छत्तीसगढ़

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छत्तीसगढ़
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राजधानी रायपुर
राजभाषा(एँ) छत्तीसगढ़ी और हिंदी
स्थापना 1 नवंबर, 2000
जनसंख्या 2,55,40,196[1]
· घनत्व 189 /वर्ग किमी
क्षेत्रफल 1,35,191 वर्ग किमी[2]
भौगोलिक निर्देशांक 21.27° उत्तर, 81.60° पूर्व
ज़िले 27[2]
सबसे बड़ा नगर रायपुर
लिंग अनुपात 1000:991 ♂/♀
साक्षरता 71.04%
· स्त्री 60.59%
· पुरुष 81.45%
उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
राज्यपाल बलराम दास टंडन
मुख्यमंत्री रमन सिंह[2]
विधानसभा सदस्य 90[2]
लोकसभा क्षेत्र 11[2]
राजकीय पशु जंगली भैंस (Wild Buffalo)
राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना (Hill Myna)
राजकीय वृक्ष साल (Sal)
विशेष भारत के कुल खनिज उत्पादन का 16 प्रतिशत खनिज उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है।[2]
अन्य जानकारी छत्तीसगढ़ में देश का 38.11 प्रतिशत टिन अयस्क, 28.38 प्रतिशत हीरा, 18.55 प्रतिशत लौह अयस्क और 16.13 प्रतिशत कोयला, 12.42 प्रतिशत डोलोमाईट, 4.62 प्रतिशत बॉक्साइट उपलब्ध है।
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छत्तीसगढ़ (अंग्रेज़ी: Chhattisgarh) भारत का 26वाँ राज्य है। भारत में विशेषत: दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका नाम विशेष कारणों से धीरे धीरे बदल गया। पहला 'मगध', जो बौद्ध विहारों के कारण 'बिहार' बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल', जो 'छत्तीस गढ़ों' को अपने में समाहित रखने के कारण 'छत्तीसगढ़' बन गया। ये दोनों ही क्षेत्र प्राचीन काल से भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। 'छत्तीसगढ़' पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष बताते हैं कि यहाँ वैष्णव, शैव, शाक्त और बौद्ध के साथ ही साथ अनेक आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का समय-समय पर प्रभाव रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन 1 नवंबर 2000 को हुआ था।

इतिहास

मध्य प्रदेश से बनाया गया यह राज्य भारतीय संघ के 26 वें राज्य के रूप में 1 नवंबर, 2000 को पूर्ण अस्तित्व में आया। इससे पूर्व छत्तीसगढ़ 44 वर्ष तक मध्य प्रदेश का एक अंग रहा था। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को 'दक्षिण कोशल' के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। छठी और बारहवीं शताब्दियों के बीच सरभपूरिया, पांडुवंशी, सोमवंशी, कलचुरी और नागवंशी शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। कलचुरी और नागावंशी शासकों ने इस क्षेत्र पर लम्बे समय तक शासन किया। कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ पर सन् 980 से लेकर 1791 तक राज किया। सन् 1854 में अंग्रेज़ों के आक्रमण के बाद महत्त्व बढ़ गया सन् 1904 में संबलपुर उड़ीसा में चला गया और 'सरगुजा' रियासत बंगाल से छत्तीसगढ़ के पास आ गई। छत्तीसगढ़ पूर्व में दक्षिणी झारखण्ड और उड़ीसा से, पश्चिम में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से, उत्तर में उत्तर प्रदेश और पश्चिमी झारखण्ड और दक्षिण में आंध्र प्रदेश से घिरा है। छत्तीसगढ़ का भू-भाग सम्पूर्ण भारत के भू-भाग का कुल 4.14% है। इस प्रकर छत्तीसगढ़ राज्य क्षेत्रफल के हिसाब से देश का 9वाँ बड़ा राज्य है। जनसंख्या की दृष्टि से इस राज्य का 17वाँ स्थान है।

