प्रशासनिक हिन्दी का विकास -डॉ. नारायणदत्त पालीवाल  

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लेखक- डॉ. नारायणदत्त पालीवाल

          हमारे देश में काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा गुजरात से लेकर नागालैंड तक अनेक भाषाएँ, उपभाषाएँ, बोलियाँ तथा उपबोलियाँ बोली जाती है। इनमें विभिन्नता के होते हुए भी एकता के दर्शन होते हैं। प्राचीन काल से भावनात्मक एकता के संदेश के साथ साथ भारतीय साहित्य में देश की सांस्कृतिक गरिमा, यहाँ की सभ्यता, यहाँ के आदर्श और जीवन के शाश्वत मूल्यों, यहाँ की सभ्यता, यहाँ के आदर्श और जीवन के शाश्वत मूल्यों को समान रूप से वाणी मिली है। यही कारण है कि सभी भारतीय भाषाएँ भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इस धरती पर सांस्कृतिक एकता की पावन गंगा प्रवाहित करती है। भाषा मानव को मानव से जोड़ती है। यह विचारों के आदान प्रदान में सहायक होने के साथ साथ परंपराओं, संस्कृतियों और मान्यताओं तथा विश्वासों को समझने का माध्यम भी हे। प्राचीनकाल से ही विभिन्न भाषाएँ इस देश में पारस्परिक स्नेह, भाई-चारे की भावना तथा सांस्कृतिक एकता और अखंडता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमका निभाती रही है। इस विचार से देखा जाए तो संस्कृत, हिन्दी तथा भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त अन्य प्रदेशिक भाषाएँ इस देश की सामासिक संस्कृति के विकास के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

हिन्दी के विकास में संस्कृत की भूमिका

संस्कृत भाषा के विषय में संस्कृत के प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान् मोनियर विलियम ने कहा है कि ‘यद्यपि भारत में पाँच सौ से अधिक बोलियाँ प्रचालित है, परंतु हिन्दुत्व को मानने वाले सभी व्यक्तियों के लिए, चाहे वे कितनी जाति, कुल, मर्यादा, संप्रदाय और बोलियों की भिन्नताओं के क्यों न हो, सर्वसम्मति से स्वीकृत और समादूत एक ही पवित्र भाषा और साहित्य है और वह भाषा है - संस्कृत और वह साहित्य है - संस्कृत साहित्य[1]। इसे किसी काल और सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। संस्कृत को विश्व की 3 प्राचीन महान् भाषाओं में गिना जाता हे। यदि पिछली कई शताब्दियों के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें ज्ञात होगा कि जब देश छोटे छोटे राज्यों और प्रांतों में बँटा था तो संस्कृत को कार्य व्यवहार के लिए महत्वपूर्ण भाषा के रूप में अपनाया गया था। भारत की प्रादेशिक भाषाएँ भी संस्कृत के प्रभाव के अंतर्गत रही है। अनेक सरकारी लेखपत्रों, कानूनों नियमों तथा सरकार और नागरिकों से संबंधित अनेक अभिलेखों का संस्कृत में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक कार्यों में इस भाषा का प्राचीन काल में प्रचलन था। इसके अतिरिक्त यह भाषा हमारे धर्मग्रंथों तथा शैक्षिणिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक साहित्य की प्राण रही है। हिन्दी साहित्य की अनेक कृतियों पर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट है। हिन्दी के आदिकाल को ही लिया जाए तो उससे पहले की भाषा अपभ्रंश पर भी संस्कृत का व्यापक प्रभाव रहा है। जहाँ तथा प्रशासनिक हिन्दी का प्रश्न है स्वतंत्रता से पूर्व अनेक रियासतों का कामकज अंग्रेजी में न होकर हिन्दी में चलता था। 1000 ई. के बाद मुसलमानों के आगमन पर अवश्य ही संस्कृत का प्रयोग समाप्त हो गया और प्रशासनिक भाषा पर अरबी-फारसी का प्रभाव पड़ा तथा मुसलमान शासकों के समय सरकार, तहसीलदार, वकील, चपरासी, सिपाही अमीन, जिला, दफ्तरी, खजांची, माल कमान आदि के समान शब्द सरकारी कामाकज में प्रचलित हो गये जो आज भी लोकप्रिय हैं और बराबर प्रयोग में आ रहे हैं।
यह परिवर्तन स्वाभाविक भी था क्योंकि बदली हुई परिस्थितियों तथा ज्ञान और विज्ञान की विकसित अवस्था के साथ साथ कोई भी जीवंत भाषा नए शब्दों और अर्थों को अपनाती है। इस प्रकार सरकारी कामकाज की हो या सामान्य जनता के प्रयोग की, किसी भी भाषा को नई दिशा मिलती रहती है। अंग्रेजी राज्य के दौरान शिक्षा, ज्ञान विज्ञान और राजनीति के क्षेत्र में परिवर्तन हुए। अतः नये आयाम और नई दिशाओं को वाणी देने के लिए भाषा भी अपने रूप को उसी के अनुकूल परिवर्तित करती गई है। जहां तक शब्दावली का प्रश्न है भाषा में संस्कृत, अंग्रेजी, अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द खपते चले गये। अंग्रेजी ने अपने शासन की सुविधा के लिए हिन्दी और संस्कृत के शब्दों को भी अपनाया। इसीलिए मुकदमा, गवाह, खारिज, पेशी तथा अर्जी जैसे शब्दों के साथ साथ समन, जज, वारंट तथा एडवोकेट जैसे शब्द भी आम प्रचलन में आ गए।

