डोगरी भाषा  

डोगरी भाषा भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य की दूसरी मुख्य भाषा है। यह भारोपीय भाषा परिवार के भारतीय-आर्य भाषा समूह की सदस्य है। इसका मूल प्राचीन भारतीय-आर्य भाषा समूह और लौकिक संस्कृत में स्थित है। अन्य आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं के समान डोगरी भी विकास के प्राचीन भारतीय-आर्य (संस्कृत) और मध्य भारतीय-आर्य (पालि, प्राकृत और अपभ्रंश) चरणों से गुज़र चुकी है और इसने लगभग 10वीं शताब्दी में आधुनिक भारतीय-आर्य चरण में प्रवेश किया। इसमें ध्वनि संरचना में विकास की तीन स्तरीय प्रक्रिया दिखाई देती है, जो शौरसेनी प्राकृत से इसकी निकटता को प्रदर्शित करती है, लेकिन वैदिक काल से इसके वर्तमान स्वरूप तक विकास के दौरान डोगरी ने सभी चरणों की विशेषताओं को संरक्षित रखा है, जैसा डोगरी शब्द पुत्तर, यानी 'बेटा' (प्राचीन भारतीय-आर्य पुत्र, मध्य भारतीय-पुत्त) में दिखाई देता है।

भाषा

इसकी शब्दावली पर फ़ारसी और अंग्रेज़ी का प्रभाव भी देखा सकता है। डोगरी भाषा पश्चिमोत्तर भारत के पर्वतीय और उपपर्वतीय क्षेत्रों तथा इससे सटे मैदानों में बोली जाती है। यह क्षेत्र उत्तर में पीरपंजाल और धौलाधार पर्वतश्रेणियों, दक्षिण में पंजाब के मैदानों, पूर्व में सतलुज नदी और पश्चिम में मुनव्वर तवी से घिरा हुआ है।

स्वर और व्यंजन

डोगरी भाषा में 10 स्वर और 28 व्यंजन हैं। इस भाषा में कर्मवाच्य और भाववाचक शब्दों की प्रधानता है। उदाहरण के लिए, लिकिआ-'लिखा' और लखोआ-'लिख गया'। डोगरी (डुग्गर) के बारे में सबसे पुराना उल्लेख 1317 ई. में अमीर ख़ुसरो द्वारा लिखित एक मसनवी नूह-शिफ़िर में मिलता है, जैसे- सिंधी ओ लहोरी ओ कश्मीरी ओ डोग्गर।

लिपि

इसकी अपनी लिपि है, जिसे डोगरा अख्खर या डोगरे[1] कहते हैं। इस लिपि में लिखी गई डोगरी, महाराजा रणवीर सिंह (1857-1885) के शासनकाल में जम्मू-कश्मीर की राजभाषा थी, लेकिन नई पीढ़ी ने डोगरी के लिए नागरी लिपि को अपना लिया। लगभग सम्पूर्ण आधुनिक साहित्य की रचना देवनागरी लिपि में ही हुई है और अब भी इसी का उपयोग हो रहा है। डोगरी भाषा को जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान की मान्यता प्राप्त है और इसे विद्यालय तथा विश्वविद्यालय स्तर पर भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है।

डोगरी भाषी क्षेत्र के तीन प्रमुख:-

ये क्षेत्र बोली में अन्तर को प्रदर्शित करते हैं, लेकिन यह देखा गया है कि पश्चिमी पंजाब और पाकिस्तान में डोगरी, कियुंथाली, कंडयाली, भटियाली, सिरमौरी, बगहाती, कुल्लुई, मंडयाली, चंबयाली, कुलहुरी, भदरवाही, गुजरी, रामपुरी, पोगाली, होशियारपुरी-पहाड़ी और लहंदा बोलियाँ बोली जाती हैं। 1981 की भारत की जनगणना के अनुसार डोगरीभाषी लोगों की जनसंख्या लगभग 15 लाख है, लेकिन ऊपर वर्णित तीन भूखण्डों में डोगरीभाषी निवासियों की संख्या अनुमानतः 50 लाख है।

डोगरी की कुछ स्वर विषयक विशेषताएँ:

  • डोगरी में शब्दों के आदि में य तथा घ्वनियाँ नहीं आतीं, इनके स्थान पर ज तथा व घ्वनियाँ उच्चरित होती है।

(पंजाबी) वेहड़ा (आगण) - वेडा (डोगरी)

यजमान (हिन्दी) - जजमान (डोगरी)

यश (हिन्दी) - जस (डोगरी)

