धर्मकीर्ति बौद्धाचार्य  

धर्मकीर्ति धर्मपाल और ईश्वरसेन के शिष्य थे। बौद्ध न्याय की जिस परम्परा का प्रारम्भ मैत्रेयनाथ, असंग और वसुबन्धु की कृतियों से हुआ था, उसे आचार्य दिङ्नाग ने अपनी कृतियों में वाद विधि से पृथक् तर्कशास्त्र या हेतुशास्त्र के रूप में विकसित किया। आगे चलकर दिङ्नाग द्वारा प्रवर्तित इस तर्क विद्या को धर्मपाल एवं ईश्वरसेन के शिष्य आचार्य धर्मकीर्ति ने (बौद्ध न्याय को) 'प्रमाणशास्त्र' के रूप में विकसित किया।

समय काल

तिब्बती परम्परा के अनुसार आचार्य कुमारिल और आचार्य धर्मकीर्ति समकालीन थे। कुमारिल ने दिङ्नाग का खण्डन तो किया है, किन्तु धर्मकीर्ति का नहीं, जबकि धर्मकीर्ति ने कुमारिल का खण्डन किया है। ऐसी स्थिति में कुमारिल आचार्य धर्मकीर्ति के वृद्ध समकालीन ही हो सकते हैं। आचार्य धर्मकीर्ति ने तर्कशास्त्र का अध्ययन ईश्वरसेन से किया था, किन्तु उनके दीक्षा गुरु प्रसिद्ध विद्वान् एवं नालन्दा के आचार्य धर्मपाल थे। धर्मपाल को वसुबन्धु का शिष्य कहा गया है। वसुबन्धु का समय चौथी शताब्दी निश्चित किया गया है। धर्मपाल के शिष्य शीलभद्र ईस्वीय वर्ष 635 में विद्यमान थे, जब ह्वेनसांग नालन्दा पहुँचे थे। अत: यह मानना होगा कि जिस समय धर्मकीर्ति दीक्षित हुए, उस समय धर्मपाल मरणासन्न थे। इस दृष्टि से विचार करने पर धर्मकीर्ति का काल 550-600 हो सकता है।

यश पताका

धर्मकीर्ति के ग्रन्थों में जिस न्यायशास्त्र या प्रमाण विद्या का विशद रूप में प्रौढ़ रीति से उपन्यास मिलता है, वह समस्त परवर्ती बौद्ध न्यायशास्त्र और ब्राह्मण तथा जैन न्याय के विकास का भी मूल आधार बना। न केवल भारत अपितु तिब्बत, चीन, मध्य एशिया एवं दक्षिण पूर्व के तमाम देशों में धर्मकीर्ति की यश पताका विगत चौदह सौ वर्षों से फहरा रही है। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत न केवल भारतीय दार्शनिक परम्परा में प्रमाणवाद के मेरुदंड के रूप में स्वीकृत हुए, अपितु बाहरी देशों में भी उनके अनुवाद अत्यन्त लोकप्रिय हुए। किन्तु संस्कृत या किसी अन्य भाषा में धर्मकीर्ति की जीवनी का कोई क्रमबद्ध या व्यवस्थित विवरण उपलब्ध नहीं होता। तारानाथ और बु-दोन् के विविरणों से कतिपय तथ्य निकलते हैं, जिनमें धर्मकीर्ति के जीवन पर प्रकाश पड़ता है।[1]

जीवन परिचय

दिङ्नाग की भांति ही धर्मकीर्ति भी दक्षिण में, त्रिमलय के एक ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता का नाम कोरूनन्द था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा ब्राह्मण परम्परा और दार्शनिक परिवेश में हुई थी। बाद में उनका झुकाव बौद्ध धर्म और दर्शन की ओर हो गया। फलत: उन्होंने नालन्दा में आकर वसुबन्धु के वृद्ध जीवित शिष्य और योगाचार परम्परा के साक्षात् प्रतिनिधि आचार्य धर्मपाल से बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की। तर्कशास्त्र एवं बौद्ध न्याय विद्या में अपनी गूढ़ सैद्धांतिक जिज्ञासा को शान्त करने के लिए उन्होंने आचार्य दिङ्नाग के साक्षात् शिष्य आचार्य ईश्वरसेन से बौद्ध प्रमाण विद्या का अध्ययन किया और अपने गुरु से अधिक प्रौढ़ ज्ञान अर्जित करने में सफल हुए। स्वयं इनके गुरु ईश्वरसेन ने यह बात स्वीकार की थी, ऐसा परम्परा से ज्ञात होता है। अन्त में वे कलिंग देश में मृत्यु को प्राप्त हुए।[1]

