पाणिनि  

पाणिनि
पाणिनि के सम्मान में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट
पूरा नाम पाणिनि
जन्म 500 ईसा पूर्व
जन्म भूमि गांधार
मुख्य रचनाएँ अष्टाध्यायी
प्रसिद्धि संस्कृत के व्याकरणाचार्य
विशेष योगदान संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पाणिनि ने अपने समय की संस्कृत भाषा की सूक्ष्म छानबीन की थी। इस छानबीन के आधार पर उन्होंने जिस व्याकरण शास्त्र का प्रवचन किया, वह न केवल तत्कालीन संस्कृत भाषा का नियामक शास्त्र बना, अपितु उसने आगामी संस्कृत रचनाओं को भी प्रभावित किया।

पाणिनि (अंग्रेज़ी:Pāṇini) संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध और श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य हैं। उनके अष्टाध्यायी नामक ग्रन्थ के आठ अध्याय हैं। हर अध्याय में चार पाद हैं। प्रत्येक पाद में प्रस्तुत विषय के अनुसार कम अथवा अधिक सूत्र संख्या है। अत्यन्त संक्षेप में कहे हुए नियम अथवा विधान को सूत्र कहते हैं। अत्यंत संक्षिप्त होना ही पाणिनीय सूत्रों का सबसे निराला वैशिष्ट्य है। उस संक्षेप के लिए महर्षि पाणिनी ने एक स्वतंत्र पद्धति तैयार की है। फलस्वरूप सूत्रों की अधिकांश रचना अत्यधिक तकनीकी और लोक व्यवहार की भाषा से भिन्न हो गई है। पाणिनी सूत्र की भाषा संस्कृत होते हुए भी संस्कृत भाषा के अच्छे ज्ञान मात्र से सूत्रार्थ का ज्ञान असंभव है: तथापि यह व्याकरण बहुत संक्षिप्त हो गया है, बल्कि कुछ एक हद तक दुर्बोध भी हो गया है, फिर भी एक एक सूत्र से बड़ा शब्द समूह सिद्ध हो जाता है। यह एक बड़ा लाभ है।

परिचय

पाणिनि (500 ईसा पूर्व) संस्कृत व्याकरण शास्त्र के सबसे बड़े प्रतिष्ठाता और नियामक आचार्य थे। इनका जन्म पंजाब के शालातुला में हुआ था जो आधुनिक पेशावर (पाकिस्तान) के क़रीब तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनका जीवनकाल 520-460 ईसा पूर्व माना जाता है। इनके व्याकरण को अष्टाध्यायी कहते हैं। इन्होंने भाषा के शुद्ध प्रयोगों की सीमा का निर्धारण किया, जो प्रयोग अष्टाधायायी की कसौटी पर खरे नहीं उतरे और उन्हें विद्वानों ने 'अपणिनीय' कहकर अशुद्ध घोषित कर दिया। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है।

अष्टाध्यायी

अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। उस समय के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, ख़ान-पान, रहन-सहन आदि के प्रसंग स्थान-स्थान पर अंकित हैं। पाणिनि का समय ईसा पूर्व 800 से 400 के मध्य है, यद्यपि विद्वान् पाणिनि का समय भगवान बुद्ध से पूर्व बताते हैं, तो दूसरे कहते हैं कि बुद्ध भगवान के बाद हुए। अर्थरहित और अत्यन्त संक्षिप्त रि, धु, भ, ध इत्यादि संज्ञाएं पाणिनि तन्त्र की एक अद्वितीय विशेषता है। इस प्रकार के अनेक कारणों से पाणिनि का व्याकरण शास्त्र अनेक वैशेष्ट्यों की खान और व्याकरणकारों के लिए एक आदर्श बन गया है।

प्राचीन कथाओं में उल्लेख

पाणिनी का जीवन वृत्त अत्यन्त स्वल्प रूप में मिलता है। अष्टाध्यायी की पतंजलि रचित टीका, महाभाष्य में उसके विषय में कई उल्लेख आए हैं। पारम्पारिक लोक कथाओं से स्वल्परूप में जो कुछ ज्ञात है, उसे ऐतिहासिक सत्य समझना भूल होगी। महाभाष्यकार पतंजलि पाणिनि को दाक्षिपुत्र (1-1-20) कहते हैं। नर्मदा नदी के उत्तरवर्ती भारत में पाणिनि ने प्रवास किया और उस समय प्रचलित संस्कृत भाषा और उपभाषाओं का उसने बहुत सूक्ष्म बुद्धि से अध्ययन किया। पाणिनि ने उस समय उपलब्ध वेद सूत्रादि वाङ्मय का भी गहरा अध्ययन किया होगा। यह बात उसके सूत्रों में उल्लिखित बातों से भली प्रकार से ज्ञात होती है। पाणिनि के पूर्व अनेक व्याकरणकार हो चुके थे, परन्तु उनके व्याकरणों में बहुत अधूरापन था और विशेष प्रदेश, शाखा, सम्प्रदाय की भाषा का ही उनके व्याकरण में विमर्श किया गया था। पाणिनि का व्याकरण सर्वसमावेशक होने से महाभाष्यकार उस व्याकरण को सर्ववेद 'परिषद' (2.1.58) यानी सर्ववेद शाखा और सभी परम्पराओं का संग्राहक कहकर अन्य पूर्व व्याकरणों से उसका वैशिष्टय स्पष्ट से बताते हैं।

प्राचीन काल में भारत देश में व्याकरण शास्त्र का अन्य शास्त्रों से सम्बन्ध बहुत गहरा माना जाता था। व्याकरण और न्याय ये दो शास्त्र ग्रन्थ सब शास्त्रों के अध्ययन के लिए अत्यावश्यक समझे जाते थे। विशेषत: तत्वज्ञान से व्याकरण शास्त्र का सम्बन्ध दो कारणों से होता है। तत्वज्ञान वस्तुओं और घटनाओं का यथार्थ ज्ञान है। किसी भी वस्तु का सही स्वरूप विचार से ही निश्चित करना सम्भव है। विचारों का माध्यम शब्द है और यह जितना समुचित हो उतना ही विचार में निश्चितता होती है। ऐसे अत्यन्त समुचित शब्दों का ज्ञान व्याकरण शास्त्र से सम्भव है।

