कृष्ण संदर्भ  

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कृष्ण अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त ब्रह्म थे। मूलत: वे नारायण थे। वे स्वयंभू तथा संपूर्ण जगत् के प्रपितामह थे। द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी रचण, अश्विनीकुमार नासिकास्थान, चंद्र और सूर्य नेत्र तथा विभिन्न देवता विभिन्न देहयष्टियां हैं। वे (ब्रह्म रूप) ही प्रलयकाल के अंत में ब्रह्मा के रूप में स्वयं प्रकट हुए तथा सृष्टि का विस्तार किया। रुद्र इत्यादि की सृष्टि करने के उपरांत वे लोकहित के लिए अनेक रूप धारण करके प्रकट होते रहे।

प्रसंग सहित संक्षिप्त परिचय

श्रीकृष्ण के रूप में वही अव्यक्त 'नारायण' व्यक्त रूप धारण करके अवतरित हुए। वे वसुदेव के पुत्र हुए। कंस के भय से वसुदेव उन्हें नंद गोप के यहाँ छोड़ आये। वहीं पलकर वे बड़े हुए। यशोदा (नंद की पत्नी) से उन्हें अद्भुत वात्सल्य की उपलब्धि हुई।

  • शिशुरूप में वे एक बार छकड़े नीचे सो रहे थे। यशोदा उन्हें वहां छोड़ यमुना तट गयी थी। बाल-लीला का प्रदर्शन करते हुए रोते हुए कृष्ण ने अपने पांव के अंगूठे से छकड़े को धक्का दिया तो वह उलट गया। उस पर रखे समस्त मटके चूर-चूर हो गये।
कृष्ण जन्म
कृष्ण को कारागार ले जाते हुए वसुदेव, द्वारा- राजा रवि वर्मा
  • देवताओं के देखते-देखते उन्होंने पूतना को मार डाला। (विस्तार से पढ़ें- पूतना वध)
  • वे अपने बड़े भाई संकर्षण[1] के साथ खेलते-कूदते बड़े हुए। सात वर्ष की अवस्था में गोचारण के लिए जाया करते थे। एक बार मक्खन चुराकर खाने के दंडस्वरूप माँ यशोदा ने उन्हें ऊखल में बांध दिया। कृष्ण ने उस ऊखल को यमल तथा अर्जुन नामक दो वृक्षों के बीच में फंसाकर इतने ज़ोर से खींचा कि वे दोनों वृक्ष भूमिसात हो गये। इस प्रकार उन वृक्षो पर रहने वाले दो राक्षसों को उन्होंने मार डाला। वे दोनों भाई ग्वालोचित वेशधारी वन में पिपिहरी तथा बांसुरी बजाकर आमोद-प्रमोद के साथ गायों को चराते थे। (विस्तार से पढ़ें- यमल और अर्जुन)
  • कृष्ण पीले और बलराम नीले वस्त्र धारण करते थे। वे पत्तों के मुकुट पहन लेते। कभी-कभी रस्सी का यज्ञोपवीत भी धारण कर लेते थे। वे गोप बालकों के आकर्षण का केंद्रबिंदु थे।
  • उन्होंने कदम्बवन के पास हृद (कुण्ड) में रहने वाले कालिया नाग के मस्तक पर नृत्यक्रीड़ा की थी तथा अन्यत्र जाने का आदेश दिया था।
  • गोपाल बालकों द्वारा किये सर्वभूत ईश्वर स्वरूप को प्रकट किया तथा गिरिराज को समर्पित होने वाली खीर वे स्वयं खा गये। तब से गोपगण उनकी पूजा करने लगे। जब इन्द्र ने वर्षा की थी तब श्रीकृष्ण ने गौओं की रक्षा के निमित्त एक सप्ताह तक गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ पर उठाए रखा था। इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें गोविंद नाम दिया।
  • श्रीकृष्ण ने पशुओं की हितकामना से वृक्ष रूप-धारी 'अरिष्ट नामक दैत्य' का संहार किया।
  • ब्रजनिवासी 'केशी नामक दैत्य' का संहार किया। उस दैत्य का शरीर घोड़े जैसा और बल दस हज़ार हाथियों के समान था।
  • कंस के दरबार में रहने वाले चाणूर नामक मल्ल को उन्होंने मार डाला।
  • कंस के भाई तथा सेनापति शत्रुनाशक का भी उन्होंने नाश कर डाला।
  • कंस के कुवलयापीड़ नामक हाथी को भी उन्होंने मार गिराया।
  • कंस को मारकर उन्होंने उग्रसेन का राज्याभिषेक कर दिया।
  • उज्जयिनी में दोनों भाइयों ने वेद विद्याध्ययन किया। धनुर्विद्या सीखने वे सांदीपनि के पास गये। सांदीपनि ने गुरु-दक्षिणा में अपने पुत्र को वापस मांगा, जिसे कोई समुद्री जंतु खा गया था। श्रीकृष्ण ने समुद्र में रहने वाले उस दैत्य का संहार कर दिया तथा गुरुपुत्र को पुन: जीवनदान दिया जो कि वर्षों पूर्व यमलोक में जा चुका था। कृष्ण के कृपाप्रसाद से उसने पूर्ववत् अपना शरीर धारण किया।
  • श्रीकृष्ण ने नरकासुर[2] को मार डाला। (विस्तार से पढ़ें- नरकासुर)
  • श्रीकृष्ण ने उषा अनिरुद्ध का मिलन करवाया, बाणासुर को मारा। (विस्तार से पढ़ें- उषा अनिरुद्ध)
  • उन्होंने रूक्मी को पराजित करके रुक्मिणी का हरण किया। (विस्तार से पढ़ें- रुक्मिणी)
  • इन्द्र को परास्त करके परिजात वृक्ष का अपहरण किया।

छान्दोग्य उपनिषद

एक बार आंगिरस ऋषि ने देवकी के पुत्र कृष्ण को यज्ञदर्शन सुनाया था। फलस्वरूप कृष्ण शेष समस्त विधाओं के प्रति तृष्णाहीन हो गये थे।[3]कृष्ण का मातृपरक नाम 'देवकीपुत्र'[4] में पाया जाता है।

महाभारत (उद्योगपर्व एवं द्रोणपर्व)

द्यूतक्रीड़ा के उपरांत पांडवों के वनवास काल में कौरवों-पांडवों के युद्ध की संभावना देख श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए उनकी सभा में गये। कृष्ण के साथ धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, सात्यकि इत्यादि सभी इस मत के थे कि पांडवों का राज्य उन्हें लौटा देना चाहिए तथा उनसे संधि कर, शांति स्थापित करनी चाहिए; किंतु दुर्योधन उसके लिए तैयार न था। उसने शकुनि तथा कर्ण से सलाह करके कृष्ण को बंदी बना लेने का निश्चय किया। सात्यकि को विदित हुआ तो उसने सभासदों के सम्मुख ही कृष्ण को इस तथ्य की सूचना दी।