समालोचना

अपने गुरु की आज्ञा से धर्मकीर्ति ने दिङ्नाग के प्रधान ग्रन्थ प्रमाण समुच्चय पर वार्तिक रूप एक पद्यात्मक लगभग 2000 कारिकाओं में एक ग्रन्थ लिखा। जो ग्रन्थ उक्त, अनुक्त और दुरुक्त पदार्थों की चिन्ता से युक्त हो, वह 'ग्रन्थ वार्तिक' कहा जाता है। आचार्य दिङ्नाग ने जब 'प्रमाणसमुच्चय' लिखकर बौद्ध प्रमाणशास्त्र का बीज वपन किया तो अन्य बौद्धेतर दार्शनिकों में उसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। तदनुसार न्याय दर्शन के व्याख्याकारों में उद्योतकर ने, मीमांसक मत के आचार्य कुमारिल ने, जैन आचार्यां में आचार्य मल्लवादी ने दिङ्नाग के मन्तव्यों की समालोचना की। फलस्वरूप बौद्ध विद्वानों को भी प्रमाणशास्त्र के विषय में अपने विचारों को सुव्यवस्थित करने का अवसर प्राप्त हुआ। ऐसे विद्वानों में आचार्य धर्मकीर्ति प्रमुख हैं, जिन्होंने दिङ्नाग के दार्शनिक मन्तव्यों का सुविशद विवेचन किया तथा उद्योतकर, कुमारिल आदि दार्शनिकों की जमकर समालोचना करके बौद्ध प्रमाणशास्त्र की भूमिका को सुदृढ़ बनाया। उन्होंने केवल बौद्धेतर विद्वानों की ही आलोचना नहीं की, अपितु कुछ गौण विषयों में अपना मत दिङ्नाग से भिन्न रूप में भी प्रस्तुत किया। उन्होंने दिङ्नाग के शिष्य ईश्वरसेन की भी, जिन्होंने दिङ्नाग के मन्तव्यों की अपनी समझ के अनुसार व्याख्या की थी, उनकी भी समालोचना कर बौद्ध प्रमाणशास्त्र को परिपुष्ट किया।

ग्रंथ रचना

आचार्य धर्मकीर्ति के प्रमाणशास्त्र विषयक सात ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। ये सातों ग्रन्थ प्रमाणसमुच्चय की व्याख्या के रूप में ही हैं। प्रमाणसमुच्चय में प्रतिपादित विषयों का ही इन ग्रन्थों में विशेष विवरण है। किन्तु एक बात असन्दिग्ध हैं कि धर्मकीर्ति के ग्रन्थों के प्रकाश में आने के बाद दिङ्नाग के ग्रन्थों का अध्ययन गौण हो गया। आचार्य धर्मकीर्ति के सात ग्रन्थ इस प्रकार हैं-

  1. प्रमाणवार्तिक
  2. प्रमाणविनिश्चय
  3. न्यायबिन्दु
  4. हेतुबिन्दु
  5. वादन्याय
  6. सम्बन्धपरीक्षा
  7. सन्तानान्तरसिद्धि

इनके अतिरिक्त प्रमाणवार्तिक के 'स्वार्थानुमान परिच्छेद' की वृत्ति एवं 'सम्बन्धपरीक्षा की टीका' भी स्वयं धर्मकीर्ति ने लिखी है। आचार्य धर्मकीर्ति के इस ग्रन्थों का प्रधान और पूरक के रूप में भी विभाजन किया जाता है। तथा हि- 'न्यायबिन्दु' की रचना तीक्ष्णबुद्धि पुरुषों के लिए, 'प्रमाणविनिश्चय' की रचना मध्यबुद्धि पुरुषों के लिए तथा 'प्रमाणवार्तिक' का निर्माण मन्दबुद्धि पुरुषों के लिए हैं- ये ही तीनों प्रधान ग्रन्थ है।, जिनमें प्रमाणों से सम्बद्ध सभी वक्तव्यों का सुविशद निरूपण किया गया है। अवशिष्ट चार ग्रन्थ पूरक के रूप में हैं। तथाहि-स्वार्थानुमान से सम्बद्ध हेतुओं का निरूपण 'हेतुबिन्दु' में है। हेतुओं का अपने साध्य के साथ सम्बन्ध का निरूपण 'सम्बन्धपरीक्षा' में है। परार्थानुमान से सम्बद्ध विषयों का निरूपण 'वादन्याय' में है अर्थात् इसमें परार्थानुमान के अवयवों का तथा जय-पराजय की व्यवस्था कैसे हो- इसका विशेष प्रतिपादन किया गया है।

