कबीरपंथ  

कबीरपंथ कबीर के नाम पर स्थापित मध्यकालीन भारतीय संप्रदाय है। कबीर ने ही इसका प्रवर्तन किया था, यह विवादस्पद है। कबीरपंथी साहित्य से ज्ञात होता है कि संत कबीर ने चतुर्दिक अपने विचारों का प्रचार करने के लिए अपने चार प्रमुख शिष्यों- 'चत्रभुज', 'बंके जी', 'सहते जी' और 'धर्मदास' को भेजा था। प्रथम तीन शिष्यों के संबंध में कोई विवरण प्राप्त नहीं है। धर्मदास के विषय में अवश्य यह सूचना मिलती है कि उन्होंने कबीर पंथ की 'धर्मदासी' अथवा 'छत्तीसगढ़ी' शाखा की स्थापना की थी। इस समय जो अन्य संस्थाएँ दिखाई पड़ती हैं, वे भी कबीर अथवा उनके किसी शिष्य अथवा किसी परवर्ती व्यक्ति के नाम से ही संबद्ध हैं। कबीर के नाम पर ही द्वादश पंथों का भी उल्लेख मिलता है। इनमें कबीर के प्रति श्रद्धा व्यक्ति की गई है। कुछ लोग इन द्वाद्वश पंथों को शुद्ध कल्पना मानते हैं।

शाखाएँ

कबीरपंथ की विभिन्न संस्थाओं के विभाजन के संबंध में दो मत मिलते हैं। एक मत के अनुसार कबीरपंथ की दो प्रमुख शाखाएँ बताई गई हैं। प्रथम शाखा का केंद्र 'कबीरचौरा' (काशी) है। इसकी एक उपशाखा मगहर में है। दूसरा केंद्र छत्तीसगढ़ के अंतर्गत है, जिसकी स्थापना धर्मदास ने की थी। इसकी भी अनेक शाखाएँ, उपशाखाएँ बताई गई हैं। दूसरे मत के अनुसार कबीरपंथ के नाम से चलने वाली संस्थाओं का विभाजन इस प्रकार है-

(क) स्वतंत्र रूप से स्थापित कबीरपंथ की शाखाएँ, जिनका संबंध ऐसे व्यक्तियों से जोड़ा जाता है, जो कबीर के प्रमुख शिष्यों में से थे-

  1. रामकबीर पंथ
  2. फतुहा मठ
  3. बिद्दूपुर मठ
  4. भगताही शाखा
  5. कबीरचारा (काशी)
  6. छत्तीसगढ़ी या धर्मदासी शाखा

(ख) छत्तीसगढ़ी शाखा से संबंध विच्छेद करके पृथक् मठ के रूप में स्थापित शाखाएँ इस प्रकार हैं-

  1. कबीरचौरा जगदीशपुरी
  2. हरकेसर मठ
  3. कबीर-निर्णय-मंदिर (बुरहानपुर)
  4. लक्ष्मीपुर मठ

शेष प्रमुख शाखाओं में से कुछ ऐसा हैं, जिन्हें उपर्युक्त स्वतंत्र शाखाओं में से किसी न किसी की उपशाखा मात्र कह सकते हैं। आचार्य गद्दी, बड़ैया और महादेव मठ, रुसड़ा जैसी संस्थाएँ कबीरपंथी विचारधारा द्वारा प्रभावित कही जा सकती हैं। मध्यकालीन जाति-उपजाति-विकास के अनुसार ही कबीर के नाम से प्रचलित 'पनिका' कबीरपंथियों तथा कबीरवशिंयों का ऐसे समूह के रूप में विकास हो गया है, जिसे हम जुग्गी जैसी विशिष्ट जाति कह सकते हैं।[1]