व्याकरण शास्त्र

पाणिनि ने अपने समय की संस्कृत भाषा की सूक्ष्म छानबीन की थी। इस छानबीन के आधार पर उन्होंने जिस व्याकरण शास्त्र का प्रवचन किया, वह न केवल तत्कालीन संस्कृत भाषा का नियामक शास्त्र बना, अपितु उसने आगामी संस्कृत रचनाओं को भी प्रभावित किया। पाणिनि से पूर्व भी व्याकरण शास्त्र के अन्य आचार्यों ने इस विशाल संस्कृत भाषा को नियमों में बांधने का प्रयास किया था, परन्तु पाणिनि का शास्त्र विस्तार और गाम्भीर्य की दृष्टि से इन सभी में सिरमौर सिद्ध हुआ। पाणिनि ने अपनी गहन अन्तदृर्ष्टि, समन्वयात्मक दृष्टिकोण, एकाग्रता, कुशलता, दृढ़ परिश्रम और विपुल सामग्री की सहायता से जिस अनूठे व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उसे देखकर बड़े से बड़े विद्वान् आश्चर्य चकित होकर कहने लगे – 'पाणिनीयं महत्सुविरचितम्' – पाणिनि का शास्त्र महान् और सुविरचित है; 'महती सूक्ष्मेक्षिका वर्तते सूत्रकारस्य' उनकी दृष्टि अत्यन्त पैनी है; 'शोभना खलु पाणिनेः सूत्रस्य कृतिः' उनकी रचना अति सुन्दर है; 'पाणिनिशब्दो लोके प्रकाशते' सारे लोक में पाणिनि का नाम छा गया है, इत्यादि। भाष्यकार ने पाणिनि को प्रमाणभूत आचार्य, माङ्गलिक आचार्य, सृहृद्, भगवान आदि विशेषणों से सम्बोधित किया है। उनके अनुसार पाणिनि के सूत्र में एक भी शब्द अनर्थक नहीं हो सकता, और पाणिनीय शास्त्र में ऐसा कुछ नहीं है जो निरर्थक हो। उन्होंने जो सूत्र बनाए हैं, वे बहुत ही सोच विचार कर बनाए गए हैं। उन्होंने सुहृद् के रूप में व्याकरण शास्त्र का अन्वाख्यान किया है। रचना के समय उनकी दृष्टि भविष्य की ओर थी और वह दूरतर की बात सोचते थे। इस प्रकार उनकी प्रतिष्ठा बच्चे बच्चे तक फैल गई और विद्यार्थियों में उन्हीं का व्याकरण सर्वाधिक प्रिय हुआ।

व्याकरण और तत्वज्ञान में दूसरे प्रकार का भी सम्बन्ध भी प्रचीन काल से बहुत ग्रन्थों में बताया गया है। ऊपर दिये एक सम्बन्धों से भी यह अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। उसका स्वरूप ऐसा होता है- व्याकरण शास्त्र का प्राचीन काल में दिया हुआ एक प्रसिद्ध नाम 'शब्दानुशासन' है। 'शब्दानुशासन' का अर्थ है, साधु (योग्य) शब्द से असाधु (अयोग्य) शब्दों को अलग करना। परन्तु शब्द का साधुत्व और असाधुत्व अर्थ सापेक्ष है, जैसे- 'स्वजन' शब्द, आप्त, स्वकीय सम्बन्धी के अर्थ में योग्य (साधु) है। उस अर्थ में 'श्वजन' शब्द पूर्ण असाधु है। फिर भी श्वजन शब्द सर्वथा असाधु ही है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि कुत्ते का (रक्षक) मानव, अथवा कुत्तों का समूह इत्यादि अर्थ के लिए वह योग्य है। इसी तरह 'सकल' शब्द 'सर्व सम्पूर्ण' के अर्थ में साधु और 'टुकड़ा' अर्थ में असाधु है। 'शकल' शब्द सर्व 'अर्थ में असाधु और टुकड़ा' अर्थ में साधु है। इस तरह शब्दों का साधुत्व और असाधुत्व अर्थावलम्बी है, अन्यनिरपेक्ष अर्थात् केवल स्वरूपाश्रित नहीं है। इस विवेचन का मतलब यह है कि शब्द साधुत्व का विचार व्याकरण शास्त्र का प्रमुख उद्देश्य होते हुए भी शब्द से प्रतीत होने वाले अर्थ का ही व्याकरण शास्त्र में उपांग रूप से विचार करना अनिवार्य है।

नित्य दैनदिन व्यवहार में शब्द से संकेतिक अर्थ प्रतीत होता है। लेकिन व्याकरण शास्त्र में प्रयुक्त कई शब्दों से स्वयं शब्द स्वरूप ही ज्ञात होता है। यह एक विशेष शब्द शक्ति सूत्रकार ने 'स्वयं रूप शब्दस्याशब्द संज्ञा' [1] सूत्र से स्पष्ट रूप से बताई है। अन्य शास्त्रकार, शब्द केवल अर्थ का ही बोधक है, ऐसा कहते हैं। पर सूत्रकार पाणिनि के अनुसार शब्द बाह्य अर्थ का और शब्द का ही बोधक है। अग्नेर्टक इत्यादि सूत्रों में उच्चारित अग्नि शब्द का अर्थ 'अग्नि' शब्द प्रतीत होता है और अनेकानेक सूत्रों में 'यह शब्द', अमुक शब्द कहने की ज़रूरत नहीं होती, और बड़ा शब्द लाधव सिद्ध होता है।

शब्द के अर्थ

शब्द से प्रतीत होने वाला अर्थ क्या जातिरूप है या व्यक्तित्व है या जाति और व्यक्ति दोनों शब्द से प्रतीत होते हैं। उस अर्थ से शब्द का कोई सम्बन्ध है या नहीं। अगर कोई सम्बन्ध हो तो उस सम्बन्ध का स्वरूप क्या है। वह सम्बन्ध नित्य है या अनित्य है। कोई सम्बन्ध न हो तो शब्द से अर्थ ज्ञान की उत्पत्ति कैसी। इस कारण शब्द और अर्थ का कोई सम्बन्ध तो अवश्य ही स्वीकार करना होगा। शब्द से वाच्य, गौण, व्यंग, द्योत्य इत्यादि रूप से भिन्न भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। तात्पयार्थ भी कोई शास्त्रकार अलग रूप से स्वीकार करते हैं। वाक्यार्थ क्या केवल शब्द समूहार्थ रूप से या उससे भिन्न हैं। ये सब अर्थ भिन्न भिन्न तो हैं ही, लेकिन कभी कभी विरुद्ध भी प्रतीत होते हैं। व्याकरण शास्त्र में जो शब्द सिद्धि बतलाई गई है, इससे इस सब अन्यान्य अर्थों का कोई सम्बन्ध है या नहीं। उस सब अर्थों के विचार की ज़रूरत है या नहीं। प्रत्यक्ष और अनुमान से जो अर्थ का स्वरूप प्रतीत होता है, वही शब्द से प्रतीत होता है या कोई भिन्न स्वरूप प्रतीत होता है। अर्थ का बोधक शब्द व्याकरण शास्त्र में प्रवृत्ति प्रत्ययादि प्रक्रिया से सिद्ध किया हुआ शब्द एक ही है या अलग है। अलग हो तो उन दोनों का सम्बन्ध क्या है। एक ही हो तो वह व्याकरण में सिद्ध किया हुआ शब्द अनित्य ही मानना पड़ेगा। फिर शब्द नित्य है, ऐसा व्याकरण शास्त्र का सिद्धांत 'सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे' इस प्रमाणभूत प्रथम वार्तिक से ज्ञात होता है। शब्द, अर्थ और सम्बन्ध इन तीनों का स्वरूप व्याकरण शास्त्र में सिद्धांत रूप से कैसा स्वीकृत किया गया है। पूर्वमीमांसा, न्याय आदि अन्य शास्त्रकारों ने उसका जो स्वरूप बताया है, उसमें व्याकरण शास्त्र में बताये हुए स्वरूप का क्या भेद है। इस प्रकार की अनेकानेक समस्याएं उपस्थित होती हैं। सब समस्याओं का निवारण करके शब्द, अर्थ और सम्बन्ध का स्वरूप निश्चित करना प्रारम्भ में ही अत्यावश्यक होता है।