कृष्ण ने क्रुद्ध होकर अपना विश्व रूप (विराट् रूप) प्रदर्शित किया। कृष्ण की दाहिनी बांह पर अर्जुन, बायीं बांह पर हलधर, वक्ष पर शिव तथा अंग-प्रत्यंग पर विभिन्न देवी-देवता साक्षात् दिखलायी दिए। कृष्ण के अट्टहास से भूमंडल कांप उठा। शरीर से ज्वाला प्रस्फुटित हुई तथा सब ओर अनेक देवता और योद्धाओं के दर्शन होने लगे। ऐसे रूप के दर्शन दे, कृष्ण ने वहां से प्रस्थान किया। महाभारत युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन के सारथी का कार्यभार संभाला था। अभिमन्यु की मृत्यु के उपरांत कृष्ण ने अपने-आप स्वीकार किया कि अर्जुन (नर) नारायण (श्रीकृष्ण) का आधा शरीर है। युद्ध में पांडवों की विजय के उपरांत वे लोग कृष्ण सहित कुरुक्षेत्र में रहे। जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हो गया, भीष्म पितामह नित्य ही उन्हें दान, धर्म, कर्तव्य का उपदेश देते रहे। उनके स्वर्गारोहण उपरांत पांडवों को हस्तिनापुर छोड़ते हुए कृष्ण अपने माता-पिता के दर्शन करने द्वारकापुरी चले गये।[5] श्रीकृष्ण इस प्रकार क्रीड़ा करते हैं जैसे मनुष्य खिलौनें से क्रीड़ा करता है। संपूर्ण चराचर भूत नारायण से उद्भूत है। पानी के बुद्बुद्वत् उसी में लीन हो जाता है।[6]

हरिवंश पुराण

कृष्ण और बलराम ने अनुभव किया कि ब्रज भूमि की वनश्री बच्चों की क्रीड़ा, गोपों की फल-सब्ज़ी बेचने के लिए उपज तथा गौओं के क्षारयुक्त मल इत्यादि से नष्ट हो गयी है। इस कारण से उन्होंने निश्चय किया कि गोवर्धन पर्वत से युक्त कदम्ब इत्यादि वृक्षों से अपूरित वृन्दावन में जाकर रहना चाहिए। कृष्ण ने अपने रोम-रोम से भयानक भेड़ियों को उत्पन्न किया। उनको देखकर गोप-गोपांगनाएं तथा गायें अत्यंत त्रस्त होकर ब्रजभूमि छोड़ने के लिए तुरंत तैयार हो गये। लोग वृन्दावन में जा बसे।[7]

श्रीमद भागवत

कंस की कारागार में वसुदेव के यहाँ भगवान ने कृष्ण-रूप में अवतार लिया। दस वर्ष तक बलराम के साथ ऐसे रहे कि उनकी कीर्ति वृन्दावन से बाहर नहीं गयी। वे गाय चराते तथा बांसुरी बजाकर सबको रिझाते थे। खेल-खेल में उन्होंने अनेक असुरों का संहार किया, कंस को उठाकर पटक दिया। कृष्ण ने अपनी शक्ति योगमाया से भौमासुर की लाई राजकन्याओं से एक ही मुहूर्त में अलग-अलग महलों में विधिवत पाणिग्रहण संस्कार संपादित किया। एक बार नंद ने कार्तिक शुक्ल एकादशी का उपवास किया तथा रात्रि में यमुना में स्नान करने लगे। वह असुरों की वेला थी। अत: एक असुर उन्हें पकड़कर वरुण के पास ले गया। कृष्ण वरुण के पास गये तथा नंद बाबा को वापस ले आये।
नारद ने कंस को जाकर बताया कि कृष्ण वसुदेव का बेटा है तथा बलराम रोहिणी का। वे दोनों छिपाकर नंद के यहाँ रखे गये हैं। कंस ने कृष्ण को अपनी भावी मृत्यु का कारण मानकर वसुदेव तथा देवकी को पुन: कैद कर लिया। श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर उन्हें कैद से छुड़ाया। यदुवंशियों को ययाति का शाप था कि वे कभी शासन नहीं कर पायेंगे। अत: कृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन से शासन ग्रहण करने का अनुरोध किया। कृष्ण और बलराम ने नंद से कहा- "पिताजी, आपका वात्सल्य अपूर्व है। आपने तथा यशोदा ने अपने बालकों के समान ही हमें स्नेह दिया। आप ब्रज जाइए। हम लोग भी यहाँ का काम निपटाकर आपसे मिलने आयेंगे।" वे दोनों अवंतीपुर (वर्तमान उज्जैन) निवासी गुरुवर संदीपन के गुरुकुल में रहकर उनकी सेवा करने लगे। चौंसठ दिन में उन दोनों ने चौंसठ कलाओं में निपुणता प्राप्त की तथा संदीपन को गुरु-दक्षिणास्वरूप उसका मृत पुत्र पुन: लौटाकर वे दोनों मथुरा लौट गये।[8]
श्रीकृष्ण के अनेक विवाह हुए थे।[9] उनकी श्रुतकीर्ति नामक बुआ का विवाह केकय देश में हुआ था। उनकी कन्या का नाम था 'भद्रा' जिसका विवाह उसके भाई सन्तर्दन आदि ने कृष्ण से कर दिया था। मद्र देश की राजकुमारी 'सुलक्षणा' को कृष्ण ने स्वयंवर में हर लिया था। इनके अतिरिक्त भौमासुर को मारकर अनेक सुंदरियों को वे कैद से छुड़ा लाये थे।[10]
एक बार सूर्य-ग्रहण के अवसर पर भारत के विभिन्न प्रांतों की जनता कुरुक्षेत्र पहुंची। वहां वसुदेव, कृष्ण और बलराम से नंद, यशोदा, गोप-गोपियों आदि का सम्मिलन हुआ। कृष्ण ने गोपियों आदि को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दियां उन्हीं दिनों वसुदेव के यज्ञोत्सव का आयोजन था। उस संदर्भ में नंद बाबा, यशोदा तथा पांडव-परिवार के अधिकांश सदस्य तीन माह तक द्वारका में ठहरे।[11]
एक बार कृष्ण अपने दो भक्तों पर विशेष प्रसन्न हुए। उनमें से एक तो मिथिला निवासी गृहस्थी ब्राह्मण 'श्रुतदेव' था और दूसरा मिथिला का राजा 'बहुलाश्व' था। श्रीकृष्ण ने दो रूप धारण करके एक ही समय में दोनों को दर्शन दिए तथा दोनों भक्तों ने भगवत्स्वरूप प्राप्त किया।[12]
ब्रह्मा की प्रार्थना पर विष्णु ने हंस का रूप धारण करके सनकादि के चित्त तथा गुणों के अनैक्य के विषय में उपदेश दिया था। यदुवंशियों के संहार के उपरांत 'जरा' नामक व्याध को निमिंत्त बनाकर श्रीकृष्ण ने स्वधाम में प्रवेश किया उन्हें अपने धाम में प्रवेश करते कोई भी देवता देख नहीं पाया। श्रीकृष्ण की कृपा से उनके शरीर पर प्रहार करने वाला व्याध सदेह स्वर्ग चला गया। श्रीकृष्ण द्वारा नश्वर शरीर के त्यागोपरांत वसुदेव, अर्जुन आदि बहुत दुखी हुए। सब उनकी अलौकिक लीलाओं को स्मरण करते रहे।[13]

