दानघाटी गोवर्धन  

दानघाटी गोवर्धन
दानघाटी, गोवर्धन
विवरण गिर्राजजी की परिक्रमा हेतु आने वाले लाखों श्रृद्धालु इस मन्दिर में पूजन करके अपनी परिक्रमा प्रारम्भ कर पूर्ण लाभ कमाते हैं। ब्रज में इस मन्दिर की बहुत महत्ता है।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला मथुरा
प्रसिद्धि हिन्दू धार्मिक स्थल
कब जाएँ कभी भी
बस अड्डा गोवर्धन बस अड्डा
यातायात बस, कार, ऑटो आदि
क्या देखें मुखारबिन्द, राधाकुण्ड गोवर्धन, कुसुम सरोवर, जतीपुरा, पूंछरी का लौठा, मानसी गंगा, हरिदेव जी मन्दिर, उद्धव कुण्ड
कहाँ ठहरें होटल तथा धर्मशालाएँ आदि।
संबंधित लेख ब्रज, गोवर्धन, मथुरा, कृष्ण, गोपियाँ, बरसाना, वृन्दावन आदि।
अन्य जानकारी इसी स्थान पर सुबल, मधुमंगल आदि सखाओं के साथ श्रीकृष्ण अपने लाठियों को अड़ाकर बलपूर्वक दान ('टोलटैक्स') माँग रहे थे, गोपियों के साथ उन लोगों की बहुत नोक–झोंक हुई।
अद्यतन‎

दानघाटी का मन्दिर / गिरिराज जी मन्दिर

  • मथुरा–डीग मार्ग पर गोवर्धन में यह मन्दिर स्थित है।
  • गिर्राजजी की परिक्रमा हेतु आने वाले लाखों श्रृद्धालु इस मन्दिर में पूजन करके अपनी परिक्रमा प्रारम्भ कर पूर्ण लाभ कमाते हैं। ब्रज में इस मन्दिर की बहुत महत्ता है।
  • यहाँ अभी भी इस पार से उस पार या उस पार से इस पार करने में टोल टैक्स देना पड़ता है। कृष्णलीला के समय कृष्ण ने दानी बनकर गोपियों से प्रेमकलह कर नोक–झोंक के साथ दानलीला की है।
  • दानकेलि-कौमुदी तथा दानकेलि- चिन्तामणि आदि गौड़ीय गोस्वामियों के ग्रन्थों में इस लीला का रस वर्णन है।

प्रसंग–

किसी समय श्रीभागुरी ऋषि गोविन्द कुण्ड के तट पर भगवत प्रीति के लिए यज्ञ कर रहे थे। दूर–दूर से गोप-गोपियाँ यज्ञ के लिए द्रव्य ला रही थीं। राधिका एवं उनकी सखियाँ भी दानघाटी के उस पार से दधि, दुग्ध, मक्खन तथा दूध से बने हुए विविध प्रकार के रबड़ी आदि द्रव्य ला रही थीं। इसी स्थान पर सुबल, मधुमंगल आदि सखाओं के साथ श्रीकृष्ण अपने लाठियों को अड़ाकर बलपूर्वक दान (टोलटैक्स) माँग रहे थे। गोपियों के साथ उन लोगों की बहुत नोक–झोंक हुई। कृष्ण ने त्रिभंग ललित रूप में खड़े होकर भंगि से कहा- क्या ले जा रही हो?
गोपियाँ– भागुरी ऋषि के यज्ञ के लिए दूध, दही, मक्खन ले जा रही हैं।
मक्खन का नाम सुनते ही मधुमंगल के मुख में पानी भर आया। वह जल्दी से बोल उठा, शीघ्र ही यहाँ का दान देकर आगे बढ़ो।
ललिता– तेवर भरकर बोली– कैसा दान? हमने कभी दान नहीं दिया।
श्रीकृष्ण– यहाँ का दान चुकाकर ही जाना होगा।
श्रीमती जी– आप यहाँ दानी कब से बने? क्या यह आपका बापौती राज्य है ?
श्रीकृष्ण– टेढ़ी बातें मत करो ? मैं वृन्दावन राज्य का राजा वृन्दावनेश्वर हूँ।
श्रीमतीजी– सो, कैसे ?
श्रीकृष्ण– वृन्दा मेरी विवाहिता पत्नी है, पत्नी की सम्पत्ति भी पति की होती है। वृन्दावन वृन्दादेवी का राज्य है, अत: यह मेरा ही राज्य है।
ललिता– अच्छा, हमने कभी भी ऐसा नहीं सुना। अभी वृन्दाजी से पूछ लेते हैं।
तुरन्त ही सखी ने वृन्दा की ओर मुड़कर मुस्कराते हुए पूछा– वृन्दे ! क्या यह 'काला' तुम्हारा पति है?
वृन्दा– (तुनककर) कदापि नहीं, इस झूठे लम्पट से मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। हाँ यह राज्य मेरा था, किन्तु मैंने इसे वृन्दवनेश्वरी राधिकाजी को अर्पण कर दिया है। सभी सखियाँ ठहाका मारकर हँसने लगीं। श्रीकृष्ण कुछ झेंप से गये किन्तु फिर भी दान लेने के लिए डटे रहे, फिर गोपियों ने प्रेमकलह के पश्चात् कुछ दूर भीतर दान–निवर्तन कुण्ड पर प्रेम का दान दिया और लिया भी।

वीथिका

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