खड़ी बोली  

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हिंदी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है। सन 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। सन 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था

भाषाशास्त्र की दृष्टि से खड़ी बोली शब्द का प्रयोग दिल्ली - मेरठ के समीपस्थ ग्रामीण समुदाय की ग्रामीण बोली के लिए होता है। ग्रियर्सन ने इसे 'वर्नाक्यूलर हिन्दुस्तानी' तथा सुनीतिकुमार चटर्जी ने 'जनपदीय हिन्दुस्तानी' कहा है। खडी बोली नागरी लिपि में ही लिखी जाती है। हिंदी की रूपरेखा जानने के लिए खड़ी बोली का ज्ञान अति आवश्यक है। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से खड़ी बोली ही स्टैण्डर्ड हिन्दी, उर्दू तथा हिन्दुस्तानी की मूलधार बोली है। साहित्यक सन्दर्भ में कभी-कभी अवधी, ब्रज आदि बोलियों के साहित्य से अलगाव करने के लिए आधुनिक हिन्दी साहित्य को 'खड़ी बोली सहित्य' से अभिहित किया जाता है और इस प्रसंग में खड़ी बोली शब्द 'स्टैण्डर्ड हिन्दी' का समानार्थक हो जाता है। प्रथम को हम 'खड़ी बोली' शब्द का विशिष्ट अर्थ और द्वितीय को सामान्य अर्थ कह सकते हैं। किंतु 'खड़ी बोली' शब्द के आरम्भिक अर्थ तथा नामकरण और उसके रूप, अर्थ, प्रयोग के विकास के सम्बन्ध में विद्वानों में मतवैभिन्न्य दिखाई पड़ता है। 'खड़ी बोली' नाम की व्याख्या भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न रूप से की है। उन विद्वानों की विचार-धाराओं को निम्नलिखित वर्गों में बाँट सकते हैं-

  1. कुछ विद्वान् 'खड़ी बोली' नाम को ब्रजभाषा-सापेक्ष्य मानते हैं और यह प्रतिपादन करते हैं कि लल्लू लालजी (1803 ई.) से बहुत पूर्व यह नाम ब्रजभाषा की मधुर मिठास की तुलना में उस बोली को दिया गया था, जिससे कालांतर में स्टैण्डर्ड हिन्दी और उर्दू का विकास हुआ। ये विद्वान् 'खड़ी' शब्द से कर्कशता, कटुता, खरापन, खड़ापन आदि अर्थ लेते हैं।[1]
  2. कुछ लोग इसे उर्दू - सापेक्ष्य मानकर उसकी अपेक्षा इसे प्रकृत, 'शुद्ध', ग्रामीण ठेठबोली मानते हैं[2]
  3. कुछ खड़ी का अर्थ 'सुस्थिर, सुप्रचलित, सुसंस्कृत, 'परिष्कृत या परिपक्व से मानते हैं। [3]
  4. कुछ लोग उत्तरी भारत की ओकारांत ब्रज आदि बोलियों को 'पड़ी बोली' और उसके विरोध में इसे 'खड़ी बोली' मानते हैं।[4]
  5. जब कि कुछ लोग रेखता शैली को 'पड़ी' और इसे 'खड़ी' मानते हैं।

खड़ी बोली का इतिहास

भारतेन्दु पूर्व युग

खड़ी बोली गद्य के आरम्भिक रचनाकारों में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर दो रचनाकारों— सदासुख लाल 'नियाज' (सुखसागर) व इंशा अल्ला ख़ाँ (रानी केतकी की कहानी) तथा फ़ोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के दो भाषा मुंशियों— लल्लू लालजी (प्रेम सागर) व सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) के नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु पूर्व युग में मुख्य संघर्ष हिंदी की स्वीकृति और प्रतिष्ठा को लेकर था। इस युग के दो प्रसिद्ध लेखकों— राजा शिव प्रसाद 'सितारे हिन्द' व राजा लक्ष्मण सिंह ने हिंदी के स्वरूप निर्धारण के सवाल पर दो सीमान्तों का अनुगमन किया। राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गँवारुपन दूर कर उसे उर्दू–ए–मुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थन किया।

