गणेशोत्सव  

गणेशोत्सव
गणेश प्रतिमा
अन्य नाम गणेश चतुर्थी, गणेश उत्सव
अनुयायी हिन्दू
प्रारम्भ वैसे तो गणेशोत्सव काफ़ी लम्बे समय से भारत में मनाया जाता रहा है, किन्तु 1893 ई. में बाल गंगाधर तिलक ने इस त्यौहार को सामाजिक स्वरूप दिया, तब से गणेशोत्सव राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया।
तिथि भाद्रपद माह, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी से चतुर्दशी तक
संबंधित लेख गणेश, शिवाजी, जीजाबाई, बाल गंगाधर तिलक
अन्य जानकारी गणेशोत्सव के दौरान लोग घरों, मोहल्लों, चौराहों पर गणेशजी की स्थापना, आरती तथा पूजा आदि करते हैं। बड़े जोरों से गीत बजाते, प्रसाद बांटते हैं। अनन्त चतुर्दशी के दिन गणेशजी की मूर्ति को पूरे विधि विधान के साथ समुद्र, नदी या तालाब में विसर्जित कर अपने घरों को लौट आते हैं।
अद्यतन‎

गणेशोत्सव (गणेश + उत्सव) हिन्दू धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख उत्सव है। यह उत्सव भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तिथि तक मनाया जाता है। यद्यपि गणेशोत्सव पूरे भारत में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है, किंतु महाराष्ट्र में इसका विशेष महत्त्व है। गणेशोत्सव में भगवान गणेश की पूजा-अर्चना का विशेष महत्त्व है। यह भगवान गणेश को समर्पित प्रमुख तिथियों में से एक गणेश चतुर्थी से प्रारम्भ होकर 'अनन्त चतुर्दशी' (अनन्त चौदस) तक चलने वाला दस दिवसीय महोत्सव है। यह माना जाता है कि इन दस दिनों के दौरान यदि श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ गणेश जी की पूजा-अर्चना की जाए तो जीवन की समस्त बाधाओं का अन्त कर विघ्नहर्ता अपने भक्तों पर सौभाग्य, समृद्धि एवं सुखों की बारिश करते हैं।

इतिहास

महाराष्ट्र में सातवाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथा चलायी थी। कहा जाता है कि शिवाजी की माता जीजाबाई ने पुणे के क़स्बा गणपति में गणेश जी की स्थापना की थी और पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बहुत अधिक बढ़ावा दिया। मूलतः गणेशोत्सव पारिवारिक त्यौहार था, किन्तु बाद के दिनों में बाल गंगाधर तिलक ने इस त्यौहार को सामाजिक स्वरूप दे दिया तथा गणेशोत्सव राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया।[1]

तिलक का योगदान

बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव के द्वारा आज़ादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित किया। गणेशोत्सव की विधिवत शुरुआत 1893 ई. में महाराष्ट्र से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने की थी। 1893 ई. के पहले भी गणपति उत्सव बनाया जाता था, लेकिन वह सिर्फ घरों तक ही सीमित था। उस समय आज की तरह पंडाल नहीं बनाए जाते थे और ना ही सामूहिक गणपति विराजते थे।[2] बाल गंगाधर तिलक उस समय एक युवा क्रांतिकारी और गर्म दल के नेता के रूप में जाने जाते थे। वे बहुत ही स्पष्ट वक्ता और प्रभावी ढंग से भाषण देने में माहिर थे। यह बात ब्रिटिश अफ़सर भी अच्छी तरह जानते थे कि अगर किसी मंच से तिलक भाषण देंगे तो वहाँ आग बरसना तय है।

तिलक 'स्वराज' के लिए संघर्ष कर रहे थे और वे अपनी बात को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। इसके लिए उन्हें ऐसा सार्वजानिक मंच चाहिए था, जहाँ से उनके विचार अधिकांश लोगों तक पहुंच सकें। इस काम को करने के लिए उन्होंने 'गणपति उत्सव' (गणेशोत्सव) को चुना और इसे सुंदर भव्य रूप दिया, जिसे आज हम देखते हैं। बाल गंगाधर तिलक के इस कार्य से दो फ़ायदे हुए, एक तो वह अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचा पाए और दूसरा यह कि इस उत्सव ने आम जनता को भी स्वराज के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी और उन्हें जोश से भर दिया। इस तरह से गणपति उत्सव ने भी आज़ादी की लड़ाई में एक अहम भूमिका निभाई। तिलक द्वारा शुरू किए गए इस उत्सव को आज भी भारतीय पूरी धूमधाम से मनाते रहे हैं और आगे भी मनाते रहेंगे। आज महाराष्ट्र का गणेशोत्सव विश्व भर में प्रसिद्ध है, जहाँ गणेश भगवान को मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलमूर्ति के नाम से पूजा जाता है।