सूत्रकार पाणिनि शब्दों के साधुत्वासाधुत्व के विषय में अत्यन्त वास्तववादी हैं। उसने मुख्य रूप से तत्कालीन भाषा और समय उपलब्ध प्राचीन वेदादी वाङ्मय में प्रयुक्त भाषा का यथार्थ स्वरूप संक्षेप में बतलाने वाला ग्रन्थ सूत्र रूप में तैयार किया। इस संक्षिप्त रूप के कारण सूत्रकार ने उपरिनिर्दिष्ट अनेकानेक प्रश्नों का निर्णय प्रत्यक्ष रूप से किया नहीं है, फिर भी इस सम्बन्ध में उसके सूत्रों में कुछ उल्लेख मिलते हैं। कई स्थानों पर सूत्रकार पाणिनी ने अत्यन्त परिमित शब्दों में और स्पष्ट रूप से अपने स्वीकृत सिद्धांत कहे हैं। दोनों प्रकार के (सांकेतिक और स्पष्ट) उल्लेखों के आधार पर बहुत ऊहापोह करके उसके टीकाकारों ने कुछ सिद्धांत स्थिर किए हैं।

शब्द से जाति रूप अर्थ प्रतीत होता है या व्यक्ति रूप, इस विषय में प्राचीन शास्त्रों में अनेक मत हैं। पाणिनि ने इस विषय में ऐसा कहा है कि संदर्भ के अनुसार शब्द कई स्थानों पर जाति और कई स्थानों पर व्यक्ति का बोधक होता है। इस कारण से हर एक शब्द द्वयर्थी है। फिर भी जब शब्द जातिपरक हो तो जाति के एक ही होने के कारण शब्द एक वचन में ही प्रयुक्त करना उचित होने पर भी उसका बहुवचन प्रयोग भी हो सकता है। 'जात्याख्यायाभेकस्मिन् बहुवचन मन्यतरस्याम् [2] इस सूत्र से उपरिनिर्दिष्ट व्यवस्था उसने बतलाई है और इस विवाद्य विषय में संदर्भ अर्थात् लोक व्यवहार के अनुसार अर्थ करना चाहिए, यह सिद्धांत अपनाया है।

शब्द का प्रयोग

व्यवहार में शब्द का प्रयोग अर्थ बोध के लिए यानी अर्थपरक होता है। परन्तु व्याकरण शास्त्र में शब्द का उपयोग विशिष्टार्थ बोधक शब्द का बोध कराने के लिए यानी शब्दपूरक होता है। शब्द के उपयोग में यह भेद ध्यान में रखकर अगर शब्द अर्थपरक हो तो पाणिनि के अनुसार उसे व्याकरण शास्त्र में दी हुई सर्वनाम, अव्यय, धातु इत्यादि संज्ञा दी जाए और अगर शब्दपरक हो तो उसको सर्वनाम अव्ययादि व्याकरण संज्ञा न दी जाए और उस संज्ञा से प्रयुक्त कोई भी प्रत्ययदेशादि कार्य न किया जाए। यह शब्द का अर्थपरत्व और शब्दपरत्व का भेद सूत्राकार ने साक्षात् उपयोग करके बतलाया है। 'इदम्' शब्द का अर्थपरक उपयोग हो तो उसको सर्वनाम संज्ञा दी जाती है और उस संज्ञा के अनुसार इमे, अस्मै, एषाम् इत्यादि रूप विशेष प्रत्ययादि प्रक्रिया से बन जाते हैं, उसका षष्ठी एक वचन का विशेष रूप 'अस्य' हो जायेगा। लेकिन यदि उसका उपयोग शब्दपरक हो तो उसकी सर्वनाम संज्ञा नहीं होगी और न ही इससे प्रयुक्त विशेष कार्य होगा। उसका षष्ठी एक वचन का रूप 'इदम्:' बनेगा। 'इदयोम:' [3], इस सूत्र में शब्दापरक होने से 'इदम:', ऐसा रूप (न कि अस्य) सूत्रकार ने प्रयुक्त किया है। इसी प्रकार प्रते:, प्रतिता, अनु:, अये, भुव:, वस:, दिन:, लष:, इत्यादि अव्यय और धातुओं के विभक्त्यन्त प्रयोग पाणिनि ने प्रयुक्त किए हैं। पर सामान्य नियम से अव्यय और धातुओं का विभक्त्यन्त प्रयोग नहीं हो सकता है।

