प्रोजेरिया  

प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित एक बच्चा

प्रोजेरिया एक ऐसी बीमारी है इस बीमारी में शिशु काल से बच्चा सीधे वृद्धावस्था में पहुंच जाता है अर्थात् इसमे शिशु अपने जीवनचक्र के दौरान बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था के चरणों को पार कर वृद्धावस्था की तरफ अग्रसर होने की बजाय दो-तीन साल की उम्र में ही बुढ़ापे की तरफ बढ़ने लगता है और वह किशोरावस्था, युवावस्था को नहीं देख पाता तथा इस बीमारी की चपेट में आने वाले बच्चों का जीवन चक्र महज 13 से 21 साल की उम्र तक ही पूरा हो पाता है।

इतिहास

प्रोजेरिया (Progeria) को सैपिड एजिंग या हचिनसन गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम या हचिंगसन-गिल्फोर्ड सिंड्रोम भी कहते हैं। प्रोजेरिया नाम ग्रीक भाषा से लिया गया है, 'प्रो' का मतलब होता है पहले और 'जेरास' का मतलब है बुढ़ापा यानी वक़्त से पहले बुढ़ापा या कम उम्र के बच्चों में बुढ़ापे के लक्षण दिखना। इसकी कई किस्में होती हैं, लेकिन सबसे प्रचलित है हचिनसन गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम। 1886 में डॉ. जोनाथन हचिनसन और 1897 में डॉ. हटिंग्स डिलफोर्ड ने इस बीमारी की खोज की थी। इसी कारण इसे 'हचिनसन-गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम' के नाम से भी जाना जाता है।[1]

बीमारी का कारण

प्रोजेरिया बहुत ही दुर्लभ और एक आनुवांशिक बीमारी है। प्रोजेरिन नाम के एक प्रोटीन से प्रोजेरिया की बीमारी होती है। यह बीमारी जीन्स और कोशिकाओं में उत्परिवर्तन की स्थिति के चलते होती है। इस रोग का कारण कतिपय लोग हॉर्मोन्स की गड़बड़ी मानते हैं लेकिन नवीनतम शोध में इसके लिए लैमिन-ए (एलएमएनए) जींस को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इस बीमारी से ग्रसित 90 फ़ीसदी बच्चों में इसका कारण लैमिन-ए (एलएमएनए) नामक जीन में आकस्मिक बदलाव को माना गया है। यह गड़बड़ी अचानक ही हो जाती है। यह प्रोटीन लेमिन-ए जो कोशिका के केंद्रक को पकड़े रखता है। यदि जीन में उत्परिवर्तन होने से लेमिन-ए प्रोटीन अस्थिर हो जाए तो कोशिका के केंद्रक का आकार बिगड़ जाता है। इस वजह से कोशिकाओं का आकार भी गड़बड़ा जाता है, और रोगी के जींस में सक्रियता समाप्त हो जाती है। नतीजा प्रोटीन का स्थायित्व प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि रोगी का शारीरिक विकास नहीं हो पाता और बच्चे उम्र के हिसाब से पांच-छह गुना बड़े दिखाई देने लगते हैं।

प्रभाव

यह बीमारी अचानक ही हो जाती है और 100 में से एक मामले में ही यह बीमारी अगली पीढ़ी तक जाती है। ये एक विरली बीमारी रोग है और इसीलिए क़रीब 80 लाख (8 मिलियन) में से एक व्यक्ति में पाई जाती है। आज तक चिकित्सा जगत् में प्रोजेरिया के क़रीब 100 मामले सामने आए हैं। फिलहाल पूरी दुनिया में प्रोजेरिया के 53 ज्ञात मामले हैं। ये सभी विदेशी हैं, इनमें से एक भी हिंदुस्तान में नहीं है। लेकिन भारत के मध्य प्रदेश में भी एक बच्चे को इस बीमारी से पीड़ित बताया जाता है।

उम्र

पीडि़त बच्चों के उम्र के शारीरिक लक्षण 5-6 गुना तेजी से दिखाई देते हैं। यानी 2 साल के बच्चे के शारीरिक लक्षण 10-12 साल के बच्चे जैसे होते हैं। हालांकि उनका मानसिक विकास किसी सामान्य बच्चे जैसा होता है। इस बीमारी से ग्रसित अधिकतर बच्चे 13 साल की उम्र तक ही दम तोड़ देते हैं, उम्र के शारीरिक लक्षणों के कारण इस उम्र तक आते-आते उनकी मौत हो जाती है, जबकि कुछ बच्चे 20-21 साल तक जीते हैं। प्रोजेरिया पीड़ितों की अधिकतम उम्र 8 से 24 साल मानी गई है। 13 वर्ष की उम्र में ऐसे बच्चे 70-80 वर्ष तक के नज़र आते हैं। लड़के और लड़कियों दोनों में इस बीमारी का ख़तरा समान रूप से है।

