उरग  

उरग पृष्ठवंशी जंतुओं का एक वर्ग है। सर्प, छिपकली, कछुआ, घड़ियाल, ये सभी उरग वर्ग के जंतु हैं। वर्तमान काल में तो इस वर्ग के जंतु बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं और इनकी संख्या भी अधिक नहीं है, किंतु मध्यकल्प नामक भूतकाल में ये नि:संदेह पृथ्वी पर के सबसे अधिक महत्वपूर्ण जंतु थे। इनमें से बहुतों की नाप वर्तमान काल के हाथी की नाप से बड़ी थी।

उरगवंश की उत्पत्ति कार्बनप्रद युग में उभयचर वर्ग के आवृतशीर्ष अनुवर्ग (स्टेगोसिफ़ेलिया ऐंफ़िबिजा) से हुई और गिरियुग (पर्मियन), रिक्ताश्म (ट्राइऐसिक) तथा महासरट (जुरैसिक) युगों में इनका बहुत विकास हुआ। आद्य उरगों का विकास दो दिशाओं में पृथक्‌ पृथकृ हुआ। कुछ आद्य उरग स्तनधारी जंतुओं के सदृश होते गए और खटीयुग (क्रिटेशस युग) में आद्य स्तनधारी जंतुओं में परिणत हो गए और कुछ से उरगवर्ग और पक्षिवर्ग के जंतु उत्पन्न हुए। रक्ताश्म (ट्राइऐसिक) और महासरट (जुरैसिक) युगों में उरगवंश के जंतु बड़ी अधिकता से पृथ्वी पर फैले हुए थे। इनमें से अधिकांश सूखी भूमि पर रहनेवाले थे, परंतु कुछ जल में रहनेवाले और कुछ उड़नेवाले भी थे। उरगों के अधिकांश समूह लुप्त हो चुके हैं, केवल पाँच गण वर्तमान काल में पाए जाते हैं। ये हैं : 1-गोधिकानुगण (लैसरटिलिया); 2-अह्मनुगण (ओफ़िडिया); 3-परिवर्मिगण (किलोनिया); 4-मकरगण (क्रोकोडिलिया); 5-पल्याभगण (रिंगकोसिफ़ैलिया) जिसमें केवल स्फानदंत प्रजाति (स्फ़ीनोडॉन) अब जीवित हैं।

उरगवर्ग की परिभाषा कठिन है, क्योंकि आद्य उरग आवृतशीर्ष अनुवर्ग (स्टेगोसिफ़ेलिया) के सदृश थे; इनसे वे विकसित हुए और पीछे के उरगों में से कुछ स्तनधारियों के सदृश हो गए ओर कुछ पक्षियों के। शेष वर्तमानकाल के ओर कुछ भूतकाल के उरग (जो लुप्त हो चुके हैं) विकसित हुए। इस कारण कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि उरग वर्ग तोड़कर तीन स्वतंत्र वर्गों का निर्माण करना चाहिए। ये हैं :

1-आद्यसरट वर्ग (प्रोटोसॉरिया), जिनमें उभयचर (ऐंफिबिया) सदृश उरग रखे जाएँ; 2- थेरीप्सिडा, जिनमें स्तनधारी सदृश उरग और स्तनधारी जंतु रखे जाएँ; और 3- पक्षिसरीसृप, जिनमें विशिष्ट उरग तथा पक्षिवर्ग रखे जाएँ। परंतु इसमें संदेह नहीं कि यह वर्गीकरण पुराने वर्गीकरण से भी कम संतोषजनक है।

लक्षण - उरगों का एक बड़ा लक्षण यह है कि उनके चर्म के ऊपर बाह्मत्वकीय शल्क (एपिडर्मल स्केल्स) होते हैं। कुछ भूतकालीन उरग (जो लुप्त हो चुके हैं) ऐसे भी थे जिनके शरीर पर बाह्मत्वकीय शल्क नहीं थे और कछुओं की पीठ और उदर पर की खाल पर बाह्मत्वकीय शल्क नहीं होते। परंतु अधिकांश उरगों में यह चिह्न अवश्य मिलता है। उरगों का चर्म सूखा होता है, क्योंकि इनमें ग्रंथियाँ बहुत कम होती हैं और ये विशेष स्थानों पर ही पाई जाती है। आंतरत्वक्‌ में और कभी-कभी बाह्मत्वक्‌ के निचले स्तरों में रंगकोष्ठ पाए जाते हैं जिनके कारण चर्म रँगा हुआ दिखाई पड़ता है। कुछ सपों और छिपकलियों में चर्मरंग बदलने की शक्ति पाई जाती है। यह शक्ति गिरगिट में अधिक मात्रा में विकसित है। उरग का हृदय उभयचरों के हृदय के सदृश होता है, परंतु कई लक्षणों में उससे भिन्न होता है। उभयचरों के हृदय के सदृश उरगों का हृदय दो कोष्ठों में विभाजित होता है: दाहिना और बायाँ।

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राजदैत्य सरट (टिरैनोसॉरस रेक्स)

अलिंद (ऑरिकिल) और निलय (वेंट्रिकिल)राजदैत्य सरट (टिरैनोसॉरस रेक्स) मकरों और परिवर्मिगण (किलोनिया) में निलय भी दो काष्ठों में विभाजित होता है, किंतु दूसरे उरगों में नहीं। रोहिणी मूल (केलिस आर्टीरिओसस), जो उभयचरों में पाया जाता है, उरगों में नहीं होता और इनमें अभ्युदरीय महाधमनी (वेंट्रल एऑरटा) तीन स्वतंत्र स्कंधों में विभाजित हो जाती है जो उभयचर में नहीं होता। ये हैं (1) दाहिनी और बाई दैहिक महाधमनी (सिस्टेमिक एऑरटा), (2) फुफ्फुस धमनी (पल्मोनेरी आरटरी)। उभयचर के सदृश उरगों में दोनों दैहिक महाधमनियाँ विद्यमान रहती हैं और उनके संयोग से अभ्युदरीय महाधमनी की उत्पत्ति होती है, किंतु उरगों में सिर, ग्रीवा और हाथ में रक्त पहुँचानेवाली सब महाधमनियाँ दाहिनी देह से ही निकलती हैं।

वर्गीकरणराजदैत्य सरट (टिरैनोसॉरस रेक्स) उरगों के वर्गीकरण में खोपड़ी के शंख (टेंपोरल) प्रदेश की संरचना को बड़ा महत्व दिया जाता है। आवृतशीर्ष अनुवर्ग नामक आद्य उभयचरों में, जिनसे उरगों का विकास हुआ, शंख प्रदेश की सब हड्डियाँ एक दूसरी से मिली हुई थीं और उनके बीच कोई भी विच्छेद नहीं था। आद्य उरगों में भी यही अवस्था बनी रही। सबसे आद्य उरग मूलसरटगण (कॉटिलोसॉरिया) और वर्तमान युग के उरणों, परिवर्मिगण, में यह अवस्था मिलती है। इस प्रकार के उरगों को, जिनके शंख प्रदेश को छदि को सरंचना संपूर्ण हो, अछिद्रकरोटी (ऐनैप्सिडा) उपजाति या महागण में रखा जाता है। इसी प्रकार उरगों का संपूर्णवर्ग चार बड़ें समूहों में विभाजित किया जाता है। ये हैं : अछिद्रकरोटी (ऐनैप्सिडा), युक्तछिद्रकरोटी (सिनैप्सिडा), चतुश्छिद्रकरोटी (डायप्सिडा), द्विद्धिद्रकरोटी (पैरैप्सिडा)।

अछिद्रकरोटीराजदैत्य सरट (टिरैनोसॉरस रेक्स) ये उरग आद्य उभयचर से बहुत विभिन्न नहीं थे और कभी-कभी इनको संपूर्ण रूप से पृथक्‌ करना कठिन हो जाता है। इस वर्ग के उरग पृथ्वी पर कार्बनप्रद, गिरि और रक्ताश्म युगों में रहते थे और ये अब लुप्त हो चुके हैं। इन उरगों में अणुसरट (माइक्रोसॉरिया), चित्रपाद (सीमूरियामोर्फ़ा), और मूलसरट (कॉटिलोसॉरिया) सम्मिलित हैं। इन में इनके पूर्वज आवृतशीर्ष अनुवर्गों के शंख प्रदेश की सब हड्डियाँ विद्यमान थीं। विद्वानों की यह धारणा है कि यह समूह वास्तव में बहूद्भव (प लिफ़ाइलेटिक) है और इसका विकास पृथक्‌-पथक्‌ उनके पूर्वजों से हुआ। कुछ विद्वान्‌ अनुसरटगण को अब भी आद्य उभयचर (आवृत्त शीर्ष अनुवर्ग) या गहनदंत गण (लैबिरियोडाटा) में ही सम्मिलित करते हैं। ये उरग 1 फुट से 6 या 7 फुट तक लंबे थे और पेट के बल रेंगते थे, क्योंकि इनके हाथ पैर चलने में अधिक सहायता देने के योग्य नहीं थे। चित्रपाद प्रजाति (सिमौरिया) गिरियुग का बहुत पुराना उरग है। इसकी खोपड़ी में अंतराशंखक (इंटरटेपोरल) हड्डी पाई जाती है जो आवृतशीर्ष अनुवर्ग में विद्यमान थी, किंतु चित्रपाद प्रजाति के अतिरिक्त अन्य सब उरगों में लुप्त हो गई है। इसी प्रकार चित्रपाद प्रजाति की त्रिवेणी (टेरिगाइड) हड्डी चतुष्कोण (क्वाड्रेट) के नीचे से होकर जाती है और उसके पीछे अग्रगंडास्थि (क्वामोसैल) से मिलती है। इन हड्डियों का ऐसा पारस्परिक संबंध भी शेष उरगों में नहीं पाया जाता। चित्रपाद प्रजाति की अपेक्षा मूलसरटगण (कॉटिलोसॉरिया) की खोपड़ी की संरचना अधिक उरगों के सदृश है।