रूढ़ अर्थात् यद्च्छा शब्दों के दो उपविभाग यानी अवांतर भेद हैं। अत्यन्त रूढ़ और सादिरूढ़। जिन शब्दों का व्यवहार में विशिष्ट अर्थ बोध के लिए प्रथम प्रयोग किसने किया, इस बात का पता नहीं चलता, ये शब्द अत्यन्त रूढ़ अथवा अनादिरूढ़ कहलाते हैं। प्राचीन ईश्वरवादियों का मत ऐसा है कि कल्प के प्रारम्भ में साक्षात् ईश्वर ने ही कई शब्दों का अर्थ सहित उपदेश महर्षियों को दिया। वे शब्द महर्षियों के व्यवहार से उस समय की मानव जाति को मालूम हुए। परम्परा से आज तक वे शब्द उस अर्थ में प्रयुक्त होते आ रहे हैं। दूसरा उपविभाग सादिरूढ़ या आधुनिक संकेतित शब्दों का है। पाणिनि आदि ऋषियों के द्वारा किए हुए रि. घु. भ., आदि शब्द और अन्य लोगों द्वारा प्रयुक्त दित्थ, उवित्थ आदि नए शब्द इस प्रकार के हैं। इन दोनों प्रकार के रूढ़ शब्दों में प्रकृति प्रत्ययादि नहीं होते हैं। ऐसा मत दूसरी विचारधारा वालों का है। यौगिक शब्द प्रकृति प्रत्यय विभाग युक्त होते हैं। व्यक्ति और वस्तु में विद्यमान विशेष गुण या क्रिया इस प्रकार के शब्द से ज्ञात होती है, जैसे पाचक, नायक, चोर, आश्रय, गोपाल, राजा, ज्ञानी इत्यादि। इस कारण से इन शब्दों में मूल धातु और अन्तिम प्रत्यय ऐसा विभाग स्पष्ट रीति से ज्ञात होता है। इसलिए इन शब्दों को यौगिक अर्थात् प्रकृति प्रत्यय से साधित समझना ठीक होगा।

शब्दों के भेद

शब्दों के ये दो भेद रूढ़ और यौगिक, सब भाषाओं में सब समय में रहते ही हैं। इस मत के अनुयायी बहुसंख्यक भाषा विद्वान् हैं और भगवान पाणिनि को भी यही मत विशेष मान्य था, फिर भी शब्द का अर्थ जाति है या व्यक्ति, इस विषय में जैसे पाणिनि आग्रह वाले नहीं, वैसे ही शब्द विभाग, शब्द साधना के बारे में भी वे किसी एक मत के पक्षपाती नहीं हैं। जिन शब्दों में प्रकृति प्रत्यय विभाग स्पष्ट रूप से नहीं दीखता है फिर भी शाकटायन अथवा यास्क के मतानुसार जो यौगिक सिद्ध किये गए हैं, उनकी व्युत्पत्ति को उणादयी बहुलम् [4] सूत्र से पाणिनि ने विकल्प रूप से मान्यता दी है। शब्द रूढ़ हो या यौगिक हो, दोनों के लिए व्याकरण, शास्त्रीय संस्कार प्रक्रिया समान रूप से होती है। रूढ़ शब्द के अर्थ में पाणिनि 'संज्ञा' शब्द प्रयुक्त करता है। व्याकरण शास्त्र का अन्तिम प्रमाण लोक व्यवहार ही है। लोक व्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में जिस लिंग, वचन में प्रयुक्त होता है, वैसा ही व्याकरण शास्त्र से सिद्ध करना और मान्य करना चाहिए। लोकों में जो रूढ़ समझा गयाय है, वह रूढ़ समझना चाहिए। व्यवहार के विसंवादी तर्क और युक्तियाँ अथवा नियम व्यर्थ हैं। व्यवहार से विरुद्ध नियम को अशास्त्रीय अर्थात् सर्वथा त्याज्य ही समझना चाहिए। ऐसा स्पष्ट मत सूत्रकार पाणिनि ने 'तदशिष्यं संज्ञाप्रमाणत्वान् [5] सूत्र से व्यक्त किया है। पाणिनि का व्याकरण और भाषा दोनों के सम्बन्ध में क्या मत था, इस विषय में [6] तक के पांच सूत्र अत्यन्त विचारणीय और मार्गदर्शक हैं।

पाणिनि की विचारधारा

पाणिनि ने शब्द का शब्द बोधकत्व 'स्वं रूपं शब्दस्याशब्द संज्ञा' [7] इस सूत्र से सिद्धांत रूप से स्वीकृत किया है। इस सिद्धांत का विशेष समर्थन 'शब्द पूर्वक एवं अर्थसंप्रत्यय:' [8] 'न सोस्ति प्रत्ययो लोके य: शब्दानुगयादृते' [9] इत्यादि विवरण के द्वारा उसके टीकाकारों ने किया है।

शब्द से प्रतीत होने वाले अर्थ के बारे में पाणिनि ने उपरिनिर्दिष्ट सूत्र द्वारा अन्य शास्त्रकारों के मतों की अपेक्षा कुछ निराला सा मत प्रकट किया है। शब्द और अर्थ इन दोनों के सम्बन्ध के बारे में प्राचीन शास्त्रकारों के भिन्न भिन्न मत हैं। कोई इस सम्बन्ध को नित्य और स्वभाव सिद्ध समझते हैं तो कोई केवल सांकेतिक और अनित्य समझते हैं। नैयायिक उसे इच्छारूप और नित्य अनित्य बताते हैं। अर्थ के समान शब्द भी शब्द का बोध्य होता है, यह सिद्धांत मानकर सूत्रकार पाणिनि शब्द और अर्थ दोनों 'तादात्म्य' सम्बन्ध सूचित करता है। बोधक शब्द का बोध्य शब्द से तादात्म्य से अलग कोई भी सम्बन्ध सम्भव नहीं है। बोधक शब्द से जैससा तादात्म्य सम्बन्ध है, उसी तरह बोध्य अर्थ से भी वही तादात्म्य सम्बन्ध मानना उचित होगा लेकिन यह तादात्म्य भेदाभेद रूप ही होता है। कभी अभेद वास्तव यानी सत्य और भेद कल्पित होता है तो कभी भेद वास्तव और अभेद कल्पित होता है। जब शब्द का अर्थ शब्द ही हो तो अभेद वास्तव और भेद कल्पित होता है। और जब व्यवहार में शब्द से बाह्य अर्थ का भेद होता है, तब भेद वास्तव और अभेद कल्पित है। 'पुरवं चन्द्र:' 'गृहरलाती बालक:' इत्यादि प्रयोगों में उपमान और उपमेय में होने वाला भेद वास्तव और अभेद काल्पनिक होता है और 'फूल का रंग', 'वृक्ष की शाखा', 'सोने का अलंकार (गहना)' इत्यादि में फल और रंग, वृक्ष और शाखा तथा सोना और अलंकार इनमें होने वाला अभेद वास्तव में और भेद काल्पनिक होता है। इसी तरह शब्द और अर्थ दोनों के सम्बन्ध के विषय में पाणिनि को तादात्म्यवादी मानना ही ठीक होगा।