शिक्षा

शिक्षा के क्षेत्र में भी छत्तीसगढ़ ने धीरे-धीरे विकास की गति को अपनाया है। हालांकि इस राज्य का बस्तर ज़िला अन्य ज़िलों की अपेक्षा साक्षरता की निम्न दर रखता है। शायद इसकी वजह यह है कि यहाँ आदिवासी लोगों की संख्या सर्वाधिक है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो छत्तीसगढ़ की शिक्षा पद्धति में संस्कृत का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। महंत वैष्णवदास जी संस्कृत शिक्षा के बड़े प्रेमी थे। शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। सन् 1955 में रायपुर में 'श्री दूधाधारी वैष्णव संस्कृत महाविद्यालय' खुलवाने के लिए 3.5 लाख रुपये नगद और 100 एकड़ ज़मीन दान में दी। आगे चलकर अमरदीप टॉकिज को भी इस महाविद्यालय को दान कर दिया। इस कार्य में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और मध्य प्रदेश[3] के मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का विशेष योगदान था। इसी प्रकार बालिकाओं की शिक्षा के लिए रायपुर में सन् 1958 में 'शासकीय दूधाधारी बजरंगदास महिला महाविद्यालय' खुलवाया और इसकी व्यवस्था के लिए मठ से 1.5 लाख रुपये नगद और पेंड्री गांव के 300 एकड़ ज़मीन दान में दी। मध्य प्रांत के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की 'विद्यामंदिर योजना' के क्रियान्वयन के लिए मठ से 30 एकड़ ज़मीन दान में दी। सन् 1958 में अपने गुरु के नाम पर अभनपुर में 'श्री बजरंगदास उच्चतर माध्यमिक विद्यालय' खुलवाया। इसी प्रकार अपने पिता की स्मृति में अपने पैतृक गांव पंचरूखी में एक हाई स्कूल खुलवाया।[4]

छत्तीसगढ़ में शिक्षा के स्तर को और ऊँचा उठाने के लिए यहाँ विश्वविद्यालयों की भी स्थापना हुई हैं। 'गुरु घासीदास विश्वविद्यालय' को राज्य का पहला विश्वविधालय बनने का गौरव प्राप्त हुआ, जिसकी स्थापना 16 जून, सन् 1983 को मध्य प्रदेश के बिलासपुर में हुई थी। बाद में मध्य प्रदेश का विभाजन हो गया और यह विश्वविद्याल्य छत्तीसगढ़ में शामिल हो गया। जनवरी 2009 में केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश 'केंद्रीय विश्‍वविद्यालय अधिनियम' 2009 के माध्‍यम से इसे केंद्रीय विश्‍वविद्यालय का दर्जा दिया गया।

भूगोल

छत्तीसगढ़ राज्य मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्व में 17°46' उत्तरी अक्षांश से 24°5' उत्तरी अक्षांश तथा 80°15' पूर्वी देशांतर से 84°15' पूर्वी देशांतर रेखाओं के मध्य स्थित है। छत्तीसगढ़ का कुल भौगोलिक क्षेत्रअफल 1,35,194 वर्ग किमी. है। इसकी उत्तरी-दक्षिण लम्बाई 360 किमी. तथा पूर्व-पश्चिम चौड़ाई 140 किमी. है। छत्तीसगढ़ के उत्तर में उत्तर प्रदेश, उत्तरी-पूर्वी सीमा में झारखण्ड, दक्षिण-पूर्व में ओडिशा राज्य स्थित है।
भोरमदेव मंदिर, छत्तीसगढ़
दक्षिण में आन्ध्र प्रदेश, दक्षिण-पश्चिम में महाराष्ट्र तथा उत्तरी-पश्चिम भाग में मध्य प्रदेश स्थित है। छत्तीसगढ़ राज्य में तीन सम्भाग व 16 ज़िले हैं। यह प्रदेश भारत के कुल क्षेत्रफल का 4.11% है। क्षेत्रेफल की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल 16 रज्यों से अधिक है। यह राज्य अनेक छोटे-छोटे राज्यों से बड़ा है। क्षेत्रफल की कांकेर छत्तीसगढ़ का सबसे छोटा ज़िला है। छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल पंजाब, हरियाणा एवं केरल इन तीनों राज्यों से योग से अधिक है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का सम्भाग बस्तर[5] का विस्तार केरल के क्षेत्रफल से बड़ा है।