लोककथा

गणेश जी की यात्रा

एक लोककथा के अनुसार- "एक बार देवी पार्वती स्नान करने के लिए भोगावती नदी गयीं। उन्होंने अपने तन के मैल से एक जीवंत मूर्ति बनायी और उसका नाम 'गणेश' रखा। पार्वती ने उससे कहा- 'हे पुत्र! तुम द्वार पर बैठ जाओ और किसी पुरुष को अंदर मत आने देना।' कुछ देर बाद भगवान शिव वहाँ आए। द्वार पर पहरा दे रहे गणेश ने उन्हें देखा तो रोक दिया। इसे शिव ने अपना अपमान समझा। क्रोधित होकर उन्होंने गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया और भीतर चले गए। महादेव को नाराज़ देखकर पार्वती ने समझा कि भोजन में विलंब के कारण शायद वे नाराज हैं। उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिव को बुलाया। तब दूसरी थाली देखकर शिव ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि दूसरी थाली किसके लिए है? पार्वती बोलीं, दूसरी थाली मेरे पुत्र गणेश के लिए है, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है। क्या आपने आते वक्त उसे नहीं देखा? यह बात सुनकर शिव बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहा, देखा तो था मैंने, लेकिन उसने मेरा रास्ता रोका था। इस कारण मैंने उसे उद्दंड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती विलाप करने लगीं। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। इस प्रकार पार्वती पुत्र गणेश को पाकर प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने पति तथा पुत्र को भोजन परोस कर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर घटित हुई थी, इसलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।[3]

गणेश प्रतिमा की स्थापना

दस दिनों तक चलने वाला गणेशोत्सव का त्योहार हिन्दुओं की आस्था का एक ऐसा अद्भुत प्रमाण है, जिसमें शिव-पार्वती के नंदन श्रीगणेश की प्रतिमा को घरों, मन्दिरों अथवा पंडालों में साज-श्रृंगार के साथ चतुर्थी को स्थापित किया जाता है।
गणेश प्रतिमा की स्थापना
कहीं-कहीं तो ये प्रतिमाएँ बहुत बड़ी तथा काफ़ी उँची होती हैं। दस दिनों तक गणेश प्रतिमा का नित्य विधिपूर्वक पूजन किया जाता है और ग्यारहवें दिन इस प्रतिमा का बड़े धूम-धाम से विसर्जन कर दिया जाता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी के सिद्धि विनायक स्वरूप की पूजा होती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन गणेश जी दोपहर में अवतरित हुए थे। इसीलिए यह 'गणेश चतुर्थी' विशेष फलदायी बताई जाती है। पूरे देश में यह त्योहार 'गणेशोत्सव' के नाम से प्रसिद्ध है। भारत में यह त्योहार प्राचीन काल से ही हिन्दू परिवारों में मनाया जाता है। इस दौरान देश में वैदिक सनातन पूजा पद्धति से अर्चना के साथ-साथ अनेक लोक सांस्कृतिक रंगारंग कार्यक्रम भी होते हैं, जिनमें नृत्य नाटिका, रंगोली, चित्रकला प्रतियोगिता, हल्दी उत्सव आदि प्रमुख होते हैं। गणेशोत्सव में प्रतिष्ठा से विसर्जन तक विधि-विधान से की जाने वाली पूजा एक विशेष अनुष्ठान की तरह होती है, जिसमें वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से की जाने वाली पूजा दर्शनीय होती है। महाआरती और पुष्पांजलि का नजारा तो देखने योग्य होता है।