देवी भागवत

भूमि का भार-हरण करने की प्रार्थना सुनकर हरि ने देवताओं को दो बाल दिये थे; एक काला-कृष्ण, दूसरा सफ़ेद-बलराम[14] कृष्ण-कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे। कश्यप ने वरुण से कामधेनु मांगी थी फिर लौटायी नहीं, अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए। देवी भागवत में दिति और अदिति को दक्ष कन्या माना गया है। अदिति का पुत्र इन्द्र था जिसने माँ की प्रेरणा से दिति के गर्भ के 49 भाग कर दिए थे जो मरूत हुए। अदिति से रुष्ट होकर दिति ने शाप दिया था-'जिस प्रकार गुप्त रूप से तूने मेरा गर्भ नष्ट करने का प्रयत्न करवाया है उसी प्रकार पृथ्वी पर जन्म लेकर तू बार-बार मृतवत्सा होगी।' फलत: उसने देवकी के रूप में जन्म लिया।

  • विष्णु ने देवताओं की रक्षा करने के निमित्त भृगु की पत्नी (शुक की मां) का हनन किया था। अत: भृगु के शापवश उन्होंने पृथ्वी पर बार-बार जन्म लिया। नर-नारायण अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए। अप्सराएं राजकुमारियों के रूप में जन्मीं तथा कृष्ण की पत्नियां हुई।
बंसी बजाते हुए कृष्ण

दैत्य मधु का पुत्र लवण ब्राह्मणों को अनेक प्रकार से पीड़ित कर रहा था। लक्ष्मण के भाई शत्रुघ्न ने उस दैत्य को मारकर मथुरा नामक नगरी की स्थापना की। कालांतर में सूर्यवंश क्षीण हो गया। ययाति कुलोत्पन्न यादवों ने मथुरा पर अधिकार कर लिया। यादवराज शूरसेन के पुत्र का नाम वसुदेव था। वह वरुण के शाप तथा कश्यप के अंश से उत्पन्न हुआ था। शूरसेन की मृत्यु के उपरांत उग्रसेन को राज्य की प्राप्ति हुई। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। देवक राजा की कन्या का नाम देवकी था। उसका जन्म वरुण के शाप तथा अदिति के अंश से हुआ था। देवक ने उसका विवाह वसुदेव से कर दिया। विवाह होते ही आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस को मार डालेगी। कंस ने देवकी के बाल पकड़कर उसे मारने के लिए खड्ग उठा लिया। वसुदेव के वीर साथियों से कंस का युद्ध होने लगा। यादवों ने कंस को समझा-बुझाकर शांत किया कि अपनी बहन पर हाथ उठाना उचित नहीं है। हो सकता है, किसी शत्रु ने ही यह आकाशवाणी रची हो। वसुदेव ने कहा कि वह अपनी प्रत्येक संतान कंस को अर्पित कर देगा। इस शर्त पर कंस ने उसे छोड़ दिया।

वसुदेव देवकी को लेकर अपने घर चला गया। प्रथम पुत्र उत्पन्न होने पर वसुदेव पुत्र सहित कंस के पास पहुंचा। कंस ने 'प्रथम बालक से नहीं, अष्टम बालक से भय है' कहकर बालक उसे लौटा दिया, किंतु तभी नारद ने वहां पहुंचकर कंस को समझाया कि गिनती कहां से शुरू करेंगे आप कि किस बालक को अष्टम माना जायेगा, नहीं कहा जा सकता। यह सुनकर कंस ने बालक को शिला पर पटककर मार डाला। इसी प्रकार देवकी के छह पुत्र मारे गये। वे छहों शापवश जन्मते ही नष्ट हो गये। पूर्वकाल में ब्रह्मा अपनी कन्या के प्रति कामुक हो उठे थे। रमण करते हुए ब्रह्मा को देख महर्षि मरीचि के (उर्णा नामक पत्नी के गर्भ से उत्पन्न) छह पुत्रों ने उनका परिहास किया था। इससे रुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दिया था। फलत: पहले वे कालनेमि के पुत्र हुए, फिर हिरण्यकशिपु के पुत्र हुए। दूसरे जन्म में ज्ञान विच्युत न होने के कारण ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा था कि वे मनवांछित देवता अथवा गंधर्व हो जायें ! वर पाकर वे लोग तो प्रसन्न हुए। हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्रों को ब्रह्मा का प्रिय जान क्रोधावेश में कहा-"तुम पाताल में जाकर निद्रा में पड़े रहोगे। पृथ्वी पर षड्गर्क नाम से प्रसिद्ध होगे। देवकी के गर्भ से जन्म लेकर कालनेमि के वंश से उत्पन्न कंस के हाथों मारे जाओगे।" देवकी के सातवें गर्भ में अनंत देव आये। योगमाया ने योग-बल से इस गर्भ का आकर्षण करके उसे रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया। भौतिक दृष्टि से देवकी का गर्भपात मान लिया गया। तदनंतर विष्णु के अंशावतार कृष्ण ने अष्टम् पुत्र के रूप में जन्म लिया। योगमाया ने स्वेच्छा से यशोदा के गर्भ में प्रवेश किया। अन्य पात्रों के जन्म के मूलांश की तालिका निम्नलिखित है:-

मूलांश कृष्ण-कथा के पात्र
हिरण्यकशिपु शिशुपाल
विप्रचित्त जरासंध
प्रह्लाद शल्य
खर लंबक तथा धेनुक
वाराह और किशोर चाणूर और मुष्टिक
दिति पुत्र अरिष्ट कुवलयापीड़
कंस का हाथी