जलवायु

छत्तीसगढ़ की जलवायु में भी मॉनसूनी जलवायु की सभी विशेषताएँ हैं। छत्तीसगढ़ प्रदेश की जलवायु उष्ण-आर्द्र मॉनसून प्रकार की है, जिसे सामान्य बोलचाल में उष्णकटिबंधीय मॉनसूनी जलवायु या शुष्क उप-आर्द्र कहा जाता है। मॉनसून की दृष्टि से छत्तीसगढ़ शुष्क आर्द्र मॉनसूनी जलवायु के अन्तर्गत आता है। कर्क रेखा प्रदेश के उत्तरी भाग (सरगुजा, कोरिया ज़िले) से होकर गुज़रती है, जिसका पर्यापत प्रभाव यहाँ की जलवायु पर पड़ता है। सम्पूर्ण प्रदेश की जलवायु में आंशिक भिन्नता है, जो समय-समय पर वर्षा, तापमान आदि के रूप में परिलक्षित होती रहती है। छत्तीसगढ़ में ग्रीष्म में अधिक गर्मी तथा शीतकाल काफ़ी ठण्डा होने के साथ-साथ वर्षा ऋतु में न्यून दैनिक तापांतर एवं न्यूनाधिक वर्षा यहाँ की जलवायु की मुख्य विशेषता है। इस तरह प्रदेश में देश की मॉनसूनी जलवायु में प्राप्त ऋतु क्रम से अभिन्न स्थिति दृष्टिगोचर होती है। अंचल में औसत वर्षा 140 सेमी. तथा इसका 90% दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के द्वारा प्राप्त होता है अर्थात् जून से 1 सितम्बर के मध्य।

छत्तीसगढ़ राज्य की नदियाँ

नदियाँ जीवनदायिनी होती हैं। किसी भी राष्ट्र या राज्य के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, भौतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास में इनका प्रमुख स्थान है। नदियाँ पेयजल, सिंचाई और परिवहन का प्रमुख स्रोत रही हैं, जिसके कारण आदिकाल से ही सभ्यताओं का विकास नदियों किनारे स्थित है। नदियों से भूमि के ढाल के विषय में जानकारी प्राप्त होती है किसी राज्य का अपवाह तन्त्र वहाँ के उच्चावच एवं भूमि के ढाल पर निर्भर करता है। ये नदियाँ अपने प्रवाह के साथ विभिन्न प्रकार के महत्त्वपूर्ण तत्त्व लाकर अपने तटों पर बिछा देती हैं, जो तत्त्व कृषि में बहुत ही सहायक होते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में महानदी को 'गंगा' के समान पवित्र माना जाता है, यही कारण है कि यह 'छत्तीसगढ़ की गंगा' कही जाती है। इस नदी को गंगा कहे जाने के बारे में मान्यता है कि, त्रेतायुग में श्रृंगी ऋषि का आश्रम सिहावा की पहाड़ी में था। वे अयोध्या में महाराजा दशरथ के निवेदन पर पुत्रेष्ठि यज्ञ कराकर लौटे थे। उनके कमंडल में यज्ञ में प्रयुक्त गंगा का पवित्र जल भरा था। समाधि से उठते समय कमंडल का अभिमंत्रित जल गिर पड़ा और बहकर महानदी के उद्गम में मिल गया। गंगाजल के मिलने से महानदी गंगा के समान पवित्र हो गयी।

अर्थव्यव्स्था

छत्तीसगढ़ भारत के खनिज समृद्ध राज्यों में से एक है। यहाँ पर चूना- पत्थर, लौह अयस्क, तांबा, फ़ॉस्फेट, मैंगनीज़, बॉक्साइट, कोयला, एसबेस्टॅस और अभ्रक के उल्लेखनीय भंडार हैं। तांबे की सर्वाधिक मात्रा बिलासपुर ज़िले से प्राप्त होती है। छ्त्तीसगढ़ में लगभग 52.5 करोड़ टन का डोलोमाइट का भंडार है, जो पूरे देश के कुल भंडार का 24 प्रतिशत है। यहाँ बॉक्साइट का अनुमानित 7.3 करोड़ टन का समृद्ध भंडार है और टिन अयस्क का 2,700 करोड़ से भी ज़्यादा का उल्लेखनीय भंडार है। छत्तीसगढ़ में ही कोयले का 2,690.8 करोड़ टन का भंडार है। स्वर्ण भंडार लगभग 38,05,000 किलो क्षमता का है। यहाँ भारत का सर्वोत्तम लौह अयस्क मिलता है, जिसका 19.7 करोड़ टन का भंडार है। बैलाडीला, बस्तर, दुर्ग और जगदलपुर में लोहा मिलता है। बैलाडीला में सर्वाधिक लौह अयस्क निकाला जाता है। यहाँ से प्राप्त लौह अच्छी किस्म और उच्च कोटि का होता है। भिलाई में भारत के बड़े इस्पात संयंत्रों में से एक स्थित है। राज्य में 75 से भी ज़्यादा बड़े और मध्यम इस्पात उद्योग हैं, जो गर्म धातु, कच्चा लोहा, भुरभुरा लोहा (स्पंज आयरन), रेल-पटरियों, लोहे की सिल्लियों और पट्टीयों का उत्पादन करते हैं। 'भिलाई इस्पात संयत्र' की स्थापना सन् 1957 में की गई थी। यह देश एक बड़ा तथा महत्त्वपूर्ण इस्पात सयंत्र है।

