डेंगू  

डेंगू
एडीज मच्छर
विवरण 'डेंगू' एक जानलेवा संक्रामक गम्भीर रोग है। यह रोग एक वायरस द्वारा होता है, इसे "डेन वायरस" कहते हैं।
अन्य नाम 'डेंगी', 'डेंगू बुख़ार', 'डेंगू फीवर', 'डेंगू ज्वर' तथा 'हड्डी तोड़ बुख़ार'
डेंगू वायरस के प्रकार 'डेन-1', 'डेन-2', 'डेन-3' और 'डेन-4'[1]
मुख्य लक्षण मुख्य तीन लक्षण हैं-
  • तीव्र बुख़ार
  • जोड़ों, मांसपेशियों और शरीर में दर्द
  • चिड़चिड़ापन तथा सिर दर्द
वाहक इस रोग के वाहक 'एड़ीज मच्छर' की दो प्रजातियां हैं- 'एडीज एजिपटाई'[2] तथा 'एडीज एल्बोपेक्टस'
विशेष डेंगू की जांच हेतु रक्त के नमूने 'राष्ट्रीय संचारी रोग संस्थान', दिल्ली तथा 'राष्ट्रीय विषाणु रोग संस्थान' पुणे भेजे जाते हैं, वहीं उनकी जांच होती है। आजकल जांच हेतु 'रेपिड डाइग्नोस्टिक किट' भी उपलब्ध हैं।
अन्य जानकारी मलेरिया की तरह डेंगू बुख़ार भी मच्छरों के काटने से फैलता है। डेंगू सभी मच्छर से नहीं फैलता। यह केवल कुछ जाति के मच्छर से ही फैलता है।

डेंगू (अंग्रेज़ी: Dengue) अथवा 'डेंगी' / 'डेंगू बुख़ार' / 'डेंगू फीवर' / 'डेंगू ज्वर' एक ख़तरनाक संक्रामक रोग है। आम भाषा में इस बीमारी को "हड्डी तोड़ बुख़ार" कहा जाता है, क्योंकि इसके कारण शरीर व जोड़ों में बहुत दर्द होता है। डेंगू के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाने तथा इसके प्रति सचेत रहने के लिए ही प्रतिवर्ष '10 अगस्त' को 'डेंगू निरोधक दिवस' मनाया जाता है।

डेंगू के लक्षण

डेंगू के मुख्य लक्षण हैं- तीव्र बुख़ार, जोड़ों में मांसपेशियों में और शरीर दर्द, चिड़चिड़ापन तथा सिर दर्द। यह एड़ीज मच्छर के काटने से होने वाला एक तीव्र वायरल इन्फेक्शन है। इससे शरीर की सामान्य क्लॉटिंग (थक्का जमना) की प्रक्रिया अव्यवस्थित हो जाती है। ऐसी अवस्था प्लेटलेट के बहुतायत में नष्ट होने के कारण होती है। इससे कभी-कभी घातक रूप में सारे शरीर में रक्तस्राव होने लगता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसे महामारी के रूप में देखा जाता है। वयस्कों के मुक़ाबले, बच्चों में इस बीमारी की तीव्रता अधिक होती है। यह बीमारी यूरोप महाद्वीप को छोड़कर पूरे विश्व में होती है तथा काफ़ी लोगों को प्रभावित करती है। डेंगू की स्थिति में मृत्युदर लगभग एक प्रतिशत है। यह बरसात के मौसम में तेज़ी से फैलता है। आपको या आपके पड़ोसी को अगर डेंगू बुख़ार हो जाता है, तो इससे बचने के उपाय अपनायें। सबसे पहले रक्तजांच करायें और अपने आसपास मच्छरों से सुरक्षा के उपाय अपनायें। साधारणतः गर्मी के मौसम में यह रोग महामारी का रूप ले लेता है जब मच्छरों की जनसंख्या अपने चरम सीमा पर होती है। डेंगू एशिया, अफ़्रीका, दक्षिण तथा मध्य अमेरिका के कई उष्ण तथा उपोष्ण क्षेत्रों में होता है।[3]