भारतेन्दु युग

(1850 ई.–1900 ई.) इन दोनों के बीच सर्वमान्य हिंदी गद्य की प्रतिष्ठा कर गद्य साहित्य की विविध विधाओं का ऐतिहासिक कार्य भारतेन्दु युग में हुआ। हिंदी सही मायने में भारतेन्दु के काल में 'नई चाल में ढली' और उनके समय में ही हिंदी के गद्य के बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ। उन्होंने न केवल स्वयं रचना की बल्कि अपना एक लेखक मंडल भी तैयार किया, जिसे 'भारतेन्दु मंडल' कहा गया। भारतेन्दु युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि गद्य रचना के लिए खड़ी बोली को माध्यम के रूप में अपनाकर युगानुरूप स्वस्थ दृष्टिकोण का परिचय दिया। लेकिन पद्य रचना के मसले में ब्रजभाषा या खड़ी बोली को अपनाने के सवाल पर विवाद बना रहा, जिसका अन्त द्विवेदी के युग में जाकर हुआ।

द्विवेदी युग

(1900 ई.–1920 ई.) खड़ी बोली और हिंदी साहित्य के सौभाग्य से 1903 ई. में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन का भार सम्भाला। वे सरल और शुद्ध भाषा के प्रयोग के हिमायती थे। वे लेखकों की वर्तनी अथवा त्रुटियों का संशोधन स्वयं करते चलते थे। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बख़ूबी अन्जाम दिया। गद्य तो भारतेन्दु युग से ही सफलतापूर्वक खड़ी बोली में लिखा जा रहा था, अब पद्य की व्यावहारिक भाषा भी एकमात्र खड़ी बोली प्रतिष्ठित होनी लगी। इस प्रकार ब्रजभाषा, जिसके साथ में 'भाषा' शब्द जुड़ा हुआ है, अपने क्षेत्र में सीमित हो गई अर्थात् 'बोली' बन गई। इसके मुक़ाबले में खड़ी बोली, जिसके साथ 'बोली' शब्द लगा है, 'भाषा बन गई', और इसका सही नाम हिंदी हो गया। अब खड़ी बोली दिल्ली के आसपास की मेरठ–जनपदीय बोली नहीं रह गई, अपितु यह समस्त उत्तरी भारत के साहित्य का माध्यम बन गई। द्विवेदी युग में साहित्य रचना की विविध विधाएँ विकसित हुई।। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्याम सुन्दर दास, पद्म सिंह शर्मा, माधव प्रसाद मिश्र, पूर्णसिंह, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी आदि के अवदान विशेषतः उल्लेखनीय हैं।
इसी दौरान वर्ष 1918 में इन्दौर में गांधी जी की अध्यक्षता में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा हिन्दी राष्ट्रभाषा मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की भी स्थापना हुई जिसका मुख्यालय मद्रास में था।[5]

छायावाद युग

(1920 ई.–1936 ई. एवं उसके बाद) साहित्यिक खड़ी बोली के विकास में छायावाद युग का योगदान काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा और राम कुमार आदि ने महती योगदान किया। इनकी रचनाओं को देखते हुए यह कोई नहीं कह सकता कि खड़ी बोली सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त करने में ब्रजभाषा से कम समर्थ है। हिंदी में अनेक भाषायी गुणों का समावेश हुआ। अभिव्यजंना की विविधता, बिंबों की लाक्षणिकता, रसात्मक लालित्य छायावाद युग की भाषा की अन्यतम विशेषताएँ हैं। हिंदी काव्य में छायावाद युग के बाद प्रगतिवाद युग (1936 ई.–1946 ई.) प्रयोगवाद युग (1943) आदि आए। इस दौर में खड़ी बोली का काव्य भाषा के रूप में उत्तरोत्तर विकास होता गया।

पद्य के ही नहीं, गद्य के सन्दर्भ में भी छायावाद युग साहित्यिक खड़ी बोली के विकास का स्वर्ण युग था। कथा साहित्य (उपन्यास व कहानी) में प्रेमचंद, नाटक में जयशंकर प्रसाद, आलोचना में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जो भाषा–शैलियाँ और मर्यादाएँ स्थापित कीं, उनका अनुसरण आज भी किया जा रहा है। गद्य साहित्य के क्षेत्र में इनके महत्त्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गद्य–साहित्य के विभिन्न विधाओं के इतिहास में कालों का नामकरण इनके नाम को केन्द्र में रखकर ही किया गया है। जैसे उपन्यास के इतिहास में प्रेमचंद– पूर्व युग, प्रेमचंद युग, प्रेमचंदोत्तर युग; नाटक के इतिहास में प्रसाद– पूर्व युग, प्रसाद युग, प्रसादोत्तर युग; आलोचना के इतिहास में शुक्ल– पूर्व युग, शुक्ल युग, शुक्लोत्तर युग।

