देवगिरि  

दौलताबाद क़िला, महाराष्ट्र

देवगिरी औरंगाबाद ज़िला, महाराष्ट्र राज्य, दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित प्रख्यात नगर है। यह प्राचीन समय में यादवों की राजधानी थी। देवगिरि आधुनिक दौलताबाद का प्राचीन नाम है। इसकी स्थापना यादव वंश के राजा भिल्लम द्वारा की गई थी। बाद के समय मुस्लिम आक्रमणकारियों का देवगिरि पर हमला हुआ। पहले इस पर ख़िलजी सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने फिर मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने अधिकार किया। मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि को जीतकर अपनी राजधानी बनाया और इसका नाम बदलकर 'दौलताबाद' रख दिया था। मुग़ल बादशाह अकबर के समय में देवगिरि को मुग़लों ने जीत लिया और इसे मुग़ल साम्राज्य में शामिल कर लिया गया। मुग़लों यह अधिकार बादशाह औरंगज़ेब के राज्य काल तक बना रहा।

इतिहास

जैन पंडित हेमाद्रि के कथनानुसार देवगिरि की स्थापना यादव नरेश भिलम्म (प्रथम) ने की थी। यादव नरेश पहले चालुक्य राज्य के अधीन थे। भिलम्म ने 1187 ई. में स्वतंत्र राज्य स्थापित करके देवगिरि में अपनी राजधानी बनाई। उसके पौत्र सिंहन या सिंघण ने प्राय: संपूर्ण पश्चिमी चालुक्य राज्य अपने अधिकार में कर लिया। देवगिरि के क़िले पर अलाउद्दीन ख़िलजी ने पहली बार 1294 ई. में चढ़ाई की थी। पहले तो यादव नरेश ने उसका करद होना स्वीकार कर लिया, किन्तु पीछे से उन्होंने दिल्ली के सुल्तान को खिराज देना बन्द कर दिया, जिसके फलस्वरूप 1307, 1310 और 1318 ई. में मलिक काफ़ूर ने फिर देवगिरि पर आक्रमण किया।

नाम परिवर्तन

यहाँ का अंतिम राजा हरपाल सिंह युद्ध में पराजित हुआ और क्रूर सुल्तान की आज्ञा से उसकी खाल खिंचवा ली गई। 1338 ई. में मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया, क्योंकि मुहम्मद तुग़लक के विशाल साम्राज्य की देखरेख दिल्ली की अपेक्षा देवगिरि से अधिक अच्छी तरह की जा सकती थी। सुल्तान ने दिल्ली की प्रजा को देवगिरि जाने के लिए बलात् विवश किया। 17 वर्ष पश्चात् देवगिरि के लोगों को असीम कष्ट भोगते देखकर इस उतावले सुल्तान ने फिर उन्हें दिल्ली वापस आ जाने का आदेश दिया। सैकड़ों मील की यात्रा के पश्चात् दिल्ली के निवासी किसी प्रकार फिर अपने घर पहुँचे। मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद रखा और वारंगल के राजाओं के विरुद्ध युद्ध करने के लिए इस स्थान को अपना आधार बनाया था। किन्तु उत्तर भारत में गड़बड़ प्रारम्भ हो जाने के कारण वह अधिक समय तक राजधानी देवगिरि में नहीं रख सका।

निज़ाम आसफ़शाह का अधिकार

मुहम्मद तुग़लक के राज्य काल में प्रसिद्ध अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता दौलताबाद आया था। उसने इस नगर की समृद्धि का वर्णन करते हुए उसे दिल्ली के समकक्ष ही बताया है। राजधानी के दिल्ली वापस आ जाने के कुछ ही समय पश्चात् गुलबर्गा के सूबेदार जफ़र ख़ाँ ने दौलताबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया और यह नगर इस प्रकार बहमनी सुल्तानों के हाथों में आ गया। यह स्थिति 1526 तक रही। अब इस नगर पर निज़ामशाही सुल्तानों का अधिकार हो गया। तत्पश्चात् मुग़ल सम्राट अकबर का अहमदनगर पर क़ब्ज़ा हो जाने पर दौलताबाद भी मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित हो गया। किन्तु पुन: इसे शीघ्र ही अहमदनगर के सुल्तानों ने वापस ले लिया। 1633 ई. में शाहजहाँ के सेनापति ने दौलताबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया और तब से औरंगज़ेब के राज्य काल के अंत तक यह ऐतिहासिक नगर मुग़लों के हाथ में ही रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के कुछ समय पश्चात् मुहम्मदशाह के शासन काल में हैदराबाद के प्रथम निज़ाम आसफ़शाह ने दौलताबाद को अपनी नई रियासत में शामिल कर लिया।

