कुमारिल भट्ट  

कुमारिल भट्ट (लगभग 670 ई) या 'कुमारिल स्वामी' या 'कुमारिल मिश्र' का नाम मीमांसा के इतिहास में मौलिक चिन्तन विशद एवं स्पष्ट व्याख्या तथा अलौकिक प्रतिभा के कारण सदा स्मरणीय रहेगा। इन्होंने वैदिक धर्म का खंडन करने वाले बौद्धों को परास्त कर वैदिक धर्म की पुन: स्थापना की। शंकर दिग्विजय तथा तिब्बती ग्रंथों में इनको और धर्मकीर्ति को लेकर अनेक कथाएं हैं। यह भी कहा जाता है कि इन्होंने वेश बदलकर बौद्धों से बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया और बाद में बौद्धों को परास्त किया।

जीवन परिचय

कुमारिल भट्ट के जन्म स्थान तथा काल के विषय में भी पर्याप्त विवाद है। कुछ लोग इनको दक्षिण भारत का निवासी मानते हैं तो दूसरे लोग इन्हें उत्तर भारत, विशेष रूप से मिथिला, निवासी मानते हैं। तार नाथ के अनुसार इनका काल 635 ई. है, जबकि कृप्पुस्वमी के अनुसार इनका काल 600 से 660 के मध्य है। अन्य लोग इनका समय सातवीं शताब्दी के अंत में मानते हैं।

कुमारिल भट्ट मीमांसा दर्शन के दो प्रधान संप्रदायों में से एक एवं भट्ट संप्रदाय के संस्थापक थे। ईसा की सातवीं शताब्दी में पैदा हुए कुमारिल भट्ट ने 'मीमांसा दर्शन' के भट्ट सम्प्रदाय की स्थापना की थी। कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य से और वाचस्पति मिश्र (850 ई.) से पहले हुए एवं भवभूति (620-680) इन्हीं के शिष्य थे। कुछ विद्वान् कुमारिल भट्ट को दक्षिण का निवासी मानते हैं। कुमारिल ने ज्ञान के स्वरूप तथा उसके साधनों का विवेचन विस्तार से किया है। उनके अनुसार जिस समय को किसी वस्तु का ज्ञान होता है, उसी समय उसकी सत्यता का भी ज्ञान हो जाता है। उसकी सत्यता सिद्ध करने के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।[1]

कुमारिल के मतानुसार

कुमारिल के मतानुसार संसार की उत्पत्ति तथा प्रलय नहीं होता। जीवों का जन्म-मरण चलता रहता है। किन्तु समग्र संसार की उत्पत्ति होती है, न विनाश। न्याय दर्शन की भाँति वे भी ईश्वर को जगत् का कारण नहीं मानते। उनके अनुसार आत्मा नित्य तथा कर्त्ता और कर्म-फल-भोक्ता दोनों है। वेदान्त का अध्ययन और चिन्तन मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है। मोक्ष की स्थिति में सुख की भी अनुभूति नहीं रहती, आत्मा दु:ख से पूर्णत: मुक्त हो जाती है।[1]

ग्रंथ

शबरभाष्य पर वृत्ति रूप से इनके तीन ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हैं:

  1. श्लोकवार्तिक- जो कारिकाबद्ध ग्रंथ है एवं प्रथम अध्याय के प्रथम तर्कवाद का व्याख्यान है।
  2. तंत्रवार्तिक- यह गद्यरूप है। इसमें प्रथम अध्याय के द्वितीय पाद से लेकर तृतीय अध्याय तक की व्याख्या है।
  3. टुप्टीका- अन्तिम नव अध्यायों की टिप्पणी।

भाट्टमत के आचार्य

कुमारिल भट्ट के अनुयायी अनेक आचार्य हुए हैं, जिनमें मण्डनमिश्र, पार्थसारथि मिश्र, माधवाचार्य, खण्डदेव मिश्र आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आचार्यों ने अनेक ग्रंथों की रचना कर भट्टमत का प्रचार, प्रसार एवं संरक्षण किया है।

दार्शनिक विचार

तत्व विचार

तत्वज्ञान की दृष्टि से कुमारिल भट्ट का दर्शन बहुतत्ववादी है। इनके मत में अनेक तत्व हैं, जिनका अस्तित्व है, जिनका ज्ञान होता है तथा जिनके विषय में अनेक प्रकार के व्यवहार होते हैं। वैशेषिक दर्शन के समान कुमारिल भट्ट भी पदार्थ को दो वर्गों में विभाजित करते हैं-