खड़ी बोली ही क्यों

वास्तव में 'खड़ीबोली' में प्रयुक्त 'खड़ी' शब्द गुण्बोधक विशेषण है और किसी भाषा के नामाकरण में गुण-अवगुण-प्रधान दृष्टिकोण अधिकांश: अन्य भाषा-सापेक्ष्य होती है। अपभ्रंश और उर्दू आदि इसी श्रेणी के नाम हैं, अतएव 'खड़ी' शब्द अन्य भाषा सापेक्ष्य अवश्य है, किंतु इसका मूल खड़ी है अथवा खरी? और इसका प्रथम मूल अर्थ क्या है? इसके लिए शब्द के इतिहास की खोज आवश्यक है। बोली के अर्थ में इस नाम का उल्लेख हमें मध्यमकाल में कहीं नहीं मिलता है। निश्र्वित रूप से इस शब्द का प्रयोग 19वीं शती के प्रथम दशाब्द में लल्लूजी लाल ने 2 बार, सदल मिश्र ने 2 बार, गिलकाइस्ट ने 6 बार किया है।

लल्लूलाल जी और सदल मिश्र ने 'प्रेमसागर' तथा 'नासिकेतोपाख्यान' और 'रामचरित्र' नागरी लिपी में लिखा था। इन ग्रंथों में खड़ी बोली ही शब्द मिलता है, जिसका उच्चारण निश्चय ही खड़ी रहा होगा। इस प्रकार हिंदू लेखकों में खड़ीबोली शब्द ही प्रचलित रहा होगा, किंतु रोमनलिपि में 'प्रेमसागर' के मुखपृष्ठ पर खरी (kharee) ही मुद्रित है। रोमनलिपि में हिंदी के ड़्‌ या डः को r या R से प्रकट करते हैं। इसी से हिंदी 'खड़ी' को खरी लिखा गया है। सम्भवत: विदेशी अंग्रेज़ों में 'खरी' शब्द ही अधिक प्रचलित हुआ। आज का सामान्य अंग्रेज़ 'खड़ी' शब्द का उच्चारण खरी के आसपास ही करेगा। भारतीय ध्वनि विकास में भी र और ड़्‌ ध्वनि में परस्पर विनिमय होता रहा है। सम्भवत: उच्चारण की दृष्टि से 'खड़ी' और 'खरी' उस समय बहुत ही निकट के शब्द थे। इस शब्द के वास्तविक अर्थ ज्ञान के लिए हमें लल्लूलाल जी, सदल मिश्र और गिलक्राइस्ट के उद्धरणों पर पुन: गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। इन उद्धरणों से किसी भी प्रकार यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रजभाषा की अपेक्षा अधिक 'कर्कश', 'कटु' होने के कारण इस बोली को यह नाम दिया गया। यदि उन्नीसवीं शती से बहुत पूर्व ही ब्रजभाषा के विरोध में यह नाम प्रचलित रहा होता तो स्टैण्डर्ड उर्दू, हिंदी, हिंदुस्तानी सबके लिए यह शब्द प्रयुक्त होता, क्योंकि भाषावैज्ञानिक दृष्टि से तीनों की मूलाधार बोली यही है और 'प्रेमसागर' तथा 'बागो बहार' दोनों को खड़ी बोली का ग्रंथ कहा जाता है, किंतु ऐसा कहीं भी नहीं कहा गया। स्वयं लल्लूलाल जी ने 'लाल चंद्रिका' की भूमिका में अपने ग्रंथों की भाषा के तीन भेद किये हैं-

  1. ब्रज
  2. खड़ी बोली
  3. रेखते की बोली (उर्दू)

यदि खड़ी बोली को ब्रजभाषा सापेक्ष्य समझते तो लल्लूलाल जी अपने ग्रंथों की भाषा के दो ही भाग करते। वास्तव में खड़ी बोली के लिए कर्कश, कटु आदि अर्थ भारतेंदु युग की देन है, जबकि हिंदी कविता के लिए ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में प्रतियोगिता हो रही थी। सम्भवत: ब्रजभाषा पक्षवालों ने उसी युग में 'खडीबोली' का इस प्रकार अर्थ किया होगा। बेली महोदय के अनुसार 'खड़ी' ही मूल शब्द है, 'खरी' नहीं, जो खड़ा का स्त्रीलिंग रूप है। 'खड़ी' शब्द का अर्थ है 'उठी' और जब यह शब्द किसी भाषा के लिए प्रयुक्त होता होगा, तो तब इसका अर्थ 'प्रचलित' रहा होगा। इस प्रकार इसके अनुसार 'खड़ी' का अर्थ है 'परिपक्व', 'प्रचलित' या सुस्थिर। जयशंकर प्रसाद ने अपनी काव्य भाषा में खड़ी बोली का व्यापक रूप से प्रयोग किया है।