प्रमाणवार्तिक परिच्छेद

प्रमाणवार्तिक में चार परिच्छेद हैं-

  1. स्वार्थानुमान
  2. प्रामाण्यवाद
  3. प्रत्यक्ष
  4. परार्थानुमान

इनमें से परार्थानुमान परिच्छेद पर स्वयं आचार्य धर्मकीर्ति ने स्वोपज्ञ वृत्ति लिखी, शेष तीन परिच्छेदों पर देवेन्द्रबोधि, प्रज्ञाकर गुप्त, धर्मोत्तर, जिन, शाक्यबुद्धि, प्रभाबुद्धि, प्रभृति आचार्यों ने अपने भाष्य या टीकायें लिखीं। इन ग्रन्थों में (देवेन्द्रबुद्धि आदि) धर्मकीर्ति के प्रमाणवाद की शाब्दिक व्याख्या, तत्व ज्ञान एवं तात्विक रहस्य तथा धार्मिक रहस्य, विवेचनपूर्वक प्रमाणवाद की व्याख्या प्रज्ञाकर गुप्त प्रस्तुत की गयी है। प्रमाण विनिश्चय प्रमाणवार्तिक का ही सैद्धांतिक संक्षेप है और न्याय बिन्दु इसका भी अत्यन्त संक्षिप्त रूप है। सम्बन्ध परीक्षा में लौकिक पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध की अतात्विकता को प्रदर्शित किया गया है। संतानान्तरसिद्धि में विज्ञानवाद के मत से सांवृतिक दृष्टि से स्वभिन्न सन्तान के अनुमान का प्रकार बताया गया है। इनके अतिरिक्त सम्बन्ध परीक्षा वृत्ति (सम्बन्ध परीक्षा की स्वोपज्ञवृत्ति), जातकमाला टीका, बुद्धपरिनिर्वाण स्तोत्र, हेवज्रमहातन्त्रराजस्य पंजिकानेत्र विभड्ना, सूत्रविधि, सर्वदुर्गतिपरिशोधनमारहोपमण्डल उपायिका, वज्रडाकस्य स्तव दण्डक से ग्रन्थ भी भोट परम्परा में धर्मकीर्ति रचित माने जाते हैं। इनमें से कोई भी ग्रन्थ मूल संस्कृत में उपलब्ध नहीं है।[1]

धर्मकीर्ति के टीकाकार

आचार्य धर्मकीर्ति के मन्तव्यों का खण्डन वैशेषिक दर्शन में व्योमशिव ने, मीमांसा दर्शन में शालिकनाथ ने, न्याय दर्शन में जयन्त और वाचस्पतिमिश्र ने, वेदान्त में भी वाचस्पतिमिश्र ने तथा जैन दर्शन में अकलंक आदि आचार्यों ने किया है। धर्मकीर्ति के टीकाकारों ने उन आक्षेपों का यथासम्भव निराकरण किया है। धर्मकीर्ति के टीकाकारों को तीन वर्ग में विभक्त किया जाता है-