श्रीकृष्ण परमात्मा है। उनके सोलहवें अंश का एक अंश, सौ करोड़ सूर्यों के प्रकाश से युक्त एक बालक होकर, मूलशक्ति प्रसूत डिंब में स्थापित था डिंब के दो भागों में विभक्त होने पर भूखा-प्यासा वह बालक रोने लगा। कालांतर में पूर्व संस्कार के बल से वह परम पुरुष श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न होकर हंसने लगा। श्रीकृष्ण उस बालक को आशीर्वाद देकर त्रैलोक्य चले गये। कृष्ण के आशीर्वाद से वह ज्ञानयुक्त हुआ। उसने विराट रूप धारण किया, उसी के नाभिकमल से ब्रह्मा ने जन्म लिया तथा सृष्टि की रचना की। सृष्टि के संहार के लिए ब्रह्मा के ललाट से एकादश रुद्र उत्पन्न हुए। उस बालक के क्षुद्रांश से ही विष्णु ने उत्पन्न होकर सृष्टि का पालन किया। श्रीकृष्ण को चतुर्भुज नारायण से भिन्न माना गया है। कृष्ण ही ब्रह्मा, विष्णु , महेश के कारणभूत हैं। राधा सर्वशक्तिमति देवी हैं।[15]महाभारत में यम, रुद्र, काम और क्रोध-चारों के अंश से अश्वत्थामा का अवतरण हुआ।

शिव पुराण

दुर्वासा कृष्ण की परीक्षा लेने गये। पर्याप्त आतिथ्य पाकर उन्होंने अपने रथ को कृष्ण तथा उनकी पत्नी रुक्मिणी से खिंचवाने की इच्छा प्रकट की। कृष्ण और रुक्मिणी के सहर्ष रथ खींचने से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कृष्ण को 'पायस' दी और कहा कि वे अपने बदन पर लगा लें। जहां-जहां यह लगेगी, वहां किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं लग पायेगा। कृष्ण ने वैसा ही किया।[16]

महाभारत के प्रमुख पात्र श्रीकृष्ण

महाभारत युद्ध में भीष्म कृष्ण की प्रतिज्ञा भंग करवाते हुए

मंगलाचरण

महाभारत धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकों प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष है। यह विविध कथारूपी रत्नों का रत्नाकर तथा अज्ञान के अन्धकार को विनष्ट करने वाला सूर्य है। इस ग्रन्थ के मुख्य विषय तथा इस महायुद्ध के महानायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं। नि:शस्त्र होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण ही महाभारत के प्रधान योद्धा हैं। इसलिये सम्पूर्ण महाभारत भगवान् वासुदेव के ही नाम, रूप लीला और धाम का संकीर्तन है। नारायण के नाम से इस ग्रन्थ के मंगलाचरण में व्यासजी ने सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण की ही वन्दना की है।

द्रौपदी स्वयंवर

महाभारत के आदिपर्व में भगवान् श्रीकृष्ण का प्रथम दर्शन द्रौपदी-स्वयंवर के अवसर पर होता है। अब अर्जुन के लक्ष्यवेध करने पर द्रौपदी उनके गले में जयमाला डालती है। तब कौरव पक्ष के लोग तथा अन्य राजा मिलकर द्रौपदी को पाने के लिये युद्ध की योजना बनाते हैं। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने उनको समझाते हुए कहा कि 'इन लोगों ने द्रौपदी को धर्मपूर्वक प्राप्त किया है, अत: आप लोगों को अकारण उत्तेजित नहीं होना चाहिये।' भगवान् श्रीकृष्ण को धर्म का पक्ष लेते हुए देखकर सभी लोग शान्त हो गये और द्रौपदी के साथ पाण्डव सकुशल अपने निवास पर चले गये।

प्रथम पूजनीय

धर्मराज युधिष्ठर के राजसूय यज्ञ में जब यह प्रश्र उपस्थित हुआ कि यहाँ सर्वप्रथम किसकी पूजा की जाय तो उस समय महात्मा भीष्म ने कहा कि 'वासुदेव ही इस विश्व के उत्पत्ति एवं प्रलयस्वरूप हैं और इस चराचर जगत् का अस्तित्व उन्हीं से है। वासुदेव ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता और समस्त प्राणियों के अधीश्वर हैं, अतएव वे ही प्रथम पूजनीय हैं।' भीष्म के इस कथन पर चेदिराज शिशुपाल ने श्रीकृष्ण की प्रथम पूजा का विरोध करते हुए उनकी कठोर निन्दा की और भीष्म पितामह को भी खरी-खोटी सुनायी। भगवान् श्री कृष्ण धैर्यपूर्वक उसकी कठोर बातों को सहते रहे और जब वह सीमा पार करने लगा, तब उन्होंने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। सबके देखते-देखते शिशुपाल के शरीर से एक दिव्य तेज़ निकला और भगवान् श्रीकृष्ण में समा गया। इस अलौकिक घटना से यह सिद्ध होता है कि कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, भगवान् के हाथों मरकर वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है।

द्रौपदी

पाण्डवों के एकमात्र रक्षक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही थे, उन्हीं की कृपा और युक्ति से ही भीमसेन के द्वारा जरासन्ध मारा गया और युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ सम्पन्न हुआ। राजसूय यज्ञ का दिव्य सभागार भी मय दानव ने भगवान् श्रीकृष्ण के आदेश से ही बनाया। द्यूत में पराजित हुए पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी जब भरी सभा में दु:शासन के द्वारा नग्न की जा रही थी, तब उसकी करुण पुकार सुनकर उस वनमाली ने वस्त्रावतार धारण किया। शाक का एक पत्ता खाकर भक्तभयहारी भगवान् ने दुर्वासा के कोप से पाण्डवों की रक्षा की।

शान्तिदूत

युद्ध को रोकने के लिये श्रीकृष्ण शान्तिदूत बने, किंतु दुर्योधन के अहंकार के कारण युद्धारम्भ हुआ और राजसूययज्ञ के अग्रपूज्य भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने। संग्राम भूमि में उन्होंने अर्जुन के माध्यम से विश्व को गीता रूपी दुर्लभ रत्न प्रदान किया। भीष्म, द्रोण, कर्ण और अश्वत्थामा-जैसे महारथियों के दिव्यास्त्रों से उन्होंने पाण्डवों की रक्षा की। युद्ध का अन्त हुआ और युधिष्ठिर का धर्मराज्य स्थापित हुआ। पाण्डवों का एकमात्र वंशधर उत्तरा का पुत्र परीक्षित अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से मृत उत्पन्न हुआ, किंतु भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से ही उसे जीवनदान मिला। अन्त में गान्धारी के शाप को स्वीकार करके महाभारत के महानायक भगवान श्रीकृष्ण ने उद्दण्ड यादवकुल के परस्पर गृहयुद्ध में संहार के साथ अपनी मानवी लीला का संवरण किया।