चंद्रबली पाण्डे ने अपने लेख 'खडी बोली की निरुक्ति' में बोली ले परिपक्व, प्रचलित अर्थ का खंडन करते हुए यह प्रतिपादन करने का प्रयत्न किया है कि खड़ी बोली सदल मिश्र की निजी या उनके यहाँ की प्रचलित बोली नहीं है। किंतु उनका खंडन मान्य नहीं, क्योंकि इस बोली का प्रचलन हिंदवी रूप में अंत:प्रांतीय व्यवहार के लिए बहुत पहले से था, अन्यथा सिंध, गुजरात के स्वामी प्राणनाथ (कुलजम स्वरूप) और लालदास (वीतक), पटियाला के रामप्रसाद निरंजनी (योगवाशिष्ठ), राजस्थान के दौलतराम (पद्मपुराण) और बिहार के सदल मिश्र इस बोली में रचना नहीं कर सकते। अतएव 'खड़ी' शब्द का अर्थ परिपक्व, प्रचलित मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। साथ ही इस बोली को 'खड़ी' (स्टैण्डर्ड केवल वाचार्थ लेकर) इसलिए मानना कि इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश की 'ब्रजभाषा' आदि अन्य बोलियाँ 'पड़ी' बोलियाँ थीं, भी न्यायसंगत नहीं है। किंतु बेली का अर्थ भी पूर्ण नहीं है। खड़ी शब्द का अर्थ केवल 'स्टैण्डर्ड', 'करेण्ट' अर्थ लेने से उर्दू से उसका स्पष्ट अलगाव सिद्ध नहीं होता है, क्योंकि हिंदी सामान्य अर्थ की उर्दू शैली दिल्ली, आगरा में भली भाँति प्रचलित और सुस्थिर थी, किंतु उर्दू का झुकाव 'यामिनी' भाषा अर्थात् फ़ारसी और अरबी की ओर अधिक था, अतएव मूल रूप से हिंदी या हिंदुस्तानी होने पर भी गिलक्राइस्ट के पूर्व हेलहेडने इस हिंदुस्तानी को 'मिश्रित हिंदुस्तानी' कहा था, जब कि उसके अनुसार हिंदुस्तानी की हिंदवी शैली शुद्ध हिंदुस्तानी थी अथवा शुद्ध हिन्दी थी। 'प्रेमसागर' के प्रथम तीन संस्करणों के मुखपृष्ठ पर मुद्रित pure Hindee language or Kharee Bolee (1805ई.), पुन: इसके संस्करण में Hinduwee(1811ई.) और तीसरे संस्करण में Hindee(1842ई.) शब्द इसी तथ्य की ओर संकेत करते हैं।

सर्वप्रथम प्रयोग

खड़ी बोली नाम सर्वप्रथम हिंदी या हिंदुस्तानी की उस शैली के लिए दिया गया जो उर्दू की अपेक्षा अधिक शुद्ध हिंदी (भारतीय) थी और जिसका प्रयोग संस्कृत परम्परा अथवा भारतीय परम्परा से सम्बंधित लोग अधिक करते थे। अधिकांशत: वह नागरीलिपि में लिखी जाती थी। 1805ई. से हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू शब्द गिलक्राइस्टके अनुसार समानार्थक थे, अतएव इनसे अलगाव सिद्ध करने के लिए 'शुद्ध' (pure) विशेषण जोड़ने की आवश्यकता पड़ी तथा खड़ीबोली नाम सार्थक हुआ। इस प्रकार खड़ीबोली का वास्तविक अर्थहोगा शुद्ध, परिष्कृत या परिनिष्ठित प्रचलित भाषा। उर्दू भी दिल्ली आगरा की भाषा थी, किंतु वह यामिनी मिश्रित थी, अतएव वह दिल्ली आगरा की खड़ी और प्रचलित बोली नहीं थी। खड़ी बोली शब्द का अर्थ 1823 ई. के बाद हिंदी हुआ। यही करण है कि "प्रेमसागर' के 1842 ई. के संस्करण में हिंदी शब्द ही मुखपृष्ठ पर मुद्रित है।