  1. प्रथम वर्ग के पुरस्कर्ता देवेन्द्रबुद्धि माने जाते हैं, जो धर्मकीर्ति के साक्षात शिष्य थे और जिन्होंने शब्द प्रधान व्याख्या की है। देवेन्द्रबुद्धि ने प्रमाणवार्तिक की दो बार व्याख्या लिखकर धर्मकीर्ति को दिखाई और दोनों ही बार धर्मकीर्ति ने उसे निरस्त कर दिया। अन्त में तीसरी बार असन्तुष्ट रहते हुए भी उसे स्वीकार कर लिया और मन में यह सोचकर निराश हुए कि वस्तुत: मेरा प्रमाणशास्त्र यथार्थ रूप में कोई समझ नहीं सकेगा। शाक्यबुद्धि एवं प्रभाबुद्धि आदि भी इसी प्रथम वर्ग के आचार्य हैं।
  2. दूसरे वर्ग के ऐसे आचार्य हैं, जिन्होंने शब्द प्रधान व्याख्या का मार्ग छोड़कर धर्मकीर्ति के तत्त्वज्ञान को महत्त्व दिया। इस वर्ग के पुरस्कर्ता आचार्य धर्मोत्तर है। धर्मोत्तर का कार्यक्षेत्र कश्मीर रहा, अत: उनकी परम्परा को कश्मीर-परम्परा भी कहते हैं। वस्तुत: धर्मकीर्ति के मन्तव्यों का प्रकाशन धर्मोत्तर द्वारा ही हुआ है। ध्वन्यालोक के कर्ता आनन्दवर्धन ने भी धर्मोत्तर कृत प्रमाणविनिश्चय की टीका पर टीका लिखी है, किन्तु वह अनुपलब्ध है। इसी परम्परा में शंकरानन्द ने भी प्रमाणवार्तिक पर एक विस्तृत व्याख्या लिखना शुरू किया, किन्तु वह अधूरी रही।
  3. तीसरे वर्ग में धार्मिक दृष्टि को महत्त्व देने वाले धर्मकीर्ति के टीकाकार हैं। उनमें प्रज्ञाकर गुप्त प्रधान है। उन्होंने स्वार्थानुमान को छोड़कर शेष तीन परिच्छेदों पर 'अलंकार' नामक भाष्य लिखा, जिसे 'प्रमाणवार्तिकालङ्कार भाष्य' कहते हैं। इस श्रेणी के टीकाकारों में प्रमाणवार्तिक के प्रमाणपरिच्छेद का अत्यधिक महत्त्व है, क्योंकि उसमें भगवान बुद्ध की सर्वज्ञता तथा उनके धर्मकाय आदि की सिद्धि की गई है। प्रज्ञाकर गुप्त का अनुसरण करने वाले आचार्य हुए है। 'जिन' नामक आचार्य ने प्रज्ञाकर के विचारों की पुष्टि की है। रविगुप्त प्रज्ञाकर के साक्षात शिष्य थे। ज्ञानश्रीमित्र भी इसी परम्परा के अनुयायी थे। ज्ञानश्री के शिष्य यमारि ने भी अलंकार की टीका की। कर्णगोमी ने स्वर्थानुमान परिच्छेद ने चारों परिच्छेदों पर टीका लिखी है, किन्तु उसे शब्दार्थपरक व्याख्या ही मानना चाहिए।[1]

राहुल सांकृत्यायन का योगदान

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अथक परिश्रम के फलस्वरूप प्रमाणवार्तिक[2] एवं प्रज्ञाकर गुप्त के भाष्य के साथ टीका, वाद न्याय[3], न्यायबिन्दु ये ग्रन्थ अपने मूल रूप में उपलब्ध एवं प्रकाशित हुए हैं। हेतु बिन्दु टीका (आलोक) से एवं अन्य जैन न्याय ग्रन्थों से हेतु बिन्दु का अद्धार किया जा सकता है। भोट अनुवाद से इसका संस्कृत में पुनरुद्धार किया गया है। धर्मकीर्ति तत्वों के हिताध्याशय से प्रेरित बुद्ध की देशना की चर्चा करते हैं, किन्तु उनका सर्वज्ञत्व उनकी चर्चा का विषय नहीं है। धर्मकीर्ति ने ईश्वर के अस्तित्व का भी निषेध किया, क्योंकि उनके मत में प्राणियों के अदृष्ट या कर्मवशात्, प्रतीत्यसमुत्पाद मुखेन जगत् के विविध उपादानों की सृष्टि होती है। उन्होंने चारवाकसम्मत भौतिकवादी दृष्टि का निरास कर विज्ञान के अस्तित्व का समर्थन किया, किन्तु तथागत द्वारा उपदिष्ट नैरात्म्य, पुद्गल नैरात्म्य एवं धर्म नैरात्म्य, के सिद्धांत का भी सम्यक् प्रतिपादन किया।