विस्तार

गुजरात में प्रचलित रामकबीर पंथ के प्रवर्तक कबीर शिष्य 'पद्मनाभ' तथा पटना में 'फतुहा मठ' के प्रवर्तक तत्वाजीवा अथवा गणेशदास बताए जाते हैं। इसी प्रकार मुजफ्फरपुर ज़िलांतर्गत कबीरपंथ की बिद्दूरपुर मठवाली शाखा की स्थापना कबीर के शिष्य जागूदास ने की थी। बिहार में सारन ज़िले के अंतर्गत धनौती में स्थापित भगताही शाखा के प्रवर्तक कबीर शिष्य भागोदास वा भगवान गोसाईं कहे जाते हैं। भगताही शाखा में भक्ति भावना ही प्रधान है, न कि ब्राह्योपचार। सुरतगोपाल द्वारा प्रवर्तित काशीस्थ कबीरचौरा शाखा अन्य शाखाओं से प्राचीन समझी जाती है। लेकिन कुछ लोग इसमें संदेह भी व्यक्ति करते है। काशी स्थित लहरतारा, बस्ती ज़िले में स्थित मगहर कबीरबाग (गया) में इसकी उपशाखाएँ बताई जाती हैं। कबीरपंथ की अन्य शाखाओं की तुलना में छत्तीसगढ़ी शाखा अधिक व्यापक है। इस शाखा द्वारा पर्याप्त सांप्रदायिक साहित्य भी निर्मित हुआ है। छत्तीसगढ़ी शाखा की अनेक उपशाखाएँ मांडला, दामाखेड़ा, छतरपुर आदि स्थानों में स्थापित हैं। इनके अतिरिक्त कबीरपंथ की अनेक अन्य शाखाओं, उपशाखाओं का भी उल्लेख मिलता है।

कल्पनाएँ

कबीरपंथी संस्थाओं के अस्तित्व में आ जाने पर उनमें अनेक प्रकार की पौराणिक कथाओं की सी कल्पना करके कबीर को विशेष प्रकार का अलौकिक रूप दे दिया गया। साथ ही संसार की सृष्टि, विनाश, विभिन्न लोकों की भी कल्पनाएँ कर ली गई हैं। इस प्रकार के कबीरपंथी साहित्य के अधिकांश भाग का, जो पौराणिक कथाओं, कर्माकांड अथवा गोष्ठियों, संवादों आदि से संबद्ध है, निर्माण छत्तीसगढ़ी शाखा के अनुयायियों द्वारा किया गया। इसके अंतर्गत 'सुखनिधान', 'गुरुमहात्म्य', 'अमरमूल', 'गोरखगोष्ठी', 'अनुरागसागर', 'निरंजनबोध' और 'कबीर मंसूर' जैसी रचनाओं की गणना की जाती है। इस प्रकार के साहित्य निर्माण द्वारा कबीर मूल रूप वस्तुत: तिरोहित हो गया और जिस संप्रदायवाद, कर्मकांड, बाह्यडंबर आदि का उन्होंने विरोध किया था, उन सबका विधिवत प्रचार, प्रसार कबीरपंथी संस्थाओं द्वारा होने लगा।

प्रमुख ग्रंथ

कबीर का प्रमुख धर्मस्थान कबीरचौरा आज तक प्रसिद्ध है। यहाँ पर एक मठ और कबीरदास का मन्दिर है, जिसमें उनका चित्र रखा हुआ है। देश के विभिन्न भागों से सहस्रों यात्री यहाँ पर दर्शन करने आते हैं। इनके मूल सिद्धान्त निम्नांकित ग्रन्थों में पाए जाते हैं-

ब्रह्मनिरूपण, ईसमुक्तावली, कबीरपरिचय की साखी, शब्दावली, पद, साखियाँ, दोहे, सुखनिधान, गोरखनाथ की गोष्ठी, कबीरपंजी, वलक्क की रमैनी, रामानन्द की गोष्ठी, आनन्द रामसागर, अनाथमंगल, अक्षरभेद की रमैनी, अक्षरखण्ड की रमैनी, अरिफ़नामा कबीर का, अर्जनामा कबीर का, आरती कबीरकृत, भक्ति का अंग, छप्पय, चौकाघर की रमैनी, मुहम्मदी बानौ, नाम माहात्म्य, पिया पहिचानवे को अंग, ज्ञानगुदरी, ज्ञानसागर, ज्ञानस्वरोदय, कबीराष्टक, करमखण्ड की रमैनी, पुकार, शब्द अनलहक, साधकों के अंग, सतसंग को अंग, स्वासगुंञ्जार, तीसा जन्म, कबीर कृत जन्मबोध, ज्ञानसम्बोधन, मुखहोम, निर्भयज्ञान, सतनाम या सतकबीर बानी, ज्ञानस्तोत्र, हिण्डोरा, सतकबीर, बन्दीछोर, शब्द वंशावली, उग्रगीता, बसन्त, होली, रेखता, झूलना, खसरा, हिण्डोला, बारहमासा, चाँचरा, चौतीसा, अलिफ़नामा, रमैनी, बीजक, आगम, रामसार, सोरठा कबीरजी कृत, शब्द पारखा और ज्ञानबतीसी, रामरक्षा, अठपहरा, निर्भयज्ञान, कबीर और धर्मदास की गोष्ठी आदि।

