क्षत्रिय  

क्षत्रिय
क्षत्रिय प्रतीक चिह्न
विवरण क्षत्रिय हिन्दुओं के चार वर्णों में से दूसरा वर्ण है। इस वर्ण के लोगों का काम देश का शासन और शत्रुओं से उसकी रक्षा करना माना गया है।
अन्य नाम क्षत्रिया, क्षत्राणी
क्षत्रिय का अर्थ जो दूसरों को क्षत से बचाये
सामाजिक मान्यता ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार क्षत्रियों की गणना ब्राहमणों के बाद की जाती थी, परंतु बौद्ध ग्रंथों के अनुसार चार वर्णों में क्षत्रियों को ब्राह्मणों से ऊँचा अर्थात् समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त था।
साहित्यिक संदर्भ वैदिक साहित्य में क्षत्रिय का आरम्भिक प्रयोग राज्याधिकारी या दैवी अधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। "क्षतात त्रायते इति क्षत्य अर्थात् क्षत आघात से त्राण" देने वाला।
क्षत्रिय वंश का उद्भव क्षत्रिय वंश के उद्भव का प्रारम्भिक संकेत पुराणों से मिलने लगता है कि सूर्यवंश और चंद्रवंश ही क्षत्रिय वंश परम्परा के मूल स्त्रोत है।
क्षत्रिय और राजपूत क्षत्रिय और राजपूत शब्द को लेकर कुछ विवाद भी की स्थिति है। कुछ लोग दोनों को अलग-अलग मानते हैं। लेकिन अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि राजपूतों का संबंध क्षत्रियों से है। प्रत्येक राजा प्रायः क्षत्रिय हुआ करते थे। अतः राजपूत्र का अर्थ क्षत्रिय से माना गया।
संबंधित लेख वर्ण व्यवस्था, जाति, जाट, कायस्थ, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र
अन्य जानकारी क्षत्रिय वंश में मांधाता, हरिश्चंद्र, सगर, दिलीप, भगीरथ, दशरथ और भगवान राम जैसे प्रतापी राजा हुए हैं।

क्षत्रिय शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से अर्थ है जो दूसरों को क्षत से बचाये। क्षत्रिया, क्षत्राणी हिन्दुओं के चार वर्णों में से दूसरा वर्ण है। इस वर्ण के लोगों का काम देश का शासन और शत्रुओं से उसकी रक्षा करना माना गया है। भारतीय आर्यों में अत्यंत आरम्भिक काल से वर्ण व्यवस्था मिलती है, जिसके अनुसार समाज में उनको दूसरा स्थान प्राप्त था। उनका कार्य युद्ध करना तथा प्रजा की रक्षा करना था। ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार क्षत्रियों की गणना ब्राहमणों के बाद की जाती थी, परंतु बौद्ध ग्रंथों के अनुसार चार वर्णों में क्षत्रियों को ब्राह्मणों से ऊँचा अर्थात् समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त था। गौतम बुद्ध और महावीर दोनों क्षत्रिय थे और इससे इस स्थापना को बल मिलता है कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म जहाँ एक ओर समाज में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे के प्रति क्षत्रियों के विरोध भाव को प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर पृथक् जीवन दर्शन के लिए उनकी आकांक्षा को भी अभिव्यक्ति देते हैं। क्षत्रियों का स्थान निश्चित रूप से चारों वर्णों में ब्राह्मणों के बाद दूसरा माना जाता था।

साहित्यिक संदर्भ

भारतीय समाज और संस्कृति का आधार स्तंभ रही है वर्ण व्यवस्था। यह वर्णव्यवस्था वैदिक युग में समाज के सुचारु संचालन के लिए, कार्य के आधार पर तय की गई। शिक्षा और धर्म के ध्वज वाहक ब्राह्मण कहलाये, सुरक्षा, शासन, और युद्ध का कार्य वाला क्षत्रिय कहलाया, भरण - पोषण की जिम्मेदारी निभाने वाला वैश्य तथा हर तरह की सेवा में संलग्न समुदाय शूद्र कहलाया। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त - 10 /09/ 12 - में वर्णन है कि -

