कल्प  

कल्प का अर्थ

‘कल्प’ शब्द का प्रयोग ऋग्वेद [1] में पाया जाता है। [2], जहाँ ऐसा आया है- ‘सृष्टिकर्ता ने सूर्य, चंद्र, दिन, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष की, पहले की भांति, सृष्टि की।’ निश्चित तिथि वाला अत्यंत प्राचीन प्रमाण अशोक के अनुशासनों में पाया जाता है, यथा गिरनार एवं कालसी का चौथा प्रस्तर-लेख [3] तथा शहबाजगढ़ी एवं मानसेहरा का पाँचवा प्रस्तर लेख [4]। इससे यह सिद्ध होता है कि कल्प के विशाल विस्तार के सिद्धांत ई. पू. तीसरी शती के बहुत पहले से ज्ञात थे। बौद्धों ने भी कल्पों के सिद्धांत को अपनाया था, यह 'महापरिनिब्बानसुत' [5] से प्रकट है- ‘हे भगवन्, कृपा करके कल्प में रहें । हे महाभाग, असंख्य लोगों के कल्याण एवं सुख के लिए कल्प भर रहें।’ ऐसी मान्यता है कि आदि काल में मानव-समाज आदर्श रूप से अति उत्कृष्ट था और क्रमश: नैतिक बातों, स्वास्थ्य, जीवन-विस्तार आदि में क्रमिक अपकर्श होता चला गया और सुदूर भविष्य में पुन: पढ़ नैतिक बातों आदि का स्वर्ण युग अवतरित होगा।

युग शब्द के कई अर्थ

‘युग’ शब्द के कई अर्थ हैं-

  1. काल की अल्पावधि [6],
  2. पाँच वर्षों का एक वृत्त,
  3. दीर्घावधि एवं सहस्रों वर्ष की अवधि।
  • प्रो. मन्-कड़ ने ‘पूना ओरिण्टलिस्ट’ [7] में इसके दस अर्थ दिये हैं। उनकी सभी बातें ग्रहण नहीं की जा सकती, उदाहरणस्वरूप, जब वे शाकुंतल [8] में युग को दिन का चौथाई भाग मानते हैं । शाकुन्तल में उसका अर्थ होना चाहिए ‘सूर्य आकाश में (पूर्व क्षितिज में) एक युग (घुरा) ऊपर आ गया है।’ ऋग्वेद [9] में भी यही अर्थ है। महाभारत, मनुस्मृति एवं पुराणों में युगों, मन्वन्तरों एवं कल्पों के विषय में बहुत कुछ विस्तार के साथ वर्णित है।
  • युग चार हैं -
  1. कृत,
  2. त्रेता,
  3. द्वापर एवं
  4. तिष्य या कलि और ये केवल भारत से सम्बंधित माने गये हैं। [10]
  1. स्वायंभुव,
  2. स्वारोचिष,
  3. उत्तम,
  4. तामस,
  5. रैवत,
  6. चाक्षुष एवं
  7. वैवस्वत ।
  • इसके उपरान्त निमेषों का विभाजन है - 18 निमेष=काष्ठा, 30 काष्ठा=कला, 30 कला=मुहूर्त, 30 मुहूर्त=अहोरात्र
  • ऐसी मान्यता है कि मानव मास पितरों का अहोरात्र (दिन एवं रात्रि) है, मानव वर्ष दैव अहोरात्र है। कृत युग का विस्तार दैव-मान से 4000 वर्ष है, इसके पूर्व संध्या 400 वर्ष है इसके उपरान्त सन्ध्यान्त 400 वर्ष है । शेष तीन, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग क्रम से 3000, 2000 एवं 1000 दैववर्ष के हैं; संध्या एवं संध्यांत क्रम से हैं 600, 400 एवं 200 दैव वर्ष । इस प्रकार चार युगों का विस्तार 12000 वर्षों (4800+3600+2400+1200) का है, जिसे देवों का युग (यह दिव्य मानक है) कहा गया है; इन चारों के 1000 वर्ष ब्रह्मा का एक दिन और उतनी ही ब्रह्मा की एक रात्रि है। 12000 दैव वर्षों के 71 युगों में प्रत्येक को मन्वन्तर कहा जाता है और मन्वन्तर असंख्य हैं और इसी प्रकार सृष्टियाँ एवं प्रलय भी असंख्य हैं। मनु में कल्प का उल्लेख नहीं है।