ज्ञानाकार का अस्तित्व

बाह्यार्थ के अस्तित्व का निराकरण कर आचार्य धर्मकीर्ति ने सौत्रान्तिक साकार बुद्धि के सिद्धांत का भी निरसन कर यह स्थापित किया कि केवल स्वसंवेदन रूप विज्ञान की स्थिति है। विषयाकार से विज्ञान के अस्तित्व बोध की कोई अपेक्षा नहीं है। ज्ञानाकार का अस्तित्व उन्होंने स्वीकार किया, किन्तु ज्ञानाकार के आधार रूप में विषय (बाह्यार्थ) के अस्तित्व का समर्थन नहीं किया। हमें संघात का बौध होता है, किन्तु परमाणुओं का ज्ञान नहीं होता। सौत्रान्तिक परमाणु के आकार की कल्पना नहीं करते, उनके संघात के ज्ञान रूप में आकार की कल्पना करते हैं। वस्तुत: ज्ञान में बाह्यार्थ के आकार की कल्पना अनर्थक है। केवल विज्ञान का अस्तित्व है, जो स्वसंवेदन स्वरूप है, प्रमेय, प्रमाता और प्रमिति एक ही है, अनेक नहीं। वह ज्ञेय से अभिन्न और अद्वय रूप है।

सहोपलम्भ नियम से नील और नीलबुद्धि का अभेद मानना चाहिए। वहाँ कहीं ग्राह्य-ग्राहक का, विषय ज्ञान आदि का भेद प्रतीति होता है, वह भ्रांति के कारण होता है। यह भ्रांति अनादि काल से आसेवित वासनाजनित प्रतीत से होती है। जिस प्रकार चंद्रमा एक होता हुआ भी भ्रांतिवशात् दो दिखाई देता है, उसी प्रकार केवल विज्ञान ही सत् है, विज्ञान से व्यतिरिक्त विषयाकार की कल्पना नित्य जगत् होने के कारण अनावश्यक है। अत: केवल ज्ञान मात्र, सत्य है, उसी से ज्ञाता और ज्ञेय का भेद उल्लसित होता है। धर्मकीर्ति के अनुसार बुद्धि में जो अर्थ प्रकाशित होता है, वह वक्ता के व्यापार का विषय होता है और उसमें शब्द का ही प्रामाण्य होता है। वह अर्थतत्वाश्रित नहीं है। विषय के आकार के भेद से बुद्धि के अधिगम के भेद से, अधिगम (प्राप्ति) के फल के भाव से, प्रमाण के स्वरूप को गति (प्रामाण्य) का बोध स्वत: होता है। प्रामाण्य व्यवहाराश्रित है, समस्त शास्त्र जो भगवान तथागत प्रवेदित धर्मविनय पर आधृत हैं, प्राणियों के मोह के निवर्तन के लिए प्रयुक्त हुआ है।[1]

अविसंवादि ज्ञान

अज्ञात अर्थ का प्रकाशक शास्त्र ही प्रमाण है। अविसंवादि ज्ञान प्रमाण कहा जाता है। अर्थ क्रिया स्थिति यानि क्रिया कार्य को उत्पन्न करने की सामर्थ्य से युक्त होना ही अविसंवादन है। व्यवहार से प्रामाण्यबोध सम्भव होता है। लोक में वह पुरुष संवादक कहा जाता है जो सत्य भाषी है और पूर्वोपदर्शित अर्थ का प्रापक है। उसी प्रकार पूर्वोपदर्शिक अर्थ का व्यापक ज्ञान भी संवादक कहा जाता है। जो प्रदर्शिक अर्थ का प्रापक यानी उसका प्रवर्तक और पुरुषार्थ सिद्धि का कारण होता है। अधिगत अर्थ में पुरुष प्रवर्तित होता है और अर्थ प्रापित होता है, अत: अर्थाधगति ही प्रमाण फल है। तात्पर्य यह है कि अर्थाधिगम से प्रमाण का व्यापार समाप्त हो जाता है। यही वह स्थिति है, जहाँ पुरुष का कारित्र होता है। इसे अर्थक्रिया क्षम वस्तु कहते हैं। जो क्रिया इस वस्तु का अधिगम करती है, वही सफल पुरुषार्थ है। इस प्रक्रिया में विज्ञान ज्ञापक मात्र है, कारक कारण नहीं। अनधिगत अर्थ ही प्रमाण होता है। अर्थ क्षणिक है, जो इन्द्रिय द्वारा अधिगत और कल्पना द्वारा निर्मित होता है। इसलिए ज्ञान का प्रथम क्षण सदा इन्द्रिय विज्ञान का क्षण होता है। वह अविकल्प होता है। किन्तु विकल्पोत्पत्ति की शक्ति से संयुक्त होता है। सत्य की परीक्षा केवल व्यवहार (अनुभव) से होती है। प्रामाण्य परत: होता है, क्योंकि प्रापक ज्ञान ही प्रमाण है। कारण गुण के ज्ञान से, संवाद के ज्ञान से, अर्थ क्रिया क ज्ञान से ज्ञान की अविसंवादिता ज्ञापित या सिद्ध होती है।