वैदिक काल से शब्दों के विषय में दो विचार धाराएं चलती थीं। एक विचार धारा कहती है कि भाषा में प्रयुक्त हर एक शब्द, एक या अनेक धातुओं से बना है। शकट ऋषि का पुत्र शाकटायन आचार्य इस मत का बड़ा समर्थक था। ऐसा कथन निरुक्त और महाभाष्य इत्यादि ग्रन्थों में मिलता है। स्वयं निरुक्तकार यास्क भी इस मत का ही समर्थक था। उसने जो अनेकानेक शब्दों की व्युत्पत्तियां बड़ी खींचतान से बताई हैं, उससे यह बात प्रकट होती है। शब्द में केवल एक वर्ण किसी धातु से मिलता हो तो भी नि:संशय होकर केवल उस वर्ण की समानता को लेकर उस धातु से शब्द का निर्वचन करना, लेकिन अमुक शब्द का निर्वचन शक्य नहीं है, ऐसा कभी न कहना, इस बात का सूचक है। इस मत के अनुसार भाषा में प्रयुक्त सब शब्दों का नाम, सर्वनाम, विशेषण, ही क्या अव्ययों का भी निर्वचन ढूंढने की बड़ी कोशिश ज़रूर करनी चाहिए। पाणिनि आदि शास्त्रकारों ने जो केवल स्वेच्छा से रूढ़ किए हैं, ऐसे लट, लिट, इत् आदि यदृच्छा शब्दों का जिनका उपयोग पारिभाषिक अर्थ में केवल विशिष्ट शास्त्र में ही किया गया है और जो व्यवहार में कभी प्रयुक्त नहीं है, ऐसे अर्थहीन शब्दों का भी निर्वचन किसी न किसी रीति से करने का प्रयत्न करने से उसमें भी कुछ सफलता मिल जाएगी, ऐसा इस मत को मानने वालों का कहना है। वर्तमान समय में उस शब्द से जो अर्थ निकलता है, उस अर्थ से वह निर्वसन से संगति रखने वाले अर्थ में प्रयुक्त था और काल प्रवाह में भिन्न अथवा अत्यन्त विरुद्ध अर्थ का बोधक हो गया, ऐसा सम्भव है। तदनुसार हर एक शब्द की व्युत्पत्ति अर्थात् धातु, प्रत्यय आदि से विभाजन अटल रूप से प्रारम्भ में होना है।

दूसरी विचारधारा ऐसी है कि भाषा में कई शब्द रूढ़ और योगिक होते हैं। रूढ़ शब्द को ही शास्त्रकार यद्च्छा शब्द कहते हैं। जिन शब्दों का धातु, प्रत्यय इत्यादि में विभाजन स्पष्ट रूप से मालूम होता है, ऐसे शब्द यौगिक हैं।

अष्टाध्यायी अथवा पाणिनीयाष्टक

पाणिनि का व्याकरण शब्दानुशासन के नाम से विद्वानों में प्रसिद्ध है, परन्तु आठ अध्यायों में विभक्त होने के कारण यही शब्दानुशासन लोक में अष्टाध्यायी अथवा पाणिनीयाष्टक के रूप में जाना जाता है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी से संस्कृत भाषा को अमरता प्रदान की। उनकी व्याकरण की रीति से संस्कृत भाषा के सभी अङ्ग आलौकित हो उठे। सर्वशास्त्रोपकारक के रूप में पाणिनीय अष्टाध्यायी की सहायता से हमें कहीं भी अपना मार्ग ढूँढ़ने में कठिनाई नहीं होती है। संसार की अनेक भाषाएं नियमित व्याकरण के अभाव में या तो लुप्त हो गईं हैं, या इतनी दुरूह हैं कि उन्हें समझना ही दुष्कर हैं। किन्तु संस्कृत भाषा के गद्य और पद्य दोनों पाणिनि शास्त्र से नियमित होने के कारण सदा ही सुबोध बने रहे हैं। आज भी हम पाणिनीय अष्टाध्यायी की सहायता से संस्कृत के प्राचीनतम साहित्य से लेकर नवीनतम रचनाओं का रसास्वाद कर सकते हैं।

अपने व्याकरण को पूर्व एवं सर्वग्राही बनाने के लिए पाणिनि ने देशाटन कर भारत के विभिन्न जनपदों की भाषा, उनके रीति–व्यवहार, वेशभूषा, उद्योग–धन्धे तथा उनके व्यक्ति और जाति–वाचक नामों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। अतः उनका व्याकरण न केवल शब्दानुशासन की दृष्टि से परिपूर्ण है, अपितु वह तत्कालीन सभ्यता और संस्कृति का विश्वसनीय और प्रामाणिक इतिहास भी है। पणिनीय व्याकरण इतना सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक, लाघवपूर्ण और सर्वाङ्गपूर्ण सिद्ध हुआ कि उनके सामने समस्त व्याकरण गौण हो गए। यहाँ तक कि धीरे धीरे प्रादेशिक व्याकरणों का प्रचलन बन्द हो गया और कालान्तर में वे नष्टप्राय हो गए। पाणिनीय अष्टाध्यायी के आठ अध्यायों में से प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं और कुल मिलाकर लगभग चार हज़ार सूत्र हैं। अष्टाध्यायी की सूत्र संख्या के विषय में विद्वानों में थोड़ा विवाद है। कुछ विद्वान् इसके सूत्रों की संख्या 3981 मानते हैं। इनमें यदि 14 प्रत्याहार–सूत्र जोड़ दें तो यह संख्या 3995 हो जाती है। अष्टाध्यायी को वेदाङ्ग मानने वालों की परम्परा में प्रचलित मौखिक पाठ में यह संख्या 3983 है। काशिका और सिद्धान्त–कौमुदी के परम्परागत पाठ के अनुसार 3983 संख्या ही दी हुई है।

अध्याय

व्याकरणीय प्रक्रिया की दृष्टि से अष्टाध्यायी को मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक, वाक्यों के पदों का संकलन (1–2 अध्याय); दो, पदों का प्रकृति–प्रत्यय में विभाग (3–5 अध्याय); तीन, प्रकृति–प्रत्ययों के साथ आगम आदेशादि का संयोजन कर परिनिष्ठित पदों का निर्माण (6–8 अध्याय)। अष्टाध्यायी के प्रथम दो अध्यायों में पदों के सुबन्त, तिङन्त भेदों और वाक्यों में उनके परस्पर सम्बन्ध पर विचार किया गया है। तृतीय अध्याय में धातुओं से शब्द–सिद्धि का विवेचन तथा चतुर्थ और पञ्चम अध्याय में प्रातिपदिकों एवं शब्द सिद्धि का विचार है। षष्ठ एवं सप्तम अध्यायों में सुबन्त एवं तिङन्त शब्दों की प्रकृति–प्रत्ययात्मक सिद्धि एवं स्वरों का विवेचन है, तथा अष्टम अध्याय में सन्निहित पदों के शीघ्रोच्चारण से वर्णों या स्वरों पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा है। यदि प्रतिपाद्य विषयों की दृष्टि से विचार किया जाए तो संज्ञा और परिभाषा, स्वरों और व्यंजनों के प्रकार, धातुसिद्ध क्रियापद, कारक, विभक्ति, एकशेष समास, कृदन्त, सुबन्त, तद्धित, आगम और आदेश, स्वर विचार, दित्व और सन्धि – ये अष्टाध्यायी के प्रतिपाद्य विषय हैं।