लक्षण

प्रोजेरिया बीमारी में लक्षण

प्रोजेरिया में मानसिक उम्र उतनी ही रहता है, लेकिन शारीरिक उम्र बढ़ती जाती है। मतलब बहुत कम उम्र में ही बुजुर्गों जैसे लक्षण व हाव-भाव दिखने लगते हैं। 12-13 वर्ष उम्र में पहुंचते-पहुंचते 64-65 वर्ष उम्र वाले जैसा दिखाई पड़ने लगता है। प्रोजेरिया एक जन्मजात बीमारी है और इसमें ख़ास ध्यान देने वाली बात यह है कि जैसे बुढ़ापे में ट्यूमर होता है, इसमें वह नहीं होता है। ज़्यादातर बदलाव त्वचा, धमनी और माँसपेशियों में ही रहते हैं। इससे पीड़ित बच्चा आम बच्चों के मुक़ाबले तीन गुना तेजी से बुढ़ापे की ओर बढ़ता है। जन्म के समय ही ऐसे बच्चों में इस बीमारी की पहचान सम्भव है। जन्म के वक़्त वह बिल्कुल सामान्य होता है, मगर उनकी नाक तराशी हुई होती है, चमड़ी के अंदर त्वचा जगह-जगह से मोटी व खुरदरी होती है। लेकिन डेढ़-दो साल की उम्र में इसके लक्षण नज़र आने लगते हैं। दो साल की उम्र पूरी करने के बाद प्रोजेरिया पीड़ित के शरीर से वसा का क्षय (चमड़ी के नीचे का फेट गायब) होने से पारदर्शी हो जाती है तथा बड़ी उम्र की बीमारियां जैसे नज़र की कमज़ोरी, मोतियाबिंद, सांस के रोग 13 साल की उम्र में ही होने लगते हैं। अंगों का विकास कम हो जाता है। जो धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो जाती है। शरीर ढीला पड़ जाता है और नसें उभरकर त्वचा पर साफ़ दिखाई देती हैं। ख़ून नलियों में बुजुर्गों की तरह कड़ापन (ऐथेरो स्क्लीरोसिस)। बच्चे की स्किन का रंग पीला पड़ जाता है और वह काफ़ी पतली हो जाती है, जिस पर असमय झुर्रियाँ दिखने लगती हैं। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़नी शुरू हो जाती हैं। झुर्रियाँ इस क़दर बढ़ती हैं कि रोगी का चेहरा चिड़ियों जैसा दिखने लगता है। त्वचा रोग (स्क्लेरोडर्मा) हो जाती है। शरीर में मोटे तौर पर हड्डियाँ और स्किन ही बाकी रह जाती है। चेहरा छोटा, जबड़ा भी छोटा होता जाता है। सिर शरीर से अनुपात में काफ़ी बड़ा हो जाता है और बाल उड़ जाते हैं। वह वृद्ध और काल्पनिक एलियन (दूसरे ग्रह के प्राणी) जैसा दिखने लगता है। मुंह के अंदर कई गुना ज़्यादा दांत आ जाते हैं व आंखों के आसपास गड्ढे हो जाते हैं। लैंगिक विकास नहीं होना, जोड़ों में दर्द, जोडों में कड़ापन रहना, हड्डियों का विकास रूक-सा जाता है और हिप डिस्लोकेशन हो जाते हैं। इतना ही नहीं जिस हृदय रोग को 35 वर्ष के बाद की व्याधि माना जाता है उसके दौरे भी शुरू हो जाते हैं। अक्सर हृदयाघात की ही वजह से प्रोजेरिया पीड़ित की मौत होती है।

शोध और इलाज

दुनिया भर के वैज्ञानिक और बाल रोग विशेषज्ञ अत्यंत दुर्लभ बीमारी प्रोजेरिया का तोड़ ढूँढ़ने में लगे हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें अब तक सफलता नहीं मिल पाई है और अभी तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। लेकिन फिर भी हार्मोनिक थैरोपी से थोड़ा बहुत लाभ हो सकता है। इस बारे में अभी तक प्रयोग के आधार पर जो भी कोशिश हो रही हैं उनका मकसद इनमें कोलेस्ट्रोल को कम करना है ताकि उनके जीवन को लंबा किया जा सके। चिकित्सक इस रोग के उपचार के बजाय इसकी वजह से होने वाली शारीरिक बीमारियों का इलाज करते हैं ताकि बच्चा ज़्यादा से ज़्यादा समय तक ज़िन्दा रह सके। ऐसे बच्चों की मौत ज़्यादातर बुढ़ापे में होने वाली बीमारियों से होती है। प्रोजेरिया में वे सभी लक्षण दिखते हैं जो आपको बुढापे की तरफ ले जाते हैं। यदि प्रोजेरिया की जड़ पकड़ में आ गई तो न सिर्फ़ बीमारी का इलाज ढूंढ़ने में मदद मिलेगी, बल्कि इससे मनुष्य के बूढ़े होने की प्रक्रिया के भी कई राज खुलेंगे। भारत में इस बीमारी पर काफ़ी समय से शोध चल रहा है। होम्योपैथिक सहायता – यह पैथी किसी विशेष बीमारी का इलाज न कर लक्षणों के आधार पर व्यक्ति की पीड़ा में मानसिक व शारीरिक तौर पर लाभ पहुंचाती है। समान लक्षणों के आधार पर काफ़ी हद तक लाभ पहुंचा सकती है जैसे- 1. उम्र से अधिक लगना-बैरायटा कार्ब, कैल्के, फॉस आदि। 2. गंजापन- नैट्रम म्यौर, एसिड फॉस आदि। 3. झुर्रीदार खाल बुजुर्गों जैसी-एब्रोटे, क्रियोजोट आदि। 4. दिली बीमारी- कैक्टस, क्रैटेगस आदि। 5. ख़ून की कमी-फैरम फॉस, लिसिथिन आदि।