परिवर्मिगण (किलोनिया) - इस समूह के कुछ प्रतिनिधि आज भी विद्यमान है, जैसे कछुआ। कछुआ की गणना भी विद्वान्‌ अछिद्रकरोटी में ही करते हैं, क्योंकि इसकी खोपड़ी में शंख प्रदेश की हड्डियाँ आवृतशीर्ष अनुवर्ग की हड्डियों के समान हैं, अर्थात्‌ शंख छदि पूर्ण है और कोई शंख विवरक (टेंपोरल फ़ॉसा) विद्यमान नहीं है, परंतु इस धारणा के विरुद्ध यह बात पाई जाती है कि कछुओं की खोपड़ी की हड्डियाँ अछिद्रकरोटियों की खोपड़ी की हड्डियों की अपेक्षा संख्या में कम हैं। कई हड्डियाँ लुप्त हो गई हैं। कछुओं की खोपड़ी में उपरिशंखक (सुप्राटेंपोरल), उत्तरपार्श्विका (पोस्टपाराइएटैल) और चिपिट (टैबुलर) हड्डियाँ नहीं होतीं, जो अन्य अछिद्रकरोटियों में पाई जाती हैं। पृथक्‌ पथक्‌ उत्तरललाट (पोस्टफ्रॉण्टल) की ओर उतरनेत्रगुहा (पोस्टऑर्बिटल) की हड्डियों के स्थान पर केवल एक हड्डी होती है और नास्य (नैसेल), अग्रललाट (प्रिफ़ॉण्टल) और अश्रु अस्थि नामक तीन हड्डियों की जगह पर भी केवल एक हड्डी होती है। इन कारणों से कुछ विद्वान्‌ परिवर्मिगण को अछिद्रकरोटिवर्ग में स्थान देने के विरुद्ध हैं। उनकी धारणा यह है कि कछुओं की खोपड़ी की हड्डियों का विन्यास आद्य नहीं, उत्तरजात है। बहुत-सी खोपड़ियों की हड्डियों की हड्डियाँ, जिनका आद्य परिवर्मिगणों में लोप हो गया, फिर से उत्पन्न हो गई, जैसे परिवर्मिगण और पोडोक्नेमिस में।

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मीनसरट (इक्थियोसार, एक सामुद्रिक उरग) का जीवाश्म

इस जाति के जीव 8 से 10 फुट लंबे होते थे। यह जीवाश्म महासरट संस्थान (जूरैसिक) शिलाओं में पाया गया था। इसका संपूर्ण कंकाल खनिज में तथा मांस कोयले में परिवर्तित हो गया था।

कछुए - कछुओं में अन्य कई विशेषताएँ मिलती हैं। इनका शरीर एक हड्डी के प्रावर के भीतर होता है। यह प्रावर ऊपर की ओर चर्म से ढका रहता है जो मृदुकश्यपवंश (ट्राइओनिकिडी) और अप्रावरानुगण (आथीसी) के अतिरिक्त अन्य कछुओं में श्रृंगवत्‌ कठोर होता है। इनके जबड़ों में दाँत नहीं होते और नाक का छिद्र एक ही होता है। प्रावर (या कठोर कोष) के दो भाग होते हैं, एक पृष्ठीय और दूसरा प्रतिपृष्ठीय। पृष्ठीय को पृष्ठवर्म (कैरेपेस) कहते हैं और प्रतिपृष्ठ भाग को उदरवर्म (प्लैस्ट्रान)। पृष्ठवर्म के ऊपर के चर्म पर कठोर पट्ट होते हैं जिनका विन्यास पृष्ठवर्म की हड्डियों के विन्यास पर आधारित होता है। पृष्ठवर्म कई एक हड्डियों के योग से बना रहता है। बीच में एक पंक्ति आठ छोटी-छोटी हड्डियों की होती है जिसे तंत्रिकापट्ट (न्यूरल प्लेट्स) कहते हैं। प्रथम तंत्रिकापट्ट के पीछे एक कटीपट्ट (पाइगैल प्लेट) होता है। तंत्रिकापट्ट के दोनों ओर आठ पर्शुपट्ट (कॉस्टैल प्लेट्स) होते हैं जो वक्ष कशेरुकाओं की पसलियों से जुड़े होते हैं। ये पसलियाँ पर्शुपट्टों से परे पृष्ठवर्म के किनारे के प्रांत पट्टों से मिलती हैं। साधारणत: ये प्रांतपट्ट संख्या में 11 जोड़ी होते हैं। पृष्ठवर्म के तंत्रिकापटट् नीचे स्थित वक्षकशेरुकाओं के चेताशल्य (न्यूरल स्पाइन्स) से सायुज्यित (फ़्यूज्ड) होते हैं। जैसा ऊपर कहा जा चुका है, प्रावर का दूसरा भाग उदरवर्म है। यह प्रांतपट्ट से स्वयं जुड़ा होता है अथवा स्नायुओं के द्वारा जुड़ा रहता है। पृष्ठवर्म की भाँति यह भी कई एक आंतरत्वक्‌ (डर्मल) हड्डियों के जोड़ से बना होता है। ये हैं एक मध्य अंतरुदरवर्म (एंटोप्लैस्ट्रन) और चार जोड़ी अन्य हड्डियाँ-उपर्युदरवर्म (एपिप्लैस्ट्रा), अधोदरवर्म

(हाइपोप्लैस्ट्रा), द्वितोदरवर्म (हाइपोप्लैस्ट्रन) और पश्चोदरवर्म (ज़िफ़िप्लस्ट्रन)। यह माना जाता है कि अंतरुदरवर्म अन्य कशेरु कदंडियों के अंतराक्षक (इंटर्क्लैविकल) के अनुरूप है और उपर्युदरवर्म उनके अक्षक के। कुछ कछुओं में संपूर्ण उदरवर्म एक संततपट्ट के रूप में होता है, जैसा भूमि पर रहनेवाले टेस्टयूडिनिडी जाति के कछुओं में पाया जाता है। पृष्ठवर्म तथा उदरवर्म दोनों ही के ऊपर के सींग के समान कठोर अधिचर्मीय वर्म नीचे स्थित हड्डियों के ठीक ठीक अनुरूप नहीं होते। साधारणत: पृष्ठतल पर एक मध्य पंक्ति पाँच कशेरुका वर्मो की होती है, दाएँ और बाएँ तक एक पंक्ति चार पर्शुवर्मो की होती है, और किनारे किनारे 24 अथवा 25 प्रांतवर्म होते है, जिनका अगला घाटा (न्यूकैल) और पिछला कटी (पाइगैल) या पुच्छोपरि (सुप्राकॉडैल) कहलाता है। प्रतिपृष्ठतल पर 6 जोड़े वर्म होते हैं, जिनके नाम हैं (आगे से पीछे की ओर) गल (ग्यूलर), अंस्यक (ह्यू मरल), अंस (पेक्टोरल), उदरीय (ऐब्डॉमिनल), ऊरु (फ़ेमोरल) और गुद (ऐनल)। गल के आगे साधारणत: एक अंतरागल होता है और प्रांत के नीचे कुछ अध:प्रांत होते हैं जिनकी संख्या निश्चित नहीं होती है।

कछुओं के पृष्ठ में अन्य उरगों की अपेक्षा कम कशेरुकाएँ होती हैं। साधारणत : 8 ग्रैव (सर्विकल), 10 वक्षीय (थोरैसिक), 2 त्रिक (सैक्रैल) और कुछ थोड़ी सी पुच्छीय (कॉडैल्स) होती हैं, जिनकी संख्या बदला करती है।

कछुए अंडे कम देते हैं, परंतु समुद्री कछुए स्थलचर कछुओं की अपेक्षा अधिक अंडे देते हैं। जलचर कछुए अपने अंडों को किनारों के समीप मिट्टी अथवा बालू में गाड़ देते हैं। कछुए धीरे-धीरे बढ़ते हैं और इनकी आयु भी अधिक होती है। कुछ कछुए बारह वर्ष की अवस्था प्राप्त करने पर अंडे देना आरंभ करते हैं।