  1. भाव पदार्थ
  2. अभाव पदार्थ।

भाव पदार्थ के चार भेद होते हैं-

  1. द्रव्य
  2. गुण
  3. कर्म
  4. सामान्य।

अभाव भी चार प्रकार का होता है-

  1. प्रागभाव
  2. ध्वंसाभाव
  3. अन्योन्याभाव
  4. अत्यन्ताभाव।

इन पदार्थों का संक्षिप्त वर्णन यहाँ प्रस्तुत किया जाता है-

द्रव्य

यह गुण तथा क्रिया का आश्रय होता है। शब्द को भी द्रव्य माना जाता है। कुमारिल भट्ट के अनुसार शब्द एक नित्य एवं सर्वगत द्रव्य है। अंधकार में नील रूप और क्रिया है। 'नील अंधकार चलता है', इस प्रकार की प्रतीति एवं व्यवहार होता है। अत: तम या अंधकार को भी द्रव्य माना गया है। इसका प्रत्यक्ष चक्षु से होता है, किन्तु इसके ज्ञान के लिए आलोक का अभाव सहकारी कारण है। आकाश का भी इस मत में चक्षु से प्रत्यक्ष माना गया है।

आत्मा

आत्मा शरीर, इन्द्रियाँ एवं बुद्धि से भिन्न नित्य द्रव्य है। यह अविनाशी है तथा कर्मों का कर्ता एवं फल का वास्तविक भोक्ता है। यह सर्वव्यापक है। यह 'मैं', इस प्रत्यय के द्वारा माना जाता है। इसका स्वरूप चेतन है। यह सुख तथा दु:ख का अनुभव करने वाला है। आत्मा तीन प्रकार के प्रपंच के कारण बंधन में रहता है। तीन प्रकार के प्रपंच हैं: भोगायतन 'शरीर', भोग साधन 'इन्द्रियां', तथा शब्द स्पर्श, रूप आदि भोग 'विषय'। इन तीनों के द्वारा जीवन सुख और दु:ख के विषय का अनुभव करता हुआ अनादिकाल के बंधन में पड़ा हुआ है। इन्हीं तीनों के आत्यन्तिक नाश से मुक्ति संभव है।

गुण तेरह हैं।

सामान्य

कुमारिल के अनुसार, जाति, सामान्य तथा आकृति पर्यायवाची हैं। आकृति ही व्यक्तियों में समान रूप से विद्यमान रहकर उनको एक नये वर्ग में रखती है और अन्य वर्ग से अलग करती है। व्यक्ति और जाति में नित्य एवं अविभाज्य संबंध है। सामान्य व्यक्ति से भिन्न होता है, फिर भी सभी व्यक्तियों में विद्यमान रहता है।

शेष पदार्थों का स्वरूप वैशेषिक दर्शन के अनुरूप है।

प्रमाण-विचार : प्रमा तथा प्रमाण

यथार्थ अनुभव को प्रमा कहा जाता है। किन्तु स्मृति और संशय आदि प्रमा के अंतर्गत नहीं आते हैं। अत: अज्ञात एवं सत्यभूत तत्व का ज्ञान प्रमा कहलाता है। इस लक्षण में 'अज्ञात' शब्द देने से स्मृति और अनुवाद का निवारण हो जाता है। वे प्रमा के अंतर्गत नहीं आ पाते और सत्यभूत शब्द देने से संशय, विपर्यय आदि प्रमा से अलग हो जाते हैं। इसी प्रमा के साधन को प्रमाण कहा जाता है।

प्रमाण भेद

भाट्टमत में प्रमाण छ: माने जाते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि या अभाव। इनमें प्रारम्भ के पांच प्रमाणों से भाव पदार्थों का ज्ञान होता है और अंतिम अनुपलब्धि से अभाव पदार्थ का ज्ञान होता है।

प्रत्यक्ष

इन्द्रिय का विषय से सम्बन्ध होने पर जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे प्रत्यक्ष कहते हैं।

प्रत्यक्ष के भेद

प्रत्यक्ष दो प्रकार का होता है। निर्विकल्पक या आलोचनात्मक प्रत्यक्ष और सविकल्पक प्रत्यक्ष।