कारण

यह "डेंगू" वायरस द्वारा होता है इसे "डेन वायरस" भी कहते हैं। डेंगू वायरस चार मुख्य प्रकार के होते हैं, जैसे कि डेन-1, डेन-2, डेन-3 और डेन-4 (DEN-1, DEN-2, DEN-3, DEN-4)। ये फ्लैवि वायरस गण तथा फ्लेविविराइड परिवार के होते हैं, बहुधा उन्हीं क्षेत्रों में फैलता है जिनमें मलेरिया फैलता है, किंतु मलेरिया से पृथकता यह है कि यह शहरी क्षेत्र में फैलता है जिनमें सिंगापुर, ताइवान, इण्डोनेशिया, फिलीपींस, भारत तथा ब्राज़ील भी शामिल है, प्रत्येक विषाणु इतना भिन्न होता है किसी एक से संक्रमण के बाद भी अन्य के विरुद्ध सुरक्षा नहीं मिलती है, तथा जहाँ यह महामारी रूप में फैलता है वहाँ एक समय में अनेक प्रकार के विषाणु सक्रिय हो सकते हैं, ये उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में तथा अफ़्रीका में मिलते हैं, ये चार प्रकार के निकटता से जुड़े [विषाणु]] से होते हैं। डेंगू बुख़ार से पीड़ित रोगी के रक्त में डेंगू वायरस काफ़ी मात्रा में होता है। डेंगू बुख़ार से पीड़ित रोगी के रक्त में डेंगू विषाणु प्रवेश कर प्लेटलेट पर आक्रमण करता है। प्लेटलेट शरीर में रक्तस्राव रोकने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। शरीर में प्लेटलेट की संख्या चिंताजनक स्तर तक गिर जाती है। इससे असामान्य रक्तस्राव हो सकता है, जो कि चमड़ी, आमाशय, आंत्रों और शरीर के अन्य रन्ध्रों से होता है। एक छोटी चोट लगने पर भी बहुत तेज़ रक्तस्राव होने लगता है, क्योंकि रक्त क्लॉट (जमने) नहीं हो पाता।[4]

डेंगू का वाहक 'एडीज एजिपटाई'

प्रसार

मलेरिया की तरह डेंगू बुख़ार भी मच्छरों के काटने से फैलता है। डेंगू सभी मच्छर से नहीं फैलता है। यह केवल कुछ जाति के मच्छर से फैलता है। इस रोग का वाहक एड़ीज मच्छर की दो प्रजातियां हैं- एडीज एजिपटाई (Aedes aegypti) तथा एडीज एल्बोपेक्टस के नाम से जाने जाते हैं। जो काफ़ी ढीठ व और दुस्साहसी मच्छर हैं और दिन में भी काटते हैं। मच्छर के शरीर में एक बार वायरस के पहुंचने के पश्चात् यह पूरी ज़िन्दगी बीमारी फैलाने में समक्ष होता है। डेंगू बुख़ार उस मच्छर के काटने से होता है जिसने पहले से ही किसी डेंगू के मरीज़ को काटा है। यह मच्छर बरसात के मौसम में ज़्यादा फैलते हैं और यह उन जगहों पर तेज़ी से फैलते हैं जहाँ पानी जमा हो। डेंगू का वायरस स्वाइन फ्लू की तरह संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से नहीं फैलता। यह मच्छर के माध्यम से ही फैलता है। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता, अगर किसी को डेंगू की बीमारी है, और एडीज मच्छर उस मरीज़ से ख़ून पीता है, तो मच्छर में डेंगू वायरस युक्त ख़ून चला जाता है। फिर जब एक सप्ताह में किसी स्वस्थ व्यक्ति को यह मच्छर काटता है, तो डेंगू का वायरस उसमें चला जाता है। मच्छर को वेक्टर (vector) कहते हैं और इस प्रकार से फैलने वाले बीमारी को वेक्टर बोर्न डिसईज़ (vector borne disease) कहते हैं। डेंगू उन लोगों को जल्दी प्रभावित करता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। यह भी हो सकता है कि डेंगू बुख़ार एक ही व्यक्ति को कई बार हो जाये। लेकिन ऐसी स्‍थिति में बुख़ार के प्रकार भिन्न होंगे।