हिन्दी का राष्ट्रव्यापी रूप

अंग्रेजों के विरुद्ध सुदूर उत्तर से दक्षिण तक पूर्व से पश्चिम तक जो राष्ट्रव्यापी आंदोलन चला उसका माध्यम अधिकांश रूप में हिन्दी होने के कारण यह भाषा राष्ट्रवयापी रूप में सामने आई। इस प्रकार हिन्दी एक अखिल भारतीय भाषा के रूप में इस देश को जोड़ती हुई धीरे धीरे पारस्परिक कार्य व्यवहार की भाषा के रूप में विकसित होने लगी और उसे संस्कृत के पश्चात् इस देश के जनमानस को जोड़ने वाली भाषा का रूप मिला। डाॅ. सुनीति कुमार चटर्जी का कथन है कि ‘अपने देश से प्रेम रखने वाले जो भारतीय राष्ट्र को अखंड मानते हैं, अवश्य स्वीकार करेंगे कि हमारी राष्ट्रीय, व्यापारिक तथा सांस्कृतिक एकता के बाद हिन्दी को ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप मानता हूूं। इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ साहित्यिक और अंतप्रांतीय व्यवहार में हिन्दी को जो महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ उसमें बदलती हुई परिस्थितियों और उर्दू तथा भारत की सभी भाषाओं का सहयोग सम्मिलित है। चूंकि संस्कृत की भूमिका भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त अन्य सभी भाषाओं और हिन्दी के विकास तथा पोषण का मार्ग सुगम बनाने में उसका योगदान महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। अंतप्रांतीय विचार से हिन्दी की शब्दावली में संस्कृत अथवा तत्सम शब्दों को प्रधानता देना आवश्यक है। इसी आधार पर हिन्दी की शब्दावली का आवश्यक अंग अखिल भारतीय रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
मेरा मत तो यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा (जो नाम अब भारत की सभी मान्यता प्राप्त भाषाओं के लिए प्रयुक्त होता है) का स्थान इसलिए प्राप्त नहीं हुआ कि वह सभी भारतीय भाषाओं में श्रेष्ठ है वरन् इसलिए प्राप्त हुआ कि इस भाषा का देश में सबसे अधिक प्रचार और प्रसार है तथा इसे अधिकांश जनता समझती तथा बोलती है। हिन्दी प्रारंभ से भारत के सभी प्रांतों में बोली व समझी जाती थी और प्रायः सभी प्रांतों के अहिन्दी भाषी लेखकों ने इस भाषा में साहित्य सृजन भी किया है। इससे इस भाषा को संस्कृत की भांति अखिल भारतीय रूप मिला है। हिन्दी को उसका अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने में देश के कोने कोने में फैले हुए मज़दूर वर्ग, व्यापारी वर्ग, आजीविका व विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