'पा' फ़िल्म

अमिताभ बच्चन, फ़िल्म "पा" में

'पा' फ़िल्म में हिन्दी फ़िल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे व्यक्ति (औरो) की भूमिका निभाई है जो प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीड़ित है। बकौल अमिताभ इसमें उनकी मानसिक उम्र तो जस के तस रहती है लेकिन शारीरिक उम्र तेजी से बढ़ती जाती है। पहले लोग इस बीमारी से ज़्यादा परिचित नहीं थे, लेकिन बहुचर्चित फ़िल्म 'पा' ने प्रोजेरिया रोग के प्रति आमजन ही नहीं चिकित्सा क्षेत्र के लोगों की भी जिज्ञासा बढ़ा दी है।

इस बीमारी के बारे में जागरूकता लाना बेहद ज़रूरी है। ऐसे बच्चे नफरत के नहीं बल्कि प्यार के हकदार हैं, ताकि इस बीमारी से लड़ने की हिम्मत उन्हें मिल पाए। उम्मीद है कि फ़िल्म ‘पा’ देखने के बाद लोगों को इस रोग से पीडि़त बच्चों से सहानुभूति हो जाएगी। इस फ़िल्म की विशेषता यह है कि इसमें बीमार बच्चे से उसके जीने का तरीका नहीं छीना गया है और ना हि उसे कोई दर्दनाक संज्ञा दी गयी है बल्कि उसे उसके अनुसार जीने की आज़ादी दी गयी है और पूर्णत: यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि किसी भी बीमारी की जानकारी रखकर अगर बीमारी के साथ ही जीवन को खुशहाल तरीके से जीया जाये तो बीमारी का इलाज आसान हो जाता है।

अमेरिका स्थित प्रोजेरिया रिसर्च फाउंडेशन भी फ़िल्म पा में काफ़ी इंटरेस्ट दिखा रहा है। आर बाल्की ने कहा: मुझसे खुशी होगी कि फाउंडेशन फ़िल्म "पा" देखे और तय करे कि इसका इस्तेमाल प्रोजेरिया की जागरूकता में कैसे किया जा सकता है। उधर ऑरो की स्टोरी सुनकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पसीज गए हैं। उन्होंने बिहार के प्रोजेरिया पीड़ित दो बच्चों इकरामुल और अली हुसैन के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है।

अमिताभ बच्चन, फ़िल्म "पा" शूटिंग के दौरान

पा फ़िल्म में प्रोजेरिया पीड़ित दिखने के लिए अमिताभ को मेकअप में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। इसके लिए उन्हें प्रोस्थेटिक मेकअप का सहारा लेना पड़ा। हर दिन शूंटिंग से पहले उन्हें अपने शरीर पर फोम, जिलेटिन, लेटेक्स और सिलिकान की परतें चढ़वानी पड़ती थीं। इसमें उन्हें चार से पांच घंटे लग जाते थे। शूंटिंग के बाद मेकअप उतारने में दो घंटे लगते थे।

57वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को फ़िल्म ‘पा’ में प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चे ‘औरो’ की भूमिका में यादगार अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया।