  • मनुस्मृति के अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में जैसे - विष्णु पुराण [22] में आया है कि 14 मन्वन्तरों का एक कल्प होता है, जो ब्रह्मा का एक दिन है । देवों का एक दिन एक मानव वर्ष है, अत: 12000 वर्षों की चतुर्युगी 43,20,000 मानव वर्षों के बराबर होगी (12000 X 360), जिसे मानुष काल-मानक कहा जाता है। युगों की इन विशाल वर्ष संख्याओं का निर्देश कब और कैसे हुआ, यह अभी एक पहेली ही है।
  • शतपथ ब्राह्मण काल में ही लोग विशाल वर्ष-संख्याओं से परिचित थे। शतपथ ब्राह्मण में[23] आया है कि एक वर्ष में 10,800 मुहूर्त होते हैं (30 X 360, 30 अहोरात्र का द्योतक है), प्रजापति ने ऋग्वेद की व्यवस्था इस प्रकार की कि इसके अक्षरों की संख्या 12000 व्याह्रतियों (प्रत्येक व्याह्रति में 36 अक्षर होते हैं) के बराबर है, अर्थात् कुल अक्षर 4,32,000 हैं; ऐसा भी कहा गया कि ऋग्वेद में 10,800 पंक्तियाँ (प्रत्येक पंक्ति में 40 अक्षर हैं, अत: 10800 X 40=4,32,000) हैं। प्रजापति ने अन्य दो वेदों की व्यवस्था भी की और तीनों वेदों में 8,64,000 अक्षर हैं । 360 यज्ञिय दिनों में 10,800 मुहूर्त होते हैं और मुहूर्त के उपरान्त मुहूर्त पर 80 अक्षरों की वृद्धि होती है, अत: 10,800 X 80=8,64,000 अक्षर हुए।
  • पेरिस के ‘कॉलेज द फ़्रांस’ के प्रो. डा. जीन फ़िलियोजात ने एक मत प्रकाशित किया है कि शतपथ[24] में दी गई उपर्युक्त संख्या वैज्ञानिक है और हेराक्लिट्स ने जो कहा है कि 10,800 साधारण मानुष वर्ष ‘महान वर्ष’ द्योतक हैं और बेरोसस ने जो यह कहा कि महान् ज्योतिषीय काल 4,32,000 वर्षों का है, तो वह यह है कि यूनानियों ने भारत से उधार लिया [25]
  • ब्रह्मा का एक दिन बराबर है एक कल्प के , अर्थात् 4,32,0000 X 1000=4,32,00,00,000 वर्ष । ब्रह्मा के जीवन के 100 वर्ष के मानुष वर्ष जानने के लिये 4,32,00,00,000 को 2 से गुणा और पुन: 360 और पुन: 100 से गुणा करना होगा, इस प्रकार ब्रह्मा का वर्ष बराबर होगा 31,10,40,00,00,00,000 मानव वर्ष के।
  • यही बात अल्बरूनी [26] ने भी कही है। कुछ लोगों ने ब्रह्मा के जीवन को 108 वर्ष माना है। ब्रह्मा अब तक 50 वर्ष के हो चुके हैं। और उनके जीवन का दूसरा अर्धांश है, अब वाराहकल्प एवं 'वैवस्वत मन्वन्तर' (सातवाँ) चल रहा है। अतीत छ: मनु हैं- स्वायंभुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत एवं चाक्षुष तथा आज के मनु हैं वैवस्वत (सातवें)। [27]। शेष 7 मनु विभिन्न रूपों से संज्ञापित हैं ।
  • नरसिंह-पुराण [28] में भावी मनुओं के नाम ये हैं-
  1. सावर्णि,
  2. दक्ष सावर्णि,
  3. ब्रह्मसावर्णि,
  4. धर्मसावर्णिक,
  5. रुद्रसावर्णि,
  6. रुचि एवं
  7. भौम;
  1. सावर्णि,
  2. रैभ्य,
  3. रौच्य एवं
  4. मेरुसावर्णि।