राजभाषा हिन्दी की संवैधानिक स्थिति

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो इस बात की आवश्यकता पड़ी कि नवोदित राष्ट्र की गरिमा और आत्मसम्मान के अनुकूल हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकृत और विकसित किया जाए। अतः समाज की नई नई आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन के रूप में और भारतीय जन जीवन के चिंतन तथा भावनाओं और संवेदनाओं की अभिव्यंजना के माध्यम के रूप में अन्य भारतीय भाषाओं के सहयोग के साथ साथ हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में चुना गया। भाषायी स्वाभिमान स्वतंत्र राष्ट्र के जीवन का एक अंश होता है। अतः स्वतंत्रता के पश्चात् हिन्दी को राजकाज की भाषा बनाने के पीछे यह भावना थी कि संपर्क भाषा के रूप में विकसित होकर हिन्दी, ज्ञान विज्ञान, अध्ययन-अध्यापन और साहित्य की ही भाषा न रहे वरन् उसे प्राशसनिक भाषा का रूप भी दिया जए और सरकारी काम काज बोलचाल तथा कार्य व्यवहार की भाषा बना दिया जाए। यह ठीक भी था क्योंकि कोमलकांत पदावली प्रशासनिक कार्यों के लिए प्रयोग में नहीं लाई जा सकती। जिस भाषा ने संत कबीर की साखियों को सजाया, सूरदास और तुलसीदास की कविता को संवारा और प्रसाद, पंत तथा महादेवी के गीतों को मधुर रूप दिया उसे संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने तथा प्रशासन के क्षेत्र में जन जन की भाषा बनाने के प्रयत्न किए गए। अतः साहित्यिक हिन्दी तथा बोलचाल की हिन्दी को न्यायालयों, विद्यालयों, कार्यशालाओं, प्रशासनिक संस्थाओं और सरकारी पत्र व्यवहार में अपनाए जाने के लिए नया रूप दिया जाने लगा। अतः यह प्रयास किया गया कि धीरे धीरे सरकारी क्षेत्रों मेें ऐसा वातावरण बने जो हिन्दी को अपने दैनिक कार्य में अपनाने के लिए सहायक हो। इसके लिए वैधानिक व्यवस्था के साथ साथ मानवीय और भौतिक साधन जुटाने का प्रयास किया गया और राजभाषा के रूप में हिन्दी को सरकारी कामकाज का माध्यम चुन लिया गया। भारत के संविधान निर्माताओं ने हिन्दी का महत्व सामझते हुए उसे राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में अंगीकार करने की व्यवस्था की। फलतः भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 में यह व्यवस्था की गई कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई हिन्दी यहां की राजभाषा होगी। संविधान के अनुच्छेद 351 में इसकें लिए जो निर्देश दिए गये हैं वे इस प्रकार हैं-

‘हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि कर उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः वैसी उल्लिखित भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा।’

प्रारंभ में यह व्यवस्था थी कि अंग्रेजी का प्रयोग 1965 तक चलता रहे तथा बीच में हिन्दी को विकसित रूप दे दिया जाए। भाषा के प्रश्न पर 1965 में खेर आयोग की स्थापना की गई और उस आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए 1957 में पंत समिति बनाई गई। इस आयोग तथा समिति दोनों ने जहां हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने की सिफारिश की वहीं अंग्रजी का प्रयोग 1965 के बाद भी जारी रखने की सिफारिश की। इन परिस्थितियों को कार्य रूप देने के लिए 1963 में संसद द्वारा राजभाषा अधिनियम 1963 पास किया गया। इसके अनुसार यह व्यवस्था की गई कि संघ के जिन कार्यों के लिए 26 जनवरी, 1965 से पहले अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता था उनके लिए उस तारीख के बाद भी हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है। बाद में परिस्थितियां बदलीं और 1967 में राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 1967 पास किया गया। इस प्रकार यह व्यवस्था हुई कि ‘हिन्दी ही संघ की राजभाषा होगी, किंतु अंग्रेजी के इस्तेमाल की छूट तब तक बनी रहेगी, जब तक हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमंडल अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त करने के लिए संकल्प न पारित करें और उनके संकल्पों पर विचार करने के बाद संसद के दोनों सदन भी ऐसा ही न करें।’ इस प्रकार कानून के विचार से सरकारी कागजपत्रों, लिखा पढ़ी और दैनिक कार्यों में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं को चलाने की व्यवस्था हुई। हाल ही में भारत सरकार द्वारा हिन्दी के संबंध में एक अधिसूचना जारी की गई है जिससे प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी के व्यापक प्रयोग की व्यवस्था की गई है।

