र. बाइबिल)।

(2) अप्रामाणिक धार्मिक साहित्य-दूसरी शताब्दी ई. पू. से लेकर दूसरी शताब्दी ई. तक बहुत से ऐसे ग्रंथों की रचना हुई थीं जिनका उद्देश्य है बाइबिल में प्रतिपादित विषयों की व्याख्या अथवा उनका विस्तार। इनमें प्राय: बाइबिल के प्रमुख पात्रों की भविष्य संबंधी उक्तियों का समावेश है। उदहारणार्थ, आदम और हौवा की जीवनी। इन रचनाओं को बाइबिल में स्थान नहीं मिला। इन्हें अप्रामाणिक साहित्य कहा जाता है। इस प्रकार के साहित्य की मूल भाषा प्राय: इब्रानी थीं, किंतु आजकल यह केवल आरमीय अथवा परवर्ती अनुवादों में ही मिलता है।

(3) शास्त्रीय साहित्य-ईसाई धर्म के प्रवर्तन के पश्चात्‌ यहूदी शास्त्री (इब्रानी में इनका नाम रब्बी है), जो ईसाई धर्म स्वीकार करते थे, एक अत्यंत विस्तृत साहित्य की रचना करने लगे। यह शास्त्रीय साहित्य के नाम से विख्यात है। इसका तीन वर्गो में विभाजन किया जा सकता है:

(अ) मिश्ना-यह पर्व, संस्कार, पूजा, कानून आदि के विषय में यहूदियों के यहाँ प्रचलित मौखिक परंपराओं का संग्रह है जिसे दूसरी शताब्दी ई. में यूदाह हनासी ने संकलित किया था। 'तोसेफ्ता' इसका अर्वाचीन परिशिष्ट है।

(आ) तलमूद-यह मिश्ना की व्याख्या है जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न रूप धारण कर लेती है। जेरूसलम के शास्त्रियों ने अपना जेरूसलमी तलमूद तीसरी चौथी ईसवी में लिखा है। बाबीलोनिया के तलमूद का नाम बब्ली अथवा गेमारा है; इसका रचनाकाल चौथी छठी शताब्दी ईसवी है। बब्ली तलमूद सबसे विस्तृत (10,000 पृ.) तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। तलमूद की भाषा इब्रानी तथा आरमीय है।

(इ) मिद्रशीम-ये मूसा के नियम की व्यावहारिक तथा उपदेशात्मक व्याखएँ हैं। गौण मिद्रशीम सन्‌ 500 ई. के हैं, उनमें से मेखिलता सफ्राि तथा सफ्रेि उल्लेखनीय हैं। परवर्ती मिद्रशीम (रब्बोत) अपेक्षाकृत विस्तृत हैं। उनकी रचना छठी शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक होती रही।

(4) मध्याकालीन साहित्य-विभिन्न देशों में बसनेवाले यहूदियों में कई संप्रदाय उत्पन्न हुए जिनका इब्रानी साहित्य अब तक सुरक्षित है। बाबीलोनिया के सूरा नामक स्थान पर ६00 ई. से लेकर गेओनीम संप्रदाय है जिसका कानून, मिना तथा बाइबिल विषयक साहित्य विस्तृत है। इसके प्रमुख विद्वान्‌ सदियाह 942 ई. में चल बसे। करा-वादी आठवीं शताब्दी ई. का यहूदी शस्त्रियों का एक संप्रदाय है जिसका साहित्य मुख्यतया बाइबिल की व्याख्या है।

नवीं शताब्दी ई. में स्पेन मुसलमानी और यहूदी संस्कृति का केंद्र बना; वहाँ विशेषकर व्याकरण, बाइबिल की व्याख्या तथा अरस्तू के दर्शन पर साहित्य की सृष्टि हुई। इस संबंध में मूसा इब्न एज्ऱा (1140 ई.) तथा जूदाह हल्लेवी (1140 ई.) उल्लेखनीय हैं, किंतु उस समय के सबसे महान्‌ यहूदी दार्शनिक मैमोनीदेस (1135-1204 ई.) हैं। मैमोनीदेस ने अरस्तू की कुछ रचनाओं के अरबी अनुवाद का विशेष अध्ययन करने के बाद धार्मिक विश्वास तथा बुद्धि के समन्वय की आवश्यकता दिखलाने का प्रयत्न किया। यहूदियों ने इब्न सिना (1137 ई.) तथा इब्न रूस (1198 ई.) जैसे अरबी विद्वानों की रचनाएँ मध्यकालीन यूरोप तक पहुँचाकर अरबी तथा यूनारी ज्ञान विज्ञान के प्रचार में महत्वपूर्ण योग दिया है।

(5) आधुनिक साहित्य-मूसा मेंदेलसोन (1729-178६) के बुद्धिवाद से प्रभावित होकर इब्रानी साहित्य का दृष्टिकोण उत्तरोत्तर उदार तथा साहित्यिक होता जाता रहा है। 19वीं शताब्दी में एक नवीन राष्ट्रवादी धारा उत्पन्न हुई जो बाद में सिओनवादी (ज़िओनिस्ट) आंदोलन में परिणत हुई। यह फिलिस्तीन देश को पुन: यहूदी जाति का सांस्कृतिक केंद्र बनाना चाहती है। आधुनिकतम इब्रानी साहित्य में प्रतिभा, कलात्मकता तथ विद्वत्ता का भंडार है; उसका विश्वसाहित्य तथा विश्वव्यापी आंदोलनों के साथ गहरा संबंध है। एलिएजेरबन यहूदाह (1923) अपना 'इब्रानी भाषा का कोश' (10 खंड) लिखकर विश्वविख्यात बन गए। जेरूसलम के इब्रानी विश्वविद्यालय की ओर से एक सुविस्तृत इब्रानी विश्वकोश का संपादन सन्‌ 1950 ई. में प्रांरभ हुआ। द्वितीय महायुद्ध के बाद इब्रानी साहित्यिक जीवन का केंद्र पूर्वी यूरोप से हटकर पश्चिमी यूरोप, अमरीका तथा इज़रायल में आ गया है।[1]

इब्रानी भाषा के स्वरूप के वर्णन में यिद्दिश का ऊपर उल्लेख हो चुका है। अब्रामोविच के यिद्दिश उपन्यास प्रसिद्ध हैं। इधर शोलेम आशा के बहुत से एतिहासिक उपन्यास अंग्रेजी में अनूदित हो चुके हैं। आइ.एल. पेरेज़ एक आधुनिक रहस्यवादी लेखक तथा मारिस रोसेनफेल्द एक लोकप्रिय कवि हैं। सन्‌ 1897 ई. में अब्राहम कहान ने अमरीका में यिद्दिश पत्रकारिता का प्रारंभ किया था।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 532-33 |
  2. सं.ग्रं.-एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका खंड 11; हिब्रू लैंग्वेज़, लिटरेचर; जे. ब्रोकेलमैन : कंपरेटिव ग्रामर ऑव सेमेटिक लैंग्वेजेज़, बर्लिन 1912; जै. हेंपेल : आल्ट हेब्रेश्चे लिटरेट्योर, पॉट्सडैम, 1934; ए. लॉड्स : इस्त्वार दे ला लिटरेट्योर हेब्रेक ए जूई, पेरिस, 1950।
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