ख़ान अब्दुलगफ़्फ़ार ख़ान

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(जन्म- 1890, उतमंजाई, भारत- मृत्यु- 20 जनवरी 1988, पेशावर, पाकिस्तान),

ख़ान अब्दुलगफ़्फ़ार ख़ान
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पूरा नाम ख़ान अब्दुलगफ़्फ़ार ख़ान
अन्य नाम 'सीमांत गांधी', 'बाचा ख़ान', 'बादशाह ख़ान'
जन्म 1890 ई.
जन्म भूमि उतमंजाई, भारत
मृत्यु 20 जनवरी, 1988 ई.
मृत्यु स्थान पेशावर, पाकिस्तान
अविभावक अब्दुल्ला ख़ान (परदादा), बैरम ख़ान (पिता)
नागरिकता भारतीय
पार्टी कांग्रेस
जेल यात्रा 1919 ई., 1930 ई. और 1942 ई. में जेल यात्रा की।
विद्यालय मिशनरी स्कूल
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न (1987 ई.)
रचनाएँ 'माई लाइफ़ ऐंड स्ट्रगल'
अन्य जानकारी 1937 ई. के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने विधानसभा में बहुमत प्राप्त किया। 'ख़ां साहब' को पार्टी का नेता चुना गया और वह मुख्यमंत्री बने।

20वीं शताब्दी में पख़्तूनों (या पठान; पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान का मुसममान जातीय समूह) के सबसे अग्रणी और करिश्माई नेता थे, जो महात्मा गांधी के अनुयायी बन गए और उन्हें ‘सीमांत गांधी’ कहा जाने लगा । अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ाँ का जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही अत्यधिक दृढ़ स्वभाव के व्यक्ति हैं, इसलिये अफ़ग़ानों ने उन्हें 'बाचा ख़ान' के रूप में पुकारना प्रारम्भ कर दिया। आपका सीमा प्रान्त के क़बीलों पर अत्यधिक प्रभाव था। गांधी जी के कट्टर अनुयायी होने के कारण ही उनकी 'सीमांत गांधी' की छवि बनी। विनम्र ग़फ़्फ़ार ने सदैव स्वयं को एक 'स्वतंत्रता संघर्ष का सैनिक' मात्र कहा, परन्तु उनके प्रसंशकों ने उन्हें 'बादशाह ख़ान' कह कर पुकारा। गांधी जी भी उन्हें ऐसे ही सम्बोधित करते थे। राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेकर उन्होंने कई बार जेलों में घोर यातनायें झेली हैं। फिर भी वे अपनी मूल संस्कृति से विमुख नहीं हुए। इसी वज़ह से वह भारत के प्रति अत्यधिक स्नेह भाव रखते थे।

जीवन परिचय

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान का जन्म पेशावर, पाकिस्तान में हुआ था। उनके परदादा 'अब्दुल्ला ख़ान' बहुत ही सत्यवादी और जुझारू स्वभाव थे। उनके पिता 'बैरम ख़ान' शांत स्वभाव के थे और ईश्वरभक्ति में लीन रहा करते थे। उन्होंने अपने लड़के अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान को शिक्षित बनाने के लिए 'मिशनरी स्कूल' में भेजा, पठानों ने उनका बड़ा विरोध किया। मिशनरी स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद वे अलीगढ़ आ गए। गर्मी की छुट्टियों में समाजसेवा करना उनका मुख्य काम था। शिक्षा समाप्त कर वह देशसेवा में लग गए।

गाँधी से परिचय

ख़ुदाई ख़िदमतगार की स्थापना

1929 में कांग्रेस पार्टी की एक सभा में शामिल होने के बाद ग़फ़्फ़ार ख़ां ने ख़ुदाई ख़िदमतगार (ईश्वर के सेवक) की स्थापना की और पख़्तूनों के बीच लाल कुर्ती आंदोलन का आह्वान किया । विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी। उसके बाद उन्हें यातनाओं की झेलने की आदत सी पड़ गई। जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए 'ख़ुदाई ख़िदमतग़ार' नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया।

सीमांत गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

मुस्लिम लीग ने जहाँ पख़्तूनों को इस आन्दोलन के लिये कोई मदद नहीं दी, वहीं कांग्रेस ने उन्हें अपना पूर्ण समर्थन दिया। अतः वे पक्के कांग्रेसी बन गए और यहीं से वे गांधी जी के अनुयायी के रूप में प्रतिष्ठित होते चले गये। ख़ान ने पठानों को गांधी जी का 'अहिंसा' का पाठ पढ़ाया।

शांतिप्रिय बादशाह ख़ान

अहिंसक राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन

भारत रत्न

मृत्यु

सन 1988 में पाक़िस्तान सरकार ने उन्हें पेशावर में उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया। 20 जनवरी, 1988 को उनकी मृत्यु हो गयी और उनकी अंतिम इच्छानुसार उन्हें जलालाबाद अफ़ग़ानिस्तान में दफ़नाया गया।



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