जब कोई (द्रव्य, गुण या सामान्य) इन्द्रिय के समक्ष आता है तब पहले उसका ज्ञान 'कुछ है', इस रूप में होता है। उसके वर्ग, उसकी विशेषता, आकृति आदि का स्पष्ट ज्ञान उस समय नहीं रहता। इसी ज्ञान को आलोचन ज्ञान या निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहा जाता है। किन्तु जब उस वस्तु के स्वरूप, वर्ग, जाति आदि का स्पष्ट ज्ञान होने लगता है तब वह सविकल्पक प्रत्यक्ष कहलाता है।

इन्द्रिय तथा विषय के सम्बन्ध को 'सम्प्रयोग' या 'सन्निकर्ष' कहा जाता है। न्याय दर्शन में सन्निकर्ष छ: माने गए हैं, किन्तु कुमारिल भट्ट केवल दो ही सन्निकर्ष मानते हैं- संयोग और संयुक्त तादात्म्य। इनके मत में द्रव्य के साथ, गुण, कर्म और जाति का सम्बन्ध समवाय नहीं, बल्कि तादात्म्य है। अत: केवल दो ही सन्निकर्ष मानने से ही काम चल जाता है। प्रत्यक्ष का विशेष विवरण न्याय दर्शन के समान है।

अनुमान

जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह किसी अन्य ज्ञान के बाद आता है, अर्थात् अनुमान प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित होता है। पहले साध्य और हेतु के सम्बन्घ का ज्ञान होता है, जिसे व्याप्ति ज्ञान कहा जाता है। उसके बाद हेतु को देखकर पक्ष में साध्य का ज्ञान प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ, पहले यह ज्ञान रहता है कि जहाँ जहाँ धूम है, वहाँ वहाँ अग्नि है। इसे ही व्याप्ति ज्ञान कहते हैं। इसके बाद पर्वत में धूम दिखलाई पड़ने पर पर्वत में अग्नि का ज्ञान होता है। यही अनुमान से उत्पन्न ज्ञान है। इस प्रकार अनुमान से ज्ञान प्राप्त कर जब दूसरे को समझाया जाता है, तब उसके लिए कुछ वाक्यों का प्रयोग करना पड़ता है, जिन्हें अवयव वाक्य कहते हैं। न्याय दर्शन में ये अवयव वाक्य पांच होते हैं, किन्तु कुमारिल भट्ट केवल तीन ही अवयव मानते हैं : उदाहरण, उपनय एवं निगमन अथवा उदाहरण, हेतु एवं प्रतिज्ञा, जिनको इस प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है। जहाँ जहाँ धूम है, वहाँ वहाँ अग्नि है, जैसे रसोईघर में (उदाहरण) वहाँ पर्वत में धूम है (उपनय अथवा हेतु) अत: पर्वत में अग्नि है (निगमन अथवा प्रतिज्ञा)।

उपमान

उपमान सादृश्य ज्ञान को कहते हैं। इसे न्याय और मीमांसा दोनों में एक स्वतंत्र प्रमाण माना जाता है, किन्तु दोनों की मान्यता में भेद है। न्याय दर्शन में उपमान प्रमाण के द्वारा 'नील गाय' शब्द 'नील गाय' अर्थ का वाचक है। इस प्रकार की शक्ति का ज्ञान होता है। कुमारिल भट्ट के अनुसार उपमान प्रमाण की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है-

एक व्यक्ति जो गाय को जानता है, जंगल में जाता है। वहाँ वह एक जानवर को देखता है। उस जानवर में उसे अपनी गाय की समानता दीख पड़ती है। इसके बाद उसके मन में पहले से ज्ञात गाय का स्मरण होता है कि मेरी गाय मेरे सामने उपस्थित जानवर के समान है। इस सादृश्य से जो ज्ञान होता है, उसका विषय है: वर्तमान जानवर की समानता से युक्त अपनी गाय। यही उपमिति है। इससे सादृश्य का प्रत्यक्ष और गाय का स्मरण होता है, किन्तु सादृश्य युक्त गाय का ज्ञान न तो प्रत्यक्ष से होता है और न ही स्मरण से। अत: उपमान प्रमाण आवश्यक एवं स्वतंत्र प्रमाण माना जाता है।