ऋग्वेद में कृष्ण

ऋग्वेद में कृष्ण नाम का उल्लेख दो रूपों में मिलता है—एक कृष्ण आंगिरस, जो सोमपान के लिए अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं[17] और दूसरे कृष्ण नाम का एक असुर, जो अपनी दस सहस्र सेनाओं के साथ अंशुमती तटवर्ती प्रदेश में रहता था और इन्द्र द्वारा पराभूत हुआ था। कृष्ण सम्बन्धी इन दोनों सन्दर्भो में परस्पर सम्बन्ध है अथवा नहीं, इस विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों की स्तुति में कक्षिवान ऋषि द्वारा उन्हें कृष्ण के पौत्र विष्णापु के जिलाने का श्रेय दिया गया है।[18] कृष्ण के पुत्र विश्वक (विश्वकाय) ने भी एक सूक्त में सनतान के लिए अश्विनीकुमारों का आवाहन किया है और दूरस्थ विष्णापु को लाने की प्रार्थना की है।[19] ऐसा जान पड़ता है कि कदाचित विष्णापु किसी प्रकार आहत हो गया था और कृष्ण आंगिरस और उनके पुत्र ने उसके जीवन के लिए आरोग्य के देवता अश्विनीकुमारों से प्रार्थना की थी।

कृष्णासुर के सम्बन्ध में भी उल्लेख है कि उसकी गर्भवती स्त्रियों का इन्द्र ने वध किया था।[20] ऋग्वेद के एक छंद में गायों के उद्धारकर्ता और स्वामी का उल्लेख है और विष्णु को उस लोक का अधिपति कहा गया है। परन्तु भागवत धर्म के उपास्य कृष्ण की कथा से इन सन्दर्भों का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं जान पड़ता। छान्दोग्य उपनिषद में देवकीपुत्र कृष्ण को घोर आंगिरस का शिष्य कहा गया है और बताया गया है कि गुरु ने उन्हें यज्ञ की एक ऐसी सरल रीति बतायी थी जिसकी दक्षिणा, तप, दान, आर्जव, अहिंसा, और सत्य थी। गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण की ज्ञान-पिपासा सदा के लिए शान्त हो गयी।[21] कृष्ण आंगिरस का उल्लेख कौशीतकी ब्राह्मण में भी मिलता है।[22] कृष्ण-सम्बन्धी यह सन्दर्भ उन्हें गीता के उपदेष्टा और भागवत धर्म के पूज्य कृष्ण के निकट ले जाता है।

बौद्ध साहित्य

बौद्ध साहित्य में कृष्ण का उल्लेख दो स्थलों पर मिलता है-एक घत जातक में वर्णित देवगब्भा और उपसागर के बलवान, पराक्रमी, उद्धत और क्रीड़ाप्रिय पुत्र वासुदेव कण्ह की कथा के रूप में और दूसरा महाउमग्ग जातक के कामासक्त वासुदेव कण्ह के सन्दर्भ में। घत जातक के वासुदेव कण्ह पुत्र शोक में दुखी चित्रित किये गये हैं जिससे ऋग्वेद के आंगिरस कृष्ण के सन्दर्भ से उनका सूत्र जोड़ा जा सकता है। महाउमग्ग, जातक में वासुदेव कण्ह द्वारा कामासक्त होकर चाण्डाल कन्या जाम्बवती को महिषी बनाने का उल्लेख हुआ है।

अनेक वृत्तान्त

गोवर्धन पर्वत उठाते हुए कृष्ण

निपुण बलवान योद्धा

महाभारत में कृष्ण सम्बन्धी अनेक वृत्तान्त मिलते हैं। महाभारत युद्ध में उनके पराक्रम, ऐश्वर्य और नीतिनैपुण्य के साथ उनके देवत्व का भी समन्वय पाया जाता है। सभापर्व में भीष्म द्वारा उनकी प्रशंसा समस्त वेद-वेदान्त के ज्ञाता तथा राजनीति में निपुण बलवान योद्धा के रूप में की गयी है। उद्योग पर्व में कहा गया है कि अर्जुन वज्रपाणि इन्द्र की अपेक्षा कृष्ण को अधिक पराक्रमी समझकर उन्हें युद्ध में अपनी ओर मिलाने में अपना सौभाग्य मानते हैं। इसी स्थल पर कृष्ण के पराक्रम का वर्णन करते हुए उनके द्वारा दस्युओं के संहार, दुर्धर्ष राजाओं के विनाश, रुक्मिणी के हरण, नगजित के पुत्रों की पराजय, सुदर्शनराजा की मुक्ति, पाण्डय के संहार, काशी नगरी के उद्धार, निषादों के राजा एकलव्य के वध, उग्रसेन के पुत्र सुनाम की मृत्यु आदि कार्यो का वर्णन किया गया है। देवताओं के द्वारा उन्हें अवध्यता का वरदान मिला था। उन्होंने बाल्यावस्था में ही इन्द्र के घोड़े उच्चै:श्रवा के समान बली, यमुना के वन में रहने वाले हयराज को मार डाला था तथा वृष प्रलंब, नरग, जृम्भ, मुर, कंस आदि का संहार किया था, जल देवता वरुण को पराजित किया था तथा पाताल वासी पंचजन को मारकर पाँचजन्य प्राप्त किया था। अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा की प्रसन्नता के लिए वे अमरावती से पारिजात लाये थे।

वासुदेव

महाभारत में प्राप्त कृष्ण सम्बन्धी इन सन्दर्भों से उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व की सूचना मिलती है और ज्ञात होता है कि वे वृष्णि वंशीय सात्वत जाति के पूज्य पुरुष थे। यह भी संकेत मिलता है कि महाभारत और पुराणों में वर्णित कृष्ण के चरित्र और किन्हीं ऐतिहासिक वासुदेव कृष्ण सम्बन्धी कथा में कुछ अन्तर अवश्य रहा होगा, क्योंकि महाभारत और पुराणों में अनेक स्थलों पर इस बात पर बल दिया गया है कि यही कृष्ण वास्तविक वासुदेव हैं, यही द्वितीय वासुदेव हैं। द्वितीय वासुदेव कहने का अभिप्राय यह था कि कुछ अन्य राजा भी अपने को द्वितीय वासुदेव के नाम से प्रसिद्ध करने का यत्न करते थे। पौण्ड्र राजा पुरुषोत्तम और करवीरपुर के राजा श्रृगाल इसी प्रकार के व्यक्ति थे, जिन्हें मारकर कृष्ण ने सिद्ध किया कि उनका वासुदेवत्व मिथ्या है तथा वे ही स्वयं एकमात्र वासुदेव हैं।

