चंद्रकांत देवताले  

चंद्रकांत देवताले
चंद्रकांत देवताले
पूरा नाम चंद्रकांत देवताले
जन्म 7 नवंबर, 1936
जन्म भूमि जौलखेड़ा, बैतूल, मध्य प्रदेश
मृत्यु 14 अगस्त, 2017
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ 'हड्डियों में छिपा ज्वर' (1973), 'दीवारों पर खून से' (1975), 'लकड़बग्घा' हंस रहा है (1980) तथा ‘मां पर नहीं लिख सकता कविता’
भाषा हिंदी, मराठी
विद्यालय सागर विश्वविद्यालय
शिक्षा पी-एच. डी. (मुक्तिबोध से)
पुरस्कार-उपाधि साहित्य अकादमी पुरस्कार (2012), कविता समय सम्मान (2011), भवभूति अलंकरण (2003)
विशेष योगदान चंद्रकांत देवताले देश की 24 भाषाओं में विशेष साहित्यिक योगदान के लिए प्रख्यात थे। इसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया था।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी चंद्रकांत देवताले ने अपनी रचनाओं में दलितों, वंचकों, आदिवासियों, शोषितों को जगह दी। उनकी कविताओं में न्याय पक्षधरता के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग जैसी आधुनिक चुनौतियों पर भी विमर्श दिखता है।
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इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

चंद्रकांत देवताले (अंग्रेज़ी: Chandrakant Devtale, जन्म- 7 नवंबर, 1936, जौलखेड़ा, बैतूल, मध्य प्रदेश; मृत्यु- 14 अगस्त, 2017) प्रसिद्ध भारतीय कवि एवं साहित्यकार थे। वह देश की 24 भाषाओं में विशेष साहित्यिक योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकारों में शामिल थे। चंद्रकांत अपनी कविता की सघन बुनावट और उसमें निहित राजनीतिक संवेदना के लिए जाने जाते थे। वे 'दुनिया का सबसे ग़रीब आदमी' से लेकर 'बुद्ध के देश में बुश' तक पर कविताएं लिखते थे। देवताले वंचितों की महागाथा के कवि थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में दलितों, वंचकों, आदिवासियों, शोषितों को जगह दी। उनकी कविताओं में न्याय पक्षधरता के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग जैसी आधुनिक चुनौतियों पर भी विमर्श दिखता है।[1]

परिचय

चंद्रकांत देवताले का जन्म गाँव जौलखेड़ा, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश में 7 नवंबर, 1936 को हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक एवं उच्च शिक्षा इंदौर से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने मुक्तिबोध पर सागर विश्वविद्यालय, सागर से पी-एच. डी. की। वह इंदौर में एक कॉलेज से शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्त होकर स्वत: लेखन कार्य कर रहे थे। उन्होंने अपनी कविता की कच्ची सामग्री मनुष्य के सुख दुःख, विशेषकर औरतों और बच्चों की दुनिया से इकट्ठी की थी।

साहित्यिक परिचय

बैतूल में हिंदी और मराठी बोली जाती है, इसलिए उनके काव्य संसार में यह दोनों भाषाएं जीवित थीं। मध्य भारत का वह हिस्सा जो महाराष्ट्र से छूता है, उसमें मराठी भाषा पहली या दूसरी भाषा के रूप में बोली जाती रही है। बैतूल भी ऐसी ही जगह है। अपने प्रिय कवि मुक्तिबोध की तरह देवताले मराठी से आंगन की भाषा की तरह बर्ताव करते थे। यह उनकी कविताओं में बार-बार देखा जा सकता है। वह इंदौर में रहे और इंदौर को अपनी सार्वदेशिकता के कारण मध्य भारत का मुंबई कहा जाता है। यह सार्वदेशिकता उनकी कविताएं भी बयान करती हैं। देवताले काफी पढ़े लिखे इंसान थे।