अष्टाध्यायी संहिता

पाणिनि ने सम्पूर्ण अष्टाध्यायी संहिता पाठ में रची थी। महाभाष्य में लिखा है[10] 'उभयथा हि तुल्या संहिता स्थानेऽन्तरतम उरण् रपरः इति।' इस प्रकार के प्रमाणों से स्पष्ट है कि पाणिनि ने अष्टाध्यायी संहिता पाठ में रची थी। यद्यपि पाणिनि ने प्रवचन काल में सूत्रों का विच्छेद अवश्य किया होगा (क्योंकि उसके बिना सूत्रार्थ का प्रवचन सम्भव नहीं), तथापि पतञ्जलि ने उनके संहिता पाठ को ही प्रामाणिक माना है। पाणिनीय व्याकरण में कई स्थानों पर प्राचीन व्याकरणों के श्लोकांशों की स्पष्ट झलक उपलब्ध होती है। जैसे ‘तदस्मै दीयते युक्तं श्राणामांसौदनाट्टठिन।’ ये अनुष्टुप् के दो चरण थे। इसमें पाणिनि ने यंक्तं का नियुक्तं पढ़कर दो सूत्रों का प्रवचन किया है। आचार्य युधिष्ठिर मीमांसक जी के अनुसार यद्यपि पाणिनि ने अपने शास्त्र के प्रवचन में सम्पूर्ण प्राचीन वाङ्मय का उपयोग किया है, तो भी पाणिनि का प्रधान उपजीव्य आपिशल व्याकरण है।

सूत्र

अष्टाध्यायी के प्रत्येक पाद की विभिन्न संज्ञाएँ उस–उस पाद के प्रथम सूत्र के आधार पर रखी गईं हैं।

  • गाङ्कुटादिपादः[11]
  • भूपादः[12]
  • द्विगुपादः[13]
  • सम्बन्धपादः[14]
  • अङ्गपादः[15]

पाणिनि की अष्टाध्यायी के अनुशीलन से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे जिस संस्कृत भाषा का व्याकरण लिख रहे थे, वह लोकभाषा थी। सैंकड़ों ऐसे सूत्र हैं जिनका उपयोग व्यवहार–गम्य शब्दों की सिद्धि के निमित्त ही होता है, किसी शास्त्रीय शब्द के लिए नहीं। उदाहरणार्थ – प्लुतविधान की युक्तिमत्ता – प्लुतविधान के निमित्त अनेक सूत्र हैं।

  1. दूर से बुलाने के लिए प्रयुक्त वाक्य के टि की प्लुत संज्ञा होती है – सक्तून् पिब देवदत्त 3 यहाँ दत्त का अन्तिम अकार प्लुत हुआ है।
  2. देवदत्त को दूर से पुकारना होगा तो देवदत्त में तीन स्थानों में क्रमशः प्लुत होगा – देवदत्त, देवदत्त, देवदत्त 3।[16]

पाणिनि ने व्यवहार में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं के नाम सिद्ध करने के लिए सूत्रों का निर्माण किया है। इन वस्तुओं का सम्बन्ध शास्त्रों से न होकर लोक–संस्कृति से है। उदाहरणार्थ– जितना अनाज एक खेत में बोया जाता है, उतने से उसका नामकरण पाणिनि ने किया है। प्रास्थिक, द्रौणिक तथा खारीक आदि शब्द इसी नियम से बनते हैं।[17] अष्टाध्यायी में उस समय प्रचलित ऐसे मुहावरे का प्रयोग है जो संस्कृत को लोकभाषा सिद्ध करते हैं। विविध प्रयोग इसे स्पष्ट सिद्ध करते हैं। शय्योत्थानं धावति–सेज से सीधे उठकर दौड़ता है।[18] अर्थात् शीघ्रता के कारण वह अन्य आवश्यक कार्यों की परवाह किए बिना दौड़ता है।

ग्रन्थ

पाणिनि ने पूर्वाचार्यों के द्वारा निर्दिष्ट प्रभूत संज्ञाओं का प्रयोग अपने ग्रन्थ में किया है, परन्तु लाघव के निमित्त उन्होंने अनेक स्वोपज्ञ संज्ञाएं उद्भवित की हैं जैसे 'घु' संज्ञा– दाधाघ्वदाप्[19], 'घ' संज्ञा– तरतमपौ घः[20], वृद्ध संज्ञा – वृद्धो यूना[21] गोत्र संज्ञा – अपत्यं पौत्रपुभृति गोत्रम्।[22]

पाठान्तर

पाणिनि अष्टाध्यायी के भी पाठान्तर उपलब्ध होते हैं। इन पाठान्तरों को तीन भागों में बांट सकते हैं:–

  1. कुछ पाठान्तर ऐसे हैं, जो पाणिनि के स्वकीय प्रवचन–भेद से उत्पन्न हुए हैं। यथा– उभयथा ह्याचार्येण शिष्याः सूत्रं प्रतिपादिताः[23],
  2. वृत्तिकारों की व्याख्याओं के भेद से– काण्ठेविद्धिभ्यः इत्यन्ये पठन्ति[24],
  3. लेखक के प्रमाद से। यथा– एवं चटकादैरत्येतत् सूत्रमासीत्। इदानीं प्रमादात् चटकाया इति पाठः।

अष्टाध्यायी और उसके खिलपाठ (धातुपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ) के विविध पाठों का सूक्ष्म अन्वेण करके इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि आचार्य पाणिनि के पञ्चाङ्ग व्याकरण का ही त्रिविध पाठ है– प्राच्य पाठ- अष्टाध्यायी के जिस पाठ पर काशिका वृत्ति है, वह प्राच्य पाठ है।
औदीच्य पाठ– क्षीरस्वामी आदि कश्मीर प्रदेशीय विद्वानों से आश्रीयमाण सूत्रपाठ है।
दाक्षिणात्य– जिस पाठ पर कात्यायन ने अपने वार्तिक लिखे हैं, वह दाक्षिणात्य पाठ है।
महाभाष्यकार ने अष्टाध्यायी का प्रयोजन शिष्ट प्रयोगों के ज्ञान का मार्ग प्रदर्शन कराना लिखा है – 'शिष्टपरिज्ञानार्था अष्टाध्यायी'।[25]