एकेश्वरवादी

कबीरदास ने स्वयं ग्रन्थ नहीं लिखे, केवल मुख से भाखे हैं। इनके भजनों तथा उपदेशों को इनके शिष्यों ने लिपिबद्ध किया। इन्होंने एक ही विचार को सैकड़ों प्रकार से कहा है और सबमें एक ही भाव प्रतिध्वनित होता है। ये रामनाम की महिमा गाते थे, एक ही ईश्वर (एकेश्वरवाद) को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्ति, रोजा, ईद, मसजिद, मन्दिर आदि को नहीं मानते थे। अहिंसा, मनुष्य मात्र की समता तथा संसार की असारता को इन्होंने बार-बार गया है। ये उपनिषदों के निर्गुण ब्रह्मा को मानते थे और साफ़ कहते थे कि वही शुद्ध ईश्वर है, चाहे उसे राम कहो या अल्ला। ऐसी दशा में इनकी शिक्षाओं का प्रभाव शिष्यों द्वारा परिवर्तन से उल्टा नहीं जा सकता था। थोड़ा-सा उलट-पुलट करने से केवल इतना फल हो सकता है कि रामनाम अधिक न होकर सत्यनाम अधिक हो। यह निश्चित बात है कि ये रामनाम और सत्यनाम दोनों को भजनों में रखते थे। प्रतिमापूजन इन्होंने निन्दनीय माना है। अवतारों का विचार इन्होंने त्याज्य बताया है। दो-चार स्थानों पर कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनसे अवतार महिमा व्यक्त होती है।

मत-विरोधाभास

कबीर के मुख्य विचार उनके ग्रन्थों में सूर्यवत् चमक रहे हैं, किन्तु उनसे यह नहीं जान पड़ता कि आवागमन सिद्धान्त पर वे हिन्दू मत को मानते थे या मुसलमान मत को। अन्य बातों पर कोई वास्तविक विरोध कबीर की शिक्षाओं में नहीं दिखता। कबीर साहब के बहुत-से शिष्य उनके जीवन काल में ही हो गए थे। भारत में अब भी आठ-नौ लाख मनुष्य कबीरपंथी हैं। इनमें मुसलमान थोड़े ही हैं और हिन्दू बहुत अधिक हैं। कबीरपंथी कण्ठी पहनते हैं, बीजक, रमैनी आदि ग्रन्थों के प्रति पूज्य भाव रखते हैं। गुरु को सर्वोपरि मानते हैं।

निर्गुणमार्गी पंथ

निर्गुण-निराकारवादी कबीरपंथी के प्रभाव से ही अनेक निर्गुणमार्गी पंथ चल निकले। यथा-

नानकपंथ पंजाब में, दादूपन्थ जयपुर (राजस्थान) में, लालदासी अलवर में, सत्यनामी नारनौल में, बाबालाली सरहिन्द में, साधुपंथ दिल्ली के पास, शिवनारायणी गाजीपुर में, ग़रीबदासी रोहतक में, मलूकदासी कड़ा (प्रयाग) में, रामसनेही राजस्थान में। कबीरपंथ को मिलाकर इन ग्यारहों में समान रूप में अकेले निर्गुण निराकार ईश्वर की उपासना की जाती है। मूर्तिपूजा वर्जित है, उपासना और पूजा का काम किसी भी जाति का व्यक्ति कर सकता है। गुरु की उपासना पर बड़ा ज़ोर दिया जाता है। इन सबका पूरा साहित्य हिन्दी साहित्य में है। रामनाम, सत्यनाम अथवा शब्द का जप और योग इनका विशेष साधन है। व्यवहार में बहुत से कबीरपंथी बहुदेववाद, कर्म, जन्मान्तर और तीर्थ इत्यादि भी मानते हैं।

इन्हें भी देखें: कबीर


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कबीरपंथ (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 09 अगस्त, 2014।

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