ब्रम्हणोस्य मुखमासीत वाहू राजन्यकय्तः।
अरुःयत तद्वैश्यः पदभ्यांशूद्रो आजयता॥

अर्थात् ब्राह्मण का जन्म ईश्वर के मुख से, क्षत्रिय का हाथ से, वैश्य का जांघ से और शुद्र का पांव से हुआ बताया गया। आर्यों के द्वारा सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के प्रयास में अत्यन्त नियोजित रुप से एक उपयोगी संस्था के रुप में वर्ण व्यवस्था का विकास किया गया।

वैदिक साहित्य में क्षत्रिय का आरम्भिक प्रयोग राज्याधिकारी या दैवी अधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। "क्षतात त्रायते इति क्षत्य अर्थात् क्षत आघात से त्राण" देने वाला। मनुस्मृति में कहा कि क्षत्रिय शत्रु के साथ उचित व्यवहार और कुशलता पूर्वक राज्य विस्तार तथा अपने क्षत्रित्व धर्म में विशेष आस्था रखना क्षत्रियों का परम कर्तव्य है। क्षत्रिय अर्थात् वीर राजपूत सनातन वर्ण व्यवस्था का वह स्तम्भ है जो भगवान की भुजाओं से जन्म पाया और ब्राम्हण के बाद मानव समाज का दूसरा अंग कहा गया। यो क्षयेन त्रायते स?ःक्षत्रिय की उपाधि से अतंकृत क्षत्रिय के लिये गीता में कहा गया कि -

शौर्य तेजोधृति र्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनमं।
दानमीश्वर भावश्च क्षत्रं कर्म स्वभावजम॥

अर्थात् शूरवीरता, तेज, धैर्य, युद्ध में चतुरता, युद्ध से न भागना, दान, सेवा, शास्त्रानुसार राज्यशासन, पुत्र के समान पूजा का पालन - ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्तव्य - कर्म कहे गये हैं।[1]

पाणिनि द्वारा उल्लेख

पाणिनि ने इस स्थिति को स्वीकार किया है कि अनेक जनपदों के नाम वही थे, जो उनमें बसने वाले क्षत्रियों के।[2] इतिहासकार वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार- पंचाल क्षत्रियजन के बसने के कारण ही आरम्भ में जनपद का भी पंचाल नाम पड़ा था। पीछे जनपद नाम की प्रधानता हुई और जनपद के नाम से वहाँ के प्रशासक क्षत्रियों के नाम, जिन्हें 'अष्टाध्यायी' में 'जनपदिन्' कहा गया है, लोक प्रसिद्ध हुए। पहली स्थिति के कुछ अवशेष आज तक बच गए हैं, जैसे यौधेयों (वर्तमान जोहिये) का प्रदेश जोहिया बार (बहावलपुर रियासत), मालवों का (वर्तमान मलवई लोगों का) मालवा (फ़िरोजपुर, लुधियाना जिलों का भाग), दरद् क्षत्रियों का दरदिस्नान। यों तो तत्कालीन संघों और जनपदों में क्षत्रियों के अतिरिक्त और वर्णों के लोग भी थे, उदाहरणार्थ मालव जनपद के क्षत्रिय मालव तथा ब्राह्मण एवं क्षत्रियेतर मालव्य कहलाते थे।[3] मालवपुत्र ही वर्तमान 'मलोत्रे' हो सकते हैं।[4]

