क़सीदा  

क़सीदा काव्य या शायरी का एक स्वरूप है, जो पूर्व इस्लामी अरब में विकसित हुआ था, तब से यह आज तक प्रचलित है। क़सीदे का प्रारम्भ प्राय: 'नसीब' कही जाने वाली छोटी पंक्ति से होता है। शायरों मे क़ाफ़िया की रचना कौशल प्रदशिर्त करने और इसमें सहयोगी विषयों को अधिक से अधिक गूंथने की होड़ लगी होती है। अपनी शैली और भाषा के कारण ये शब्दकोश निर्माताओं के लिए विशेष दिलचस्पी के विषय होते हैं।

संरचना

शास्त्रीय क़सीदा 60 से 100 पंक्तियों का एक विस्तृत संरचना वाला उद्बोधन होता है, जिसमें प्रत्येक पंक्ति को एक-सी तुक या क़ाफ़िये मे रखते हुए सम्पूर्ण गीत की रचना की जाती है। यही क़ाफ़िया पहले छंद की पहली अर्द्धाली में रखा जाता है। वस्तुत: क़सीदे के लिए कोई भी छंद (सिवाय रजज़ के) ग्रहणीय हैं। क़सीदा की शुरुआत प्राय: 'नसीब' कही जाने वाली एक संक्षिप्त प्रस्तावना से शुरू होती है। नसीब शोक गीत का भाव लिए होता है और उसका आशय श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींचना होता है। नसीब में इस बात का चित्रण होता है, कि कैसे शायर एक पुराने कबीलाई डेरे में रुका अपनी प्रेयसी के साथ कैसा आनंदमय समय बिताया और जब वे अलग हुए, तो विरह में कैसी वेदना हुई।

प्रथम प्रयोग

मान्यता है कि अरबी शायर इमरूल-क़ायस ने पहली बार इस युक्ति का प्रयोग किया था। इसके बाद लगभग सभी क़सीदाकारों नें उनका अनुकरण किया। इस परंपरागत प्रारंभ के बाद आता है 'राहिल', जिसमें शायर के घोड़े या ऊँट, रेगिस्तानी पशुओं, रेगिस्तानी घटनाओं और वहाँ के 'बद्दुओं'[1] के जीवन एवं युद्धों के विवरण और उपमान होते है। राहिल का उपसंहार 'फ़ख़' या आत्म-प्रशंसा किया जा सकता है। मुख्य विषय 'मदीह' या 'प्रशस्ति', जो अक्सर 'हिज'[2] से जुड़ा होता है, अंत मे आता है और यह स्वंय शायर की' उसके क़बीले या अपने संरक्षक की प्रशंसा होती है।

क़सीदे का महत्त्व

क़सीदा शायरी लेखकों के लिए प्रारम्भ से ही महत्त्वपूर्ण रहा। क़सीदे को हमेशा से शायरी का सर्वोत्कृष्ट रूप और इस्लाम-पूर्व शासकों की धरोहर माना माता रहा है। शास्त्रीय रुझान वाले शायरों ने इस विधा को बनाए रखा और नियमों या बंधनों का पालन किया, लेकिन अरबों की बदली हुई परिस्थतियों ने उसे एक कृत्रिम परिपाटी बना दिया। इस प्रकार आठवीं शताब्दी के अंत तक क़सीदे का महत्व कम होने लगा। 10वीं शताब्दी में थोड़े समय के लिए अल-मुतानब्बी, जो अरबी भाषा के महानतम शायरों में से एक थे, उन्होंने उसे सफलतापूर्वक पुनर्जीवित किया और बद्दुओं ने उसे आज तक बनाए रखा है। 19 वीं शताब्दी तक फ़ारसी, तुर्की और उर्दू भाषाओं में भी क़सीदे लिखे गए।

उद्देश्य

क़सीदा सोदृश्य लिखी गई शायरी है। इसका उद्देश्य सांसारिक लाभ प्राप्त करना, जैसा कि शाहों या नवाबों की तारीफ़ में लिखी गई रचनाओं का लक्ष्य होता है, या संसार के उपरांत पारलौकिक लाभ प्राप्त करना, जैसा कि ईश्वर की प्रंशसा में या पैगंबर मुहम्मद साहब अथवा पवित्र व्यक्तित्वों ती तारीफ़ में रचित शायरी का उद्देश्य होता है। ये प्रशस्तियाँ सामान्यत बहुत लंबी होती है और अत्यंत अंलकारिक व अतिशयोक्तिपुर्ण शैली में लिखी जाती हैं। शायरों मे क़ाफ़िया की रचना और इसके कौशल को प्रदशिर्त करने और साथ ही इसमें सहयोगी विषयों को अधिक से अधिक गूंथने की होड़ लगी रहती है। अपनी शैली और भाषा के कारण ही ये शब्दकोश निर्माताओं के लिए विशेष रूप से दिलचस्पी के विषय होते है। दक्षिण भारत में लिखे गए क़सीदों पर बहुत अधिक शोधकार्य नहीं हुआ है। उत्तरी भारत में अनेक शायरों को इस विधा में विशिष्टता के कारण बहुत सम्मान प्राप्त है। 18वीं शताब्दी के सौदा, इंशा और 19वीं शताब्दी के ज़ौक़ व मिर्ज़ा ग़ालिब इन्हीं सम्मानित शायरों में से एक है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अरब की एक ख़ानाबदोश जाति
  2. दुश्मनों पर व्यंग्य

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