जपुजी  

जपुजी सिक्ख धर्म का प्रसिद्ध नित्यपाठ का ग्रंथ है। इसमें पद्य एवं भजनों का संग्रह है। 'जपजी' का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है, जो हिन्दुओं के लिए 'गीता' का है। इस ग्रंथ में संग्रहित पदों को गुरु नानक ने भगवान की स्तुति एवं अपने अनुयायियों की दैनिक प्रार्थना के लिए रचा था। गुरु अर्जुन देव ने अपने कुछ भजनों को इसमें जोड़ा था। 'जपुजी' सिक्खों की पाँच प्रार्थना पुस्तकों में से प्रथम है तथा प्रात:कालीन प्रार्थना के लिए व्यवहृत होता है।

सूत्रमयी दार्शनिक वाणी

आदिगुरु श्री गुरुग्रंथ साहब की मूलवाणी 'जपुजी' गुरु नानकदेव द्वारा जनकल्याण हेतु उच्चारित की गई अमृतमयी वाणी है। 'जपुजी' एक विशुद्ध एक सूत्रमयी दार्शनिक वाणी है। उसमें महत्त्वपूर्ण दार्शनिक सत्यों को सुंदर अर्थपूर्ण और संक्षिप्त भाषा में काव्यात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। इसमें ब्रह्मज्ञान का अलौकिक ज्ञान प्रकाश है। इसका दिव्य दर्शन मानव जीवन का चिंतन है। इस वाणी में धर्म के सत्य, शाश्वत मूल्यों को मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। अतः इस महान् कृति की व्याख्या करना तो दूर इसे समझना भी आसान नहीं है। लेकिन जो इसमें प्रयुक्त भाषाओं को जानते हैं, उनके लिए इसका चिंतन, मनन करना उदात्तकारी एवं उदर्वोमुखी है। यह एक पहली धार्मिक और रहस्यवादी रचना है और आध्यात्मिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में इसका अत्यधिक महत्व महान् है।[1]

वृतांत

गुरु नानक की जन्म साखियों में इस बात का उल्लेख है कि जब गुरुजी सुल्तानपुर में रहते थे, तो वे प्रतिदिन निकटवर्ती वैई नदी में स्नान करने के लिए जाया करते थे। जब वे 27 वर्ष के थे, तब एक दिन प्रातःकाल वे नदी में स्नान करने के लिए गए और तीन दिन तक नदी में समाधिस्थ रहे। वृतांत में कहा गया है कि इस समय गुरुजी को ईश्वर का साक्षात्कार हुआ था। उन पर ईश्वर की कृपा हुई थी और देवी अनुकम्पा के प्रतीक रूप में ईश्वर ने गुरुजी को एक अमृत का प्याला प्रदान किया थ। वृतांतों में इस बात की साक्षी मौजूद है कि इस अलौकिक अनुभव की प्रेरणा से गुरुजी ने मूलमंत्र का उच्चारण किया था, जिससे 'जपुजी साहिब' का आरंभ होता है।

'जपुजी' का प्रारंभिक शब्द एक ओमकारी बीज मंत्र है, जैसे उपनिषदों और गीता में 'ओम' शब्द बीज मंत्र है।

'एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ,
निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि'

विभाजन

समस्त 'जपुजी' को मोटे तौर पर चार भागों में विभक्त किया गया है-

  1. पहले सात पद
  2. अगले बीस पद
  3. बाद के चार पद
  4. शेष सात पद

पहले सात पदों में अध्यात्म की खोजी जीवात्मा की समस्या को समझाया गया है। अगला भाग पाठकों को उत्तरोत्तर साधन पथ की ओर अग्रसर करता जाता है, जब तक कि जीवात्मा को महान् सत्य का साक्षात्कार नहीं हो जाता। तीसरे भाग में ऐसे व्यक्ति के मानसिक रुझानों और दृष्टि का वर्णन किया है, जिसने कि अध्यात्म का आस्वाद चख लिया हो। अंतिम भाग में समस्त साधना का सार प्रस्तुत किया गया है, जो स्वयं में अत्यधिक मूल्यवान है, क्योंकि इस भाग में सत्य और शाश्वत सत्य, साधना पथ की ओर उन्मुख मननशील आत्मा का आध्यात्मिक विकास के चरणों का प्रत्यक्ष वर्णन किया गया है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 आलौकिक कृति, जपुजी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 18 दिसम्बर, 2012।

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