खनिज संपदा से ही छ्त्तीसगढ़ को सालाना 600 करोड़ रुपये से ज़्यादा का राजस्व प्राप्त होगा। रायपुर ज़िले के देवभोग में हीरे के भंडार हैं। यहाँ हीरों की तलाश शुरू हो गई है और लगभग दो वर्षों में इसका खनन आरंभ हो जाने पर राज्य को 2,000 करोड़ रुपये सालाना का अतिरिक्त राजस्व मिलने की उम्मीद है।

ऊर्जा

छ्त्तीसगढ़ अपनी आवश्यकता से अधिक ऊर्जा का उत्पादन करता है। यहाँ कोयला समृद्ध कोरबा में तीन तापविद्युत संयंत्र हैं, और अन्य कई संयंत्र लगाने की योजना है| कोरबा में पहला विद्युत संयत्र सन् 1978 में में स्थापित किया गया था। यह दिन छत्तीसगढ़ राज्य के लिए स्वर्णिम था। साउथ ईस्टर्न कोलफ़ील्डस लिमिटेड कोयले के विशाल भंडार वाले क्षेत्रों में खोज कर रहा है। छ्त्तीसगढ़ में तेंदू पत्ते का भारत के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत होता है।

औद्योगिक क्षेत्र

एक औद्योगिक क्षेत्र और कई विकासशील औद्योगिक नगर वाले छ्त्तीसगढ़ का आर्थिक परिवेश आधुनिक है। भिलाई, बिलासपुर, रायपुर, रायगढ़ और दुर्ग राज्य के मुख्य शहर हैं। भिलाई की रेलवे लाइन के पूर्व और पश्चिम में शहरी विस्तार हुआ है। कोरबा, राजनांदगांव और रायगढ़ अन्य विकासशील शहरी केंद्र हैं। सीधे नहरों से सिंचित क्षेत्र भी हैं। इस क्षेत्र का ग्रामीण आधार कमज़ोर है और यहाँ के भीतर इलाके अभी तक घोर ग्रामीण तथा अविकसित हैं। शहरी केंद्रों का क्षेत्रीय जनजातीय अर्थव्यवस्था पर बहुत कम प्रभाव पड़ा है।

कृषि

राज्य में 80 प्रतिशत आबादी कृषि और उससे जुडी गतिविधियों में लगी है। 137.9 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से कुल कृषि क्षेत्र कुल क्षेत्र का लगभग 35 प्रतिशत है। खेती का प्रमुख मौसम ख़रीफ हैं। चावल यहाँ की मुख्य फ़सल है। राज्य में धान का सर्वाधिक भंडार मौजूद है, शायद यही मुख्य कारण है कि राज्य को 'धान का कटोरा' कहकर सम्मानित किया गया है। यहाँ प्रति हेक्टेयर 14 क्विंटल धान का उत्पादन होता है। राज्य की अन्य महत्त्वपूर्ण फ़सलें हैं- मक्का, गेंहूँ कच्चा अनाज, मूँगफली और दलहन। कोरिया छत्तीसगढ़ राज्य के प्रमुख क्षेत्रों में से एक है, जहाँ पर मक्के की खेती सबसे ज़्यादा की जाती है। लगभग 3.03 लाख हेक्टेयर में बागवानी फ़सलें उगाई जाती हैं। छत्तीसगढ़ में 'इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय' प्रमुख कृषि कार्य के बारे में विस्तारपूर्वक शोध करता है। विश्वविद्यालय की स्थापना 20 जनवरी, सन् 1987 को की गई थी। यह कृषि विश्वविद्यालय कृषि शिक्षा प्रदान करता है। यह कृषि विश्वविद्यालय 9 महाविद्यालयों, 8 अनुसंधान केन्द्रों तथा 4 कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से काम कर रहा है। इस विश्वविद्यालय का लक्ष्य है- 'कृषि शिक्षा अनुसंधान और प्रसार'।