हिन्दी में तकनीकि शब्दावली का विकास

हिन्दी को प्रशासनिक कार्याें में लाने के लिए सबसे पहले तकनीकी शब्दावली की आवश्यकता पड़ी। इस दिशा में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय तथा वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग ने बड़ा काम किया। उनके प्रयास से विभिन्न विषयों की शब्दावली के संकलन तैयार किए गए और प्रशासनिक क्षेत्र में प्रयोग के लिए पारिभाषिक शब्द संग्रह बनाए गए। यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत की शब्द निर्माण सामर्थ्य की बराबरी कोई भाषा नहीं कर सकती। संस्कृत की लगभग 2000 धातुएं अनेक शब्दों के निर्माण मे सहायक हैं। इसकें साथ ही प्रत्यय और उपसर्ग लगाकर नए शब्दों का निर्माण किया जा सकता है। यहां तक कहा गया है कि उपसर्ग, प्रत्यय और धातुओं की सहायता तथा शब्दों के क्रम परिवर्तन, संधि आदि से लगभग 85 करोड़ शब्द बनाए जा सकते हैं। परंतु देखना है कि अनेक शब्द केवल कोश की ही शोभा बनाने के लिए हैं या वे व्यवहारोपयोगी भी हैं। अतः अति उत्साह और केवल संस्कृत निष्ठ शब्दावली के प्रयोग का मोह छोड़ना व्यावहारिक दृष्टि से कहीं अधिक उपयोगी है। यही कारण है कि आरंभ में संवैधानिक, विधि और प्रशासनिक क्षेत्र में शब्दावली से संबंधित समस्या को हल करने के लिए बनाए गए कुछ कोश महत्वपूर्ण होते हुए भी लोकप्रिय नहीं हो सके। इसका कारण यह है कि प्रशासनिक कार्य के क्षेत्र में ऐसी शब्दावली का स्वागत होता है जो व्यावहारिक रूप से सहज, स्वाभाविक और और समझ में आ सकने योग्य हो। वास्तव में जिस भाषा का प्रयोग सरकारी कार्यो में किया जाता है और जो विभिन्न विभागों अथवा दैनिक सरकारी पत्र व्यवहार के लिए अथवा एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच पारस्परिक आदान प्रदान के प्रयोग में आती है। उस भाषा का स्वरूप न तो पूरी तरह से सामान्य बोलचाल की भाषा से मेल खा सकता है और न पूरी तरह स साहित्यिक भाषा से। अतः उसका स्वरूप कुछ अलग ही होता है और उसकी शब्दावली भी उसी के अनुरूप होना अनिवार्य है।
जहां तक हिन्दी की अपनी शब्द संपदा का प्रश्न है हमें अनेक शब्दकोश मिलते है। इस बीच नए नए शब्द इन कोशों में और भी जुड़ गए हैं। यहां तक कि हिन्दी शब्दसागर के 11 भागों में लगभग 2,11,50,000 शब्द उपलब्ध हैं। प्रश्न हिन्दी की संपदा का उतना नहीं है जितना कि अभिव्यंजना शक्ति और समय की संपूर्ण परिस्थितियों के अनुरूप ज्ञान विज्ञान की विभिन्न शाखाओं से संबंधित पारिभाषिक और प्राविधिक अर्थ रूपों को समझा सकने योग्य होने की उसकी सामर्थ्य का है। अतः हिन्दी के विकास की यह नई दिशा अत्यंत महत्वपूर्ण रही है और भाषा को नए नए शब्द और अर्थ मिले हैं। अब धीरे धीरे न्यायालयों में, कार्योलयों में, समाचार पत्रों में, कार्यशालाओं में और जनता तथा सरकार के पारस्परकि कार्य व्यवहार में एक नए रूप में उभर कर सामने आ रही है। इस कार्य में विभिन्न राज्यों ने शब्दावली के निर्माण का कार्य किया है और उसके द्वारा बनाए गए अनेक कोश, शब्द संग्रह अथवा शब्द संकलन निरंतर प्रयोग में आ रहे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा दिल्ली प्रशासन आदि सम्मिलित हैं।

विधि शब्दावली

जहां तक कि विधि शब्दावली का संबंध है विधि मंत्रालय के अधीन राजभाषा विधायी आयोग द्वारा इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। ऐसी शब्दावली का निर्माण हुआ है जो अनेक अधिनियमों के हिन्दी रूपों में प्रयोग में लाया जाता गया है। यह आवश्यक है कि कानून के क्षेत्र में जनता को अपनी भाषा के प्रयोग की छूट होनी चाहिए। अब तक न्यायालयों में हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी और अन्य क्षेत्रों में वहां की क्षेत्रीय भाषा का स्थान नहीं मिलता तब तक यह समस्या उलझी ही रहेगी। यह कैसी विडंबना है कि न्यायालय में जिस समय निर्णय सुनाया जाता है उस समय अंग्रेजी न जानने वाले अपराधी या पक्ष को यह मालूम भी नहीं हो पाता कि उसे क्या दंड दिया जा रहा है अथवा उसके मामले में क्या किया गया। यहां हमें यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कानून के क्षेत्र में शब्दों का विशेष महत्व है। वहां एक शब्द के लिए निर्वाचन द्वारा एक ही निर्धारित अर्थ होता है। जैसे -

नियम (रूल) अभियोग (चार्ज)
उपनियम (बाइ लाज) अभियोजन (प्रोसीक्यूशन)
विनिमय (रेग्यूलेशन) अभियोक्ता (प्रोसीक्यूटर)
अधिनियम(एक्ट) अभियुक्त (क्रिमिनल)
नियमावली (रूल्स एंड रेग्यूलेशन) द्वोष (कनविक्शन)
विधेयक (बिल) द्वोष मुक्त (एक्टिवेटेड)
धारा (सेक्शन) सिद्ध द्वोष (कंविक्ट)
उपधारा (सबसेक्शन) द्वोषी (एक्यूज्ड)
खंड (क्लौज) वादी (प्लैंटिफ)
उपखंड (सब क्लौज) प्रतिवादी (डिफैडैंट)