एड़ीज मच्छर

एड़ीज मच्छर

एड़ीज मादा मच्छर साफ़ पानी में अण्डे देती है, अण्डे से एक कीड़ा निकलता है, जिसे लार्वा कहते हैं, लार्वा से प्यूपा बनता है एवं फिर मच्छर बन जाता है। लार्वा व प्यूपा अवस्था पानी में रहते हैं और मच्छर पानी के बाहर रहता हैं। अण्डे से मच्छर बनने में क़रीब एक सप्ताह का समय लगता हैं। मच्छर का जीवनकाल क़रीब तीन सप्ताह का होता है। एड़ीज मच्छर काले रंग का होता है, जिस पर सफ़ेद धब्बे बने होते हैं, इसे टाइगर मच्छर भी कहा जाता हैं। ख़ास बात यह है कि डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर गंदे पानी की बजाय साफ़ पानी में पनपता है। ये मच्छर ऐसे स्वच्छ पानी में जहाँ कई दिनों से हलचल न हो, उस स्थान पर ब्रीड करते हैं। पानी के पुराने टैंकों में पानी की सतह पर बड़ी संख्या में लार्वा देखे जा सकते हैं। जल संकाय, मछली के खुले टैंक, साफ़ झील आदि, बरसात और बाढ़ में महामारी के बड़े स्रोत होते हैं तथा बरसात में गमलों, कूलरों, पानी के ड्रम, पुराने ट्यूब या टायर, फूटे मटके जानवरों के पीने की हौद आदि में एकत्रित हुए पानी में यह मच्छर ज़्यादा पाया जाता है।[5]

संक्रामक काल

जिस दिन डेंगू वायरस से संक्रमित कोई मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो उसके लगभग 3-5 दिनों बाद ऐसे व्यक्ति में डेंगू बुख़ार के लक्षण प्रकट हो सकते हैं। यह संक्रामक काल 3-10 दिनों तक भी हो सकता है।

प्रकार

एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में सिर्फ़ एक बार ही किसी ख़ास प्रकार के डेंगू से संक्रमित होता है। डेंगू बुख़ार तीन प्रकार के होते हैं तथा लक्षण इस बात पर निर्भर करेंगे कि डेंगू बुख़ार किस प्रकार है-

  • क्लासिकल (साधारण) डेंगू बुख़ार
  • डेंगू हॅमरेजिक बुख़ार (डीएचएफ)
  • डेंगू शॉक सिंड्रोम (डीएसएस)

क्लासिकल डेंगू साधारण प्रकार का डेंगू है, यह एक स्वयं ठीक होने वाली बीमारी है तथा इससे मृत्यु नहीं होती है अगर इसका सही उपचार नहीं हुआ तो यह बुख़ार (1) डेंगू हेमोरेजिक फीवर, (2) डेंगू शॉक सिंड्रोम में बदल जाता है, जिससे मरीज़ की जान भी जा सकती है। इसलिए यह पहचानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि बीमारी का स्तर का क्या है। जब यह बीमारी गंभीर हो जाता है, तो मरीज़ में विभिन्न जगहों से ख़ून बहने लगता है इसका इलाज, अस्पताल में तुरंत होना चाहिये।

लक्षण

डेंगू बुख़ार के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि बुख़ार किस प्रकार है। डेंगू का एक से अधिक लक्षण होता है। अगर आपको नीचे लिखे हुये लक्षण में से कुछ भी है, जो साधारण दवा से ठीक नहीं हो रहा है, तो डॉक्टर से दिखाने अवश्य जायें। सामान्यत: डेंगू बुख़ार के लक्षण कुछ ऐसे होते हैं-