एक विस्तृत और लहरदार प्रदेश छ्त्तीसगढ़ में चावल और अनाज की खेती होती है। निम्नभूमि में चावल बहुतायत में होता है, जबकि उच्चभूमि में मक्का और मोटे अनाज की खेती होती है। क्षेत्र की महत्त्वपर्ण नक़दी फ़सलों में कपास और तिलहन शामिल हैं। बेसिन में आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रचलन धीमी गति से हो रहा है। कृषि की दृष्टि से यह एक बेहद उपजाऊ क्षेत्र है। यह देश का 'धान का कटोरा' कहलाता है और 600 से ज़्यादा चावल मिलों को अनाज की आपूर्ति करता है। कुल क्षेत्र का आधे से कम क्षेत्र कृषि योग्य है, हालांकि स्थलाकृति, वर्षा और मिट्टी में विविधता के कारण इसका वितरण असमान है। यहाँ की कृषि की विशेषता कम उत्पादन और खेती की पारंपरिक विधियों का प्रयोग है।

उद्योग

छ्त्तीसगढ़ अभी तक अपने संसाधनों का संपूर्ण लाभ नहीं उठा पाया है। औद्योगिकीकरण हो रहा है, लेकिन उसकी गति धीमी है। बड़े और मध्यम पैमाने के उद्योग केंद्र सामने आ रहे हैं। सुनियोजित विकास के अंग के रूप में रायपुर और भिलाई को औद्योगिक क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया है। सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिस उपकरण और उच्च प्रौद्योगिक ऑप्टिकल फ़ाइबर के निर्माण जैसे अन्य आधुनिक उद्योगों को भी स्थापित किया गया है। निजी उद्योगों में सीमेंट कारख़ाने, काग़ज़, चीनी और कपड़ा (सूती, ऊनी, रेशम और जूट) मिलों के साथ- साथ आटा, तेल और आरा मिलें भी हैं। यहाँ पर सामान्य इंजीनियरिंग वस्तुओं के साथ- साथ रासायनिक खाद, कृत्रिम रेशे और रसायन उत्पादन की भी कुछ इकाइयाँ हैं। राज्य में विस्फोटक पदार्थों का कारख़ाना कोरबा ज़िले में स्थित है, जहाँ कई प्रकार के ख़तरनाक विस्फोटक पदार्थों का निर्माण किया जाता है। राज्य की लधु उद्योग इकाइयों का राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रभाव छोड़ना बाक़ी है। लेकिन हथकरघा उद्योग यहाँ फल- फूल रहा है और साड़ी बुनने, ग़लीचे व बर्तन बनाने तथा सोने रसायन उत्पादन की भी कुछ इकाइयाँ हैं। भारत में बीड़ी बनाने का उद्योग भी बड़े पैमाने पर होता है। मध्य प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ राज्यों में तेन्दुपता एक बड़ी मात्रा में उगाया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य में इस पत्ते का अधिकतर प्रयोग बीड़ी बनाने में किया जाता है।