पाणिनीय तन्त्र के खिल ग्रन्थ

पाणिनीय सम्प्रदाय की अथवा किसी भी व्याकरण सम्प्रदाय की समग्रता के हेतु पांच अंगों से युक्त होना नितान्त आवश्यक होता है। इसलिए सम्पूर्ण व्याकरण को पञ्चाङ्ग व्याकरण कहा जाता है। इन पांचों अंगों में सूत्रपाठ तो मुख्य ही है, और उसके सहायक अथवा पूरक होने से अन्य अंगों की भी उपयोगिता है। इन्हीं को खिल–ग्रन्थ अथवा परिशिष्ट ग्रन्थ के नाम से पुकारते हैं– 1. धातुपाठ, 2. गणपाठ, 3. उणादिपाठ, 4. लिङ्गानुशासन।

अष्टकं गणपाठश्च धातुपाठस्तथैव च।
लिङ्गानुशासनं शिक्षा पाणिनीया अमी क्रमात्।।

धातुपाठ

पाणिनि का धातुपाठ पाणिनीय व्याकरण का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। पाणिनि–प्रोक्त धातुओं की संख्या लगभग दो सहस्त्र है। ये धातुएं भ्वादि–अदादि दस गणों में विभक्त हैं। प्रत्येक धातु के साथ अर्थ–निर्देश किया गया है। पाश्चात्त्य भाषावेत्ताओं ने पाणिनीय धातु–पाठ की प्रचुर मीमांसा की है।

गणपाठ

गणपाठ अष्टाध्यायी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक अंग है। परस्पर भिन्न किन्तु किसी एक विषय में समानता रखने वाले शब्दों को व्याकरण के एक नियम के अन्तर्गत लाने के लिए आचार्य जी ने गणपाठ का कथन किया। गणपाठ के द्वारा पाणिनि ने अष्टाध्यायी रूपी गागर में ग्राम, जनपद, संघ, गोत्र, चरण आदि से सम्बन्धित भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सामग्री का सागर भर दिया है। व्याकरण नियमों की रचना में सहायक गणपाठ की शैली पाणिनि के हाथों में सांस्कृतिक सामग्री का भण्डार बन गई। कुछ गण तो ऐसे थे जिनका पाणिनि के द्वारा ही पूरा पाठ एक बार में दे दिया गया था। ये पठित गण कहलाए। गोत्र और स्थान–नामों की गणसूचियाँ इसी प्रकार की हैं। दूसरे गण आकृतिगण कहलाए। इन आकृतिगणों के द्वार भाषा में उत्पन्न होने वाले नए–नए शब्दों के लिए सर्वथा खुले हुए थे। गणपाठ की इस विशेषता के कारण नए–नए शब्द पाणिनि–शास्त्र के अनुशासन में आते रहे हैं और भी यह एक जीता–जागता शास्त्र बना हुआ है।

उणादि सूत्र

व्याकरण शास्त्र के अनुसार शब्द दो प्रकार के होते हैं– रूढ़ तथा यौगिक। रूढ़ अव्युत्पन्न होते हैं, अर्थात् उनकी व्युत्पत्ति किसी धातु से नहीं दिखाई जा सकती। यौगिक शब्द धातु से निष्पन्न होते हैं, इसलिए वे व्युत्पन्न होते हैं। उणादि सूत्र प्रत्येक शब्द की साधुता प्रत्यय के योग से सिद्ध करते हैं। फलतः उनकी दृष्टि में कोई शब्द अव्युत्पन्न नहीं है, अर्थात् धातु–विशेष से उनकी सिद्धि अवश्य दिखाई जा सकती है। इन सूत्रों में आरम्भिक सूत्र उण् प्रत्यय का विधान करता है। कृ–वा–पा–जिमि–स्वाद–साध्यशूभ्यं उण् – इस प्रत्यय के आदिम होने के कारण यह समस्त प्रत्यय–समुच्चय उणादि के नाम से प्रख्यात है। प्रत्येक व्याकरण–सम्प्रदाय का उणादि अविभाज्य तथा आवश्यक अंग है। पाणिनीय सम्प्रदाय में उणादि के द्विविध रूप में मिलते हैं–

  1. पञ्चपादी,
  2. दशपादी।

पञ्चपादी पांच पादों में विभक्त है और सूत्रों की पूरी संख्या 759 है; दशपादी दशपादों में विभक्त है, और सूत्रों की संख्या 727 है।

लिङ्गानुशासन

संस्कृत में लिङ्गों का निर्धारण करना कठिन है। स्त्रीबोधक होने वाला दार शब्द पुङ्ल्लिग है और कलत्र नपुंसक है। पुरुष–सुहृद् वाचक होने पर भी मित्र नपुंसक है, शत्रुवाचक 'अमित्र' पुल्लिङ्ग है। इसी कठिनाई को दूर करने के लिए आचार्य जी ने लिंगानुशासन की रचना की। व्याडि ही लिंगानुशासन के सर्वप्रथम सर्वप्राचीन ग्रन्थकार हैं। पाणिनि का लिंगानुशासन सूत्रात्मक है। समग्र सूत्रों की संख्या 188 है। इसमें पाँच अधिकार हैं– स्त्री अधिकार, पुल्लिंग अधिकार, नपुंसक अधिकार, पुंनपुंसक अधिकार। पाणिनीय लिंगानुशासन के प्रवक्ता स्वयं सूत्रकार पाणिनि ही हैं। लिङ्गानुशासन का 30वां सूत्र है– 'अप्–सुमनस्–समा–वर्षाणां बहुत्वम्'। इसमें नित्य बहुवचनान्त स्त्रीलिंग शब्दों का परिगणन है। ये शब्द हैं– अप, सुमनस, समा, सिकता तथा वर्षा।

परिभाषा पाठ

परिभाषा किसी भी व्याकरण–शासन का अनिवार्य अंग है। परिभाषा का लक्षण है– 'अनियमे नियमकारिणी परिभाषा'। सामान्यतः परिभाषा दो प्रकार की होती हैः एक तो पाणिनीय अष्टाध्यायी में सूत्ररूप से गठित है, क्योंकि पाणिनि के अनेक सूत्र 'परिभाषा–सूत्र' के नाम से विख्यात हैं। दूसरे प्रकार की परिभाषाएं वे हैं जो या तो किसी सूत्र से ज्ञापित होती हैं (ज्ञापकसिद्धा), अथवा लोक में प्रचलित न्याय का अनुगमन करती हैं (न्यायसिद्धा परिभाषा)।