दिङ्नाग का अनुसरण करते हुए धर्मकीर्ति वस्तु को परमार्थसत् मानते हैं। जो अर्थ क्रियासमर्थ है, वही वस्तु है। जिसमें अर्थ क्रिया की सामर्थ्य नहीं होती, वह अवस्तु कही जाती है। अत: वस्तु स्वलक्षण होती है। यह परमार्थसत् या वस्तुसत् क्षणिक, स्वलक्षण होने के कारण, विकल्प शून्य (निर्विकल्प) होता है। अतीत और अनागत अवस्तु है, केवल प्रत्युत्पन्न वस्तु है। संवृतिसत्य परिकल्प रूप है। यह शुद्ध और वस्तु मिश्रित द्विविध है। वस्तु भी शुद्ध और परिकल्प मिश्रित दो प्रकार की होती है। नाम, जात्यादि की कल्पना विकल्पों से रहित अविसंवादी ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो साक्षात्कारी ज्ञान होता है। यह निर्विकल्प होता है और स्वलक्षण को ग्रहण करता है। यह नाम, जाति, द्रव्य, गुण और कर्म का परिग्रह नहीं करता। इसलिए प्रत्यक्ष का यह लक्षण किया गया।[1]

प्रत्यक्षड्कल्पनापोढ़म्प्रत्यक्षेणैव सिध्यति।
प्रत्यात्मवेद्य: सर्वेषां विकल्पो नाम संश्रय:।।
संहत्य सर्वतश्चिन्तां स्तिमितेनान्तरात्मना।
स्थितोऽपि चक्षुवां रूपमीक्षते साक्षजा मति:।।[4]

प्रत्यक्ष के प्रकार

आचार्य धर्मकीर्ति ने प्रत्यक्ष के चार प्रकार बताये हैं-

  1. इन्द्रिय प्रत्यक्ष
  2. मनोविज्ञान
  3. योगि प्रत्यक्ष
  4. आत्म संवेदन

धर्मकीर्ति ने स्पष्टत: स्मृति और प्रत्यभिज्ञा से प्रत्यक्ष का अन्तर भी स्पष्ट किया है। स्वलक्षण ही प्रत्यक्ष का विषय है। धर्मकीर्ति के अनुसार वस्तुसत् का बोध प्रत्यक्ष प्रमाण से होता है। कल्पना प्रसूत अवस्तु या सामान्य के बोध के लिए अनुमान प्रमाण की आवश्यकता होती है। अनुमान से विशेष का ज्ञान नहीं होता। इसलिए धर्मकीर्ति अन्य वादियों के मत के विरुद्ध प्रमाण विप्लववाद के सिद्धांत को अंगीकार करते हैं। अर्धकीर्ति के अनुसार सामान्य लक्षण का बोध अनुमान से होता है। स्वार्थानुमान और परार्थानुमान के भेद से अनुमान दो प्रकार का होता है। स्वार्थानुमान ज्ञानात्मक होता है और परार्थानुमान शब्दात्मक होता है। दोनों में अत्यन्त भेद होने के कारण दोनों के पृथक-पृथक् लक्षण किये जाते हैं।