प्रोजेरिया से पीडि़त

डुमरी गांव, बिहार के भाई-बहन
प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित 23 साल के इकरामुल ख़ान और 11 साल के अली हसन
प्रोजेरिया बीमारी से पीडि़त बच्चे आमतौर पर 17 साल से ज़्यादा जी नहीं पाते। लेकिन कुछ अपवाद भी मिलते हैं। आमतौर पर किसी परिवार के एक सदस्य को यह बीमारी होने के बाद बाकी इससे बचे रहते हैं लेकिन बिहार में छपरा ज़िले से क़रीब 20 किलोमीटर दूर सारण ज़िले के मांझी प्रखंड के डुमरी गांव निवासी मोहम्मद शमशुद्दीन उर्फ नबी हुसैन उर्फ बिसुल ख़ाँ और रजिया सुल्तान/खातुन के आठ संतानें हुई। 5 बेटे और 3 बेटियाँ। सभी बेटे प्रोजेरिया से ग्रस्त हो गए थे, राजिया की 8 संतानों में से 3 संतानें पूरी तरह स्वस्थ हैं जबकि प्रोजेरिया से पीड़ित पांच बच्चों में से तीन की मृत्यु हो चुकी है। लेकिन उनमें से अब दो बेटे 23 साल के इकरामुल ख़ान और सबसे छोटा 11 साल के अली हसन उर्फ राजू ही जीवित बचे हैं। दोनों का इलाज कोलकाता में चल रहा है। प्रोजेरिया से पीड़ित इन बच्चों की तीन बहनें 17 साल की गुड़िया, 24 साल की रेहाना और 13 साल की रोबिना की भी प्रोजेरिया के कारण मृत्यु हो चुकी है। अब इनके माता-पिता को इन बच्चों को भी खो देने का डर दिन रात सता रहा है। ये सभी डेढ़ वर्ष की उम्र तक स्वस्थ थे परंतु उसके बाद उन्हें यह बीमारी हो गई थी । ढाई से तीन फीट की लंबाई, 15 से 18 किलो वजन तथा 22 से 25 वर्ष के होते होते इनका मौत हो जाता है। उन्हें अब रामूल को लेकर भी भय सता रहा हैं क्योंकि उसकी उम्र भी 22 वर्ष हो चुकी हैं। उनके अन्य बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं। डरे सहमें दो बेटियों को नबी ने ननिहाल पहुंचा दिया और वे इस रोग का शिकार होने से बच गईं। उनकी दो बेटियां शमीमा व गुड़िया ही उनके जीवन का सहारा बन सकती है। सात वर्ष पहले महानगर की एक चैरिटी संस्था इन दोनों को कोलकाता ले आई, तब से वे यहीं रहते हैं। शमशुद्दीन कोलकाता में किसी निजी कंपनी में चौकीदार का काम करते हैं। आसपास के लोग इन बच्चों को एलियंस के नाम से पुकारते थे, इकरामुल और अली हसन आम लोगों की तरह बातचीत करते हैं, घूमते हैं, खेलते हैं और नाचते भी हैं परंतु उनका मानसिक और शारीरिक विकास नहीं हो पाया है।
प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित बिहार का एक परिवार
इकरामुल अपना नाम - लिख पढ़ लेते हैं। वह काफ़ी खुश मिज़ाज हैं। पहले इनकी जबान भी साफ़ नहीं थी लेकिन अब ये साफ़ बोलते हैं। गाना भी गाते हैं। बच्चों को होने वाली छोटी - मोटी बीमारियों के अलावा बुजुर्गो को होने वाली बीमारियां भी इन्हें घेर लेती हैं। खाने में दिक्कत के अलावा सोने और उठने - बैठने में भी परेशानी होती है। झुक नहीं पाने की वजह से ये बिस्तर पर सीधे ही गिरते हैं और उठते भी सीधे-सीधे ही हैं। सोते वक़्त भी इनकी आंखें खुली रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी वजह माता-पिता के जीन्स में इस बीमारी का मौजूद होना बताते हैं। ये पति-पत्नी चचेरे भाई-बहन हैं। प्रोजेरिया से ग्रस्त रसूल और अली हसन को जब इस बीमारी को लेकर फ़िल्म बनने की बात बताई गई तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। रसूल और अली हसन ने कहा कि उनको भी फ़िल्म देखने में मजा आता हैं। उनके पसंदीदा अभिनेता अमिताभ बच्चन और आमिर खान हैं। वे अब अमिताभ बच्चन से मिलने की ख्वाहिश भी रखते हैं। रजिया सुल्तान ने शुक्रवार को बताया कि आखिरकार उनकी चौथी संतान इकरामुल भी गुरुवार की रात प्रोजेरिया बीमारी के कारण चल बसी। उन्हें अब आशंका है कि इस बीमारी से ग्रसित 13 वर्षीय अलीहसन भी एक दिन उन लोगों को छोडकर अल्लाह को प्यारा हो जाएगा। विकृत चेहरे वाले लड़के कहीं भी जाते हैं तो इन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है, हालांकि ये किसी काम में पीछे नहीं रहते। इन्हें आज तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। यहां तक कि बीपीएल, इंदिरा आवास तक का लाभ नहीं मिल सका है। इनके दरवाज़े तक पहुंचे तत्कालीन एसडीओ सांवर भारती तथा सिविल सर्जन ने तरह - तरह के आश्वासन ज़रूर दिए पर उनपर अमल नहीं हो सका। स्थानीय मुखिया से भी कहा गया, लेकिन सबकुछ डपोरशंखी ही सिद्ध हुआ। अन्नपूर्णा, अन्त्योदय का लाभ न मिलने के बावजूद मां-बाप अपने बच्चों को खुश रखने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।[2]
सिसिया गांव, राजस्थान का अमित
प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित राजस्थान का अमित