अधिकांश कछुए वनस्पति खाते हैं, किंतु कुछ चर्णप्रावार (मोलस्क्स), मछली इत्यादि भी खाते हैं। कछुए स्थलचर होते हैं, नदी और पोखरों में पाए जाते हैं और समुद्र में भी तट के निकट रहते हैं। ये अधिकतर गरम देशों में ही मिलते हैं। कछुओं और अन्य उरगों के शरीर की संरचना में बहुत अंतर पाया जाता है और ऐसे अंतर सबसे प्राचीन उत्तररक्ताश्मयुग के कछुओं में भी पाए गए हैं।

कछुओं का वर्गीकरण-कछुए दो उपगणों में विभाजित किए जाते हैं-(1) आथीसी और (2) थिकौफ़ोरा

आथीसी- इन कछुओं की कशेरुकाएँ और पसलियाँ स्वतंत्र होती हैं, पृष्ठवर्म से जुड़ी नहीं होतीं। चर्म पर सींग के समान कठोर पट्ट नहीं होते और बाहु तथा पाद क्षेपणी सदृश तथा बिना नखों के होते हैं। ये समुद्री प्राणी हैं और हिंद, प्रशांत तथा अंध महासागर के उष्ण कटिबंध प्रदेश में पाए जाते हैं।

थिकौफ़ोरा - इन कछुओं की कशेरुकाएँ तथा पसलियाँ पृष्ठवर्ग से जुड़ी होती हैं। यह समूह कई एक कुलों में विभाजित है। केलिडिडी कुल के कछुओं की पूँछें लंबी होती हैं और इनकी अँगुलियाँ जालयुक्त (वेब्ड) होती हैं। ये बड़े प्रचंड होते हैं। केलिड्रा उत्तरी अमरीका में पाया जाता है और खाया भी जाता है। टेस्टयूडिनिडी कुल के कछुए आस्ट्रेलिया और पूर्वी एशिया को छोड़ अन्य सब प्रदेशों में पाए जाते हैं। इनमें स्थलचर और जलचर दोनों प्रकार के कछुए शामिल हैं। कछुआ, बटागर, हरदेला और चायबसिया भारत में पाई जानेवाली जातियों के नाम हैं। टेस्टयूडो पालिफ़ीमस उत्तरी अमरीका में पाया जाता है। इनमें कुछ बड़े डील के होते हैं, जिनके कवच 55 इंच व्यास तक के होते हैं। गालापागस, ऐलडीब्रा इत्यादि स्थानों के कछुए 150 वर्ष या इससे भी अधिक समय तक जीवित रहते हैं। केलोनाइडी कुल के सब कछुए समुद्री होते हैं। हरा कछुआ

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सिस्टडो कैरोलिना नामक पेटीरूपी कच्छप (बॉक्स टटल)

(केलोन मिडास) अंध, हिंद तथा प्रशांत महासागरों में पाया जाता है। यह वनस्पति खाकर रहता है। इसके मांस, वसा तथा कवच के भीतर के संयोजी ऊतक का झोल (सूप) बनाया जाता है। श्येनचंचु कश्यप (केलोन इंब्रिकेटा) के सींग सदृश अधिचर्मीय वर्म से चश्मों के कूर्म कवचवाले फ्रेम बनते हैं, यद्यपि अब प्लैस्टिकों के कारण इसका प्रचलन कम हो गया है। ये सब कछुए और इनके अतिरिक्त अन्य कई कुल क्रिप्टोडिरा वर्ग में रखे जाते हैं।

प्लिउरोडिरा वर्ग के सब कछुए मीठे जल में रहनेवाले हैं। पोडोक्नेमिस एक्सपैंसा खाने के काम में आता है और इसके अंडों से तेल निकाला जाता है। यह दक्षिण अमरीका में पाया जाता है। ट्रायोनिकीडी वर्ग के कछुए एशिया, अफ्रीका और उत्तरी अमरीका की नदियों में पाए जाते हैं। ये छिछले पानी में मिट्टी में रहते हैं। ट्रायोनिक्स फ़ेरॉक्स संयुक्त राज्य (अमरीका) में पाया जाता है। कहा जाता है, इसका मांस हरे कछुए के मांस से अधिक स्वादिष्ट होता है।

मकरगण (क्रोकोडीलिआ) - ये चतुश्छिद्र करोटि अनुवर्ग (डायप्सिडा) में रखे जाते हैं। ये नदी में रहते हैं और इनमें कुछ बहुत विशालकाय होते हैं। इनके शरीर के ऊपर होते हैं जो अधिचर्म के सींग के समान कठोर होने से बनते हैं। इनके पृष्ठ पर और कुछ कुछ के उर के ऊपर भी शल्कों के नीचे हड्डी के पट्ट होते हैं। इनके कशेरुकदंड में साधारणत: ९ ग्रैव (सर्विकल), 11 (या 12) पृष्ठीय (डार्सल), 3 (या 4) कटिदेशीय (लंबर), 2 त्रैक (क्रैसेल), और 35 (या अधिक) पुच्छीय (कॉडैल) कशेरुकाएँ होती हैं। खोपड़ी की पृष्ठीय और पार्श्वीय हड्डियों में छोटे-छोटे गढ़े होते हैं। प्रौढ़ जंतुओं में पार्श्विका और ललाटकीय अस्थियाँ एक एक होती हैं, युग्मित नहीं। उपजंभ (मैक्सिले), अग्रहनु (प्रिमैक्सिले) और तालव्य अस्थि (पैलाटाइंस)में, और बहुतों में त्रिवेणी (टेरिगायड्स) में भी पट्ट होते हैं जिनके बीच में मिलने से हड्डियों का एक कठोर पट्ट बन जाता है और इस कारण नाक का आंत्रिक छिद्र बहुत दूर पीछे, खोपड़ी के आधार पर, होता है।

कर्णपटह गुहा (टिंपैनिक कैविटी) से ग्रसनी (फैरिंग्स) में पटहपूर नाल (यूस्टेकियन कैनैल्स) जाते हैं और आसपास की हड्डियों में वायु के मार्ग (एयर पैसेजेज़) जाते हैं।

घड़ियाल-घड़ियाल (क्रोकोडोइल्स) हिंस्र और प्रचंड जंतु हैं और बड़ी-बड़ी नदियों में रहते हैं। इनमें कुछ मनुष्य के लिए भी भयंकर और घातक हैं। ये बहुत दिनों तक जीवित रहते हैं और जीवन भर बढ़ते रहते हैं। ये ध्वनि भी पैदा करते हैं। अंडे ये बालू में देते हैं या किनारे के छोटे-छोटे गढ़ों में।

आद्य घड़ियाल समुद्री थे और महासरट युग में पश्चात्‌ ही मीठे पानी में रहनेवाले घड़ियाल मिलते हैं। परामकर (पैरासुकिया) गण और मेसोसुकिया उपगण के उरग वर्तमान काल के घड़ियालों के सदृश थे, परंतु ये लुप्त हो चुके हैं। वर्तमान युग के घड़ियाल, जो सब युसूकिया उपगण में स्थान पाते हैं, नक्र (ऐलिगेटर), कुंभीर (केमैन), मकर प्रजाति (क्रोकोडाइलस), गंगामकर प्रजाति (गैविऐलिस), ऑस्टिओलीमस और टोमिस्टोमा हैं। वर्तमान काल के घड़ियाल कई कुलों में विभाजित किए जाते हैं। गैविऐलिडीकुल का गंगामकर उत्तरी भारत की बड़ी नदियों में पाया जाता है। यह मछली खाता है और मनुष्य के लिए हानिकर नहीं है।

गंगामकर के जीवाश्म (फ़ॉसिल्स) शिवालिक पहाड़ की अतिनूतन युग की चट्टानों में मिलते हैं। मकर कुल के घड़ियालों के जीवाश्म उत्तर खटीयुत युग तक रहते थे, पर अब ये यूरोप से लुप्त हो चुके हैं। मकर प्रजाति अफ्रीका, दक्षिणी, उत्तरी आस्ट्रेलिया और उष्ण अमरीका में पाई जाती है। नक्र का सिर छोटा और चौड़ा होता है। यह चीन और उत्तरी अमरीका में पाया जाता है। कुंभीर मध्य और दक्षिणी अमरीका में मिलता है।

घड़ियालों की गणना चतुश्छिद्रकरोटि अनुवर्ग में होती है। इनकी खोपड़ी में दो पार्श्वशंखक खात (लैटरल टेंपोरल फ़ॉसी) और दो पार्श्वशंखक वीथिकाएँ (आरकेड्स) होती हैं। नील नदी (उत्तरी अफ्रीका) का घड़ियाल मनुष्य पर आक्रमण करता है और अवसर प्राप्त होने पर मनुष्य को खाता है। इसी कारण नील के आसपास रहनेवाले लोग इससे बहुत भयभीत रहते हैं। प्राचीन काल के मिस्रनिवासी इस भयंकर जीव की पूजा करते थे और इसको सूर्योदय का प्रतीक मानते थे। कुछ शहरों में तो ये पाले भी जाते थे और सोने के गहनों से विभूषित किए जाते थे। मृत्यु के पश्चात्‌ शव सुगंधमय ओषधियों में रखकर भूगर्भ स्थित समाधिस्थान में गाड़ दिया जाता था, जिस प्रकार वहाँ के राजा लोग गाड़े जाते थे। यह घड़ियाल लगभग 18 फुट लंबा होता है।

