कालिदास की अलंकार-योजना

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कालिदास के काव्यों में शब्दालंकारों का प्रयोग अपेक्षाकृत कम मिलता है। यद्यपि यत्र - तत्र सानुप्रासिक पदावली दिखायी देती है, किंतु उतनी ही मात्रा में जितनी कि काव्यप्रवाह में अत्यंत स्वाभविक रूप से उपनिबद्ध हो गयी है। यथा-

जीवंपुन: शश्वदुपप्लवेभ्य: प्रजा: प्रजानाथ पितेव पासि[1]

उपमा कालिदासस्य नोत्कृष्टेति मतं मम।
अर्थांतरन्यासविन्यासे कालिदासों विशिष्यते॥

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरी॥

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीताय पतिंवरा सा।
नरेन्द्रमार्गाट्ठ इव प्रपेदे, विवर्णभावं स स भूमिपाल:॥[3]

मेघदूत महाकाव्य

मेघदूत में उपमा का प्रयोग तो श्लाध्य है ही, किंतु वहाँ उत्प्रेक्षा का बाहुल्येन प्रयोग है। मेघ के रामगिरि से अलकानगरी की ओर प्रस्थान करने पर मार्ग में पड़ने वाले नगरों, पर्वतों एवं नदियों मे मेघ के सम्पर्क से कैसी अपूर्व शोभावृद्धि होती है, कवि ने उत्प्रेक्षा के माध्यम से चित्रित किया है। कृष्णवर्ण मेघ जब विश्राम करने के लिये पके आम्रवृक्षों से घिरे हुए आम्रकूट पर्वत पर बैठेगा तो पृथिवी के स्तन जैसी दिखायी देने वाली यह शोभा देवताओं के द्वारा देखने योग्य होगी- छन्नोपांत: परिणतफलद्योतिभि: काननाम्रै-

स्त्वय्यारूढे शिखरमचल: स्निग्धवेणी सवर्णे।
नूनं यास्यत्यमरमिथुनप्रेक्षणीयामवस्थां
मध्ये श्याम: स्तन इव भुव: शेषविस्तारपाण्डु:॥[4]

प्रेक्षिष्यंते गगनगतयो नूनमावर्ज्य दृष्टी-
रेकं मुक्तागुणमिव भुव: स्थूलमध्येन्द्रनीलम्॥[5]

कुमारसम्भव

कुमारसम्भव में कवि ने कामदेव के प्रभाव से शंकर के मन में उठे विकार की बड़ी ही सटीक उपमा दी है। जिस तरह चन्द्रमा के उदित होने पर समुद्र में ज्वार आ जाता है, उसी प्रकार पार्वती को देख लेने पर शंकर के मन में हलचल होने लगी और उन्होंने अपने नेत्र पार्वती के बिम्बाफल सदृश अधरोष्ठों पर गड़ा दिये-

हरस्तु किञ्चित् परिलुप्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशि:।
उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि॥[6]

इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे।
कामार्त्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतननेषु॥[7]

अनंतरत्नप्रभवस्य यस्त्र हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम्।
एको हि दोषों गुणसन्नितीन्दो: किरणेष्विवाङ्क:॥[8]

क्वचित् प्रभालेपिभिरिन्द्रनीलैर्मुक्तामयी यष्टिरिवानुविद्धा।
अन्यत्र माला सितपङ्कजानामिन्दीवरैरुत्खचितांतरेव।।
क्वचित् खगाना प्रियमानसानां कादम्बसंसर्गवतीत पङक्ति:।
अन्यत्र कालागुरुदत्तपन्ना भक्तिर्भुवश्चन्दनकल्पितेव॥
क्वचित् प्रभा चान्द्रमसी तमोभिश्छायाविलीनै: शबलीकृतेव।
अन्यत्र शुभ्रो शरदभ्रलेखा रन्ध्रेष्षिवालक्ष्यनभ: प्रदेशा॥
क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणेव भस्माङ्गरागा तनुरीश्वरस्य।
पश्यानवद्याङगि विभाति गङ्गा भिन्नप्रवाहा यमुनातरङ्गै:॥[9]

पुष्पं प्रवालोपहितं यदि स्यान्मुक्ताफलं वा स्फुटविद्रुमस्थम्।
ततोस्नुकुर्याद् विशदस्य तस्यास्ताम्रौष्ठपर्यस्तरुच: स्मितस्य॥ [10]

उन्मीलितं तूलिकयेव चित्रं सूर्यांशुभिर्भिन्नमिवारविन्दम्।
बभूव तस्याश्चतुरस्त्रशोभि वपुर्विभक्तं नवयौवन॥[11]

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. रघुवंश महाकाव्य 2.48
  2. दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या॥ रघुवंश महाकाव्य 2.20
  3. 6.67, रघुवंश महाकाव्य
  4. 1.18, मेघदूत महाकाव्य
  5. 1.50, मेघदूत महाकाव्य
  6. 3.67, कुमारसम्भव
  7. 1.5
  8. 11.3
  9. रघुवंश, 13.54-57
  10. कुमारसम्भव 1.44
  11. कुमारसम्भव, 1.32
  12. रघुवंश 8।93
  13. रघुवंश,12।5

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