राजस्थान में झुंझुनू के सिसिया गांव का रहने वाला अमित चार वर्ष का है, लेकिन शक्ल-सूरत अधेड़ जैसी दिखती है। जिसमें बच्चे की उम्र के हिसाब से कद-काठी नहीं है। वह प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित है। इस बीमारी से बेख़बर उसके माता-पिता अब तक उसका इलाज त्वचा रोग विशेषज्ञ से करा रहे थे, क्योंकि उसकी त्वचा मोटी, खुरदुरी, झुर्रीदार और असामान्य होने लगी थी। तीन जनवरी 2010 में अमित के दाएं पैर व हाथ में लकवे की शिकायत से पहले उसका वजन साढ़े सात किलो के क़रीब था, जो कि अब छह किलो ही रह गया है। रविवार को वे अमित को सूरजगढ़ लेकर गए। वहां एक चिकित्सक ने अमित के शरीर की नियमित मालिश करने तथा कुछ आयुर्वेद औषघि लेने की सलाह दी। शाम को अमित को लेकर घर लौट आए। झुंझुनूं के डॉक्टरों ने बच्चे को जयपुर में दिखाने को कहा तो पिता राजपाल सिंह ने 26 जनवरी को उसे जयपुर के जे.के. लोन अस्पताल में ले आए तथा लकवे से पीडित होने के बाद पिछले 15-16 दिन से ज़्यादा तकलीफ में था। अमित के लिए रविवार का दिन न केवल बेचैनी भरा था रहा बल्कि वह कई बार रोने भी लगा। जे.के. लोन अस्पताल में उसे मेडिकल यूनिट तीन में रखा गया था। यहां डॉक्टरों ने जांचें कराईं तो प्रोजेरिया का पता चला। [3] उसे जब अस्पताल लेकर आए तो उसकी एमआरआई और एंजियोग्राफी कराई गई जिसमें उसकी दिल की धमनियों में वसा की मोटी परतें (ब्लॉकेज) पाई गईं और उसकी ख़ून की नसें सिकुड़ गई है। इससे हाथ-पैरों में कमज़ोरी आ रही थी। उसके ख़ून का दौरा बढ़ाने व ख़ून की नसों को खोलने की दवा दी जा रही है। शरीर का विकास कम होने के कारण उसे अस्पताल के मैलन्यूट्रीशन सेंटर में रखा गया, जिसमें एमएनडीटी के तहत विशेष खुराक दी गई। घर पर भी उसे ऐसी ही खुराक देने की सलाह दी गई है ताकि उसका वजन बढ़ सके। इसका वजन भी औसत वजन से काफ़ी कम था। जेके लोन अस्पताल के डॉ.चमन वर्मा व डॉ.रामबाबू शर्मा ने बताया कि इलाज के बाद बच्चे का वजन भी बढ़ गया है। हालांकि शुक्रवार रात जेके लोन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद अमित के परिजन उसे झुंझुनू स्थित पैतृक गांव में ले गए। इस बच्चे की आंखें अंदर तक धंसी हुई हैं और चेहरे से भौंहें गायब हो चुकी हैं। नाख़ूनों का आकार भी बुजुर्गो की तरह हो गया है। त्वचा पर झुर्रियां आ गई हैं। उसका वजन भी इस उम्र के औसत वजन से काफ़ी कम है तथा लंबाई भी सामान्य लंबाई के मुक़ाबले कम है। डॉक्टर बताते हैं कि ऐसे बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित नहीं होता लेकिन लैंगिक विकास नहीं हो पाता है। अमित के पिता राजपाल सिंह टैक्सी ड्राइवर हैं। उसकी माँ अनीता देवी हैं। अनीता का कहना है कि उनका छोटा बेटा पूरी तरह स्वस्थ है, मगर अमित में दो साल की उम्र से इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगे थे। चार साल का अमित उम्र से पांच गुना बड़ा दिखता है। दादा शीशपाल सिंह ने बताया कि साढ़े तीन साल से अमित का इलाज चल रहा है। इस पर लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं। अनिता ने बताया कि कई सामाजिक संस्थाओं ने सहयोग किया। जिनसे अब तक क़रीब 60 हज़ार रुपए की आर्थिक सहायता मिल चुकी है। जेके लोन अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.अशोक गुप्ता ने बताया कि इस बालक का वल्र्ड प्रोजेरिया रजिस्टर्ड में रजिस्ट्रेशन कराया जाएगा। इस बालक में मिले लक्षणों व अन्य सभी बातों को उसमें दिया जाएगा। ताकि भविष्य में यह शोध के रूप में काम आ सके।