भारत से आस्ट्रेलिया तक बड़ी नदियों के ज्वार-नद-संगमों में एक घड़ियाल पाया जाता है जो नील के घड़ियाल से भी अधिक भयंकर और हिंसक हैं। यह कभी-कभी स्थल से दूर समुद्र में तैरता मिलता है। यह 20 फुट लंबा होता है।

भारत, मलाया और लंका की नदियों में एक और घड़ियाल (मगर) पाया जाता है जो साधारणत: 12 फुट से बड़ा नहीं होता और डरपोक होता है।

गोधिकानुगण (लैसरटिलिया) - छिपकलियों (लिज़ार्ड्‌स) की खोपड़ियों में केवल एक पार्श्वशंखक खात होता है और यह अब भी भली-भाँति निश्चित नहीं है कि यह खात युक्तछिद्रकरोटी (सिनैप्सिडा) के खात का समजात (होमोलोगस) है, अथवा यह चतुश्छिद्र करोटियों के ऊपरी पार्श्वशंखक खात का समजात माना जाता है, तो इसके नीचे की दो हड्डियाँ जिनसे शंखकवीथिका बनती है, पश्चनेत्रकोटरीय (पोस्ट ऑर्बिटल) और अग्रगंडास्थि (स्क्वैमोसैल) मानी जाएँगी। परंतु यदि यह स्वीकार किया जाए कि यह खात युक्तछिद्रकरोटियों के शंखक खात के समान है, तो पार्श्वशंखक वीथिका को हड्डियाँ गंडिकीय (जूगल) और चतुष्क गंडिकीय (क्वाड्रेटोजूगल) मानी जाएँगी। कई विद्वानों की यह धारणा है कि छिपकलियों का विकास न्यूज़ीलैंड के स्फानदंत (स्फ़ैनॉडॉन) नामक उरग के सदृश किसी चतुश्छिद्रकरोटि उरग से हुआ। छिपकलियों के आद्य पूर्वजों को खोपड़ी में चतुश्छिद्र करोटियों के समान दो पार्श्वशंखक खात और दो पार्श्वशंखक वीथिकाएँ प्रस्तुत थीं, किंतु चतुष्कगंडिकीय हड्डी, जो गंडिका और चतुष्कोणस्थि (क्वाड्रेट) के बीच में थी, क्रमश: छोटी होती गई और अंत में लुप्त हो गई। इसी कारण वर्ममान काल की छिपकलियों की खोपड़ी में गंडिकास्थि और चतुष्कोणास्थि एक दूसरे से पृथक्‌ हैं और निचला शंखकखात, नीचे की ओर वीथिका न होने के कारण, खुला हुआ है।

कुछ प्राणिविज्ञ इस विचार को स्वीकार नहीं करते। उनकी धारणा यह है कि छिपकलियों का विकास किसी ऐसे उरग से हुआ जिसकी खोपड़ी में एक ही पार्श्वशंखक खात था और जो गिरि-कार्बनप्रद-युगीय तनुसरट प्रजाति (आरेओसेलिस) अथवा महासरट युगीय पार्श्वसरट (प्लिउरोसॉरस) के समान था। उस आद्य पूर्वज को खोपड़ी में एक ही चौड़ी पार्श्वशंखक वीथिका थी जो नीचे को ओर क्रमश: संकीर्ण होती गई। छिपकली की खोपड़ी के शंखक खात के पीछे की दो अस्थियों के विषय में भी मतभेद है। उनमें से बाह्य हड्डी, जी गंडिका (जूगल) की ओर है, अग्रगंडास्थि (स्कवैमोसैल) समझी जाती है। कुछ इसकी परिचतुष्कोणास्थि (पैराक्वाड्रेट) कहते हैं, कुछ इसकी पूर्वाग्रगंडास्थि (प्रोस्कवैमोसैल) समझते हैं और कुछ चतुष्कयुगीय (क्वाड्रेटी जूगल)। दूसरी हड्डी को, जो भीतर की ओर है, अधिकांश प्राणिविज्ञ उपरिशंखक (सुप्राटेंपोरल) कहते हैं, परंतु कुछ अग्रगंडास्थि (स्क्वैमोसैल) और कुछ चिपिटास्थि (टैबुलर) भी समझते हैं। इस विवाद का निर्णय भी अभी पूर्ण रूप से नहीं हुआ है।

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बाइपेड कैनिकुलेटस नामक केवल दो पैरों की कृमि-छिपकली

यह मेक्सिकों में पाई जाती है। कुल लंबाई 10 इंच होती है।

छिपकली का शरीर पतला और लंबा होता है। यद्यपि इनके बाहु और पाद होते हैं, तथापि ये इतने छोटे और दुर्बल होते हैं कि शरीर को धरातल से उठी हुई स्थिति में रखकर नहीं चल पाते। चलते समय यह शरीर को केवल आगे ढकेल सकते हैं और चढ़ने, खोदने, और चिपकने के भी काम में आते हैं। साधारणत: हाथ और पैर में पाँच-पाँच अँगुलियाँ होती हैं जिनमें नखर होते हैं । किसी किसी में तो हाथ और पैर इतने छोटे होते हैं कि छिपकली ऐसा साँप प्रतीत होती है जिसके शरीर में दो जोड़ी ठूँठ जड़े हों। कैमिसारा ऐसी ही एक छिपकली है। कूटगोधा (सिउडोपस) और सर्पगोधा (पाइगोपस) में पैरों के अवशेष तो होते हैं किंतु बाहु सर्वथा लुप्त हो गए हैं। इसके विरुद्ध काइरोटीज़ में केवल बाहु होते हैं, पाद नहीं। अपादा प्रजाति (एंग्विस), गुप्ताक्षिकर्ण प्रजाति (एंफ़िसबीना) और ऐनेलिट्रॅपिडी कुल की छिपकलियों में बाहु तथा पाद दोनों ही नहीं होते और वे देखने में साँप मालूम होती हैं। सब छिपकलियों में अंस (पेक्टोरल) और श्रोणि (पेल्विक) मेखलाएँ होती हैं। इनमें साधारणत: कर्णपटह गुहा और कर्णपटह झिल्ली भी होती हैं, केवल गुप्ताक्षिकर्ण कुल में नहीं। अपादा प्रजाति (ऐनेलिट्रॉपिडी), कृकलास प्रजाति (कैमीलिऑण्टिडी) इत्यादि में कर्णपटह झिल्ली या तो नहीं होती या चर्म से ढकी होती है।

चर्म पर सींग के समान कड़े अधिवर्मीय शल्क होते हैं जो चर्मपिंडिका (डर्मल पैपिली) के ऊपर होते हैं और एक दूसरे पर अतिच्छदित होते हैं। मरुगोधिका वंश (सिंसिडी) और अपादा कुल (एंग्विडी) में चर्मपिंडिका में अस्थिपट्ट (ऑस्टिओडर्म्स) उत्पन्न हो जाते हैं जो नीचे की अस्थियों से जुड़ जाते हैं। गुप्ताक्षिकर्ण कुल की छिपकलियों का चर्म चिकना और शल्करहित होता है। सिर पर के शल्क साँपों के शल्क के समान होते हैं। अधिचर्म (एपिडर्मिस) का बाह्मस्तर शल्कों के साथ साथ नियतकालिक रूप से छिपकर गिर जाता है, साधारणत: टुकड़े टुकड़े के रूप में, परंतु अपादा प्रजाति इत्यादि में संपूर्ण एक खंड में।

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ड्रैको वोलैंज़ नामक उड़नेवाली छिपकली

इसे फ्लाइंग ड्रैगन भी कहते हैं। यह मैलेयेशिया में पाई

जाती है। वयस्क की लंबाई 8 से 10 इंच होती है।

पहली उरोस्थिक पसलीवाली कशेरुका के आगेवाले सब कशेरुक, ग्रैव कशेरुक माने जाते हैं। कटि कशेरुक एक या दो होते हैं, त्रिक कशेरुक दो होते हैं और पुच्छ कशेरुक बहुत से होते हैं। तृणांजन वंश (इग्वैनिडी) के कशेरुक में प्रि आर पोस्ट-ज़ाइगीफ़िसेस के अतिरिक्त साँपों के समान चापखात (ज़ाइग्रैट्रा) और चापस्फान (ज़ाइगोस्फ़ीन्स) भी होते हैं। छिपकलियों का खोपड़ी में जतुकपक्षस्थि (ऐलिस्फ़ीनाएड), अक्षिजतुक (ऑर्बटोस्फ़ोनॉएड) और जतुकाग्रास्थि (प्रिस्फ़ीनॉएड) नहीं होते। हर एक में ऐनिईला, गुप्ताक्षिकर्ण कुल और कृकलास प्रजाति का छोड़कर एक जोड़ी उपरित्रिवेणी (एपिष्टेरिगॉएड) हड्डी होती हैं जो पार्श्विका (पैराइटल) से त्रि-अंगिका (टेरिगोइड) तक विस्तृत होती है। साधारणत: एक ही अनुकपाल मुंडिका (औक्सिपिटल कौडाइल) होती है। जो मुख्यत: आधार अनुकपाल (बेसी-आक्सिपटिल) से उत्पन्न होती है, परंतु जिसको उत्पत्ति में पार्श्व-अनुकपाल (एक्सआक्सिपिटल) भी भाग लेते हैं। किंतु गुप्ताक्षिकर्ण कुल में दो अनुकपाल मुंडिकाएँ होती हैं। साधारणत: प्रौढ़ अवस्था में पार्श्विकाएँ जुड़कर एक हो जाती हैं परंतु छिपकली में ये अलग अलग हो रहती हैं। ललाट भी किसी किसी में जुड़कर एक हो जाते हैं।