  • डेंगू बुख़ार होने पर रोगी को अचानक बिना खांसी व जुकाम के तथा ठंड व कपकंपी के साथ अचानक तेज़ बुख़ार चढ़ना। रोगी को हर समय बुख़ार 103 से 105 डिग्री तक बना रहता है। डेंगू बुख़ार दो से चार दिनों तक रहता है। दवा उपचार पर भी कम न होना।
डेंगू बुख़ार के लक्षण
  • रोगी के सिर के अगले हिस्से में तेज़ दर्द होता है, आंख के पिछले भाग में दर्द होता है, कमर, मांसपेशियों तथा जोड़ों में दर्द होना।
  • अत्यधिक कमज़ोरी लगना, भूख में बेहद कमी तथा जी मितलाना।
  • मुँह का स्वाद ख़राब होना, पेट ख़राब हो जाना, उसमें दर्द होना, उल्टी-दस्त की शिकायत होना।
  • गले में हल्का सा दर्द होना, हल्की खाँसी व गले में खराश होना।
  • ब्लड प्रेशर का सामान्य से बहुत कम हो जाना। निरंतर चक्कर आना।
  • रोगी बेहद दुःखी व बीमार महसूस करता है। रोशनी से चिड़चिड़ाहट होना।
  • शरीर पर लाल-गुलाबी चकते (रैश / रैशेज़) बन जाते हैं जो सबसे पहले पैरों पर, फिर छाती पर तथा कभी-कभी सारे शरीर पर फैल जाते हैं। चेहरे, गर्दन तथा छाती पर विसरित दानों की तरह के ददोरे हो सकते हैं। बाद में ये ददोरे और भी स्पष्ट हो जाते हैं। हाथ पैर में चकत्ते होना, विशेषकर दबे भागों में, ख़ून बहना या ख़ून के चकत्ते होना, शरीर के उभरे चकत्तों से ख़ून रिसता है। शरीर पर दाने इस बुख़ार में दो बार भी दिखाई दे सकते हैं। पहली बार शुरू के दो-तीन दिनों में और दूसरी बार छठे या सातवें दिन। इस बुख़ार का मरीज़ क़रीब 15 दिनों में पूरी तरह ठीक होता है। यह बुख़ार बच्चों व बड़ी आयु के लोगों में ज़्यादा खतरनाक होता है।
  • एक सप्ताह तक रोगी को पसीना, दस्त, नकसीर (नाक से ख़ून आना) आने लगती है। अगर यह बुख़ार ज़्यादा बढ़ जाता है तो रोगी के कान में दर्द और सूजन तथा फेफड़ों में सूजन आ जाती है।
  • गंभीर रोगियों में पहले केवल वमन फिर ताजा रक्त या कॉफी के रंग का वमन होता है। मल भी गहरा भूरा या काला होता है। साथ-साथ मसूड़ों से अथवा आंतों से रक्तस्त्राव का होना अथवा ख़ून में प्लेटलेट्स का कम होना लक्षण पाये जायें तो यह गंभीर प्रकार का डेंगू बुख़ार हो सकता है जो घातक हो सकता है। इसमें तत्काल इलाज लेना चाहिए।
  • हीमोरैजिक रक्तस्राव के समय के लक्षण कुछ इस प्रकार हैं- ज्वर बहुत तेज़ हो जाता है, लगातार पेट में तेज़ दर्द रहना, त्वचा ठंड़ी, पीली व चिपचिपी होना, रोगी के चेहरे और हाथ-पैरों पर लाल दाने हो जाते हैं। हीमोरैजिक डेंगू होने पर शरीर के अन्दरूनी अंगों से ख़ून आने लगता है। नाक, मुंह व मल के रास्ते ख़ून आता है जिससे कई बार रोगी बेहोश हो जाता है। ख़ून के बिना या ख़ून के साथ बार-बार उल्टी, नींद के साथ व्याकुलता, लगातार चिल्लाना, अधिक प्यास का लगना या मुंह का बार-बार सूखना आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं। हीमोरैजिक डेंगू अधिक ख़तरनाक होता है और डेंगू बुख़ार साधारण बुख़ार से काफ़ी मिलता-जुलता होता है। रक्त की कमी हो जाती है, थ्रोम्बोसाटोपेनिया हो जाता है, कुछ मामलों डेंगू प्रघात की दशा [डेंगू शोक सिंड्रोम] आ जाती है जिसमें मृत्यु दर बहुत ऊँची होती है।
    डेंगू वायरस
  • कुछ मामलों में लक्षण हल्के होते हैं जैसे- चकते ना पड़ना, जिसके चलते इसे इंफ्लूएंजा का प्रकोप मान लिया जाता है या कोई अन्य विषाणु संक्रमण, यदि कोई व्यक्ति प्रभावित क्षेत्र से आया हो और इसे नवीन क्षेत्र में ले गया हो तो बीमारी की पहचान ही नहीं हो पाती है रोगी यह रोग केवल मच्छर या रक्त के द्वारा दूसरे को दे सकता है वह भी केवल तब जब वह रोग ग्रस्त हो।