भिलौनी गाँव, छत्तीसगढ़ का कुलजीत सतनामी
प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित भिलौनी गाँव का कुलजीत सतनामी

रायपुर से कोलकाता रेल से जाते समय जांजगीर-चांपा स्टेशन आता है। यह छत्तीसगढ़ का एक ज़िला मुख्यालय है अभी तक इस स्थान की पहचान इसके बेहतरीन कोसा उत्पादन के लिए रही है। इस ज़िला मुख्यालय से थोड़ी दूर भिलौनी (भिलोनी) गाँव है। अभी तक यह गाँव अनजाना ही है। अब इस गाँव को जो नई पहचान मिलने जा रही है वह "कुलजीत (कुलजीत बनर्जी)" की वजह से। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा ज़िले में जांजगीर से 40 किलोमीटर दूर पामगढ़ विकासखंड की ग्रामपंचायत भिलौनी गाँव के निवासी श्री दिलीप सतनामी बंजारे की चार संताने है। पहला अजित दूसरा सुजीत और इसके बाद हुए जुड़वाँ कुलजीत और जमना (बिंदिया)। पत्नी रेवती के साथ गाँव के कच्चे झोपड़े में रहते है यह सभी। जब जुड़वाँ बच्चे हुए तो उन्हें नहीं मालूम था कि उनकी एक संतान "प्रोजेरिया" नाम कि लाइलाज बीमारी से ग्रसित है। जन्म के एक साल बाद उन्हें अपने बेटे की बीमारी का पता चला, उसके बाद स्थानीय स्तर पर बहुत इलाज करवाया, पर बीमारी का पता नहीं चल पाया। सन् 2005 में रायपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अपने बेटे कुलदीप का इलाज कराने पहुंचे दिलीप को तब डॉक्टर ने बताया कि उनका बच्चा प्रोजेरिया नाम की बीमारी से पीड़ित है। अपने बेटे को ठीक करवाने की धुन में दिलीप ने हज़ारो रुपये खर्च कर दिए। वह बिलासपुर के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉक्टर प्रदीप सिहोरे से भी उसकी जाँच करवाई पर उन्होंने भी बता दिया कि इस रोग का इलाज संभव नहीं है। यह बीमारी करोडो लोगो में किसी एक को होती है इस बीमारी का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि पूरी दुनिया में अभी तक प्रोजेरिया के कुल 112 मामले सामने आने की जानकारी मिली है। असल ज़िंदगी में 12 बरस का कुलजीत बचपन से ही प्रोजेरिया बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के चलते उसकी केवल उम्र ही बढ़ रही है परन्तु उसका मानसिक और शारीरिक विकास रूक गया है और वह महज 7 किलो का है और उसकी उंचाई ढाई फीट है। सिर व शरीर पर बाल नहीं हैं, दांत भी झड रहे है, कान बड़े हैं तो नाक लंबी है। गाल पिचके हुए हैं और चेहरे पर झुर्रियां छाई हैं। नसें तनी हुई हैं, जैसे वह बूढ़ा हो गया हो। चेहरा किसी एलियन जैसा, बच्चो के लिए डरावना चेहरा। इसके दिमाग की नसों में ख़ून जमा हो गया था, जिसे काफ़ी उपचार के बाद ठीक किया गया. इसे शारीर के बांयी ओर लकवा मार गया है और हार्ट प्राब्लम भी हो गया है,शरीर की चमड़ी सिकुड़ गई है, असल ज़िंदगी का ओरो अपने गाँव वालो के बीच बहुत लोकप्रिय है। कोई इसे शेरखान कह कर पुकारता है तो कोई कुलजीत कहकर। 12 बरस का कुलजीत अभी दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है, जबकि उसकी जुड़वाँ बहन बिंदिया पाँचवी में पढ़ रही है। कुलजीत बीमारी से ग्रस्त है, जबकि बिंदिया स्वस्थ है। बीमारी की वजह से कुलजीत ज़्यादातर समझ नहीं आता। कुलजीत खुद बहुत सवेदनशील है, किसी बच्चे को रोता हुआ देखकर खुद भी उदास हो जाता है, उससे रोने का कारण पूछता है। जब तक घर के लोग खाना नहीं खा लेते तब तक खुद भी नहीं खाता है। गाँव के आम्बेडकर स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो बच्चे उसका मजाक भी उड़ाते है पर अब वह इसका आदि हो चुका है। डाक्टरों ने परिजनों से कह दिया है कि इसका इलाज भी संभव नहीं और यह अब भगवान भरोसे है कि वह कितने और दिन अपने जीवन के काटता है। डाक्टरों ने प्रोजेरिया से पीड़ित की अधिकतम उम्र 20 साल बताया है। बावजूद माता-पिता ने हार नहीं मानी है और अपने बच्चे का जीवन बचाने के लिए वह हर डाक्टर और जानकारों से गुहार लगा रहे है। कुलजीत का वजन में कमी होती जा रही है। इस परिवार को आर्थिक मदद की ज़रूरत है, लेकिन फिलहाल कोई हाथ का सहारा इन्हें नहीं मिल सका है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से भी गुहार लगाई है। देखना है यह बदनसीब बच्चा इस कठिन लड़ाई को कब तक लड़ सकेगा। अभी हाल ही में कुलजीत के परिवार वालों ने 10 नवंबर को उसका जन्मदिन मनाया, इस दौरान भी उनकी आंखों में अमिताभ बच्चन से मिल पाने का सपना दिखाई दिया। कुलजीत के भाई सुजीत का कहना है कि खबर के नाम पर डेढ़ दर्जन से अधिक मीडिया वाले उनके घर पहुंचे और कईयों ने उन्हें प्रशासन र्से आर्थिक मदद दिलाने में सहयोग दिलाने की बात कही, लेकिन एक-दो को छोड़कर किसी ने दोबारा संपर्क करने की कोशिश नहीं की। [4]