छत्तीसगढ़ में वन, खनिज और भूजल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का असीम भंडार है। पिछले कुछ वर्षो से राज्य में उद्योगों का विस्तार हो रहा है। छत्तीसगढ़ में देश का लगभग 15 प्रतिशत इस्पात तैयार होता है। भिलाई इस्पात संयंत्र, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम, साउथ-ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड एन.टी.पी.सी. जैसे भारत सरकार और ए.सी.सी. गुजरात अंबुजा, ग्रासिम, एल एंड टी सी सी आई और फ्रांस के ला-फार्गे जैसे बड़े सीमेंट प्लांट तथा 53 इस्पात परियोजनाएं क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों में है। राज्य में लगभग 133 इस्पात ढालने के कारखाने, अनेक लघु इस्पात संयंत्र, 11 फैरो-एलॉय कारखाने, इंजीनियरिंग और फैब्रीकेशन इकाइयों सहित बड़े पैमाने पर कृषि आधारित और खाद्य प्रसंस्करण, रसायन, प्लास्टिक, भवन निर्माण सामग्री और वनोत्पाद पर आधारित कारखाने हैं। अनुकूल औद्योगिक वातावरण के कारण छत्तीसगढ़ में विशाल औद्योगिक निवेश हो रहा है। नए उद्योगों की स्थापना और विद्यमान औद्योगिकी इकाइयों के विस्तार के लिए 85,000 करोड़ रुपए के 80 आशय-पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं। राज्य में जनवरी-दिसंबर 2006 के बीच 1,07,899 करोड़ रुपए के प्रस्तावित निवेश होने के कारण छत्तीसगढ़ को भारत सरकार के उद्योग मंत्रालय की औद्योगिकी उद्यमशीलता ज्ञापन रिपोर्ट में प्रथम स्थान मिला। भारत के केंद्र में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य कारखानों को हर समय बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम है। राज्य में कोयले के विशाल भंडार (देश के 17 प्रतिशत) के कारण से राज्य के पास कम लागत पर बिजली उत्पादन के अवसर हैं और अन्य के पास 50,000 मेगावॉट की बिजली उत्पादन क्षमता है। एन.टी.पी.सी बिलासपुर ज़िले में अपना सबसे बड़ा बिजली उत्पादन संयंत्र स्थापित कर रहा है। एन.टी.पी.सी. ने सीपट में 2,640 मेगावॉट और कोरबा में 600 मेगावॉट के सुपर ताप बिजलीघर का निर्माण शुरू हो गया है। कई अन्य राज्य भी यहाँ अपने संयंत्र लगाना चाहते हैं। निजी क्षेत्र के 25,000 मेगावॉट से अधिक के संयंत्रों के अनुबंध-पत्र (एम.ओ.यू) विचाराधीन हैं। छत्तीसगढ़ औद्योगिक विकास निगम लि., रायपुर ने राज्य में लगभग 3,500 हेक्टेयर औद्योगिक ज़मीन के विकास, रखरखाव और प्रबंधन का काम अपने हाथ में ले लिया है। निगम द्वारा विकसित ज़मीन में 925 से अधिक उद्योग खुल गये हैं जिन पर 1,800 करोड़ रुपए से भी अधिक का निवेश है और इनमें 80,000 लोगों को रोज़गार मिला हुआ है।

पशुपालन

छत्तीसगढ़ राज्य में मवेशी और पशुपालन महत्त्वपूर्ण कार्यों में से एक हैं। मवेशियों में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, और सूअर आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। राज्य में बिलासपुर स्थित बकरी व गाय के कृत्रिम प्रजनन और संकरण केंद्र इन जानवरों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने में लगे हैं। गोकुलम (अंजोरा) राज्य का एकमात्र पशु चिकित्सालय और एक महाविद्याल्य है, जहाँ पशुओं आदि की देखभाल और उनसे सम्बन्धित बीमारियों का इलाज किया जाता है। छत्तीसगढ़ में पेड़-पौधे और नदि-पहाड़ आदि बहुत हैं। यहाँ पर पक्षियों की भी विभिन्न क़िस्में पाई जाती हैं। पहाड़ी मैना को यहाँ का 'राजकीय पक्षी' और 'वन भैंसे' को 'राजकीय पशु' घोषित किया गया है। इसके साथ ही साथ 'साल वृक्ष', जिसे छत्तीसगढ़ में 'सराई' कहा जाता है, को 'राजकीय वृक्ष' घोषित किया गया है।

सूचना प्रौद्योगिकी

चिप्स (छत्तीसगढ़ इंफोटेक एंड बायोटेक प्रोमोशन सोसायटी) उच्चाधिकार प्राप्त परिषद है जो मुख्यमंत्री की अध्यक्षता मेंगठित है और इसका कार्य राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करना है। ई-शासन की सारी नागरिक सेवाएं ‘चॉइस’ (छत्तीसगढ़ ऑनलाइन इंफॉर्मेशन फॉर सिटीजन एंपावरमेंट) नामक परियोजना के अंतर्गत हैं। छत्तीसगढ़ को, नागरिकों की बेहतरी के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके तैयार की गई मानव विकास रिपोर्ट के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम पुरस्कार, 2007 मिला है।