कानून की भाषा में वाक्य की यथावतता भी आवश्यक है। इस क्षेत्र में यदि हम भाषा को सरल और सुबोध बनाने के लिए प्रयास द्वारा शब्द परिवर्तन करेंगे तो अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। अतः कानून की शब्दावली में हमें कभी कभी कठिन शब्दों का स्वागत करना पड़ेगा जो प्रयोग द्वारा ही सरल लग सकेगें। संस्कृत शब्दावली इस दिशा में सहायक हुई। सरलता के विचारा से इस समय आज प्रचलन में आए शब्द जैसे समन, अर्जी, हलफ़नामा, बयान, बहस, वारंट, जिरह, वकील, अपील, आदि शब्दों को प्रयोग में लाते रहने की परंपरा बनी हुई हैं। कानून के क्षेत्र मं प्रत्येक शब्द का अपना निश्चित और स्पष्ट अर्थ होने के कारण कानूनी शब्दावली के निर्माण में कानूनी पहलू का विचार भी महत्वपूर्ण है। इस दिशा में हिन्दी भाषी राज्य के विधि व भाषा मंत्रियों के जयपुर और भोपाल के सम्मेलनों में नीति संबंधी दिशा संकेत दिया गया है और कानूनी शब्दावली के अनेक मानक शब्दकोश तैयार किए गए हैं।

प्रशासनिक शब्दावली तथा संस्कृत

सरकारी कामकाज की शब्दावली में कुछ तो पदनाम होते हैं और कुछ पत्र व्यवहार के लिए प्रयोग में आने वाले विशिष्ट शब्द तथा वाक्यांश होते हैं। इसकें अतिरिक्त नियमों, विनियमों, अधिसूचनाओं, संहिताओं और विभिन्न विभागों से संबंधित नियमों की शब्दावली होती है। आरंभिक स्थिति में उपसर्ग और प्रत्यय लगाकर अनेक शब्द बनाए गए। उदाहरण के लिए, सचिव (सेक्रेटरी) शब्द को लें। इसके साथ आरंभ में आने वाले पर्याप्त शब्द आसानी के साथ बन गए। उपसचिव, अवर सचिव, सह सचिव, संयुक्त सचिव, निजी सचिव, वैयक्तिक सचिव, महासचिव, संसदीय सचिव, मंत्रि परिषद सचिव आदि शामिल हैं। इसी भांति सचिवालय (सेक्रेटेरियेट), सचिवालयीय (सेक्रेटेरियल) आदि शब्द भी गिने जा सकते हैं। ऐसे शब्दों के निर्माण में संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट है।
          इस पद्धति को अपनाने पर विभिन्न प्रकार की संकल्पनाओं को व्यक्त करने के लिए थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ हमारे पास एक शब्द समूह उपलब्ध हो जाता है। जैसे प्रारूप (ड्राफ्ट) शब्द की सहायता से प्रारूपण, प्रारूपकार, प्रारूपित आदि शब्द बनाए जा सकते हैं। परंतु इसकें उर्दू समानार्थी ‘मसौदा’ शब्द को इस प्रकार के रूपों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। यही नियम हिंदी के पत्र, परिपत्र (सर्कुलर) प्रपत्र (फार्म), पत्रावली (फाइल), पत्राचार अथवा पत्रव्यवहार पर भी लागू होता है जो कदाचित चिट्ठी अथवा खत शब्द से पूरा नहीं हो सकता। विभिन्न प्रकार की संकलपनाओं को अभिव्यक्त करने के सिलसिले में अधिकार शब्द को भी लिया जा सकता है जिसको यदि अधिकृत बना दिया जाए तो अंग्रजी के आॅथराइज्ड शब्द का अर्थ बन जाता है। हमें औथेंटिक के लिए शब्द की आवश्यकता होती है तो इसी की सहायता से प्राधिकृत शब्द बना लिया जाता है। इसी संदर्भ में आॅफिसर के लिए अधिकारी शब्द का प्रयोग भी अफसर के स्थान पर अधिक उपरयोगी लगता है। यही बात कानून के क्षेत्र मे प्रयोग की जाने वाली शब्दावली पर भी निर्भर है। उदाहरण के लिए, विधि शब्द को लीजिए। इसका प्रयोग कानून के बदले किया जाता है। हम इसकी सहायता से उपविधि (बाइ-लाॅ), विधायक (लेजिस्लेटर), विधायिका (लेजिस्लेचर), विधिक (लीगल), विधिसम्मत (इन कंफर्मिटी विद लाॅ), विधिवेत्ता (कानून का जानकार) विधिविशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट इन लाॅ) आदि शब्द बना सकते हैं यह स्पष्ट है कि केवल कानून शब्द से हम इतने अधिक शब्द नहीं बना सकेंगे। इसी प्रकार विधान, वैधानिक, संविधान, वैधानिकता और संवैधानिक आदि शब्दों का उदाहरण दिया जा सकता है।
          प्रशासनिक क्षेत्र में कुछ शब्द ऐसे भी प्रयोग में आते है। जिनका अर्थ सामान्य तथा एक सा लगता है और साधारण बालचाल में ऐसे शब्दों के लिए हम एक ही शब्द से काम चला सकते हैं। परंतु जब कार्यालय की औपचारिकता का ध्यान रखते हुए यदि सरकारी प्रयोजनों के लिए उन शब्दों का प्रयोग किया जाए तो यह आवश्यक हो जाता है कि उनके लिए अलग अलग शब्द प्रयोग में लाएं उदाहरण के लिए, आदेश, निदेश, अनुदेश, अध्यादेश तथा समादेश शब्दों को लिया जा सकता है जो क्रमशः अंग्रेज़ी के आर्डर, डायरेक्शन इंस्ट्रक्शन आॅर्डिनेंस ओैर कमांड के लिए प्रयोग में आते हैं। इसी तरह यदि हम कार्यालयी बातचीत में कहे कि आप क्या रिमार्क देंगे या आपके कमेंट्स क्या हैं अथवा आपका ओबजरवेशन क्या है या आप की ओपिनियन क्या है अथवा आप के व्यूज क्या है तो ऐसा लगता है कि हम किसी विषय पर किसी के विचार जानना चाहते है और साधारणतया आपकी क्या राय है कहने से काम चल सकता है। परंतु व्यावहारिक प्रयोग में जहाँ कभी-कभी ये शब्द साथ-साथ प्रयोग में आ जाएँ वहाँ कठिनाई आती है और नए-नए शब्दों की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप रिमार्क के लिए टिप्पणी, कमेंट्स के लिए राय, ओवजरवेशन के लिए मंतब्य, ओपिनियन के लिए मत और व्यूज के लिए विचार शब्द प्रयोग करना आवश्यक हो जाता हेै, जबकि सामान्य बोलचाल में हम इन सब के लिए सलाह शब्द से ही काम चला सकते हैं।