  • नारद पुराण [30] में 14 मनुओं के नाम आये हैं। ऐसा आया है कि प्रत्येक मन्वन्तर [31]में विभिन्न ॠषियों, मनु-पुत्रों, देवों, राजाओं, स्मृतियों, इंद्र एवं धर्म की सम्यक व्यवस्था एवं लोगों की रक्षा के पालकों का दल होता है [32]
  • विष्णु पुराण में ऐसा आया है कि कुछ देव चार युगों तक, कुछ एक मन्वन्तर तक और कुछ एक कल्प तक रहते हैं[33]
  • विष्णु धर्मसूत्र [34] में मनु के समान ही मन्वन्तरों एवं कल्पों का उल्लेख है किन्तु इसमें एक अन्य बात भी है कि ब्रह्मा का सम्पूर्ण जीवन पुरुष (विष्णु) के एक दिन के बराबर है और पुरुष की रात्रि भी इतनी ही लम्बी है। यह द्रष्टव्य है कि यही मत अल्बरूनी [35] ने पुलिश सिद्धांत में भी पाया है। यह नहीं ज्ञात है कि उन यूरोपीय विद्वानों ने, जो पुलिश को 'पौलस अलेक्जैड्रिनस' कहते हैं, यह किस प्रकार बताया है कि उपर्युक्त बातें यूनानी ज्योतिर्विद पौलस में पायी जाती हैं।
  • कलियुग के [36] निराशावादी एवं दारुण वृत्तांतों का उल्लेख वनपर्व [37], शान्तिपर्व [38], हरिवंश [39], ब्रह्म पुराण [40], वायु पुराण [41], मत्स्य पुराण [42], कूर्म पुराण [43] तथा अन्य पुराणों में किया गया है। वायु पुराण [44] में 33 कल्पों के नाम आये हैं। मत्स्य पुराण [45] ने 30 कल्पों के नाम दिये हैं । ब्रह्माण्ड पुराण [46] में आया है कि कल्प 25 में से न कम हैं और न अधिक ।
  • पुराणों में प्रलय के चार प्रकार दिये गये हैं:
  1. नित्य (जो जन्म लेते है उनकी प्रति दिन की मृत्यु),
  2. नैमित्तिक (जब ब्रह्मा का एक दिन समाप्त होता है, और विश्व का नाश होता है)
  3. प्राकृतिक (जब प्रत्येक वस्तु प्रकृति में विलीन हो जाती है) तथा
  4. आत्यन्तिक प्रलय (मोक्ष, सम्यक् ज्ञान से परमात्मा में विलीनता)।
  • कतिपय पुराणों में नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलयों का अति दुखावह वर्णन पाया जाता है। कूर्म पुराण [47] में उल्लिखित है- 'जब एक सहस्र चतुर्युगों का अंत होता है तो एक सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होती; परिणाम यह होता है कि प्राणी मर जाते हैं और पृथ्वी में विलीन हो जाते है; सूर्य की किरणें असहय हो जाती हैं , यहाँ तक की समुद्र सूख जाते हैं; पर्वतों, वनों एवं महाद्वीपों के साथ पृथ्वी सूर्य की भीषण गर्मी से जलकर राख हो जाती है। जब सूर्य की किरणें प्रत्येक वस्तु को जलाती गिरती है तो सम्पूर्ण विश्व एक विशाल अग्नि के सदृश लगता है। चल एवं अचल सभी वस्तुएं जल उठती हैं । महासमुद्रों के जन्तु बाहर आकर राख बन जाते हैं। संवर्तक अग्नि प्रचंड आँधी से बढ़कर सम्पूर्ण पृथ्वी को जलाने लगती है और उसकी ज्वालाएं सहस्रों योजन ऊपर उठने लगती हैं, वे गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, नागों, राक्षसों को जलाने लगती है, केवल पृथ्वी ही नहीं, प्रत्युत ‘भुव:’ एवं ‘स्व:’ लोक भी जल जाते हैं । तब विशाल संवर्तक बादल हाथियों के झुण्डों के समान, विद्युत से चमत्कृत हो आकाश में छा जाते हैं और अति वर्षा कर अग्नि बुझाने लगते हैं। जब अग्नि बुझ जाती है, नाश के बादल सम्पूर्ण लोक को बाढ़ों से घेर लेते है; पर्वत छिप जाते हैं, पृथ्वी पानी में निमग्न हो जाती है और सभी कुछ जलार्णव हो जाता है और तब ब्रह्मा यौगिक निद्रा में आ जाते हैं।' वनपर्व [48] में नैमित्तिक प्रलय का संक्षिप्त वर्णन है।