शब्द

ज्ञात शब्द से पदार्थ के स्मरण होने पर जो वाक्य के अर्थ का ज्ञान होता है, उसे शाब्दी प्रमा या शब्द बोध कहते हैं और इस प्रकार का बोध कराने वाले वाक्य शब्द प्रमाण कहे जाते हैं- पौरुषेय और अपौरुषेय। पौरुषेय वाक्य तभी प्रमाणित होते हैं, जब उनका व्यवहार आप्त पुरुष के द्वारा किया जाता है। अपौरुषेय वाक्य श्रुति है। वह नित्य एवं निर्दोष होने से सदा प्रमाण है।

वाक्य के और भी दो भेद किये जाते हैं

सिद्धार्थक वाक्य और विधायक वाक्य। विधायक वाक्य भी दो प्रकार के होते हैं- उपदेशक और जातिदेशक। किसी पदार्थ की सत्ता को प्रदर्शित करने वाले वाक्यों को सिद्धार्थक वाक्य कहते हैं, जैसे- 'सत्यं ज्ञानमनतंम् ब्रह्म' (अर्थ : ब्रह्म, सत्य एवं अनंत है)। किसी अनुष्ठान के लिए प्रेरणा देने वाला वाक्य विधायक कहलाता है। 'ऐसा इसे करना चाहिए', इस प्रकार के विधान करने वाले वाक्य को उपदेशक वाक्य कहते हैं और 'दर्श पूर्णमास याग के द्वारा स्वर्ग का साधन करे, इस प्रकार के विधायक वाक्य को अतिदेशक वाक्य कहा जाता है।

लौकिक ज्ञान के लिए आप्त पुरुष का कथन प्रमाण हो सकता है, किनतु धर्म की जानकारी केवल वेद वाक्यों से ही संभव है। वेद नित्य और निर्दोष हैं, क्योंकि वे अपौरुषेय हैं। शब्द के नित्य होने के कारण तथा अर्थ के साथ उसके सम्बन्ध के नित्य होने के कारण शब्द की उत्पत्ति नहीं होती। उच्चारण से केवल ध्वनि की उत्पत्ति होती है, जिससे शब्द अभिव्यक्त होता है। इसी शब्द नित्यता के आधार पर वेद वाक्यों को नित्य और अपौरुषेय माना गया है। वह गुरु परम्परा से सुनकर आया है। अत: उसका नाम श्रुति है।

अर्थापत्ति

दृष्ट या श्रृत विषय की उपपत्ति जिस अर्थ के बिना न हो, उस अर्थ के ज्ञान को अर्थापत्ति कहते हैं। उदाहरण के लिए देवदत्त नामक एक व्यक्ति को लेते हैं, जो दिन में कभी नहीं खाता, किन्तु फिर भी मोटा है और मोटा होता जा रहा है। यहाँ देवदत्त की इन दोनों स्थितियों (दिन में न खाने और मोटा होने) में भेद दीख पड़ता है। अत: इस विरोध को हटाने के लिए यह मानना पड़ता है कि देवदत्त रात में भोजन अवश्य करता है। यही अर्थापत्ति है। संक्षेप में इसे यों कहा जा सकता है कि दिन में भोजन न करने वाला देवदत्त मोटा है अर्थात् वह रात में भोजन करता है। देवदत्त का रात में भोजन करना अर्थापत्ति से ज्ञात हो रहा है, क्योंकि यही 'रात का भोजन' उक्त दो वाक्यों के विरोध को हटा सकता है।

अर्थापत्ति के दो भेद होते हैं-

  1. दृष्टार्थापत्ति- जहाँ देखी गई किसी वस्तु के लिए अर्थान्तर की कल्पना की जाती है, जैसे ऊपर वाले उदाहरण में
  2. श्रुतार्थापत्ति- जहाँ एक शब्द सुनकर किसी वस्तु की उत्पत्ति के लिए अन्य शब्द की कल्पना करनी पड़ती है, जैसे- 'बन्द करो' शब्द सुनकर 'द्वार' शब्द की कल्पना की जाती है। इस कल्पना के बिना 'बन्द करो' शब्द अपना अर्थ व्यक्त करने में असमर्थ है। अत: अर्थापत्ति में 'द्वार' शब्द को मिलाकर 'द्वार बन्द करो' यह अर्थ किया जाता है।