सरल भाषा तथा लोक-प्रचलित प्रयोगों का महत्व

प्रशासन के क्षेत्र में हिन्दी को बढावा देनेे के लिए यह आवश्यक है कि भाषा सरल ओैर समझ में आ सकने योग्य हो। इसके लिए प्रचलित प्रयोगों का भी अपना अलग महत्व है। इसीलिए प्रशासनिक भाषा में शब्द चयन में बडी सतर्कता आवश्यक है, जिससे मूल सामग्री का अर्थ परिवर्तित न हो। शब्दावली के क्षेत्र में एक बात यह भी है कि किसी विशेष क्षेत्र मे कार्य करने वालों को उस क्षेत्र-विशेष की शब्दावली की ही अधिक आवश्यकता पड़ती है जैसे शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग में आने वाली शब्दावली की चिकित्सा के क्षेत्र में या न्यायालयों मे काम करने वाले कर्मचारियों को उतना प्रयोग नहीं करना पडता है इसके लिए उन्हें अपने दैनिक कार्य से संबंधित बुनियादी शव्दावली के ज्ञानार्जन की ही अधिक आवश्यकता रहती हैं।
हिन्दी मे मशीन, डायरी, बस, कार, मोटर, बैंक, चैक बैक-ड्राफ्ट, मनी आर्डर, रेडियो, सिनेमा, गैस, कार्ड, मैनेजर, कमीशन, बिल आदि शब्द बहुत ही लोकप्रिय रूप में चल रहे हैं। इसी तरह सलाहकार बोर्ड, ज़िला बोर्ड, जांच कमेटी, वार्ड अधिकारी, जनाना वार्ड, सेमिनार कक्ष जैसे शब्द सामान्य बोलचाल के अतिरिक्त प्रशासनिक कार्यों में भी पूरी तरह से अपना लिए गये हैं। यहां तक कि ‘कल’ के बदले ‘मशीन’ और ‘सुई लगाना’ के बदले ‘इंजेक्शन’ अधिक आसान प्रतीत होने लगा है। इतना ही नहीं अंग्रेजी के एटम शब्द से एटमी, मैनेजर से मैनेजरी, इंजीनियरिंग से इंजीनियरी और डॉक्टर से डॉक्टरी आदि शब्द हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल ढाल लिए गए हैं। इसीलिए अभियांत्रिकी या चिकित्सकीय जैसे प्रयोग अधिक लोकप्रिय नहीं रहे हैं।
उपर्युक्त स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि संस्कृत की शब्दावली में नए शब्दों का निर्माण भले ही सुगम हो जाता हो परंतु ऐसे शब्द जो जनता की जबान पर चढ़ चुके हैं और आम बोलचाल अथवा सामान्य कार्यव्यवहार में निरंतर प्रयोग में आ रहे हैं, हिन्दी को अधिक जीवंत और लोकप्रिय बनाने में सहायक हैं। शब्दकोश में जितने शब्द दिए जाते हैं, सामान्य कार्यव्यवहार में प्रयोग के लिए अर्थ की स्पष्टता और विभिन्न संकल्पनाओं की अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति के लिए शब्द चयन में पूरी सतर्कता अपेक्षित होती है केवल कोश के सहारे शब्दों का मनमाना या अंधाधुंध प्रयोग भाषा की एकरूपता की दृष्टि से तो ठीक नहीं ही है वरन् इससे अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। प्रशासन का कार्य एक विशेष कार्यप्रणाली पर आधारित होता है। यही कारण है कि इस कार्य की भाषा भी तकनीकी प्रकार की होती है जिसका स्वरूप साहित्यिक भाषा तथा साधारण भाषा की बोलचाल में प्रायः अलग होता है। इस भाषा का संबंध केवल सरकारी कार्यालयों से नही वरन् सामान्य से भी होता है। अतः जितना अधिक सरल रूप इसेे दिया जा सके उतनी ही अधिक सुविधा जन सामान्य को मिल सकेगी। यही कारण है कि सरकारी भाषा अर्थात् प्रशासनिक हिन्दी के संबंध में सरल या कठिन भाषा की बात उठाई जाती रहती है। कठिन शब्दावली के प्रयोग से भाषा जितनी बोझिल होगी उतनी वह जन साधारण से दूर हो जाएगी। परंतु अखिल भारतीय रूप को ध्यान में रखा जाए तो वह समस्या भी सामने आती है कि किस शब्द को सरल कहा जाए और किसे कठिन। उर्दू जानने वालों के लिए मंजूरी, दख़ल, पेश करना आदि सरल हैं तो संस्कृत अथवा बंगला आदि जानने वालों के लिए स्वीकृति, हस्तक्षेप तथा प्रस्तुत करना आदि सरल हो सकते हैं। वास्तव में भाषा का संबंध विषय से है। अतः भारत जैसे देश मे जहां अनेक प्रकार की क्षेत्रीय भाषाएं हैं, सरल और कठिन भाषा की समस्या और भी उलझ जाती है। निरंतर प्रयोग से शब्द सरल लगने लगते हैं और भाषा भी उन्हें आत्मसात कर लेती है। आरंभ में राष्ट्रपति, संसद, विधेयक आदि शब्द कठिन लगते थे परंतु अब अभ्यास और प्रयोग के कारण ये शब्द बहुत लोकप्रिय हो गये हैं। यही कारण है कि गढ़े हुए शब्दों से भाषा को बोझिल बनाने की अपेक्षा भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाओं में से प्रचलित शब्द बदल दिए जाएं तो धीरे धीरे से शब्द हिन्दी में खप जाएंगे और इससे भाषायी एकता भी विकसित होगी। ‘सबडिविजनल मजिस्ट्रेट’ के लिए ‘खंडमंडलाधीश’ तथा ‘एक्जीक्यूटिव इंजीनियर डिविजन-1’ के लिए अधिशासी अभियंता प्रथम प्रखंड जैसे प्रयोगों से जितना बचा जा सके उतना अच्छा है।