देवताले की कविताओं में जूता पॉलिश करते एक लड़के से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक जगह पाते हैं। वे 'दुनिया के सबसे ग़रीब आदमी' से लेकर 'बुद्ध के देश में बुश' तक पर कविताएं लिखते थे लेकिन सुखद यह है कि कविता के इस पूरे फैलाव में कहीं भी उनके गुस्से में कमी नहीं आती। वे अपने गुस्से को सर्जनात्मक बनाकर उससे भूख का निवारण चाहते हैं। 'अंधेरे की आग में कब से/ जल रही है भूख/ फिर भी नहीं उबल रहा/ गुस्से का समुद्र/ कब तक? कब तक?' उनकी कविता का शीर्षक है। देवताले वंचितों की महागाथा के कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में दलितों, वंचकों, आदिवासियों, शोषितों को जगह दी। उनकी कविताओं में न्याय पक्षधरता के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग जैसी आधुनिक चुनौतियों पर भी विमर्श दिखता है।[1]

रचनाएँ

चंद्रकांत देवताले का रचना समय आज़ाद भारत का रचना समय है। उन्होंने हिंदी कविता के पिछले छह दशकों को अपनी रचनाधर्मिता से आलोकित किया। उन्होंने दर्जनभर कविता-संग्रह और आलोचना की एक किताब लिखी। मराठी भाषा से अनुराग उन्हें मराठी भक्ति कविता और दिलीप चित्रे की कविताओं की ओर ले गया।

कविता संग्रह-

उनके कविता संग्रह हैं:- 'हड्डियों में छिपा ज्वर' (1973), 'दीवारों पर खून से' (1975), 'लकड़बग्घा' हंस रहा है (1980), 'रोशनी के मैदान की तरफ' (1982), 'भूखंड तप रहा है' (1982), 'आग हर चीज़ में बताई गई थी' (1987), 'बदला बेहद महंगा सौदा' (1995), 'पत्थर की बेंच' (1996), 'उसके सपने' (1997), 'इतनी पत्थर रोशनी' (2002), 'उजाड़ में संग्रहालय' (2003), 'जहां थोड़ा सा सूर्योदय होगा' (2008), 'पत्थर फेंक रहा हूं' (2011)।

आलोचना- मुक्तिबोध (कविता और जीवन विवेक)

संपादन- दूसरे-दूसरे आकाश, डबरे पर सूरज का बिम्ब

अनुवाद- पिसाटी का बुर्ज (दिलीप चित्रे की कविताएँ, मराठी से अनुवाद)

विशेष

सन 2008 में वाणी प्रकाशन और वाक् पत्रिका एक तथाकथित टैलेंट हंट आयोजित करती थी। इसमें विश्वविद्यालयों में ‘कवियों में प्रतिभा’ या ‘प्रतिभाशाली’ कवियों की ख़ोज की जाती थी। ऐसा ही एक टैलेंट हंट इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित हुआ था। सभी नौजवान और प्रतिभाशाली कवियों ने कविताएं सुनानी शुरू कीं और कुछ कवियों ने मां पर भी कविताएं सुनाईं। इस टैलेंट हंट की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्द कथाकार और कथा पत्रिका के संपादक मार्कन्डेय जी ने अंत में बहुत ही आहिस्ते से कहा कि क्या आप लोगों ने चंद्रकांत देवताले की कविता ‘मां पर नहीं लिख सकता कविता’ पढ़ी है? तुम नौजवानों को वह कविता पढ़ लेनी चाहिए। कुछ दिन बाद, शायद जनवरी, 2009 में वह कविता मिल गई, जो इस प्रकार है[1]-

मां ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चंद्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा
मां पर नहीं लिख सकता कविता!

सम्मान एवं पुरस्कार

चंद्रकांत देवताले को ढेर सारे पुरस्कार मिले, जिसमें अंतिम महत्त्वपूर्ण पुरस्कार 2012 का साहित्य अकादमी पुरस्कार था। यह उनके कविता संग्रह ‘पत्थर फेंक रहा हूं’ के लिए दिया गया था।

निधन

प्रसिद्ध साहित्यकार चंद्रकांत देवताले का 14 अगस्त, 2017 को निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार राजधानी के लोधी रोड श्मशान घाट पर किया गया।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 चंद्रकांत देवताले की कविताएं इंसानी तमीज़ की कविताएं हैं (हिंदी) thewirehindi.com। अभिगमन तिथि: 19 अगस्त, 2017।

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