खनिज संसाधन

छत्तीसगढ़ में आग्नेय, कायांतरित और तलछटी क्षेत्रों में अनेक प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। कोयला, कच्चा लोहा, चूना पत्थर, बॉक्साइट, डोलोमाइट तथा टिन के विशाल भंडार राज्य के विभिन्न हिस्सों में हैं। रायपुर ज़िले में डाइमंडीफैरस किंबरलाइट्स में से बहुत मात्रा में हीरा प्राप्त किया जाता हैं। इसके अलावा सोना, आधार धातुओं, बिल्लौरी पत्थर, चिकना पत्थर, सेटाइट, फ्लूरोराइट, कोरूंडम, ग्रेफाइट, लेपिडोलाइट, उचित आकार की एम्लीगोनाइट के विशाल भंडार मिलने की संभावना है। राज्य में देश के कुल उत्पादन का 20 प्रतिशत इस्पात और सीमेंट का उत्पादन किया जाता है। कच्चे टिन का उत्पादन करने वाला यह देश का एकमात्र राज्य है। यहाँ खनिज संसाधनों से उत्खनन, खनिज आधारित उद्योग लगाने और रोज़गार के अवसर बढ़ाने की अपार क्षमता है। छत्तीसगढ़ विश्व का सबसे अधिक किंबरलाइट भंडार का क्षेत्र है।

सिंचाई और बिजली

जब यह राज्य अस्तित्व में आया तब यहाँ कुल सिंचाई क्षमता 13.28 लाख हेक्टेयर (1 नवम्बर 2000 के अनुसार) थी। दो वर्ष और नौ माह बाद 1.25 लाख हेक्टेयर की अतिरिक्त क्षमता का सृजन किया गया। प्रमुख रूप से पूरी की गई परियोजनाएं हैं तंडुला, कोदार और पेयरी। हसदेव, महानदी रिजर्वायर परियोजना, सोंधुर और जोंक कुछ अन्य परियोजनाएं हैं। राज्य बिजली बोर्ड की कुल क्षमता 1,68,1.05 मेगावाट है, जिसमें से 1,260 मेगावाट तापबिजली और शेष पनबिजली है। राज्य बिजली बोर्ड ने कोरबा में 500 मेगावाट की अतिरिक्त स्थापित उत्पादन क्षमता (2x250 मेगावाट यूनिट) बढ़ाई है। निजी क्षेत्र को बिजलीघर बनाने और उसे राज्य से बाहर बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। राज्य के कुल 19,270 बसे हुए गांवों में से 93 प्रतिशत गांवों में बिजली पहुंचाई जा चुकी है।

छत्तीसगढ़ में सिंचाई सुविधा में बढ़ोतरी करने के लिए यहाँ के दो बड़े जलाशयों को लंबी नहर से जोड़ा जाएगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राज्य के दो प्रमुख सिंचाई जलाशयों धमतरी ज़िले के गंगरेल स्थित रविशंकर जलाशय और दुर्ग ज़िले के तांदुला जलाशय को लगभग 60 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए आपस में जोडऩे की प्रस्तावित योजना के लिए सर्वेक्षण की स्वीकृति प्रदान कर दी। जल संसाधन विभाग ने गंगरेल-तांदुला जलाशय लिंक परियोजना के लिए सर्वेक्षण शुरू करा दिया है। प्रस्तावित नहर के निर्माण में लगभग 250 करोड़ रुपये की लागत संभावित है, जबकि इसके बन जाने पर दुर्ग ज़िले में तांदुला जलाशय के कमांड क्षेत्र में किसानों को लगभग 30,000 हेक्टेयर के रकबे में खरीफ के दौरान सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी दिया जा सकेगा।[6]

परिवहन

चित्रकोट जलप्रपात, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ देश के अन्य भागों से सड़क, रेल और वायुमार्ग से भलीभांति जुड़ा है।

सड़क मार्ग

रेल मार्ग

हवाई मार्ग

सांस्कृतिक जीवन

त्योहार

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध त्योहार हैं- पोला, नवाखाई, दशहरा, दीपावली, होली, गोवर्धन पूजा को बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।