  • डोगरी में शब्दों के आदि में का उच्चारण हिन्दी पंजाबी से सर्वथा भिन्न होता है।
  • डोगरी में वर्गों के चतुर्थ वर्णो के उच्चारण में तद्वर्गीय प्रथम अक्षर के साथ हल्की चढ़ती सुर जोड़ी जाती है।
  • ह जब शदों के मध्य में आता है। इसके डोगरी उच्चरण में चढ़ते सुर के स्थान पर उतरते सुर का प्रयोग होता है, जैसे:

हिन्दी डोगरी

पहाड़ प्हाड़ - पा/ड़

मोहर म्होर - मो/र

  • डोगरी के कुछ शब्दों के आदि में तथा का जैसे अनुनासिकों का विशुद्ध उच्चारण मिलता है, जैसे-

हिन्दी - डोगरी

अंगार - ङार

अंगूर - ङूर

अञाणा (पंजाबी) - ञ्याणा

ग्यारह - आरां

  • संस्कृत का जो हिन्दी में लुप्त हो जाता है, डोगरी में प्राय: सुरक्षित है।

संस्कृत - हिन्दी - डोगरी

ग्राम - गाँव - ग्राँ

क्षेत्र - खेत - खेतर

पत्र - पात - पत्तर

स्त्री - तिय, तीमी (पं0) - त्रीम्त

मित्र - मीत - मित्तर

इसी प्रवृत्ति के कारण कई रूपों में का अतिरिक्त आगम भी हुआ है, जैसे-

संस्कृत - हिन्दी - डोगरी

तीक्ष्ण - तीखा - त्रिक्खना

- दौड़ - द्रौड़

पसीना - परसीना, परसा

कोप - कोप - करोपी

धिक् - चिक्कार - घ्रिग

  • डोगरी संश्लेषणात्मक भाषा है। इसी के प्रभाव से इसमें संक्षेपीकरण की असाधारण प्रवृत्ति पाई जाती है। संश्लेषणात्मकता जैसे -

संस्कृत - हिन्दी - डोगरी

अहम् - मैने - में

माम् - मुझको - में

माम् - मुझको - मिगी (ऊ मी)

अस्माभि: - हमने - असें

(हमारे द्वारा)

मह्मम् - मुझे मेरे - तै (गितै) (मेरे लेई पं0)

मत् - मुझसे मेरे - शा (मेरे कोलो-पं0)

मयि - मुझ में - मेरे च (मेरे निच-पं0)

संक्षेपीकरण- जैसे

हिन्दी - पंजाबी - डोगरी

मुझसे नहीं आया जाता -मेरे थीं नई आया जांदा - मेरेशा नि नोंदा(औन हुन्दा)

खाया जाता - खान हुंदा - खनोंदा

  • डोगरी में कर्मवाच्य (तथा भाववाच्य) के क्रियारुपों की प्रवृत्ति पाई जाती है:

खनोंदा - खाया जाता नोग तां - औन होग (पं0) ता

पनोंदा- पिया जाता पजोग - पुज्जन होग उ पहुँच सका तो सनोंदा - सोया जाता

  • डोगरी में वर्णविशर्यय की प्रवृत्ति भी असाधारण रूप से पाई जाती है:

उधार - दुआर

उजाड़ - जुआड़

ताम्र - तरामां

कीचड़ - चिक्कड़ आदि

  • डोगरी में शब्दों के प्रारंभ के लघु स्वर का प्राय: लोप हो जाता है-

अनाज - नाज

अखबार - खबर

इजाजत - जाजत

एतराज - तराज

साहित्य

इस भाषा में मौखिक साहित्य की लम्बी और समृद्ध परम्परा रही है। डोगरा जीवन तथा समाज के सभी आयामों से जुड़े लोकगीतों के अलावा कराक, बार, भाख और गीतडू-कत्थकन्न डोगरी लोककाव्य के विशिष्ट स्वरूप हैं। लिखित डोगरी साहित्य के इतिहास को दो चरणों में विभक्त किया गया है। पहला काल अल्प और अनियमित लेखन का था, जो 16वीं शताब्दी के बाद से 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक रहा। दूसरे काल में इस भाषा में लगातार रचनाएँ हुई और साहित्यिक क्षितिज पर कई प्रख्यात लेखकों का उदय हुआ, जैसे कवि, गल्प लेखक, नाटककार, गद्य लेखक और उल्लेखनीय साहित्यिक आलोचक। डोगरी भाषा का अपना व्याकरण है। डोगरी भाषा और साहित्य, लोकगीत व साहित्य पर शोधकार्य प्रकाशन स्वरूप में भी उपलब्ध है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुराने डोगरे और नामें डोगरे, जो तक्री या तहक्री लिपियों पर आधारित है

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