  • कूर्म पुराण [49] एवं विष्णु पुराण [50] में प्राकृतिक प्रलय का वर्णन है जो सांख्य के वर्णन के समान है - 'जब अघ लोकों के साथ सभी लोक अनावृष्टि से नष्ट हो जाते है और महत से आगे के सभी प्रभाव नष्ट हो जाते हैं , तो जल सर्वप्रथम गन्ध को सोख लेता है और जब गन्धत मात्रा नष्ट हो जाती है, पृथ्वी जलमय हो जाती है, जल के विशिष्ट गुण रस-तन्मात्रा का नाश हो जाता है, केवल अग्नि शेष रहती है और सम्पूर्ण लोक अग्निज्वाला से परिपूर्ण हो जाता है; तब वायु अग्नि को आत्मसात कर लेता है और रूप-तन्मात्रा का विनाश हो जाता है; वायु सभी 10 दिशाओं को हिला देता है; आकाश वायु के स्पर्श-गुण को हर लेता है और केवल आकाश ही शून्य-सा पड़ा रहता है और शब्द-तन्मात्रा चली जाती है। इस प्रकार सात प्रकृतियाँ महत एवं अहंकार के साथ क्रम से समाप्त हो जाती है; यहाँ तक की पुरुष एवं प्रकृति परमात्मा (विष्णु) में विलीन हो जाते हैं। विष्णु का दिन मानुष वर्षों के दो परार्घों के बराबर होता है।'
  • हरिवंश [51], कहते हैं कि कल्प के अंत में केवल मुनि मार्कण्डेय बचे रहते हैं और प्रलय (या कल्प) के समय तक विष्णु में अवस्थित रहते हैं और फिर उनके मुख से बाहर आ जाते हैं ।
  • ब्रह्म पुराण [52] का कथन है कि कल्पान्त के समय मार्कण्डेय एक वट वृक्ष देखते हैं और रत्नजटित एक शय्या पर पड़े हुए एक बालक (स्वयं विष्णु) को देखते है; इसके उपरान्त वे उसमें प्रवेश कर जाते हैं और बाद को बाहर आ जाते हैं ।
  • मत्स्य पुराण [53], भगवद्गीता [54] में ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर सभी प्राणियों के बार-बार लय एवं ब्रह्मा के दिन के आरम्भ पर प्राणियों के पुन:उद्भव की बात आयी है।
  • युगों, मन्वन्तरों एवं कल्पों का सिद्धांत अवास्तविक एवं कल्पना मात्र है। किन्तु इसमें अन्तर्हित भाव है कि अखिल ब्रह्माण्ड की 'काल-संहिता'; यद्यपि समय-समय पर यह प्रकट होता है, क्रमश: घटता, नष्ट हो जाता है, केवल दिव्य प्रकाश के उपरान्त पूर्णता के रूप में पुन: प्रकट होने के लिये। इसमें यह भावना भी है कि मानव वास्तविकता के पीछे पड़ा रहता है और भांति-भांति के आदर्शों की प्राप्ति करना चाहता है। इसमें यह महान् भावना है कि मानव किसी विशिष्ट लक्ष्य को लेकर चलता है, विभिन्न प्रकार के बड़े-बड़े प्रयासों एवं उद्योगों के साथ उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है, कुछ सफलता के उपरान्त उस लक्ष्य का त्याग करता है और उस ढंग को भी छोड़ता है जिसके सहारे वह आगे बढ़ा था और पुन: किसी अन्य लक्ष्य का निर्धारण करता है और उसकी प्राप्ति के लिए बहुत काल तक इस आशा से प्रयत्न करता है कि सुदूर काल में वह ऐसे समाज का निर्माण कर सके जो पूर्ण हो। [55]