पर्यटन स्थल

जंगल, पहाड़, पाताल भेदी झरनों के साथ-साथ प्राकृतिक सौन्दर्य शौकीनों के लिए छत्तीसगढ़ में बहुत कुछ है। राज्य की इसी ख़ासियत को लेकर ईयर एंड वेकेशंस के लिए राज्य का पर्यटन विभाग कई योजनाएँ चला रहा है। राज्य में 3 राष्ट्रीय पार्क और 11 वाइल्ड लाइफ़ सेंचुरी हैं। जहाँ विंटर सीजन के लिए जंगल सफारी और कैंपिंग सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ राज्य में कांकेर घाटी, अचानकमार, बारनवापारा और चित्रकोट, मैनपाट जैसे स्थल एडवेंचर के लिए विकसित किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में पहाड़ी मैना को राजकीय पक्षी का गौरव प्रदान किया गया है। बारनवापारा राज्य का प्रथम पक्षी विहार था, जिसे ब्रिटिशकाल में विकसित किया गया था। राज्य में पैरासेलिंग, पैराग्लाइडिंग, पैपलिंग, रॉक क्लाइंबिंग और वॉटर स्पोट्र्स जैसी सुविधाओं की भी तैयारी की जा रही है।

जलप्रपात

अमृतधारा जलप्रपात कोरिया का एक प्राकृतिक झरना है, जो हसदो नदी पर स्थित है। छत्तीसगढ़ में कोरिया भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान एक रियासत थी। पूरे भारत में कोरिया को प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह जगह पूरे घने जंगलों, पहाड़ों, नदियों और झरनों से भरी पड़ी है। अमृतधारा जलप्रपात कोरिया में सबसे प्रसिद्ध झरनो मे से एक है। कोरिया मे अमृतधारा झरना, एक बहुत ही शुभ शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस जगह के आसपास एक बहुत प्रसिद्ध मेला हर साल आयोजित किया जाता है। मेले का आयोजन रामानुज प्रताप सिंह जूदेव, जो कोरिया राज्य के राजा थे, ने वर्ष 1936 में किया गया था। महाशिवरात्रि के उत्सव के दौरान इस जगह मे मेले का आयोजन होता है, जिस दौरान यहाँ लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उपस्थित होती है।

छत्तीसगढ़ के जशपुर ज़िले से 15 किमी. दूर 'रानीदाह जलप्रपात' स्थित है। मान्यता है कि उड़ीसा की किसी रानी ने यहाँ कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इसीलिए इसका नाम रानीदाह पड़ा। रानीदाह के निकट महाकलेश्वर मंदिर स्थित है। रानीदाह जलप्रपात से एक किमी. दूर दक्षिण में ऐतिहासिक स्थल पंचभैया प्राचीन शिवमंदिर है। इस जलप्रताप से आगे बिहार की रामरेखा की प्रसिध्द गुफाएँ एवं प्राचीन मंदिर जाने का मार्ग है। इसलिए रानीदाह का इस राज्य में विशेष महत्त्व है। बिलासपुर में रतनपुर का महामाया मंदिर, डूंगरगढ में बंबलेश्वरी देवी मंदिर, दांतेवाडा में दंतेश्वरी देवी मंदिर और छठी से दसवीं शताब्दी में बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा सिरपुर भी महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं। महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्मस्थान चंपारण, खूटाघाट जल प्रपात, मल्लाहार में डिंडनेश्वरी देवी मंदिर, अचानकमार अभयारण्य, रायपुर के पास उदंति अभयारण्य, कोरबा ज़िले में पाली और कंडई जल प्रपात भी पर्यटकों के मनपसंद स्थल हैं। खरोड जंजगीर चंपा का साबरी मंदिर, शिवरीनारायण का नरनारायण मंदिर, रंजिम का राजीव लोचन और कुलेश्वर मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर और जंजगीर का विष्णु मंदिर महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 2011 की जनगणना के अनुसार
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 2.4 2.5 मुखपृष्ठ (अंग्रेज़ी) (एच.टी.एम.एल) छत्तीसगढ़ की आधिकारिक वेबसाइट। अभिगमन तिथि: 14 जुलाई, 2014।
  3. विभाजन से पूर्व
  4. केशरवानी, प्रो. अश्विनी। मट और महंत परंपरा (हिन्दी) (एच.टी.मल.एल.)। । अभिगमन तिथि: 14 जनवरी, 2012।
  5. 39,114 वर्ग किमी.
  6. नदियां न सही जलाशयों को ही जोड़ा जाएगा (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 15 जनवरी, 2012।

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