शेखपुरा ज़िले की ब्यूटी

शेखपुरा ज़िले के बरबीघा थाना क्षेत्र के कजीचक गांव में, यहां प्रोजेरिया बिमारी से ग्रसित एक बच्ची है पर उसके पिता ही उसकी हत्या करना चाहते हैं और जब उसकी माँ ने उसे बचाने का प्रयास किया तो उसे बेटी के साथ ही घर से निकाल दिया गया। संयोगिता फिलहाल अपने पिता के घर में रह रही है। संयोगिता की शादी जमुई ज़िले के अलीगंज थाना क्षेत्र नोनी गांव निवासी जयराम प्रसाद के पुत्र रामानुग्रह प्रसाद के साथ 1999 में हुई थी। रामानुग्रह प्रसाद सीआईएसएफ में नौकरी करता है। शादी के बाद संयोगिता ने एक बेटी को जन्म दिया तब लोगों ने खुशियां मनाई पर जब कुछ दिनों के बाद पता चला के बेटी मानसीक रूप से विकलांग है तो परिजनों में शोक का लहर दौर गया। एक तो बेटी उपर से मानसीक रूप से विकलांग भला इससे शादी कौन करेगा। इसी को लेकर संयोगिता के ससुर और उसके पति के द्वारा ब्यूटी की हत्या का प्रोग्रम बनाया गया पर संयोगिता के द्वारा जब इसका विरोध किया गया तो उसके साथ मारपीट की गई और उसे घर से भगा दिया गया। संयोगिता ने बताया कि उसके परिजन पहले ब्यूटी के इलाज के लिए काफ़ी प्रयास किया जिसके तहत बाबा रामदेव के यहां भी क़रीब दो साल तक इसका इलाज कराया गया पर सुधार नहीं होने पर इससे छुटकारे की बात मन में उठी जिसका विरोध उसके द्वारा किए जाने के बाद उसे भी घर से भगा दिया गया। संयोगिता की माने तो 13 साल की ब्यूटी कुछ खाना नहीं खाती है और वह सिर्फ़ दूध पीकर ही ज़िन्दा रह रही है। उसकी माँ के अनुसार ब्यूटी आज रुपये के आभाव की वजह से सही भोजन नहीं मिलने और उचित दवाई नहीं मिलने के कारण धीरे धीरे मौत के क़रीब जा रही और वह चाह कर भी इसे नहीं बचा पा रही है। उसने बताया कि उसके पिता के पास इतने अधिक पैसे नहीं है कि ब्यूटी का इलाज और इसका भरपूर भोजन दिया जा सके जिसकी वजह से वह मौत के क़रीब जा रही है। अपनी ``ऑरो´´ बेटी को बचाने के लिए संधर्ष कर रही माँ आज लोगों से अपने बेटी को बचाने की गुहार कर रही है देखना है कि उसकी गुहार कहां तक असर लाती है।[5]