पुराणों में कृष्ण

विष्णु पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर का आवरण पृष्ठ

महाभारत, हरिवंश पुराण तथा विष्णु पुराण, वायु पुराण, वामन पुराण, भागवत पुराण आदि पुराणों में कृष्ण की तुलना में इन्द्र की हीनता सिद्ध करने के लिए अनेक कथाएँ दी गयी हैं; परन्तु फिर भी गोवर्धन पर्वत धारण के प्रसंग में उनके इन्द्र द्वारा अभिषिक्त होने और 'उपेन्द्र' नाम से स्वीकृत होने का उल्लेख हुआ है। पुराणों में विविध कथाओं के माध्यम से उत्तरोत्तर कृष्ण की महत्ता और उसी अनुपात में इन्द्र की हीनता प्रमाणित की गयी है। महाभारत में कृष्ण के ऐश्वर्य और देवत्व का प्रचुर वर्णन है परन्तु उनके लालित्य और माधुर्य का कोई संकेत नहीं मिलता। महाभारत उनके गोप जीवन और गोपी प्रेम के सम्बन्ध में सर्वथा मौन है। सभा पर्व के उस प्रसंग में भी, जिसे प्रक्षिप्त कहा जाता है और जिसमें शिशुपाल कृष्ण की निन्दा करते हुए उनके द्वारा पूतना, बकासुर, केशी, वत्सासुर और कंस के वध तथा गोवर्धन धारण किये जाने का उल्लेख करता है, गोपियों से उनके प्रेम का कोई संकेत नहीं किया गया है। इससे यह स्पष्ट सूचित होता है कि गोपाल कृष्ण का ललित और मधुर चरित मूलत: महाभारत के कृष्ण के चरित से भिन्न था। पुराणों में वर्णित कृष्ण सम्बन्धी ललित कथाएँ उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि पाती गयी हैं। उदाहरण के लिए हरिवंश में जिसे 'वास्तव में महाभारत का परिशिष्ट कहा जाता है, उनके गोपाल रूप सम्बन्धी सन्दर्भ अतयन्त संक्षिप्त है। उनकी तुलना में उनके ऐश्वर्य रूप की भोग-विलास सम्बन्धी अनेक कथाएँ कहीं अधिक विस्तार से वर्णित हैं। विष्णु पुराण में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। किन्तु भागवत, पद्म पुराण , ब्रह्म वैवर्त पुराण तथा कुछ अन्य पुराणों में, जिन्हें परवर्ती कहा जा सकता है, गोपालकृष्ण सम्बन्धी कथन अधिक विस्तृत होने लगे हैं। पुराणों के भोग-ऐश्वर्य सम्बन्धी आख्यानों और गोप-गोपी लीला सम्बन्धी मधुर कथाओं में वातावरण का बहुत अन्तर पाया जाता है। यदि एक में घोर भौतिकता, विलासिता और नग्न ऐन्द्रियता है तो दूसरे में भावात्मक कोमलता, हार्दिक उत्फुल्लता, सूक्ष्म अनुभूति और अलौकिकता की ओर उन्मुख उदात्तता है।

शूरसेन प्रदेश

शूरसेन महाजनपद

अनुमान है कि गोपाल कृष्ण मूलत: शूरसेन प्रदेश के सात्वत वृष्णिवंशी पशुपालक क्षत्रियों के कुल देवता थे और उनके क्रीड़ा कौतुक की मनोरंजक कथाएँ मौखिक रूप में लोक-प्रचलित थीं। इन कथाओं के लोक-प्रचलित होने के प्रमाण कुछ पाषाण मूर्तियों और शिलापट्टों पर उत्कीर्ण चित्रों में मिले है। मथुरा में प्राप्त एक खण्डित शिलापट्ट में वसुदेव नवजात कृष्ण को एक सूप में सिर पर रखकर यमुना पार करते हुए दिखाये गये हैं। 5वीं शताब्दी ईसवी के एक दूसरे खण्डित शिलापट्ट में कालिय-दमन का दृश्य दिखाया गया है। यह छठी शताब्दी ईस्वी की अनुमान की गयी है। बंगाल के पहाड़पुर नामक स्थान में छठी शताब्दी की कुछ मृण्मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें धेनुकासुर वध, यमलार्जुन उद्धार तथा मृष्टिक चाणूर के साथ मल्ल-युद्ध के दृश्य दिखाये गये हैं। यहीं पर एक अन्य मूर्ति मिली है जिसमें कृष्ण को किसी गोपी के साथ प्रसिद्ध मुद्रा में खड़े दिखाया गया है। अनुमान किया गया है कि यह गोपी सम्भवत: राधा का सबसे प्राचीन मूर्तिगत प्रमाण प्रस्तुत करती है। राजस्थान के मण्डोर तथा बीकानेर के पास सूरतगढ़ में क्रमश: द्वारपाटों पर उत्कीर्ण गोवर्द्धन –धारण, नवनीत-चौर्य, शकटभंजन और कालिय-दमन के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं तथा गोवर्धन-धारण और दान-लीला का दृश्यांकन प्रस्तुत करने वाले कुछ सुन्दर मिट्टी के खिलौने प्राप्त हुए हैं। मण्डोर के चित्र चौथी-पाँचवी शताब्दी ईस्वी के अनुमान किये गये हैं। दक्षिण भारत के बादामी के पहाड़ी क़िले पर कृष्ण-जन्म, पूतना-वध, शकट-भंजन, कंस-वध आदि के अनेक दृश्य गुफ़ाओं में उत्कीर्ण मिले हैं। जो छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाते हैं[23]

काव्य में कृष्ण

काव्य में गोपाल कृष्ण की लीला का पहला सन्दर्भ प्रथम शताब्दी ईसवी में रचित अश्वघोष के 'बुद्धिचरित'[24]में मिलता है। अनुमानत: प्रथम शताब्दी ईस्वी में हाल सातवाहन द्वारा संग्रहीत 'गाहासत्तसई' (गाथा सप्तशती) में कई गाथाएँ कृष्ण, राधा, गोपी, यशोदा आदि से सम्बद्ध मिलती हैं।[25] इन गाथाओं में कृष्ण द्वारा नारियों के गौरवहरण, मुखमारूत से राधिका के गोरज के अपनयन आदि के उल्लेख हुए हैं। इन उल्लेखों से सूचित होता है कि कृष्ण के गोपी-प्रेमसम्बन्धी प्रसंग कम से कम पहली शताब्दी ईस्वी के पहले से ही लोक-प्रचलित थे। यह अवश्य द्रष्टव्य है कि 'गाहासत्तसई' में भक्ति भावना का कोई संकेत नहीं मिलता, उसका वातावरण सर्वथा लौकिक श्रृंगार का ही है परन्तु इससे भिन्न दक्षिण के आलवार सन्तों द्वारा रचित गीत पूर्णतया भक्ति भावना से प्रेरित और अनुप्राणित हैं। इन सन्तों का समय पाँचवीं से नवीं शताब्दी ईसवी अनुमान किया गया है। आलवार सन्तों के इन गीतों में विष्णु, नारायण अथवा वासुदेव तथा उनके अवतारों-राम और कृष्ण के प्रति अपूर्व भक्ति –भाव प्रकट किया गया है। इनमें गोपाल-कृष्ण की ललित लीला के ऐसे अनेक प्रसंग वर्णित हैं जो उत्तर भारत के मध्यकालीन कृष्ण भक्ति- काव्य के प्रिय विषय रहे हैं। इन गीतों में कृष्ण की प्रेम-लीलाओं से सम्बद्ध एक नाप्पित्राय नामक गोपी का प्रमुख रूप से वर्णन है। उसे कृष्ण की प्रियतमा और विष्णु की अर्द्धागिनी लक्ष्मी का अवतार कहा गया है। अनुमान है कि यह गोपी उत्तर भारत की कृष्णकथा में प्रयुक्त राधा ही है। राधा-कृष्ण कथा की प्राचीनता की दृष्टि से तमिल साहित्य का यह प्रमाण महत्त्वपूर्ण है।