हिन्दी अनुवाद व मूल प्रारूपण की समस्या

सरकारी कामकाज कई वर्षों से अंग्रेज़ी में किया जा रहा है। अतः माध्यम परिवर्तन के लिए अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है। यह कहा गया है कि अनुवाद यदि सुंदर है तो वह ईमानदार नहीं हो सकता और ईमानदार है तो वह सुंदर नहीं हो सकता है। इस सुंदरता का आशय उस भाषा के लालित्य तथा उसकी प्रकृति के अनुकूल होने से है जिस भाषा में अनुवाद किया गया है। इसके लिए प्रारूप तथा पत्र की रूपरेखा मूूल से हिन्दी अथवा संबंधित क्षेत्रीय भाषा में तैयार करना अधिक उचित होगा।
टिकट, स्टेशन, प्लेटफार्म जैसे शब्दों के लिए यात्रा पत्र, गाड़ी-विश्राम-स्थल, यात्री विश्राम स्थल जैसे शब्दों का प्रयोग उचित नहीं है। कभी कभी शब्द गढ़ने का मोह हमें मक्षिकास्थाने मक्षिका की स्थिति में ला देता है। इससे अनुवाद में अस्वाभाविकता आ जाती है और वह अशुद्ध भी हो सकता है। जैसे ‘वैल इक्विप्ड हाॅस्पीटल’ का हिन्दी अनुवाद भूल से ‘कुओं से सज्जित अस्पताल’ किया जा सकता है, जो अशुद्ध है। अंग्रेजी में प्रचलित परिपाटी के अनुसार ‘द अंडर साइंड इज डाइरेक्टिड टू से’ का हिन्दी अनुवाद ‘निम्नहस्ताक्षरकर्ता या अधोहस्ताक्षरी को यह कहने का निदेश हुआ है’ किया जाता है। यह हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। इसी तरह ‘कोल्ड ब्लडैड मर्डर’ के लिये नृशंस हत्या न लिखकर ‘शीत रुधिर हत्या’ लिखना तथा ‘रेफ्रीजरेटर वाटर’ के लिए सरल व स्वाभाविक रूप में ‘मशीन का ठंडा पानी’ न लिखकर ‘प्रशीतनकृत जल’ लिखना कहां तक ठीक होगा, इसका स्वयं ही अनुमान लगाया जा सकता है। किंतु प्रचलन में इस तरह के कुछ विशेष शब्द हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल भी जान पड़ते हैं और उनका प्रयोग विशुद्ध रूप से शब्द के स्थान पर शब्द का अनुवाद होते हुए भी अटपटा नहीं लगता। जैसे- लालफीताशाही (रेडटेपिज़्म), श्वेत पत्र (व्हाईट पेपर), रजत जयंती (सिल्वर जुबली), ललित कला (फाइन आर्ट), शीर्षक (हैडिंग) आदि। अंग्रेजी के ‘इंटर’ शब्द के लिए हिन्दी ने संस्कृत ‘अंतर’ शब्द अपना लिया है और इसके साथ अन्य शब्द जोड़कर हिन्दी के अनेक शब्द बना लिए गए हैं जो बराबर प्रयोग में आ रहे हैं। जैसे अंतर-विद्यालीय, अंतर-राजयीय, अंतर्राष्ट्रीय, अंतर्देशीय, अंतर-प्रांतीय, अंतर-विभागीय आदि सभी इसी प्रकार रिंग सर्विस के लिए मुद्रिका सेवा अथवा तीव्र मुद्रिका जैस कठिन लगने वाले शब्द लोकप्रियता प्राप्त कर चुके हैं। इसी प्रकार मेघ-संदेश तथा आर्यभट जैसे प्रयोग भी उल्लेखनीय हैं।