क्षत्रिय और राजपूत

क्षत्रिय और राजपूत शब्द को लेकर कुछ विवाद भी की स्थिति है। कुछ लोग दोनों को अलग - अलग मानते हैं। लेकिन अधिकांश इतिहासकार यह मानते हैं कि राजपूतों का संबंध क्षत्रियों से है। प्रत्येक राजा प्रायः क्षत्रिय हुआ करते थे। अतः राजपूत्र का अर्थ क्षत्रिय से माना गया। 12 वीं सदी के बाद राजपूत्र का मुख्सुख राजपूत हो गया जो कालान्तर में क्षत्रिय का जाति सुचक शब्द बन गया। 600 ई. से 1200 ई. तक काल को राजपूत काल कहा गया है। क्योकिं पूरे देश् में इस काल में इनका प्रभुत्व था। राजपूत निडर, निर्भय, साहसी, बहादुर, देश भक्त, सत्यवादी, वीर धुन के पक्के. कृतज्ञ, युद्ध कुशल, मर्यादापूर्ण, धार्मिक, न्यायप्रिय, उच्चविचार रखने वाला तो है हि सदैव ही भारतमाता की रक्षा के लिये अपना सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर रहते थे। राजपूतों का एक बड़ा गुण यह भी था कि वे अपनी मानमर्यादा, आन-बान-सम्मान पर हर क्षण अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिये तत्पर रहते थे। कर्नल टॉड ने भी राजपूतों के उपर्युक्त गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। 600 वर्षों तक राजपूतों ने न केवल भारत पर शासन किया, बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ देश की रक्षा करें। भारतीय सभ्यता, संस्कृति तथा धर्म के संरक्षण एवं पोषण में इस जाति का प्रभाव श्लाघनीय एवं अतुलनीय है। राजनीतिक अवस्था के बाद भी राजपूत काल साहित्य, कला के उन्नति का काल था। स्थापत्य तथा शिल्पकला की इस समय बडी उन्नति हुई। मूर्तिकला और चित्रकला विकसित अवस्था में थी। साथ ही आर्थिक दशा भी इस समय अच्छी थी। अपूर्व पौरुषता और साहस की प्रतीक यह जाति बलिदान, सहिष्णुता और सिद्धांतों के त्याग के लिये इतिहास प्रसिद्ध रही है। भारतीय संस्कृति की रक्षा करने में जन समुदायों में श्रेष्ठ क्षत्रिय राजपूत कुलों का योगदान सर्वोपरि रहा है। क्षत्रिय वंशजों के खून से सिंचित यह पुरातन संस्कृति अन्यों की अपेक्षा वर्तमान में भी अजर-अमर है।[1]

क्षत्रिय वंश का उद्भव

क्षत्रिय वंश के उद्भव का प्रारम्भिक संकेत पुराणों से मिलने लगता है कि सूर्यवंश और चंद्रवंश ही क्षत्रिय वंश परम्परा के मूल स्त्रोत है। पुराणों से संकेत मिलता है कि मनु के पूत्रों से ही सूर्यवंश की नींव पडी थी और मनु की कन्या इला के पति बुध थे जो चंद्रदेव के पुत्र थे, इन्हीं से चंद्रवंश की नींव पडी। मूल क्षत्रिय वंशों की संख्या के बारे में विद्वानों में एकमत नहीं है। कुछेक - सूर्यवंश, चंद्रवंश और अग्निवंश की चर्चा करते हैं तो सूर्यवंश, चंद्रवंश और अग्निवंश, ऋषिवंश तथा दैत्यवंश। हालाकिं अधिकांश इतिहासकार यह मानते है कि सूर्य तथा चंद्रवंश से ही सभी वंश शाखाएं है। अग्निवंश के संदर्भ में कहा जाता है कि अग्निवंशीय राजपूतों की उत्पत्ति ऋषियों द्वारा आबू पर्वत पर किये यज्ञ के अग्निकुंड से हुई जिनकी चार शाखाएं परमार, प्रतिहार, चौहान तथा सोलंकी। "चालुक्य" सूर्यवंश नामकरण के पूर्व मरीचि हुए जिनसे कश्यप और कश्यप से सूर्य तथा सूर्य से वैवस्वत मनु पैदा हुए जिन्होने अयोध्या नगरी बसाई। मनु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु अयोध्या की गद्दी पर बैठे तथा अपने दादा के नाम पर सूर्यवंश की स्थापना की। इसी कुल में मांधाता, हरिश्चंद्र, सगर, दिलीप, भगीरथ, दशरथ और भगवान राम जैसे प्रतापी राजा हुए हैं। इस वंश का गौत्र भारद्वाज है।[1]

सूर्यवंश और चंद्रवंश

सूर्यवंश और चंद्रवंश क्षत्रियों के दो प्रधान वंश है।


इन्हें भी देखें: सूर्यवंश, चंद्रवंश, हिन्दू धर्म, वर्ण व्यवस्था, जाति, जाट, कायस्थ, ब्राह्मण, वैश्य एवं शूद्र


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 क्षत्रिय वंश का उदभव एवं प्रसार (हिन्दी) क्षत्रिय कल्याण सभा। अभिगमन तिथि: 28 मार्च, 2015।
  2. जनपद शब्दात् क्षत्रियादव, 4।1।168
  3. महाभारत वनपर्व, 297।60
  4. पाणिनीकालीन भारत |लेखक: वासुदेवशरण अग्रवाल |प्रकाशक: चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-1 |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 91-92 |

भट्टाचार्य, सच्चिदानंद भारतीय इतिहास कोश (हिंदी)। लखनऊ: उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, 110।

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