पहचान

डेंगू की पहचान प्राय इन लक्षणों के आधार पर डाक्टर करते हैं, बहुत ऊँचा ज्वर जिसका कोई अन्य स्थानीय कारण समझ नहीं आये, सारे शरीर पे चकते पड़ जाना, रक्त में प्लेटलेटस की संख्या कम हो जाना।

1. ज्वर, ब्लेडर की समस्या, लगातार सिर दर्द, चक्कर आना, भूख ना लगना
2. रक्तस्त्राव की प्रवृत्ति [टोर्नक्विट परीक्षण सकारात्मक आना, खुद ब खुद छिल जाना, नाक, कान से, टीका लगाने के स्थान से ख़ून रिसना, ख़ूनी दस्त लगना और ख़ून की उल्टी आना]
3. ख़ून में प्लेटलेटस की संख्या कम होना (प्रतिघन सेमी रक्त में <100,000 से कम होना)
4. प्लाज्मा रिसाव होने के साक्ष्य मिलना (हेमोट्रोक्रिट में 20% से ज़्यादा वृद्धि या हीमाट्रोक्रिट में 20% से ज़्यादा गिरावट)

  • डेंगू शॉक सिंड्रोम को परिभाषित किया गया है-

1. कमज़ोर नब्ज चलना
2. नब्ज का दबाव कम होना (20 मिमी एच.जी दबाव से कम)
3. ठण्ड, व्यग्रता
सीरोलोजी तथा पोलिमर चेन रिक्शन के अध्ययन उपलब्ध है जिनके आधार पर डेंगू की पुष्टि की जा सकती है यदि चिकित्सक लक्षण पाकर इसका संदेह व्यक्त करे।

उपचार

विश्व में डेंगू

उपचार का मुख्य तरीका सहायक चिकित्सा देना ही है, यदि रोगी को साधारण डेंगू बुख़ार है तो उसका उपचार व देखभाल घर पर भी की जा सकती है तथा यह बीमारी स्वयं ही एक से दो हफ्तों में ठीक हो जाती है। चूँकि यह स्वयं ठीक होने वाला रोग है इसलिए केवल लाक्षणिक उपचार ही चाहिए। डेंगू की शंका होने पर, अपने डाक्टर को दिखलायें। कुछ दवा इस प्रकार से है-