छिपकलियों में लार ग्रंथियाँ नहीं होतीं, ओष्ठग्रंथियाँ विद्यमान रहती हैं। आगार-गोधिका और कृकलास (गिरगिट) के अतिरिक्त किसी छिपकली में स्वरतार (वोकल कॉर्डूस) नहीं होते। गिरगिट और कुछ आगार-गोधिकाओं में फेफड़ों के पिछले भाग से अंधनाल (डाइवर्टिकुलर) निकलते हैं जो आंतरंग (विसरा) के बीच में पड़े रहते हैं। साँपों के सदृश छिपकलियों में दोनों फेफड़े बराबर न होकर छोटे बड़े होते हैं।

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बैसिलिस्कल विट्टेटस नामक पट्टित छिपकली

इसका निवासस्थान मेक्सिको से एक्वाडोर तक

है। पूरी लंबाई लगभग 2 फुट होती है।

छिपकलियों में एक पार्श्विका अंग होता है जिसकी सरंचना नेत्र सदृश होती है। इस कारण इसको मध्य नेत्र (पिनियल आइ) कहते हैं। यह खोपड़ी के ऊपर चर्म के नीचे होता है और इसके ऊपर चर्म रंगरहित होता है। ऐसी दशा में इसके ऊपर का अधिचर्मीय शल्क स्वच्छा (कोर्निया) के सदृश होता है।

अधिकांश छिपकलियाँ अंडे देती हैं, किंतु कुछ ऐसी भी हैं जो बालजंतु को जन्म देती हैं जैसे जरायुज गोधिका (लासर्टा वाइविपारा), सूक्ष्मनेत्र अपादा (एंग्विस फ्रैजिंसिस), जरायुगोधा प्रजाति (सेप्स), गिरगिट (कामीलियन)। अंडों का शल्क चर्म सदृश होता है किंतु किसी किसी का कड़ा भी होता है। अधिकांश छिपकलियाँ हानिकर नहीं होती। वे कीड़ेमकोड़े खाती हैं।

उत्तर प्रदेश के देहातों में वेदार प्रजाति (वैरेनस) के बच्चों को विषखोपड़ा कहते हैं और यह कहा जाता है कि ये विषैले होते हैं और इनके काटने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। यह असत्य है। विषगोधिका (हीलोडर्मा) के अतिरिक्त, जो मेक्सिको और ऐरिज़ोना में पाई जाती है, किसी भी छिपकली में आज तक विषग्रंथियाँ नहीं पाई गई हैं।

भारत और मलाया में ऐसी कुछ छिपकलियाँ पाई जाती हैं जो थोड़ी दूर तक उड़ सकती हैं जैसे ड्रेको वोलैंज। इनके शरीर के दोनों ओर चर्म झिल्लीमय पल्लव (फ्लैप्स) के रूप में विस्तृत रहता है, जिसकी सहायता से ये 60 फुट या कुछ अधिक दूर तक विसर्पी (ग्लाइडिंग) कुल की कुछ छिपकलियाँ होती हैं जिनकी बैसिलिस्क कहते हैं। प्राचीन काल में लोगों का विचार था कि ये छिपकलियाँ बड़ी विषैली हैं। यह धारणा भी असत्य है।

सर्प - सर्पों की विशिष्ट आकृति, जिसके कारण ये तुरंत पहचान लिए जाते हैं, यह है कि इनके बाहु तथा पाद नहीं होते। ये पतले और लंबे होते हैं। इनकी आँखों में पृथक्‌ -पृथक्‌ पलक तथा इनके शरीर में कर्णपटह गुहा और त्रिक नहीं होते। कशेरुक दो ही श्रेणी में विभाजित किए जाते हैं, पुच्छीय तथा अग्रपुच्छीय। ज़ाइगोपॉफ़िसीज़ के अतिरिक्त इनमें संधियोजन (आर्टिकुलेशन) के लिए चापस्फान और चापखात होते हैं। द्विवेण्यस्थियाँ (शेवरन बोन्स) नहीं होतीं, परंतु पुच्छकशेरुक के अनुप्रस्थ प्रवर्धो की अवरोही शाखाएँ पुच्छीय वाहिकाओं से वही संबंध रखती है जो द्विवेण्यस्थियाँ।

सर्पों की खोपड़ी में कई विशेषताएँ पाई जाती हैं। इसमें अंतर्नेत्रकोटरीय पट (इंटरऑप्टिकल सेप्टम) और उपरित्रिवेणी (एपिप्टेरिगॉएड) अस्थि नहीं होती। खोपड़ी की अगली और मध्य की पार्श्वभित्तियाँ पार्श्विका और ललाट के प्रवर्ध (प्रोसेस) से बनती हैं। इसमें कलांतराल (फ़ांटानेल्स) और खात (फ़ॉसी) नहीं हैं। गंडिका (जूगल) और चतुष्कयुगीय (क्वाड्रेटो जूगल) नहीं होते और पश्च ललाट तथा अग्र गंडास्थि (स्क्वैमोसैल) नहीं मिलते। अधर हनु (जॉ) की हनूच्छाखाएँ (रेमाइ) एक दूसरे के संगम (सिंफ़िसिस) पर सायुज्यित नहीं होतीं, केवल लचीली स्नायुओं (लिगैमेंट्स) से बँधी होती हैं। पार्श्विका एक होती है, जिसके दाहिने ओर बाएँ प्रवर्ध खोपड़ी के तल पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं।

अधर हनु में केवल छह हड्डियाँ होती हैं, किंतु कॉरोनॉएड कभी-कभी नहीं होती। अधिकांश विषहीन सर्पो में उपजंभ (मैक्सिली), तालव्यास्थि (पैलाटाइन्स), त्रिवेणी (टेरिगाएड्स) और दंतास्थि (डेंटरीज़) पर दाँत होते हैं। चतुष्कोणास्थि अग्रगंडास्थि से संधिबद्ध (आर्टिकुलेटेड) होती है, स्वयं खोपड़ी से नहीं जुड़ी होती। ज़ेनोपेल्टिस और अजगर (पाइथन) में अग्रगंडास्थि खोपड़ी की पार्श्वभित्ति में लगी होती है और चतुषकोंणास्थि स्वयं खोपड़ी से लगी प्रतीत होती है, परंतु अन्य साँपों में नहीं। पृदाकुवंश (वाइपेरिडो) में उपजंभ छोटे होते हैं। और अग्रललाट से गतिशील विधि से संधिबद्ध होते हैं। दोनों उपजंभों में एक एक विष के दाँत होते हैं। जब मुँह बंद रहता है तो विषदंत पीछे की ओर मुड़े रहते हैं और मुँह की छत के साथ-साथ रहते हैं।

सर्पो में बाहँ और असंमेखला नहीं होती और अधिकांश में पाद और श्रोणिप्रदेश भी नहीं होते। परंतु अजगर कुल (बोइडी), अंधसर्पवंश (टिफ़लापिडी) और ज़ेनोपेल्टिडी में श्रोणिप्रदेश और पाद के अवशेषक मिलते हैं।

सर्पों का आहार - साँप अपने आहार को समूचा निगल जाता है। यह मेंढक और छोटे-छोटे कृंतक (रोडेंट्स) इत्यादि को खाता है। इसके दाँत केवल शरीर को पकड़े रहने के काम आते हैं। विषधर सर्पों में उपजंभ-दंतों पर आगे की ओर एक खाँच (ग्रूव) होता है। पृदाकुवंश (वाइपेरिडी) में उपजंभ दंतों पर खाँच नहीं होता, परंतु अधश्चर्म पिचकारी (हाइपोडर्मिक सिरिंज) की सुई के समान। ऊपरी और निचले जबड़े में ओष्ठग्रंथियाँ होती हैं। ऊपरी ओष्ठग्रंथियाँ बन जाती हैं। पृदाकुवंश में विषग्रंथि की नाली विषदंत की जड़ पर खुलती है, और अन्य विषधरों में मुहँ में। जिह्वा लंबी और पतली होती है और अग्र दो भागों में विभाजित रहता है। इसमें ज्ञानेंद्रियाँ बहुत होती है और यह स्पर्शाग का काम देती है। अवस्कर (क्लोएका) में मूत्राशय नहीं होता। यह धड़ और पूँछ की संधि पर होता है। बायाँ फेफड़ा दाहिने की अपेक्षा छोटा होता है और अधिकांश विषधर साँपों में केवल एक ही फेफड़ा होता है। अजगर अपने शिकार को शरीर की लपेट में दबाकर लंबा और पतला कर मार डालता है और तब उसे निगलता है। कुछ विषैले साँप शिकार को विष से मारने के बाद निगलते हैं, परंतु अधिकांश साँप शिकार को जीवित ही निगल जाते हैं। आँख की पलकें एक दूसरे से सायुज्यित होती हैं, इसी कारण साँप पलकहीन दिखाई पड़ते हैं।