दुर्ग का स्थापत्य

दौलताबाद क़िला, महाराष्ट्र

देवगिरि का यादव कालीन दुर्ग एक त्रिकोण पहाड़ी पर स्थित है। क़िले की ऊँचाई, आधार से 150 फुट है। पहाड़ी समुद्र तल से 2250 फुट ऊँची है। क़िले की बाहरी दीवार का घेरा 2¾ मील है और इस दीवार तथा क़िले के आधार के बीच क़िलाबेदियों की तीन पंक्तियां हैं। प्राचीन देवगिरि नगरी इसी परकोटे के भीतर बसी हुई थी। किन्तु उसके स्थान पर अब केवल एक गांव नजर आता है। क़िले के कुल आठ फाटक हैं। दीवारों पर कहीं-कहीं आज भी पुरानी तोपों के अवशेष पड़े हुए हैं। इस दुर्ग में एक अंधेरा भूमिगत मार्ग भी है, जिसे 'अंधेरी' कहते हैं। इस मार्ग में कहीं-कहीं पर गहरे गढ़डे भी हैं, जो शत्रु को धोखे से गहरी खाई में गिराने के लिए बनाये गये थे। मार्ग के प्रवेश द्वार पर लोहे की बड़ी अंगीठियाँ बनी हैं, जिनमें आक्रमणकारियों को बाहर ही रोकने के लिए आग सुलगा कर धुआं किया जाता था। क़िले की पहाड़ी में कुछ अपूर्ण गुफ़ाएं भी हैं, जो एलोरा की गुफ़ाओं के समकालीन हैं।

स्मारक

देवगिरि के प्रमुख स्मारक हैं-

  1. चांद मीनार
  2. चीनी महल
  3. ज़ामा मस्जिद

चांद मीनार

चांद मीनार 210 फुट ऊँची और आधार के पास 70 फुट चौड़ी है। यह मीनार दक्षिण भारत में मुस्लिम वास्तुकला की सुंदरतम कुतियों में से एक है। इसको अलाउद्दीन बहमनी ने क़िले की विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था। मीनार का आधार 15 फुट ऊँचा है। इसमें 24 कोष्ठ हैं। संपूर्ण मीनार पर पहले सुंदर ईरानी पत्थर जड़े हुए थे। इसके दक्षिण की ओर एक छोटी मस्जिद है, जो जैसा कि एक फ़ारसी अभिलेख से सूचित होता है, 849 हिजरी (=1445 ई.) में बनी थी।

चीनी महल

चीनी महल क़िले के अष्टम फाटक से 40 फुट दाईं ओर है। यह भवन पहले बहुत सुंदर था। इसी में औरंगज़ेब ने गोलकुंडा के अंतिम शासक अबुहसन तानाशाह को क़ैद किया था। यादव कालीन इमारतों के अवशेष अब नहीं के बराबर हैं। केवल कालिका देवल, जिसके मध्य भाग को मलिक काफ़ूर ने मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था, मौजूद है।

ज़ामा मस्जिद

चीनी महल के पास ही जामा मस्जिद है, जिसमें प्राचीन भारतीय शैली के स्तम्भ और सपाट दरवाज़े हैं। इसे 1313 ई. में मुबारक ख़िलजी ने बनवाया था। किंवदंती है कि बहमनी वंश के संस्थापक हसन गंगू का राज्याभिषेक इसी मस्जिद में 1347 ई. में हुआ था। अकबर के समकालीन इतिहास लेखक फ़रिश्ता ने इसका वर्णन किया है।

अन्य प्रमुख स्थान

देवगिरि के अन्य उल्लेखनीय स्थान हैं- काआरीटंका, हाथी हौज, जनार्दन स्वामी की समाधि तथा शाहजहाँ और निज़ामशाही सुल्तानों के बनवाये हुए कुछ महलों के भग्नावशेष। जैन स्तोत्र तीर्थमाला चैत्यवंदन में देवगिरि को 'सुरगिरि' कहा गया है।

Seealso.jpg इन्हें भी देखें: दौलताबाद


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार |पृष्ठ संख्या: 444 |


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