  • खूब सारा आराम करें।
  • मुख से तरल देते रहना क्योंकि अन्यथा जल की कमी हो सकती है, नसों से भी तरल दिया जा सकता है।
  • बुख़ार के लिये पेरासिटामोल (paracetamol) या एसिटाअमिनोफेन (acetaminophen) ले सकते हैं।
  • रोगी को सेलिसिलेट, डिस्प्रीन, एस्प्रीन (aspirin) या गैरस्टेराइड दवाएं कभी ना दें। यह आपको नुक़सान पहुंचा सकता है, जैसे- ख़ून की बीमारी।
  • यदि बुख़ार 102 डिग्री फारेनहाइट से अधिक है तो बुख़ार को कम करने के लिए हाइड्रोथेरेपी (जल चिकित्सा) करें।
  • सामान्य रूप से भोजन देना जारी रखें। बुख़ार की स्थिति में शरीर को अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।
  • संदेहास्पद रोगियों की रक्त परीक्षा करने पर प्लेटलेट की कम सख्या पायी जाती है। हिमोग्लोबिन सामान्य हो सकता है। रक्त का ब्लीडिंग और क्लॉटिंग समय लंबा हो सकता है।
  • डेंगू का सही निदान रक्त परीक्षा में वायरल एंटीजन की उपस्थिति से होता है। डेंगू की सहायात्मक चिकित्सा की जाती है। इस वायरस का कोई ईलाज नहीं है। नष्ट हुए प्लेटलेट की पूर्ति के लिए प्लेटलेट का ट्रान्सफ्यूजन, रक्त और बड़ी मात्रा में अन्तशिरा द्वारा द्रव दिया जाता है। मलेरिया और अन्य इन्फेक्शन की रोकथाम के लिए अतिरिक्त एंटीबायोटिक दिया जाता है। यह निवारणोपचार होता है और हमेशा इसकी आवश्यकता नहीं होती।
  • डेंगू की जांच हेतु रक्त के नमूने राष्ट्रीय संचारी रोग संस्थान, दिल्ली तथा राष्ट्रीय विषाणु रोग संस्थान पुणे भेजे जाते हैं, वहीं उनकी जांच होती हैं। आजकल जांच हेतु रेपिड डाइग्नोस्टिक किट भी उपलब्ध हो रहे हैं।
  • बुख़ार होने पर तत्काल चिकित्सक से सम्पर्क किया जाना चाहिये। डेंगू बुख़ार एक वायरस की वजह से होता है एवं वायरस का वर्तमान में कोई इलाज नहीं निकलता है, न ही इस बीमारी के अभी तक टीके इजाद हुए हैं, इसलिए मरीज़ में बीमारी के जो-जो लक्षण दिखाई देते हैं, उसी के अनुसार मरीज़ को उपचार किया जाता है। सामान्यत: 80 से 90 प्रतिशत मरीज़ 5 से 7 दिनों में स्वस्थ हो जाते हैं। यदि हेमोरेजिक डेंगू फीवर होता है तो वह घातक हो सकता है। इसके एक बार से ज़्यादा होने की संभावना रहती है अत: सावधानी बरतें।

बचाव

डेंगू से बचाव

डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों की आबादी पर काबू करना है। इसके लिए या लार्वा पर नियंत्रण करें या वयस्क मच्छरों की आबादी पर। मच्छर एक छोटा-सा जीव है परन्तु यह मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी गंभीर बीमारियां फैला सकता है। मलेरिया का मच्छर गंदे पानी में पनपता है इसके विपरीत डेंगू के मच्छर साफ, इकट्ठे पानी में पनपते हैं, डेंगू से बचने के लिए सबसे ज़रूरी है मच्छरों से बचना जिनसे कि डेंगू का वायरस फैलता है। मच्छर पानी में अंडा देकर और मच्छर फैलाते हैं। यह जीवनचक्र क़रीब 1 हफ्ते में पूरा होता है। इसका मतलब है कि, अगर कोई रोकने का उपाय न किया गया तो हर हफ्ता, मच्छर की तादाद दौगुना होती जाएगी। इससे मच्छरों से फैलने वाले बीमारियाँ भी अधिक होंगी। डेंगू को रोकने के लिये आपको अपने घर और मोहल्ले में मच्छर को कम करना होगा। ये मच्छर आपके घर के अंदर और आस-पास जमा हुये पानी में पैदा होते हैं। मच्छरों के पैदा होने से रोकने के लिये ऐसे क्षेत्र जहाँ डेंगू फैल रहा है, वहाँ पानी को जमा ना होने दें। अपने घर के अंदर और आस-पास कहीं पानी को जमा न होने दें। आस-पास के गड्ढों, सड़कों को जहाँ पानी जमा हो सकता है, भर दें। कचरे, अनुपयोगी सामानों को हटा दें अथवा नष्ट कर दें। एयर कूलर, ड्रम, फूलदान, पौधों के गमलों, पक्षियों के नहाने के स्थान हर सप्ताह ख़ाली करके सुखाएं। कुएं, तालाबों, पानी के बड़े पूल में मच्छरों का लार्वा खाने वाले गमबूशिया मछली छोड़ें। बरसात में या ऐसे क्षेत्रों में जहां मच्छर हों वहां मच्छरों से बचने का हर संभव प्रयास करें। आप जिस क्षेत्र में रह रहे हैं वहाँ मच्छर अधिक हैं तो मास्कीटो रिपेलेंट का प्रयोग ज़रूर करें। अपने घर, बच्चों के स्कूल और अॉफिस की साफ़ सफाई पर भी नज़र रखें। नाली को बहता रहना चाहिये। डेंगू का मच्छर दिन के समय ही काटता है इसलिए दिन में अपने आपको मच्छरों से बचाएँ। बरसात के समय फुल बाहों वाली शर्ट और जूते ज़रूर पहनें। मच्छरों के काटने से बचने के लिए कई उपाय किये जा सकते हैं, जैसे सफ़ेद या हल्के रंगा का पूरे बांह वाले कपडे़ पहने, जिससे कि आप अपने शरीर को पूरे तरह से ढक सकें, सोते समय जहां अधिक मच्छर हैं, वहां रात को कीटनाशक उपचारित मच्छरदानी का उपयोग करें। कभी-कभार मच्छर मारने वाले दवा उन जगहों पर मच्छर पर असर नहीं करता है, नीम की पत्ती का धुंआ घर में कर सकते हैं, खिड़की और दरवाज़े में जाली लगा कर रखना चाहिये। दोपहर के बाद, खिड़की और दरवाज़े को बंद रखें, कि मच्छर का आना-जाना कम हो। कोई भी बरतन में खुले में पानी न जमने दें। बतरन को ख़ाली करके रखें या उलट कर रखें। अगर आप किसी बरतन, बाल्टी, ड्रम, इत्यादि में पानी जमा करके रखते हैं, तो उसे ढक कर रखें। अगर किसी चीज़ में पानी रखते हैं, तो उसे साबुन और पानी से धो लिया करें, कि उस में से मच्छर का अंडा को हटाया जा सके। अपने मोहल्ले के लोगों को भी मच्छर को फैलने से रोकने के लिये प्रोत्साहित करें। अपने नगर निगम द्वारा मच्छर मारने वाला दवा छिड़कायें। बरसात के मौसम में और चौकसी बरतें। एक नया तरीका मेसोसाक्लोपस नामक जलीय कीट जो लार्वा भक्षी है को रुके जल में डाल देना है, यह बेहद प्रभावी, सस्ता तथा पर्यावरण मित्र विधि है इसके विरुद्ध मच्छर कभी प्रतिरोधक क्षमता हासिल नहीं कर सकते है किंतु इस हेतु सामुदायिक भागीदारी सक्रिय रूप से चाहिए।

शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के घरों में आजकल पानी का संचय करने की प्रवृत्ति होने से अकसर सभी व्यक्ति घरों में पानी कंटेनर में 5-7 दिन से ज़्यादा रखने लगे हैं। ये कंटेनर हैं- सीमेंट की टंकी, प्लास्टिक की टंकी, पानी का हौद, नांद मटका, घरों में रखे हुऐ फूलदान, जिसमें अकसर पानी प्लांट लगाते हैं, पशुओं के पानी पीने के स्थान, टायर, टूटे, फूटे सामान, जिनमें बारिश का पानी जमा होता रहता है, ऐसी जगहों पर एड़ीज मच्छर पैदा होते हैं। अकसर यह देखते हैं कि ये कंटेनर ढंके हुए नहीं रहते हैं, जिससे इनमें मच्छर पैदा होते रहते हैं, यदि हम इन कंटेनर में भरे हुए पानी को गौर से देखें तो इनमें कुछ कीड़े लार्वा ऊपर नीचे चलते हुए दिखाई देते हैं, ये ही कीड़े मच्छर बनते हैं। अब हमें ज्ञात हैं कि कीड़ों से मच्छर बनते हैं और मच्छर से डेंगू बीमारी फैलती है तो इन कीड़ों का नाश करना बहुत ज़रूरी है। लार्वा पानी में रहते हैं, इसलिये इन सभी कंटेनर में से प्रत्येक सप्ताह में एक बार पानी निकाल देना चाहिए और साफ़ करके फिर से पानी भरना चाहिए। इन सभी कंटेनर को इस प्रकार से ढककर रखना चाहिए कि इनमें मच्छर प्रवेश नहीं कर सकें और अण्डे नहीं दे सकें। ये कीड़े स्पष्ट दिखाई देते हैं, इसलिए इन्हें चाय की छन्नी से भी निकाला जा सकता है। ये कीड़े पानी से बाहर निकलाने के बाद स्वत: मर जाते हैं। इस प्रकार का अभियान अपने घर में चलाकर मच्छरों की उत्पत्ति रोकता है। केरोसिन में मिलाकर छिड़कने से मच्छर नष्ट होते हैं, जो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास उपलब्ध है।