सर्पों की श्रेणियाँ-साँप तीन श्रेणियों में विभाजित किए जाते हैं। एक श्रेणी में अंधसर्पवंश (टिफ़्लॉपिडी), अजगर (बोइडी), लेप्टोफ़िलोपिडी, अम्लिडी, यूरोपेल्टिडी और ज़ेनोपेल्टिडी कुल रखे जाते हैं। बोइडी कुल दो उपकुलों में विभाजित होता है-उपकुल बोइनी और पाइथोनिनी। दूसरी श्रेणी में अविषाहि (कोल्यूब्रिडी), कृष्णसर्प (इलैपिडी), जलसर्प (हाइड्रोफ़िडी) कुल रखे जाते हैं। अविषाहि कुल (कोलुब्रिडी) कई उपकुलों में विभाजित होता है। ये हैं ऐक्रोकॉर्डिनो, कॉलुब्राइनी, डैसिपेलिटनी, ऐंब्लिसेफ़ालिनी, हौमालोप्सिनी, डिप्साडोमॉफ़िनी और एलाकिस्टोडांटिनी। तीसरी श्रेणी में वाइपेरिडी और क्रोटेलिडी कुल आते हैं।

अंधसर्प कुल (टिफ़्लापिटी) के सर्प बिल में रहते हैं और नई और पुरानी दुनिया के उष्ण प्रदेशों में पाए जाते हैं। ये कदाचित्‌ ही 14 इंच से अधिक लंबे होते हैं। इनके जबड़ों में दाँत नहीं के बराबर होते। ये कीटों के डिंभ और दीमक खाते हैं और बहुधा दीमकों के घोंसलों में रहते हैं। श्रोणिप्रदेश और पाद के अवशेषक चर्म के नीचे छिपे पाए जाते हैं। अंधसर्प जाति (टिफ़्लोपस) सबसे बड़ी जाति है। ये सब विषहीन होते हैं।

लेष्टोफ़िलोपिडी कुल के साँप टिफ़्लोपिडी की भाँति बिल में रहनेवाले हौं और छोटे तथा चमकीले होते हैं। दाँत केवल नीचे के जबड़े में होते हैं। श्रोणिप्रदेश के अवशेष टिफ़्लोपिडी के श्रोणिप्रदेश के अवशेष की अपेक्षा बड़े होते हैं। लेप्टोफ़िलॉपस जाति एशिया, अफ्रीका, अमरीका और पश्चिमी हिंद-द्वीप समूह में पाई जाती है।

अजगरवंश (पाइथानिनी) के साँप विशालकाय और विषहीन होते हैं। अजगर (पाइथन) एशिया, मलाया, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में मिलता है। बोइनीवंश के साँप भी बड़े बड़े और विषहीन होते हैं। बोआ कंस्ट्रिक्टर 8-10 फुट और कभी कभी 15 फुट लंबा होता है। यह दक्षिणी एशिया, उष्ण, अमरीका, उत्तरी अफ्रीका और न्यूगिनी में पाया जाता है।

ऐनिलिडी जाति के साँप संख्या में बहुत कम हैं, केवल लगभग छह जातियाँ। श्रोणिप्रदेश और पाद के अवशेष बहुत छोटे होते हैं। ये लगभग एक गज लंबे होते हैं ओर बिल में रहते हैं। ये दक्षिणी अमरीका, लंका, मलय द्वीपसमूह और इंडोचाइना में पाए जाते हैं। ये विषहीन होते हैं। इलिसिआ चमकदार, मूंगे के रंग का लाल होता है और उष्ण अमरीका में पाया जाता है। यूरोपेल्टिडी जाति के साँप ऐनिलिडी के समान होते हैं, परंतु इनके शरीर में श्रोणि और पाद के अवशेष नहीं होते। ये भी विषहीन होते हैं। ज़ेनोपेल्टिडी में केवल एक जाति है जो दक्षिणी पूर्वी एशिया में पाई जाती है। ये साँप विषहीन हैं।

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कोरेलस कूकियाइ नामक वृक्षवासी अजगर का सिर

यह अजगर पतला तथा अत्यंत क्रोधी होता है। इसका

निवास दक्षिण अमरीका का उष्ण कटिबंध है। इसकी

लंबाई लगभग 7 फुट होती है।

कोलब्रिडी कुल के साँप संख्या में बहुत हैं-250 प्रजाति और 1,000 जाति से अधिक। ऐक्रोकॉर्डिनी, कोलुब्रिनी, डेसिपेल्टिनी, और ऐंब्लिसेफ़ेलिडी जातियों के साँप विषहीन हैं। हॉमालॉप्सिनी के साँपों में विषग्रंथि और विषदंत होते हैं। परंतु इनका विष बहुत शक्तिशाली नहीं होता। यह दक्षिणी एशिया, मलय द्वीपसमूह, न्यूगिनी और उत्तरी आस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। डिप्साडोमॉफ़िनी के साँप विषैले होते हैं, परंतु इनके विष के दाँत जबड़ों (जंभों) में पीछे की ओर होते हैं। ये नई और पुरानी दुनिया के गरम देशों में पाए जातें हैं। एलाकिस्टोडांटि में एक ही जाति है। इसके विष का दाँत भी पीछे की ओर होता है। एलापाइडी के सर्प सब सर्पों से अधिक विषैले हैं। कालानाग (कोब्रा), करैत, मांबा, कृष्णसर्प (ब्लैक स्नेक), चित्र सर्प (टाइगर स्नेक) और डेथ ऐडर सब इसी कुल में आते हैं। 30 प्रजातियों और 150 जातियों से अधिक के सर्प पुरानी दुनिया में मिलते हैं। माइक्रूरस (ईलैप्स) अमरीका के संयुक्त राष्ट्र और उष्ण अमरीका में मिलता है। एलापाइडी जाति के सर्पो के मुँह में विष के दो दाँत होते हैं, जो छोटे होते हैं और ऊपरी जबड़े (उपरिक जंभ) में आगे की ओर होते हैं। विषग्रंथि बहुत बड़ी होती है और विष बहुत शक्तिशाली होता है। हाइड्रोफ़िलिडी जाति के साँप समुद्री हैं और सब विषधर हैं। ये बहुधा समुद्र के किनारे से लगभग 1,000 मील तक की दूरी पर झुंड के झुंड मिलते हैं। इनकी पूँछ चप्पू (पैडल) की भाँति होती है।

वाइपेरिडी कुल के सर्प पुरानी दुनिया में मिलते हैं। इनके विषदंत बहुत बड़े होते हैं। ऐडर (यूरोप), रसेल का वाइपर (भारत), सींगदार वाइपर (अफ्रीका का मरुस्थल), पफ़ ऐडर (अफ्रीका), गैबून वाइपर और गैंडा वाइपर (राइनोसरस वाइपर) सब इसी कुल के सर्प हैं। इनका धड़ बहुत मोटा होता है और सिर चपटा और त्रिकोणाकार।

क्रौटैंलिडी में पिट वाइपर्स सम्मिलित हैं। इनके सिर के दोनों ओर आँख और नाक के छिद्रों के बीच एक छिद्र होता है। ये नई और पुरानी दोनों दुनिया में पाए जाते हैं। नई दुनिया में लगभग 50 जातियाँ और पुरानी दुनिया में लगभग 30 जातियाँ पाई जाती हैं। ये साँप अफ्रीका में नहीं मिलते। कुछ पिट वाइपर्स, जो छोटे और पतले होते हैं, वृक्षों पर रहते हैं। अमरीका के रैटल स्नेक, उष्ण अमरीका का बुश मास्टर और फ़ेयर ड लांस इसी कुल में आते हैं। इन सब सर्पो के विषदंत बड़े बड़े होते हैं।

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पिट वाइपर नामक सर्प का सिर

यह रैटल स्नेक जाति का सर्प उत्तरी और

दक्षिणी अमरीका में पाया जाता है

पाइथन रेटिकुलेटस दुनिया का सबसे बड़ा साँप है, जो पूर्वी भारत, मलाया, बर्मा, हिंदचीन और फिलिपाइन्स में मिलता है। यह 34 फुट तक लंबा होता है। पाइथन मालरस 25 फुट तक लंबा होता है और यह भारत, मलाया और जावा में मिलता है। उष्ण दक्षिणी अमरीका का ऐनाकॉण्डा (यूनेक्टेस म्युरिनस) 25 फुट लंबा होता है और आस्ट्रेलिया का पाइथन ऐमिथिस्टिनस भी लगभग इतना ही लंबा होता है। बोआ कांस्ट्रिक्टर (कांस्ट्रिक्टर) नई दुनिया में पाया जाता है। यह ऐनाकॉण्डा से छोटा और देखने में बहुत सुंदर होता है। यह 15 फुट तक लंबा होता है।