  • युगों, मन्वन्तरों एवं कल्पों के सिद्धांत के विस्तारों के विषय में कई मत-मतांतर हैं।
  • आर्यभट के मत से चारों युगों का विस्तार समान था, न कि 4, 3, 2 एवं 1 के समानुपात में; उन्होंने कहा है कि जब वे 23 वर्ष के थे तो तीन युगपाद एवं 3600 वर्ष व्यतीत हुए थे [56]
  • ब्रह्मगुप्त [57] ने कहा है कि यद्यपि आर्यभट ने घोषित किया है कि कृतयुग आदि युगों के चार पाद बराबर है, किन्तु स्मृतियाँ में ऐसी बात नहीं जाती । एक अन्य विरोधी बात भी है। आर्यभट [58] ने कहा है कि मनु 72 युगों की एक अवधि है, किंतु अन्य स्मृतियों एवं पुराणों ने मन्वन्तर को 71 युग माने हैं। आर्यभट ने यह भी कहा है कि ब्रह्मा का दिन 1008 चतुर्युगों के बराबर है [59]
  • प्रसिद्ध वैज्ञानिक ज्योतिर्विद भास्कराचार्य [60] ने अधैर्य के साथ कहा है- ‘कुछ लोगों का कथन है कि ब्रह्मा का अर्ध जीवन (अर्थात् 50 वर्ष) समाप्त हो चुका है किन्तु कुछ लोगों के मत से 58 वर्ष व्यतीत हुए हैं। चाहे जो सत्य परम्परा हो, इसका कोई उपयोग नहीं है, ब्रह्मा के चालू दिन में जो दिन व्यतीत हो चुके हैं, उन्हीं में स्थितियों को रखना है। ’


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऋग्वेद,10|190|3
  2. सूर्याचंद्रामसौ धाता यवापूर्वमकल्पयत्। दिदं च पृथिवीं चान्तरिक्षमो स्व:। ऋग्वेद (10|190|3
  3. आव सवट कपा अर्थात् यावत् सर्वत-कल्पम्
  4. आव कपम्=यावत कल्पम्
  5. महापरिनिब्बानसुत 3|53
  6. ऋग्वेद 3|26|3
  7. पूना ओरिण्टलिस्ट (जिल्द 6,पृ. 211-212
  8. 4 युगान्तरम् आरूढ़: सविता
  9. ऋग्वेद 10|60|8, 10|101|3 एवं 4
  10. चत्वारि भारते वर्षे युगानि मुनयो विदु:। कृतं त्रेता द्वापरं च तिष्यं चेति चतुर्युगम्॥ - वायु पुराण (24|1,45|137 एवं 57|22) और मत्स्य पुराण(142|17-18), ब्रह्म पुराण (27|64)। द्वापर युग के अंत के विषय में कई बातें पायी जाती हैं। ऐसा आया है कि कौरवों एवं पाण्डवों का युद्ध द्वापर एवं कलि की संध्या में हुआ। महाभारत आदिपर्व 2|13)। शल्यपर्व (60|25), वनपर्व (149|38) में आया है कि जब भारतयुद्ध होने वाला था तो कलियुग समीप था। किन्तु बहुत-से पुराणों में ऐसा आया है कि कृष्ण ने जब अपने अवतार का अन्त किया और स्वर्ग चले गए तो कलियुग का आरम्भ हो गया। यह बात वायु पुराण (99|428-429), ब्रह्माण्ड पुराण (3|74|241), मत्स्य पुराण (273|49-50), विष्णु पुराण (4|14|110), भागवत पुराण (12|2|32), ब्रह्म पुराण (212|8) में दूसरे शब्दों में कथित है। मौसलपर्व (1|13 एवं 2|20) में आया है कि कृष्ण भारत-युद्ध (महाभारत) के तुरंत बाद ही या कुछ वर्षों के उपरांत द्वापर का अंत हुआ।
  11. एपिग्रैफिया इण्डिका, जिल्द 23, पृ. 81
  12. वनपर्व अध्याय 149,188; शान्तिपर्व अध्याय 69, 231-232