सूरदास

हिन्दी का कृष्ण-भक्ति काव्य यद्यपि सूरदास से प्रारम्भ होता है परन्तु इससे पहले 15वीं शताब्दी में विद्यापति ने अपने पदों में कृष्ण के श्रृंगारी रूप का जो वर्णन किया था उसकी प्रकृति भले ही लौकिक श्रृंगार की रही हो, उसका उपयोग भक्तों ने माधुर्य भक्ति के सन्दर्भों में ही किया। विद्यापति और हिन्दी के रीतिकालीन राधाकृष्ण सम्बन्धी श्रृंगार –काव्य के बीच हिन्दी भक्तिकाव्य का एक लम्बा व्यवधान है जिसमें कृष्ण का व्यक्तित्व कवियों ने अत्यन्त कुशलता के साथ् मानव और अतिमानव के परस्पर विरोधी तत्त्वों से निर्मित कर चित्रित किया है। कृष्ण के इस चरित-चित्रण में बड़ी विलक्षणता है। एक ओर उन्हें विष्णु का अवतार, ब्रह्मा-विष्णु और महेश से परे तथा साक्षात् सच्चिदानन्द ब्रह्म कहा गया है, तो दूसरी ओर उनकी शैशव, बाल्य और किशोरकाल की अत्यन्त मानवीय और स्वाभाविक लीला का मनोहर वर्णन किया गया है। हिन्दी कृष्ण-काव्य के रचयिताओं में कृष्ण का सम्यक् चरित्र-चित्रण वास्तव में सूरदास ने ही किया किन्तु सूरदास का चरित्र-चित्रण वस्तुत: भावांत्मक है। प्रधान रूप से उन्होंने कृष्ण को वात्सल्य, सख्य और माधुर्य का आलम्बन बनाया है और इन भावों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण करते हुए दैन्य और विस्मय के भावों के सहारे उनके प्रति पूज्य भावना व्यक्त की है।

कृष्ण के चरित्र-चित्रण में सूर की अन्य विशेषता यह है कि यद्यपि वे नन्द-यशोदा, गोप-गोपी, आदि के साथ राग-रंग में आचूल मग्न रहते हैं, फिर भी उनके व्यवहार से व्यंजित होता है कि वास्तव में वे भावातीत और वीतराग हैं। कृष्ण के मथुरा और द्वारका-प्रवास तथा उनके प्रति ब्रजवासियों और विशेषकर गोपियों के विरह-भाव का वर्णन करते हुए सूरदास ने कृष्ण के इस विलक्षण व्यक्तित्व का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है। इसके द्वारा हमें गीता के योगिराज कृष्ण की अनासक्ति का व्यावहारिक परिचय मिलता है। सूरदास के अतिरिक्त अन्य कृष्ण-भक्त कवियों ने कृष्ण के सम्पूर्ण चरित का चित्रण नहीं किया। बहुत थोड़े से कवियों ने कृष्ण के बाल्य और किशोरकाल के जीवन का परिचय दिया। अधिकांश कवि उनके माधुर्यपूर्ण चरित की ओर ही झुके और राधा और गोपियों के साथ उनके प्रेम सम्बन्धों के चित्रण में ही निमग्न रहें कृष्ण के प्रेमी और प्रेमपात्र दोनों रूपों के चित्रण में अनेक कवियों ने तन्मयता प्रदर्शित की, परन्तु सूरदास ने उनमें वीतरागत्व और अनासक्ति के संकेतों तथा अन्य उपायों द्वारा जिस आध्यात्मिकता की उच्च काव्यमयी व्यंजना की थी, वह कोई अन्य कवि नहीं कर सका। सूरदास ने कृष्ण के असुर-संहारी रूप का भी विशद वर्णन किया था। यद्यपि उनके वर्णन में कृष्ण की वीरता और पराक्रम के स्थान पर उनके विस्मयकारी क्रीडा-कौतक की ही प्रधानता है, परन्तु उनका उद्देश्य जिस अलौकिक की व्यंजना करना था उसे परवर्ती कवि नहीं समझ सके। इस कारण उन्होंने कृष्ण-चरित के इस पक्ष की प्राय: उपेक्षा ही की।
श्रीकृष्ण के सहज मानवीय श्रृंगारी रूप को सूरदास ने उनके प्रति दैन्य भावना व्यक्त करके तथा उनके अलौकिक कृत्यों के वर्णयन द्वारा विस्मय की व्यंजना करके उनके चरित में जिस उदात्तता का सन्निवेश किया था, परवर्ती कवियों ने उसे विस्मृत कर दिया और श्रीकृष्ण का चरित लगभग पूर्ण रूप में इहलौकिक हो गया और उसमें मानव व्यक्तित्व की संकुचित एकांगिता ही शेष रह गयी। फलत: जीवन की व्याख्या की कसौटी पर कसने पर वह अत्यन्त कल्पित और अयथार्थ लगता है, जैसे राग-रंग और आनन्द-विहार में लिप्त जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो। वास्तव में तथ्य यही है कि कृष्ण-चरित जीवन के वास्तविक चित्रण अथवा आदर्श चित्रण के रूप में रचा ही नहीं गया, उनका चरित वास्तव में परब्रह्म की लीलामात्र हैं जिसका प्रयोजन लीलानन्द के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं। उसका उद्देश्य अखण्ड आनन्द में जीवन की आध्यात्मिक परिपूर्णता की व्यंजना करना ही है। भक्त कवियों ने उस आनन्द का रूप स्त्री-आनन्द रूप में परम पुरुष हैं और उनकी परा शक्ति रूप प्रकृति स्वरूपा राधा हैं जिनके संयोग से ही परम आनंद की परिपूर्णता सिद्ध होती है।