संभावित विषाणु रोधी उपाय
पीत ज्वर की वैक्सीन एक संबन्धित फ्लैवी वायरस के विरुद्ध है उसे डेंगू के विरुद्ध परिवर्तित रूप में प्रयोग करने की सलाह दी जाती है किंतु इस सम्बन्ध में कोई विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। अर्जेन्टीना के एक वैज्ञानिक समूह ने 2006 में विषाणु के प्रजनन तरीके को खोज निकाला है जिसके चलते आशा की जाती है कि उसके विरुद्ध प्रभावी औषधि खोज निकाली जायेगी।

डेंगू महामारी

डेंगू का प्रथम महामारी रूपेण हमला एक साथ एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका में एक साथ 1780 के लगभग हुआ था, इस रोग को 1779 में पहचाना तथा नाम दिया गया था, 1950 के दशक में यह दक्षिण पूर्व एशिया यह निरंतर महामारी रूप में फैलना शुरू हुआ तथा 1975 तक डेंगू हेमरेज ज्वर इन देशों में बाल मृत्यु का प्रधान कारण बन गया है। 1990 के दशक तक डेंगू मलेरिया के पश्चात् मच्छरों द्वारा फैलने वाला दूसरा सबसे बड़ा रोग बन गया जिससे साल भर में 40 मिलियन लोग संक्रमित होते हैं वहीं डेंगू हैमरेज ज्वर के भी हज़ारों मामले सामने आते हैं। फ़रवरी, 2002 में ही जब रियो-डी-जेनेरो में डेंगू के प्रसार हुआ तो 10 लाख लोग इसकी चपेट में आ गये थे जिससे 16 लोग मर गये। मार्च, 2008 तक भी इस शहर में दशा बहुत अच्छी नहीं थी केवल 3 माह में 23,555 मामले और 30 मौतें हुई थीं, लगभग हर पांच से छह साल में डेंगू का बड़ा प्रकोप होता है ऐसा इसलिये होता है कि वार्षिक चक्र जो इस रोग के आते हैं वो रोगियों को कुछ समय हेतु प्रतिरोध क्षमता दे देता है जैसे कि चिकनगुनिया के मामलों में होता है, जब यह प्रतिरोध क्षमता समाप्त हो जाती है तो लोग रोग के प्रति फिर से संवेदनशील हो जाते हैं, फिर डेंगू के चार प्रकार के वायरस होते हैं, इसके अलावा नये लोग जनसंख्या में जन्म या प्रवास के जरिए जुड़ जाते हैं। 1970 के बाद से एस.बी. हेल्सटीड ने एक अध्ययन द्वारा सिद्ध कर दिया है कि डेंगू हैमरेज ज्वर उन रोगियों को ज़्यादा होता है जो द्वितीयक संक्रमण से ग्रस्त हुए हो जो कि प्राथमिक संक्रमण से भिन्न प्रकार के वायरस से होता है। यद्यपि इस धारणा को ठीक से समझा नहीं जा सका है केवल कुछ मॉडल है जो इसके बारे में मत व्यक्त करते हैं, इस दशा को परमसंक्रमण की दशा कहते हैं। सिंगापुर में प्रतिवर्ष इस रोग के 4000-5000 मामले सामने आते हैं यद्यपि आम धारणा यह है कि बहुत से मामले छुपे रह जाते हैं।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. DEN-1, DEN-2, DEN-3, DEN-4
  2. Aedes aegypti
  3. डेंगू बुखार : एक संक्रामक रोग (बचाव) (हिन्दी) (ए.एस.पी) नारद समाचार। अभिगमन तिथि: 9 मार्च, 2011
  4. डेंगू या डेंगी (हिन्दी) (पी.एच.पी) निरोग। अभिगमन तिथि: 9 मार्च, 2011
  5. ये मच्छर जानलेवा है (हिन्दी) (पी.एच.पी) देशबन्धु। अभिगमन तिथि: 9 मार्च, 2011

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=डेंगू&oldid=617342" से लिया गया