प्रमाण विवेचन

अनुमेय (साध्य) में सत्व, सपक्ष में सत्य एवं असपक्ष में असत्व इस त्रिरूप लिंग (हेतु) अनुमेय (के विषय) में जो ज्ञान होता है, वह स्वार्थानुमान कहा जाता है। अनुपलब्धि, स्वभाव और कार्य ये तीन लिंग होते हैं। अनुपलब्धि ग्यारह प्रकार की (स्वभाव, कार्य, व्यापक, स्वभाव विरुद्ध, विरुद्ध कार्योपलब्धि, विरुद्ध व्याप्तोलब्धि, कारणविरुद्धोपलब्धि, कारणविरुद्धकार्योपलब्धि) होती है। दूसरे को त्रिरूप लिंग का आख्यान करना ही परार्थानुमान कहलाता है। त्रिरूप लिंग से उसकी स्मृति बनती है और स्मृति से अनुमान होता है। इस प्रकार कारण के ऊपर कार्य (अनुमान) का उपचार रूप समारोप होता है। प्रयोग के भेद से साधर्म्य और वैधर्म्य के भेद से परार्थानुमान भी द्विविध होता है। वस्तुत: इन दोनों भेदों में कोई भेद नहीं है, केवल प्रयोग का अन्तर है।[1]

इस प्रकार धर्मकीर्ति ने अपने परमगुरु दिङ्नाग द्वारा प्रमाणसमुच्चय आदि ग्रन्थों में प्रमाणों के विवेचन स्वरूप को सोपस्कर अभिव्यक्त कर उनके हेतु त्रैरूप्य सिद्धांत को अनेकश: परिष्कृत और प्रौढ़ स्वरूप प्रदान किया और इस प्रकार उनके द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण से व्याप्ति के सिद्धांत को भी एक सुनिश्चित वैज्ञानिक और शास्त्रीय स्वरूप प्राप्त हुआ।

बौद्ध पक्ष की प्रतिष्ठा एवं रक्षा

धर्मकीर्ति के समय में कुमारिल भट्ट, प्रभृति आचार्य ब्राह्मणवाद को पुन: प्रतिष्ठित करने में लगे हुए थे। अत: उन्होंने बौद्धवाद का निरसन करने का भरसक प्रयास किया। धर्मकीर्ति ने अपने प्रौढ़ प्रमाणशास्त्र द्वारा बौद्ध पक्ष की प्रतिष्ठा एवं रक्षा का पूर्ण यत्न किया। दूसरी ओर जैन, न्याय, वेदान्ती और अन्य विचारक भी परस्पर एक दूसरे के मतों को खंडित करने एवं स्वपक्षस्थापन में दृढ़ रूप में प्रमाणशास्त्र और तर्क पद्धति का प्रयोग कर रहे थे। वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पतिमिश्र, उदयन, गंगेश, प्रभृति नैयायिक, समन्तभद्र, सिद्धसेन दिवाकर, अकलंकदेव प्रभृति जैनाचार्य, तथा धर्मकीर्ति, धर्मोत्तर, प्रज्ञाकर गुप्त प्रभृति बौद्ध नैयायिक, शंकराचार्य सुरेश्वराचार्य प्रभृति वेदान्त के आचार्यों ने अपने मत की स्थापना एवं परपक्ष के खंडन में अपने तार्किक वैभव शास्त्रीय सूझ एवं दार्शनिक दृष्टि का परिचय देते हुए गंभीर दार्शनिक एवं प्रौढ़ न्याय शास्त्रीय ग्रन्थों का प्रणयन किया। उस परम्परा का प्रवर्तन उद्योतकर के बाद धर्मकीर्ति से हुआ और यह परम्परा सहस्रों वर्षों तक अक्षुण्ण रीति से चलती रही। समस्त भारतवर्ष में न्याय शास्त्र के सैद्धान्तिक विवेचन एवं विविध पद्धतियों के परस्पर खंडन-मंडन की इस प्रणाली का समस्त श्रेय मूल रूप से दिङ्नाग के योग्य उत्तराधिकारी आचार्य धर्मकीर्ति को ही है। उनका भारतीय बौद्ध प्रमाण शास्त्रीय परम्परा में महत्त्व इन सभी दृष्टियों से परिमेय है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 1.5 1.6 1.7 विश्व के प्रमुख दार्शनिक |लेखक: डॉक्टर करुणेश शुक्ल |प्रकाशक: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 684 |पृष्ठ संख्या: 242 |
  2. स्वार्थानुमान परिच्छेद स्ववृत्तिसहित
  3. विपंचितार्था टीका के साथ
  4. प्रमाणवार्तिक 3/ 123 – 124

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