खड़ी बोली शब्द का प्रयोग आरम्भ में उसी भाषा शैली के लिए हुआ, जिसे 1823 ई. के बाद 'हिंदी' कहा गया। किंतु जब प्राचीन या प्रचलित शब्द ने 'खड़ी बोली' का स्थान ले लिया तो खड़ी बोली शब्द उस शैली के लिए बहुत कम प्रयुक्त हुआ, केवल साहित्यिक संदर्भ में कभी कभी प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार जब यह मत प्रसिद्ध हो गया कि हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी की मूलाधार बोली ब्रजभाषा नहीं वरन् दिल्ली और मेरठ की जनपदीय बोली है, तब उस बोली का अन्य उपयुक्त नाम प्रचलित ना होने के कारण उसे 'खड़ी बोली' ही कहा जाने लगा। इस प्रकार खड़ी बोली का प्रस्तुत भाषाशास्त्रीय प्रयोग विकसित हुआ। प्राचेन कुरु जनपद से सम्बंध जोड़कर कुछ लोग अब इसे 'कौरवी बोली' भी कहने लगे हैं, किंतु जब तक पूर्णरूप से यह सिद्ध ना हो जाए कि इस बोली का विकास उस जनपद में प्रचलित अपभ्रंश से ही हुआ है तब तक इसे कौरवी कहना वैज्ञानिक दृष्टि से युक्तियुक्त नहीं।

खड़ी बोली बहुल क्षेत्र

खड़ी बोली निम्न लिखित स्थानों के ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाती है- मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, देहरादून के मैदानी भाग, अम्बाला, कलसिया और पटियाला के पूर्वी भाग, रामपुर और मुरादाबाद। बाँगरू, जाटकी या हरियाणवी एक प्रकार से पंजाबी और राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली ही हैं जो दिल्ली, करनाल, रोहतक, हिसार और पटियाला, नाभा, झींद के ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाती है। खड़ी बोली क्षेत्र के पूर्व में ब्रजभाषा, दक्षिण पूर्व में मेवाती, दक्षिण पश्चिम में पश्चिमी राजस्थानी, पश्चिम में पूर्वी पंजाबी और उत्तर में पहाड़ी बोलियों का क्षेत्र है। बोली के प्रधानत: दो रूप मिलते हैं-

  1. पूर्वी या पूर्वी खड़ी बोली
  2. पश्चिमी या पश्चिमी खड़ी बोली।

साहित्य के क्षेत्र में खड़ी बोली के आदि प्रयोग 'गोरखवाणी' तथा बाबा फ़रीद शररगंज की बानियों में मिलते हैं। मुसलमानों ने इस बोली को अपनाकर इसे अंत:प्रांतीय रूप दिया। निर्गुण संतों ने भी इसके प्रचार में सहयोग दिया। धीरे धीरे इस बोली में व्याकरण के क्षेत्र में तथा शब्द कोश में अन्य भाषाओं का मिश्रण होने लगा, जिससे हिंदी (आधुनिक अर्थ), उर्दू और हिंदुस्तानी का विकास हुआ। आज इस बोली के कुछ लोकगीत भी मिलते हैं, जो प्रकाशित भी हुए हैं।




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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वंशीधर विद्यालंकार: उर्दू, भाग 14, पृष्ठ 471, 1934 तथा धीरेन्द्र वर्मा: 'हिन्दीभाषा का इतिहास', तृतीय संस्करण, भूमिका पृष्ठ 34
  2. तासी (1839-1870 ई.): 'हिस्ट्री द ला हिन्दुई एण्ड हिन्दुस्तानी', प्रथम संस्करण, भाग 1 पृष्ठ 307 तथा चन्द्रबली पाण्डे: 'खड़ीबोली की नियुक्ति, उर्दू का रहस्य'
  3. टी.ग्रैहमबेली:'द हिस्ट्री ऑव उर्दू लिटेरचर' पृष्ठ 4,जे.आर.ए.1936,अक्टूबर,पृष्ठ 71
  4. सुनीतिकुमार चैट्रजी:ओ. डी.बी.एल.,पृष्ठ 11 तथा 'भारतीय आर्यभाषा और हिन्दी', पृष्ठ 165
  5. गांधीजी की अध्यक्षता में हिन्दी साहित्य सम्मलेन का 8वां अधिवेशन सन 1918 में (हिंदी) सर्व सेवा संघ प्रकाशन वाश्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इंदौर। अभिगमन तिथि: 4 जून, 2015।

धीरेंद्र, वर्मा “भाग- 1 पर आधारित”, हिंदी साहित्य कोश (हिंदी), 214-215।

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