पूजन विधि

  • गणेशोत्सव के दौरान प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर 'मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये' मंत्र से संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर से गणेशजी की प्रतिमा बनाई जाती है।
  • गणेश की प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित करते हैं। इसके बाद मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर उनका पूजन और आरती करनी चाहिए।
  • दक्षिणा अर्पित करके इक्कीस लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। इनमें से पांच लड्डू गणेशजी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देना चाहिए।
  • पूजन से पहले नित्यादि क्रियाओं से निवृत्त होकर शुद्ध आसन में बैठकर सभी पूजन सामग्री को एकत्रित कर पुष्प, धूप, दीपक, कपूर, रोली, मौली लाल, चंदन, मोदक आदि एकत्रित कर क्रमश: पूजा करनी चाहिए।
  • पूजा के दौरान यह ज़रूर याद रखें कि भगवान श्रीगणेश को तुलसी दल और तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए। उन्हें, शुद्ध स्थान से चुनी हुई दूर्वा को धोकर ही चढ़ाना चाहिए।
  • श्रीगणेश को मोदक यानी लड्डू अधिक प्रिय होते हैं। इसलिए उन्हें देशी घी से बने मोदक का प्रसाद ही चढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
  • भगवान श्रीगणेश के अतिरिक्त शिव और पार्वती, नन्दी, कार्तिकेय सहित सम्पूर्ण शिव परिवार की पूजा षोड़षोपचार विधि रूप से करना सर्वोत्तम माना जाता है।
  • शास्त्रों के अनुसार गणेश की पार्थिव प्रतिमा बनाकर उसे प्राण-प्रति‍ष्ठित कर पूजन-अर्चन के बाद विसर्जित कर देना चाहिए। अतः भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक आयोजनों के बाद प्रतिमा का विसर्जन करना नहीं भूलें।[4]

मूर्ति विसर्जन

मूर्ति विसर्जन करते लोग

अन्य सम्बंधित लेख


गणेशोत्सव संपूर्ण भारत में बड़े ही हर्ष एवं आस्था के साथ मनाया जाता है। घर-घर में गणेशजी की पूजा होती है। इस दौरान लोग मोहल्लों, चौराहों पर गणेशजी की स्थापना, आरती, पूजा करते हैं। बड़े जोरों से गीत बजाते, प्रसाद बांटते हैं। अनन्त चतुर्दशी के दिन गणेशजी की मूर्ति को पूरे विधि विधान के साथ समुद्र, नदी या तालाब में विसर्जित कर अपने घरों को लौट आते हैं। वैसे तो भगवान की पूजा कभी भी की जा सकती है, परन्तु गणेशजी की पूजा सायंकाल के समय की जाए तो बेहतर माना जाता है। पूजन के बाद सर झुकाकर चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा ज़रूर देनी चाहिए। सिर झुकाकर चंद्रमा को अर्घ्य देने के पीछे भी कारण व्याप्त है। माना जाता है कि जहां तक संभव हो, इस दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। भूल बस या कारण बस इस दिन चंद्रमा के दर्शन हो जाते हैं तो आप कलंक के भागी बन जाते हैं। फिर भी शास्त्रों में इस तरह की भूल बस होने वाली घटनाओं से मुक्ति पाने के लिए विधान भी मौजूद हैं। ऐसा होने पर गणेश चतुर्थी का व्रत कर कलंक से मुक्ति पाई जा सकती है।

गणपति यंत्र का महत्व

गणेश विसर्जन

गणेश-पूजन के दस दिनों के दौरान गणपति यंत्र के पूजन का विशेष महत्व है। जीवन को सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य से परिपूर्ण करने के लिए इस यंत्र के पूजन का विशेष महत्व है। चाहे किसी नए व्यापार की शुरुआत हो, भवन-निर्माण का आरम्भ हो या किसी किताब, पेन्टिंग या यात्रा का शुभारम्भ हो, गणपति यन्त्र आपके कार्य में आने वाली हर प्रकार की बाधा से रक्षा करता है। जो इस यन्त्र का पूजन करता है, वह अपने हर कार्य में सफल रहता है।

सम्पूर्ण भारत में पूजन

गणेश की प्रतिष्ठा सम्पूर्ण भारत में समान रूप में व्याप्त है। महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलमूर्ति के नाम से पूजता है। दक्षिण भारत में इनकी विशेष लोकप्रियता ‘कला शिरोमणि’ के रूप में है। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों में गणेश की नृत्य-मुद्रा में अनेक मनमोहक प्रतिमाएं हैं। गणेश हिन्दुओं के आदि आराध्य देव हैं। हिन्दू धर्म में गणेश को एक विशष्टि स्थान प्राप्त है। कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन इत्यादि सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विध्न कार्य सम्पन्न हो, इसलिए शुभ के रूप में गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. प्रथम पूज्य श्रीगणेश का उत्सव 'गणेशोत्सव' (हिन्दी) जागरण जंक्शन। अभिगमन तिथि: 02 अगस्त, 2014।
  2. गणेशोत्सव कब शुरू हुआ (हिन्दी) वेबसुनिया। अभिगमन तिथि: 02 अगस्त, 2014।
  3. गणेश चतुर्थी यानी गणेशोत्सव (हिन्दी) समय लाइव। अभिगमन तिथि: 02 अगस्त, 2014।
  4. महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की चमक औरों से अलग (हिन्दी) आज तक। अभिगमन तिथि: 02 अगस्त, 2014।

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=गणेशोत्सव&oldid=616829" से लिया गया