कोलुब्रिडी कुल में ऐसे भी साँप हैं जो विषैले होते हैं, परंतु ये हानिकारक नहीं होते, क्योंकि इनका विष शक्तिशाली नहीं होता और इनके विष के दाँत (एक या अनेक) जबड़े में पीछे की ओर होते हैं। जिससे ये भली-भाँति काट नहीं सकते। इनके काटने से इनका शिकार स्तंभित हो जाता है, जिससे उसे निगलने में सुभीदा होता है। क्रिसोपिलिआ ऑर्नाटा इसी प्रकार का एक साँप है जो भारतवर्ष, बर्मा, मलाया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और दक्षिणी चीन में मिलता है। यह साँप एक गज से छोटा होता है। इसका धड़ मोटा होता है और पसलियों के फैलने से चौड़ा और चपटा हो जाता है। यह छिपकलियाँ खाता है और डरने पर उड़कर बहुत दूर पहुँच सकता है। उष्ण अमरीका का एक साँप सिउडो-बोआ क्लीलिया है। यह विषैले साँपों पर आक्रमण करता है, उनको दबाकर मार डालता है और अपने से कुछ ही छोटे वाइपरों तक को निगल जाता है। विषधर साँपों के काटने का इसपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। डिसफ़ॉलिडस टाइपस दक्षिणी अफ्रीका का इसी कुल का एक साँप है, परंतु इसका विष शक्तिशाली है और इसके काटने से मनुष्य मर जाता है।

यूरोप में सब विषधर साँप वाइपेरिडी कुल के हैं और ये संख्या में बहुत कम हैं। वाइपेरा ऑर्सिनाइ आस्ट्रिया में बहुत पाया जाता है। इसका विष अन्य वाइपर्स के विष के समान शक्तिशाली होता है, परंतु यह काटता नहीं है और इसको बच्चे बहुधा पकड़ लेते हैं।

भारतवर्ष और मलाया में वाइपर बहुत कम पाए जाते हैं। वाइपर की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई होगी। वहाँ सबसे अधिक संख्या में नाना प्रकार के वाइपर पाए जाते हैं। यूरोप के वाइपरों को इन्हीं का उत्तरी फैलाव समझा जाता है। स्यूडोसिरैस्टीज़ पर्सिकस बालू का वाइपर है जो फारस में पाया जाता है। एकिस वाइपर अरब और भारत में मिलता है। भारतवर्ष और मलाया में रसेल का वाइपर (रसेल्स वाइपर) पाया जाता है। यह साँप भयानक विषधर है। एलापाइडी कुछ के साँप, जिनमें कालानाग (कोब्रा) और करैत आते हैं, एशिया भर में पाए जाते हैं और आस्ट्रेलिया और अफ्रीका में भी। भारत और मलाया का सबसे भयंकर सर्प फणिराज (किंग कोब्रा-नेआ हैना) है। यह दुनिया का सबसे बड़ा विषधर साँप है। यह केवल विषहीन सर्पों का ही आहार करता है। यह 12-15 फुट तक लंबा होता है और बलवान तथा फुर्तीला। इसका विष बहुत शक्तिशाली होता है और यह शत्रु को देखते ही आक्रमण करता है। इसमें संदेह नहीं कि यह दुनिया का सबसे भयंकर जंगली जंतु है।

फणिराज (किंग कोब्रा) के अतिरिक्त पूरे एशिया में केवल एक अन्य कोब्रा पाया जाता है। यह साधारण नाग (कोब्रा) भारत, मलाया, चीन और फिलिपाइन्स में मिलता है। इस साँप की केवल एक जाति (नेजा नेजा) है, परंतु इसकी बहुत सी उपजातियाँ हैं। नाग (कोब्रा) पाँच छह फुट लंबा होता है और इसके सर पर फन (हुड) होता है। इसका तीसरा अध्योष्ठीय वर्म (सुप्रालेबियल शील्ड) आँखों से और नास्या वर्म (नेज़ल शील्ड) से मिला रहता है, जिससे यह सुगमता से पहचाना जा सकता है। करैत भारत, बर्मा, मलय द्वीपसमूह, तथा दक्षिणी चीन में पाया जाता है। यह अधिकतर साँप खाता है, परंतु मेढ़क, छिपकली और छोटे-छोटे स्तनधारी भी इसके आहार हैं। इसकी छह सात जातियाँ मिलती हैं जो सब बंगारस प्रजाति के अंतर्गत हैं। करैत का कशेरुक (वर्टेब्रल) शल्क पार्श्व शल्क की अपेक्षा बहुत कड़ा होता है, जिससे यह सुगमता से पहचाना जा सकता है। हेमिबंगारस, कैलोफ़िस और डॉलिओलोफ़िस भी विषधर साँप हैं जो एशिया में पाए जाते हैं, परंतु काटते बहुत कम हैं। एशिया में रैटल स्नेक नहीं होते, परंतु ऐगकिस्ट्रोडॉन और ट्रिमरिस्यूरस, जो क्रोटैलिडी कुल के सदस्य हैं, यहाँ मिलते हैं।

गार्टर सर्प और कोरल सपर् अफ्रीका में मिलते हैं, ये छोटे और चमकीले होते हैं तथा विषधर होते हुए भी कम काटते हैं। पूरे अफ्रीका में नाग (कोब्रा) मिलते हैं। इनकी आठ या अधिक जातियाँ मिलती हैं। नेआ नाइग्रिकॉलिस अपना विष आठ फुट तक फेंक सकता है और बहुधा अपने शिकार की आँखों में विष पहुँचा देता है। नेआ हाइई मिस्र देश में पाया जाता है और नेआ निविआ दक्षिणी अफ्रीका में। सेपेडॉन हेमाकेड्स सबसे छोटा नाग (कोब्रा) है। यह भी विष फेंक सकता है, किंतु छह फुट से अधिक दूर नहीं। मांबा (डेंड्रैस्पिस) अफ्रीका का सबसे अधि प्रसिद्ध साँप है। इसका विष विशेष रूप से घातक है और यह बड़ी फुर्ती से आक्रमण करता है। यह बहुत पतला होता है। हरे मांबा छह से आठ फुट तक लंबे होते हैं और काले मांबे 12 फुट तक। ये पेड़ों पर रहते हैं। अफ्रीका के वाइपर्स में सबसे अधिक भयानक बाइटिस गैबोनिका है। यह बड़े डरावने आकार का होता है। यह चार फुट लंबा होता है और इसका व्यास सात इंच होता है। इसका सिर मनुष्य की चार अँगुलियों की चौड़ाई के बराबर होता है। इसके विष के दाँत लंबे होते हैं और विष अत्यंत घातक, जिससे इसके काटने से प्राणी उसी समय मर जाता है। इसके विष में हीमोटाक्सिन और न्यूरो टाक्सिन दोनों होते हैं, विशेषकर साँस में सहायक मांसपेशियों का वाहिकाप्रेरक तंत्र। साधारण वाइपरों में केवल हीमोटॉक्सिन ही होता है, न्यूरोटॉक्सिन नहीं होता या कम होता है। कहते हैं, वाइटिस नैसिकॉर्निस का विष वाइटिस गैबॉनिका के विष से भी अधिक घातक होता है। यह नदी के किनारे पाया जाता है और इस कारण इसको रिवर जैक कहते हैं। अफ्रीका में इनके अतिरिक्त भी बहुत से विषैले साँप मिलते हैं।

संयुक्त राज्य (अमरीका) के विषधर साँप कई प्रकार के हैं। वहाँ रैटल स्नेक, कॉपरहेड, वाटर मौकासिन और कोरल स्नेक पाए जाते हैं। रैटल स्नेक, कॉपरहेड और मौकासिन ये तीनों प्रकार के सर्प पिट वाइपर हैं और क्रॉटैलिडी कुल में रख जाते हैं। रैटल स्नेह तुरंत पहचाने जा सकते हैं। इनकी पूँछ का अंतिम भाग कुछ जुड़ी हुई अँगूठियों के आकार का होता है। यहाँ कायभित्ति के अंदर कुछ छोटे-छोटे असंबद्ध पुच्छकशेरुक होते हैं जो पूँछ हिलाने पर एक विशेष ध्वनि उत्पन्न करते हैं। कोरल स्नेक नाग (कोब्रा) और करैत के समान विषैले माने जाते हैं। इनके विष का प्रभाव तंत्रिका केंद्र पर पड़ता है। माइक्रूरस फ़लविअस एक प्रकार का कोरल स्नेक है; यह अधिकतर छोटे साँपों और छिपकलियों को खाता है। रैटल स्नेक बहुत प्रकार के मिलते हैं, किंतु अधिकांश प्रजातियाँ क्रॉटैलस की जातियाँ हैं। क्राँटैलस ऐडामैंटिअस नौ फुट तक लंबा होता है। इसका सिर तीन इंच चौड़ा होता है और विष के दाँत तीन चार इंच लंबे। छह फुट जंतु का भार छह से आठ सेर तक होता है। इसकी गणना दुनिया के अत्यंत घातक सर्पों में है। क्रॉटैलस हॉरिडस भी इसी प्रकार का एक घातक साँप है किंतु उत्तरी क्राटैलस हारिडस बहुत कम आक्रमण करता है। दक्षिण के ये साँप बड़े होते हैं और भयानक भी। मध्य और दक्षिणी अमरीका में केवल एक जाति का रैटल स्नेक मिलता है, परंतु पिट वाइपर बहुतायत से मिलते हैं। ये सब ब्थ्रोाॉप्स प्रजाति में आते हैं। बुशमास्टर की एक जाति पाई जाती है जिसको लैकिसिस कहते हैं। यह जंतु 12 फुट लंबा होता है। ब्थ्रोाॉक्स ऐट्रॉक्स का विष बड़ी शीघ्रता से प्रभाव डालता है। यह रक्तकोशाओं तथा रक्त की नालियों को नष्ट करता है और घाव के चारों ओर के अंगों को गला डालता है।