फिट–सूत्रपाठ

पाणिनीय सम्प्रदाय में फिट् का अपना महत्त्व है। फिट्सूत्र संख्या में 87 हैं और चार पदों में विभक्त हैं। 'फिट्' शब्द का प्रथमा एकवचन है। 'अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदकिम्'[26] तथा 'कृत्तद्धितसमासाश्च'[27] इन सूत्रों के द्वारा अर्थवान् मूल शब्द की प्रतिपादिक संज्ञा पाणिनीय मत में विहित है। सामान्य रीति से कह सकते हैं कि सुप् विभक्ति के योग से पहले अर्थवान् शब्द का जो मूल स्वरूप रहता है, जैसे– राम, हरि, गो, भानु आदि वही प्रतिपादिक है। और यही प्रतिपादिक 'फिट्' के नाम से इस तन्त्र में प्रख्यात है। फिट्–सूत्र–पाठ के 87 सूत्रों में शब्दों के स्वर संचार पर विचार है। इन सूत्रों की आवश्यकता तो शब्दों के अव्युत्पन्न मानने के अवसर पर आती है। 'अव्युत्पन्नानि प्रातिपादिकानि' पाणिनीय मत का एक बहुचर्चित पक्ष है। विद्वानों के अनुसार फिट् सूत्रों के प्रवक्ता आचार्य शन्तनु हैं। शन्तनु–प्रणीत होने से ही ये सूत्र शान्तनव नाम से प्रख्यात हैं। शन्तनु आचार्य द्वारा प्रणीत इन सूत्रों को पाणिनीय सम्प्रदाय भी अपने शास्त्र का उपादेय अंग मानता है।

पाणिनि ने संस्कृत भाषा को एक अलौकिक एवं अद्भुत शास्त्र प्रदान किया। इस शास्त्र के विधि विधान पाणिनि ने अत्यन्त विचार पूर्वक स्थिर किए थे। विवादास्पद मतों के बीच पाणिनि समन्वय और सन्तुलन का मध्यमार्ग स्वीकार करते हैं। पाणिनि के काल में व्याकरण–सम्बन्धी अनेक मत–मतान्तर प्रचलित थे। उदाहरणार्थ– व्याकरण में स्वाभाविक या प्रचलित संज्ञा उचित है या कृत्रिम संज्ञा, शब्द का अर्थ जाति है या व्यक्ति, अनुकरणात्मक शब्दों का अस्तित्व है या नहीं, उपसर्ग वाचक है सा द्योतक, धातु का अर्थ क्रिया है या भाव, शब्द व्युत्पन्न होते हैं या अव्युत्पन्न आदि। पाणिनि इनमें से किसी भी एक मत का निराकरण नहीं करते, अपितु वे इनके समन्वय का मार् स्वीकार करते हैं। समस्त अष्टाध्यायी में समन्वयात्मक और सन्तुलित दृष्टि की प्रधानता है। इस कारण यह शास्त्र इतनी विशाल शब्द–सामग्री को समेटने, नवीन शब्द–भण्डार को अपने में स्थान देने और सूत्रबद्ध करने में सफल हुआ। इसी कारण इसे लोक में इतनी अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई और पाणिनि का नाम बच्चे–बच्चे तक पहुँच गया – 'आकुमारं यशः पाणिनेः'।

नए दार्शनिकों का समर्थन

पाणिनि के पश्चात् जो उसके टीकाकार हुए उन्होंने शब्दाद्वैत अर्थात् स्फोटवाद के नाम से नए दार्शनिक मत का समर्थन किया है। पाणिनि में उसका निर्देश अत्यन्त अस्पष्ट रूप से भी उपलब्ध नहीं होता है। पूर्वाचार्यों के नाम निर्देश अनेक स्थानों पर पाणिनि ने किए हैं। एक आचार्य 'स्फोटायन' का नामोल्लेख 'अवङ स्फोटायनस्य' सूत्र में है। उसमें स्फोट शब्द का उल्लेख मात्र है, जो स्फोट सिद्धांत पाणिनि से अनेक शताब्दियों के पश्चात् भर्तुहरि आदि वैयाकरणों ने स्वीकृत और समर्थित किया है, उसका स्वल्प मात्र सम्बन्ध भी पाणिनि के सूत्रों में ज्ञात नहीं होता है। 'स्फोटायन' आचार्य के नाम निर्देश से यह स्फोट सिद्धांत सूत्रकार पाणिनि को संमत अथवा कम से कम ज्ञात तो अवश्य था, ऐसा अनुमान अनेक प्राचीन विद्वान् करते हैं, फिर वह तर्क संमत नहीं है।

स्फोट सिद्धांत पाणिनि के पश्चात् अनेक शताब्दियों के व्यतीत होने के बाद एक विशेष परिस्थिति के कारण टीकाकार विद्वानों ने नया ही प्रतिपादित और समर्थित किया है, ऐसा आधुनिक विद्वानों का मत है और वही मत युक्तियुक्त अर्थात् स्वीकारणीय है। वर्ण समूह से व्यक्त होने वाली वर्णसमूहातिरिक्त स्फोट नामक स्वतंत्र वस्तु सूत्रकार पाणिनि को सर्वथा अज्ञात ही थी। संमत थी या नहीं, यह प्रश्न उत्पन्न ही नहीं होता।

संक्षेप में, पाणिनी ऋषि पूर्ण् वास्तववादी था और तत्कालीन लोक भाषा और शास्त्रीय भाषा, दोनों वर्णनात्मक व्याकरण उसने रचा। इस विषय में वह पूर्ण यशस्वी और आदर्श व्याकरणकार था। यह निश्चित रूप से मानना पड़ेगा।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1. 2. 86
  2. मन्यतरस्याम् 1. 2. 58
  3. 7. 2. 108
  4. 3. 3. 1
  5. 1. 2. 53
  6. 1. 2. 53 से 1. 2. 57
  7. स्वं रूपं शब्दस्याशब्द संज्ञा1. 1. 68
  8. प. भा. 1. 1. 68
  9. वा. प. 1. 123
  10. 1.1.50
  11. 1.2
  12. 1.3
  13. 2.4
  14. 3.4
  15. 6.4
  16. 8.2
  17. तस्य वापः 5.1.45
  18. 3.4.52
  19. 1.1.20
  20. 1.1.22
  21. 1.2.65
  22. 4.1.162
  23. काशिका– 6.2.104
  24. पदमञ्जरी–4.1.81
  25. 6.3.109
  26. 1.2.45
  27. 1.2.46

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