अनुपलब्धि

भाव पदार्थों की जानकारी के लिए जिन पांच प्रमाणों की चर्चा की गई है, वे अभाव की जानकारी देने में असमर्थ हैं। अत: अभाव या अनुपलब्धि नाम से एक अन्य स्वतंत्र प्रमाण माना गया है, जिससे अभाव पदार्थ की जानकारी हो सके। उदाहरण के लिए, 'उस कमरे में घड़ा नहीं है', इसकी जानकारी हमें तभी होती है, जब हम घड़े की जानकारी के साधन के रहते हुए यह कहते हैं कि घड़ा उपलब्ध नहीं है और यदि होता तो संशय उपलब्ध होता। अत: अनुपलब्धि से घड़े के अभाव की जानकारी हो जाती है।

भ्रम

कुमारिल भट्ट के भ्रम सम्बन्धी सिद्धांत को विपरीतख्याति या अन्यथाख्याति कहते हैं। इस बात को समझने के लिए हम भ्रम के दो उदाहरणों को प्रस्तुत करते हैं। सीपी में चांदी का ज्ञान और रस्सी में सांप का ज्ञान। इसे विपरीतख्याति या अन्यथाख्याति इसलिए कहा जाता है कि सीपी में जिस चांदी की विशेषता का ज्ञान हो रहा है, वह केवल चांदी में रहती है, सीपी में नहीं। अत: दूसरे की विशेषता विपरीत रूप से दूसरे में भ्रामित होने के कारण यह विपरीत ज्ञान या विपरीत ज्ञान या विपरीतख्याति है। उसी प्रकार रस्सी में सांप की विशेषता के न रहने पर भी ज्ञान में रस्सी में ही सर्प की विशेषता की जानकारी प्राप्त हो लगती है, जो उसका विपरीत धर्म या विशेषता है।

स्वत:प्रामाण्यवाद

प्रामाण्यवाद मीमांसा और न्यायदर्शन का एक प्रमुख विषय है। इसका तात्पर्य यह निश्चय करना है कि ज्ञान में प्रमाण कैसे उत्पन्न होता है और उसकी जानकारी कैसे होती है।

ज्ञाततावाद

कुमारिल भट्ट के अनुसार ज्ञान जिस कारण से उत्पन्न होता है, वही कारण प्रामाण्य को भी उत्पन्न करता है और जिस प्रमाण से ज्ञान का ज्ञान होता है, उसी से उसके प्रामाण्य का भी ज्ञान होता है। यही स्वत: प्रामाण्यवाद है। इसके विरोधी मत को परत: प्रामाण्यवाद कहते हैं, जिसके अनुसार प्रामाण्य कारण के गुण से उत्पन्न होता है और उसका ज्ञान गुण के ज्ञान से होता है। कुमारिल के अनुसार ज्ञान अपने विषय में ज्ञातता नामक एक विशेषता को उत्पन्न करता है। उदाहरणार्थ, जब हम आंख से घड़ा देखते हैं, तब यह कहते हैं कि घड़ा हमें ज्ञात है। यह कहना तभी संभव है, जब हम घड़े में ज्ञातता की जानकारी प्राप्त कर लें। इस प्रकार का हम व्यवहार करते हैं। इससे स्पष्ट है कि हमें ज्ञातता की जानकारी हो जाती है और यह ज्ञातता ज्ञान के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती। अर्थात् अर्थापत्ति प्रमाण से हम ज्ञान का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार ज्ञान स्वयं प्रकाश नहीं है, जो कि प्रभाकर ने माना है।

मोक्ष

कुमारिल भट्ट के अनुसार, प्रपंच सम्बन्ध का विलय ही मोक्ष है। अर्थात् इस जगत् के साथ आत्मा के सम्बन्ध के विनाश का नाम मोक्ष है।

साधन

मोक्ष के साधन के रूप में कुमारिल ने कर्म ज्ञान समुच्यवाद को स्वीकार किया है। काम्यकर्म फल देते हैं और निषिद्ध कर्मों के करने से पाप होता है। अत: इन दोनों से विरत रहना चाहिए। किन्तु नित्य कर्मों को करते रहना चाहिए। साथ ही साथ आत्मज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। मोक्ष के लिए कर्म प्रधान कारण है और ज्ञान सहकारी कारण। यही कुमारिल कर्मज्ञान समुच्यवाद है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

गिरि, डॉ. रघनाथ विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 145।

  1. 1.0 1.1 लीलाधर, शर्मा भारतीय चरित कोश (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: शिक्षा भारती, 170।

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