आस्ट्रेलिया के सर्प अधिकांश विषैले हैं। दुनिया के अन्य भागों में विषहीन सर्प विषधरों की अपेक्षा बहुत अधिक हैं, परंतु आस्ट्रेलिया में दशा इसके विपरीत है। यहाँ के कई एक एलापाइन्स नामक सर्प इतने छोटे हैं और इनके विषदंत इतने छोटे हैं कि ये बहुत कम हानि पहुँचाते हैं। परंतु यहाँ के बड़े सर्प अत्यंत विषैले हैं। स्यूडेकिस पारफ़ीरिऐकस एक घातक सर्प है, परंतु इसका विष औरो की अपेक्षा कम शक्तिशाली है। नोटेकिस स्क्यूटेटस आस्ट्रेलिया का सबसे भयंकर और घातक सर्प है। इसका विष दुनिया के अन्य सब सर्पों के विष से अधिक शक्तिशाली और घातक है, परंतु यह कम मात्रा में बनता है, क्योंकि इस साँप की विषग्रंथियाँ बहुत छोटी होती हैं। आकैंथोफ्रस ऐंटार्क्टिकस, जिसको आस्ट्रेलिया में डेथ ऐडर कहते हैं, वाइपर की भाँति का साँप है। यह दो फुट लंबा होता है, परंतु इसका सिर बड़ा होता है और इसके विष के दाँत नोटेकिस स्क्यूटेट्स के विषदंत से बड़े होते हैं। यह भी बहुत घातक साँप है।

सर्पों की उत्पत्ति-ऐसा माना जाता है कि सर्पों की उत्पत्ति बिल में रहनेवाली छिपकलियों से हुई है। यदि यह धारणा सत्य है, तो यह मानना पड़ेगा कि सर्पों में शंखकछदि (कनपटि की छत) एकदम लुप्त हो गई और सब शंखक खात खुल गए हैं। जो हड्डी चतुष्कोणास्थि को कपाल से मिलाती है वह अग्रगंडास्थि (स्क्वैमासैल) है, या उपरिशंखक (सुप्राटेंपोरैल) या चिपिटास्थि (टैबुलर)।

युक्तछिद्रकरोटी (सिनैप्सिडा) और चतुश्छिद्रकरोटी (डाइऐप्सिडा)-अछिद्रकरोटी महागण (ऐनैप्सिडा) से युक्तछिद्रकरोटी और चतुश्छिद्रकरोटी उत्पन्न हुए)। युक्तछिद्रकरोटी का एक मुख्य प्रतिनिध है थीरोमॉर्फ़ा जिसकी खोपड़ी में एक शंखक खात नेत्रकोटरपश्च (पोस्ट ऑर्बिबल) और गंडिका (जूगल) के बीच था। शीतसरट (पेलिकोसॉरिया) और डाइनोसेफ़ालिया में यही दशा वर्तमान है। परंतु पश्चात्‌ के युक्तछिद्रकरोटियों में यह खात ऊपर की ओर फैलता गया, यहाँ तक कि उसकी ऊपरी सीमा पार्श्विका हो गई। यह दशा द्विश्वदंतगण (डाइसिनोडॉन्शिया) और स्तनिदंतगण (थीरियोडॉन्शिया) में मिलती है और उन स्तनधारियों में भी जो स्तनिदंतगण से विकसित हुए। स्तनिदंतगण का स्तनधारियों में विकास होने में शंखक खात बहुत बड़ा हो गया और अग्रललाट, पश्चललाट, नेत्रकोटरपश्च और चतुष्कयुगीय क्रमश: लुप्त हो गए। चिपिटास्थि लुप्त हो गई या पार्श्विका से सायुज्यित हो गई। पश्चपार्श्विकाएँ, अंतरापार्श्विका के रूप में शेष रह गई जो बहुधा अध्यनुकपाल से सायुज्यित हो जाती है। पश्च खंड-खात का अभिलोपन हो गया और पार्श्विक तथा अंग्रगंडास्थि अधिक फैल गई। मीनसरट गण (इक्थियोसॉरिया) में भी एक ही शंखक खात था। ये मछली के सदृश उरग थे जो समुद्र में रहते थे और लुप्त हो चुके हैं। ये रक्ताश्म युग से खटीयुत युग तक जीवित रहे। इनके जीवाश्म भारत, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, यूरोप, अमरीका और अफ्रीका में मिलते हैं। इनमें से बड़े 30 या 40 फुट तक लंबे थे। इनके बाहु पाद फ़्लिपरों (तैरने में सहायक अंगों) के सदृश थे और इनकी हड्डियाँ विचित्र थीं। लंबी हड्डियाँ (प्रगंडिका, ह्यूमरस, ऊर्विका (फ़ीमर), बहिष्प्रकोष्ठिका (रेडियस) इत्यादि छोटी और चौड़ी थीं। किसी-किसी में आठ या नौ अँगुलियाँ थीं और अंगुलास्थि (फ़ैलेंजेज़) बहुत सी। लालट वीथिका (टेंपोरैल आरकेड), अग्रगंडास्थि (स्क्वैमोसैल), उपरिशखंक (सुप्राटेंपोरैल) और चतुष्कयुगीय (क्वाड्रेटोजूगल) की बनी थी। उपरिशंखक खात (सुप्राटेंपोरैल फ़ासॉ) की सीमा पार्श्विका (पैराईटल), अग्रगंडास्थि (स्क्वैमोसैल), पश्चलालट (पोस्टफ्रांटल) से बनी थी। तुंड (स्नाउट) लंबा था और नेत्रकोटर (ऑर्बिट) बड़े-बड़े।

चतुश्छिद्रकरोटियों में दो शंखक खात और दो पार्श्वशंखक वीथिकाएँ (लटरैल टेंपोरैल आर्केड्स) होती हैं। इनमें पल्याभगण (रिंकोसिफ़ेलिया), मकरगण (क्रोकोडिलिया), भीमसरटगण (डाइनोसॉरिया), सॉरिस्किया और आर्निथिस्किया इत्यादि आते हैं। सबसे आद्य चतुश्छिद्रकरोटि जो अभी तक मिला है वह उलूखलदंत (यंगिना) प्रजाति है, जो दक्षिणी अफ्रीका के गिरियुगीन स्तरों में पाया गया है। यह न्यूज़ीलैंड के स्फानदंत (स्फ़ीनोडॉन) से मिलता जुलता है। पल्याभगण का प्रतिनिधित्व करनेवाला यह स्फानदंत आज भी जीवित है, शेष सब लुप्त हो चुके हैं।

भीमसरट - भीमसरटगण रक्ताश्म युग से खटीयुत युग तक जीवित रहे और अब सब लुप्त हो चुके हैं। इनके जीवाश्म यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अमरीका, आस्ट्रेलिया और मैडेगैस्कर में मिलते हैं। कौंप्सॉग्नाथस बिल्ली के बराबर था, और मेगालोसॉरस हाथी के बराबर। मेगालोसॉरस यूरोप और अमरीका में रहता था। ऐटलैंटोसॉरस 115 फुट लंबा था और ब्रॉण्टो सॉरस 60 फुट। इग्वैनोडॉन लगभग 30 फुट लंबा था। स्टेगोसॉरस का सिर बहुत छोटा था और बाहु बहुत फैली थी। इसके शरीर पर बेड़ी हड्डियों का कवच था। यह 28 फुट लंबा था।

उड़नेवाले उरग-टेरोसॉरिया उड़नवाले उरग थे। इनके जीवाश्म (फ़ौसिल) अवरमहासरट युग (लोअर लायस) से खटीयुत (क्रिटेशस) युग तक मिलते हैं। अपने बाह्य लक्षणों में ये पक्षियों के समान थे, परंतु इनके पर नहीं थे। इनकी बाहु बड़ी थी और अंत:प्रकोष्ठिकी अँगुली (अल्नर डिजिट) बहुत लंबी थी जिसपर चर्म की झालर (पोटेजियल एक्स्पैशन) आधारित थी।[1]



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 130 |

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