राधा के प्रेम सन्दर्भ

आठवीं शताब्दी में रचित भट्टानारायण के 'वेणीसंहार' नामक-नाटक में नांदीश्लोक में तथा वाकपति राज द्वारा लिखित प्राकृत महाकाव्य 'गउडवहो' के मंगलाचरण में कृष्ण की स्तुति उनके राधा और गोपी-प्रेम तथा यशोदा के वात्सल्यभाजन होने की स्पष्ट सूचना देती है। 'गउडवहो' में उन्हें 'विष्णुस्वरूप' और 'लक्ष्मीपति' भी कहा गया है। नवीं शताब्दी ईसवी के 'ध्वन्यालोक' में उद्धृत दो श्लोकों में कृष्ण और राधा के मधुर प्रेम के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। दसवीं शताब्दी के त्रिविक्रम भट्ट रचित 'नलचम्पू' के एक श्लोक में परम पुरुष कृष्ण के साथ राधा के अनुराग का संकेत प्राप्त होता है। दसवीं शताब्दी की ही बल्लभदेव द्वारा रचित 'शिशुपालवध' की टीका तथा सोमदेव पूरि के 'यशस्यतिलकचम्पू' में भी राधा के प्रिय कृष्ण का जिस रूप में उल्लेख मिलता है उससे कृष्ण के गोपीवल्लभ रूप की सूचना प्राप्त होती है।

प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ

'कवीन्द्रवचन समुच्चय' नामक कवितासंग्रह भी दसवीं शताब्दी का माना गया है। इसमें संकलित अनेक श्लोकों में कृष्ण की गोपी और राधा सम्बन्धी प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ मिलता है जिनसे कृष्ण के यशोदा के वात्सल्य-भाजन, गोपियों के कान्त, गोपों के सृहृद् तथा राधा के अनन्य प्रेमभाजन व्यक्तित्व की सूचना मिलती है। इन सभी सन्दर्भो में कृष्ण के दक्षिण और धृष्ट नायकत्व के भी स्पष्ट संकेत हैं। दसवीं शताब्दी तक राधा और कृष्ण के प्रति पूज्यभाव भी विकसित हो चुका था। इसका प्रमाण मालवाधीश वाक्पति मुंजपरमार के एक अभिलेख से भी मिलता है जिसमें श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका विष्णु रूप में वर्णन है और साथ ही उन्हें राधा के विरह में पीड़ित कहा गया है। दसवीं शताब्दी के आसपास रचित श्रीमद्भागवत में कृष्णचरित का व्यापक वर्णन है इसमें उनके सभी स्वरूपों का वर्णन और संकेत है। कृष्ण के व्यक्तित्व के लालित्य और माधुर्य के साथ उनके दैवत रूप की प्रतिष्ठा 12वीं शताब्दी तक और अधिक दृढ़ता के साथ हो गयी थी। इसका प्रमाण लीलाशुक द्वारा रचित 'कृष्णकर्णामृतस्तोत्र' ईश्वरपुरी द्वारा रचित 'श्रीकृष्णलीलामृत ' का श्रृगांर रस निश्चित रूप से माधुर्य भक्ति है। इसी प्रकार 'गीत गोविन्द' में राधा-माधव के जिस उद्दाम श्रृंगार का वर्णन किया गया है, उसकी मूल प्रेरणा भी धार्मिक है। कृष्ण के व्यक्तित्व में इस प्रकार जिस लोकरंजनकारी लालित्य का उदात्तीकरण वैष्णव भक्ति के विकास में होता गया उसी की चरम परिणति हम परवर्ती साहित्य में पाते हैं।

असंख्य कथा प्रसंग

बारहवीं शताब्दी के बाद कृष्ण-काव्य मृक्तकों के अतिरिक्त प्रबन्धों के रूप में भी प्राप्त होता है। 'सदुक्तिकर्णामृत' नामक एक मुक्तक संग्रह 13वीं शताब्दी के प्रारम्भ का हैं। जिसमें गोपाल कृष्ण की लीला से सम्बद्ध साठ श्लोक हैं। इन श्लोकों में गोपाल कृष्ण के शैशव, कैशोर और यौवन की ललित लीलाओं का ही वर्णन मिलता है। 13वीं-14वीं शताब्दी में रचित बोपदेव की 'हरिलीला' तथा वेदान्तदेशिककी 'यादवाभ्युदय' नामक रचनाएँ तथा पन्द्रहवीं शताब्दी की 'ब्रजबिहारी' (श्रीधरस्वामी), 'गोपलीला' (रामचन्द्र भट्ट), ' हरिचरित'-काव्य (चतुर्भुज), 'हरिविलास'-काव्य (ब्रजलोलिम्बराज), 'गोपालचरित' (पद्मनाभ), 'मुरारिविजय'- नाटक (कृष्ण भट्ट) और 'कंस-निधन' महाकाव्य (श्रीराम) आदि अनेक काव्य और नाटक गोपालकृष्ण के मधुर, ललित और पूज्य चरित का चित्रण करते हैं। 16वीं शताब्दी से कृष्णभक्ति आन्दोलन सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गया और कृष्ण-काव्य आधुनिक भाषाओं में रचा जाने लगा। इस काव्य का मूलाधार श्रीमद्भागवत था, परन्तु साथ ही कवियों ने लोक में प्रचलित कृष्णसम्बन्धी उन असंख्य कथा प्रसंगों का भरपूर उपयोग किया, जिनमें कृष्ण का चरित वात्सल्य, सख्य और माधुर्यव्यंजक लीलाओं से समन्वित रहा है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बलदेव
  2. भौमासुर
  3. छान्दोग्य उपनिषद [[छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-3, खण्ड-17, श्लोक 6
  4. छान्दोग्य उपनिषद (3,17,6)
  5. महाभारत, उद्योगपर्व, 130-131, द्रोणपर्व 79
  6. महाभारत, सभापर्व, अध्याय 38
  7. हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व 8-9
  8. श्रीमद् भागवत 3।3।-,10।28।-,10।44।
  9. कुछ को विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई, वे यहाँ उल्लिखित हैं।
  10. श्रीमद् भागवत 10।56, 57, 58
  11. श्रीमद् भागवत 10।82-84)
  12. श्रीमद् भागवत ।10।86।13
  13. श्रीमद् भागवत 11।13।15-42/- 11।30/-
  14. भागवत, 4।20-25
  15. भागवत, 8/3
  16. शिव पुराण, 44 ।7। 26
  17. ऋग्वेद 8।85।1-9
  18. ऋग्वेद 1।116।7,23
  19. ऋग्वेद 8।86।1-5
  20. ऋग्वेद 1।101।1
  21. छान्दोग्य उपनिषद 3।17।4-6)
  22. कौशीतकी ब्राह्मण 30।9
  23. आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट 1926-27, 1905-6 तथा 1928-29 ई.
  24. बुद्धिचरित (1-5)
  25. 'गाहासत्तसई' 1।29, 5।47, 2।12, 2।14

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