आज हमें हिन्दी को ऐसा स्वरूप प्रदान करना है जो हमारे देश की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुकूल तो हो ही अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी सुविधाजनक हो। इसके लिए हमें उदार दृष्टिकोण अपनाना होगा। संस्कृत का महत्व रहा है और है। हिन्दी के विकास में उसके योगदान की बात भी महत्वपूर्ण है। परंतु बदलती हुई परिस्थितियों और ज्ञान विज्ञान के क्षेत्रों में असीम विकास की संभावनाओं को देखते हुए हमें हिन्दी को एक ऐसी भाषा के रूप में विकसित करना है जो आज के युग में अभिव्यक्ति का सक्षम माध्यम हो। अतः केवल संस्कृतनिष्ठ भाषा की बात पर बल न देते हुए आज हमें भारत की सभी भाषाओं के लिए और विशेषकर प्रशासनिक क्षेत्र में राजभाषा तथा निजी क्षेत्र में संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी के पोषण के लिए अपना कर्तव्य समझना चाहिए। हिन्दी इस देश की भाषा है। इसका संबंध इस धरती, इस मिट्टी और यहां के जनमानस से है परंतु सभी क्षेत्रीय भाषाएं यहां की सभ्यता और संस्कृति की पोषक हैं। क्षेत्रीय भाषाओं का विकास प्रचार व प्रसार संपर्क भाषा हिन्दी के लिए संजीवनी शक्ति है। यदि सभी भारतीय भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि अपना ली जाए तो भाषायी एकता को बल मिलेगा ओर अंग्रेजी तो केवल सुविधा की भाषा कही जा सकती है। अतः इस देश में प्रत्येक नागरिक, कर्मचारी तथा अधिकारी का यह राष्ट्रीय कर्तव्य है कि वह अपने दैनिक कार्य व्यवहार मे इस देश की राजभाषा हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में प्रोत्साहित करे तथा संस्कृत के परिष्कृत, सारगर्भित एवं सहज शब्दों से इस भाषा को वह रूप दे जिससे भारतवर्ष के सभी प्रांतों में सहजगम्य सूत्र भाषा का विकास हो सके।
इस भाषायी एकता को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि भाषा की क्षेत्रीय एवं आंचलिक भाषाओं के शब्दों को भी राजभाषा की तकनीकि शब्दावली में यथोचित स्थान दिया जाए। देश की विभिन्न प्रांतों की राज्य सरकारें तत्तर्देशीय शब्दों को प्रशासनिक दृष्टि से लोकप्रिय बनाने में विशेष सहायक हो सकती हैं। नागपुर और माॅरीशस में आयोजित क्रमशः प्रथम तथा द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया है कि हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया जाए, जिससे इसको विश्व भाषा का स्वरूप प्राप्त हो सके। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यह आवश्यक है कि पहले हम भारत के प्रत्येक राज्य में वहां की क्षेत्रीय भाषा को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करें और राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी को उसका अपेक्षित स्थान दिलाएं। आशा है तीसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन से इस दिशा में और अधिक सफलता मिलेगी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मोनियर विलियम, हिंदुइज्म, (के.एम.मुंशी द्वारा संपादित 'इंडिया इन हैरिटेंस' जिल्द 2, पृ. 91 राधाकुमुद मुखर्जी द्वारा उद्धृत

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