  13. मनुस्मृति 1|61-74, 79-86
  14. विष्णुधर्मसूत्र 20|1-21
  15. विष्णु पुराण 1|3, 6|3
  16. ब्रह्म पुराण 5|229-232
  17. मत्स्य पुराण 142-145
  18. वायु पुराण अध्याय 21,22,57,58,100
  19. कूर्म पुराण 1, अ. 51 एवं 53
  20. ब्रह्माण्ड पुराण 2|6 एवं 31-36, 3|1
  21. मार्कण्डेय पुराण 58-64, 66-70,91-97
  22. विष्णु पुराण 6|3|11-12
  23. शतपथ ब्राह्मण 10|4|2, 22, 23, 25
  24. शतपथ ब्राह्मण
  25. डा. जे. फ़िलियोजात, जे. ओ. आर., मद्रास, जिल्द 25,1957 ई. पृ.1-8
  26. अलबेरूनी सचौ, जिल्द 1, पृ. 332
  27. ब्रह्म पुराण (5|4-5), विष्णु पुराण (3|1|6-7
  28. नृसिंह पुराण 24|17-35
  29. ब्रह्म पुराण 5|5-6
  30. नारद पुराण 1|40|20-23
  31. मन्वन्तर का अर्थ है ‘अन्य मनु:’ या मनूनामन्तरमवकाशोअवधिर्वा। यदि 1000 महायुगों को 14 से भाग दें तो प्रत्येक मन्वन्तर 71 महायुग+कुछ और (अर्थात् 14 महायुग)। ‘मनु’ शब्द ऋग्वेद एवं अन्य संहिताओं में आया है। मनु को मानवता एवं मुनियों का पिता कहा गया है कि वे मानवों के उचित मार्ग का प्रदर्शन करते हैं । - ऋग्वेद (2|33|13|, 8|30|3, 4|54|1); तैत्तिरीय संहिता(2|2|10|2); काठक संहिता (11|5)।शतपथ ब्राह्मण (1|8|1|1) में मनु एवं प्रलय की प्रसिद्धि गाथा आयी है। तैत्तिरीय संहिता (3|1|9|4-6) एवं ऐतरेय ब्राह्मण (22|9) में मनु एवं उनके पुत्र नाभानेदिष्ट की कथा है।
  32. ब्रह्म पुराण 5|39; विष्णु पुराण 3|1-2
  33. विष्णु पुराण 1|12|93
  34. विष्णु धर्मसूत्र 20|1-15
  35. अल्बरूनी सचौ, जिल्द 1, पृ.332
  36. जो पुराणों के अनुसार 4,32,000 वर्षों तक चलेगा और जो 5071 वर्षों तक सन् 1970 ई. में बीत चुका है
  37. वनपर्व (अध्याय 188, 190
  38. शान्तिपर्व 69|80-97
  39. भविष्यपर्व, अध्याय 3-5
  40. ब्रह्म पुराण अध्याय 229-230
  41. वायु पुराण अध्याय 58,99
  42. मत्स्य पुराण 144|32-47
  43. कूर्म पुराण 1|30
  44. वायु पुराण अध्याय 21-23
  45. मत्स्य पुराण 290
  46. ब्रह्माण्ड पुराण 2|31|119
  47. कूर्म पुराण 2|45|11-49
  48. वनपर्व (272|32-48
  49. कूर्म पुराण 1|46
  50. विष्णु पुराण 6|4|12-49
  51. भविष्यपर्व, अध्याय 10|12-68
  52. ब्रह्म पुराण 52|12-29 एवं 53|55
  53. मत्स्य पुराण 167|14-66
  54. भगवद्गीता 8|18-19
  55. मनुस्मृति- तप: परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥- मनुस्मृति (1|86) यही बात शांति पर्व (23|28), वायु पुराण (8|65-66), पराशरस्मृति (1|23)में आया है—‘कृतयुग में तप सर्वोच्च लक्ष्य था, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ, कलि में केवल दान ।’ यह बात मानव के विभिन्न सुन्दर उद्योगों एवं प्रेरणाओं की द्योतक है।
  56. कालक्रियापाद 10
  57. ब्रह्मगुप्त 1|9
  58. आर्यभट दशघटिका, श्लोक 3
  59. ब्रह्मगुप्त 1|12
  60. भास्कराचार्य 1114 ई. में उत्पन्न

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