गड़खा प्रखंड का दीपांशु

गड़खा प्रखंड के पैगा चांदपुरा निवासी धर्मेन्द्र कुमार के सवा तीन साल के बच्चे को बहुत दिन से सर्दी, खांसी की शिकायत थी। इसके अलावा वह चिकित्सकीय रूप से बिल्कुल अस्वस्थ था। उससे छोटी उसकी बहन के सारे दांत आ गए थे जबकि उसे सिर्फ़ दो ही दांत निकले थे। दोनों दांत हाथी के दांत जैसे बाहर निकले हुए हैं जो दीपांशु के चेहरे को भयावह बना रहे हैं। दीपांशु के पिता उसे लेकर शुक्रवार को सदर अस्पताल पहुंचे। जहां ड्यूटी पर तैनात डा. रविशंकर प्रसाद ने उसकी जांच की। मात्र सवा तीन साल का दीपांशु काफ़ी अधिक उम्र का प्रतीत हो रहा था। जिसे उन्होंने काफ़ी गंभीरता से लिया और गहनता से जांच की। जिसके बाद उन्होंने उसके प्रोजेरिया ग्रस्त होने की पुष्टि कर दी। पिता को बीमारी का नाम समझ नहीं आने पर उन्होंने उसे अमिताभ बच्चन की फ़िल्म 'पा' का ज़िक्र किया। जिसके बाद परिजन चिंतित हो उठे। चिकित्सक श्री प्रसाद ने बताया कि बच्चे के दोनों दांत बाहर की तरफ निकले हुए थे। शरीर पर चर्बी कम थी। उसकी स्थिति उसे सवा तीन वर्ष की उम्र में 25 का करार दे रही थी। उन्होंने बताया कि प्रोजेरिया के लक्षण पाने के बाद उन्होंने अपने पास मौजूद नेल्सन बुक आफ पेटिएट्रिक्स पुस्तक के पन्ने पलटे, जिसमें विस्तार से इस रोग के बारे में ज़िक्र है। यूएसए की स्टडीज के अनुसार विश्व में अब तक प्रोजेरिया के 25 केस मिले हैं जबकि देश में सोलह मरीज़ों की पुष्टि हो चुकी है। इतनी कम उम्र का यह पहला मरीज़ है। अब तक इस प्रकार के जो भी मरीज़ मिले हैं उनकी न्यूनतम उम्र 4 वर्ष है। चिकित्सक श्री प्रसाद ने बताया कि मरीज़ के क्रोमोसल एनालिसिस टेस्ट के बाद रोग का इलाज शुरू कर दिया जाएगा।[6]

वेस्ट यॉर्कशायर, लंदन (यूके) का हैरी क्रोथर
प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित हैरी क्रोथर और माँ शैरोन

वेस्ट यॉर्कशायर, लंदन (यूके) निवासी स्कूली बच्चा हैरी क्रोथर की उम्र तो 11 साल है लेकिन उसे अभी से बूढ़ों की बीमारियां "प्रोजेरिया" / "एटिपिकल प्रोजेरिया सिंड्रोम" (एपीएस) लग गई हैं। उसकी उम्र सामान्य से पांच गुना तेजी से बढ़ रही है और इसमें अधिक उम्र वाले लक्षण नज़र आने लगे हैं। ब्रिटिश अखबार "डेली मेल" में छपी रिपोर्ट के अनुसार हैरी को आर्थराइटस की बीमारी हो चुकी है जिसके लिए वह दिन में 4 बार दवा लेता है। उसकी त्वचा पतली होने के साथ-साथ उंगलियों व कॉलर बोन की हड्डियां नष्ट होने लगी हैं। यह जानना विशेष होगा कि उसका चयन चीफ स्काउट्स अवॉर्ड के लिए भी किया जा चुका है। उल्लेखनीय है कि "एपीएस" के दुनिया भर में गिने-चुने मरीज़ों की ही जानकारी मिली है। उसके पेरेंट्स माँ शैरोन और जॉन ने कहा, हमारे लिए तो यह बस इंतज़ार करने का समय है। हैरी के शरीर में आने वाले बदलाव अजीब हैं। हमारी आंखों में भी आंसुओं के साथ दिल में सवाल है कि आखिर हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ। मगर हमें याद है कि हैरी स्कूल जाता है और आम बच्चों की तरह काम करता है। बस फ़र्क़ इतना है कि उसका शरीर कुछ अलग है। हैरी को साइकल चलाना, स्विमिंग करना और पेड़ों पर कूदना पसंद है। एक साल की उम्र में ही हैरी की त्वचा रूखी और कड़ी होनी शुरू हो गई थी। इसके बाद उसके मां-बाप उसे डॉक्टर के पास ले गए। लेकिन उसके इस सिंड्रोम से पीड़ित होने का पता हचिन्सन गुइलफोर्ड सिंड्रोम से पीड़ित लड़की पर बनी डॉक्यूमैंट्री देखने के बाद चला। यह सिंड्रोम हैरी के सिंड्रोम से मेल खाता है। सात साल की उम्र में कई टैस्टों के बाद हैरी को एटिपिकल प्रोजेरिया सिंड्रोम से पीड़ित बताया गया। यह एलएमएनए जीन में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तन के कारण होता है। डॉक्टर भी नहीं जानते कि हैरी कब तक जीवित रहेगा। हैरी के सिंड्रोम से मेल खाते एक अन्य सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति 26 साल तक ज़िंदा रहा था। मीरफील्ड में जूनियर स्कूल में पढ़ने वाले हैरी के भाई-बहन एम्मा और जैक कहते हैं, लोग तो हैरी को घूर-घूरकर देखते हैं और कई तो उसे और घूरने के लिए अपने दोस्त भी ले आते हैं। हालांकि हैरी खुद को दूसरों से अलग नहीं मानता। वह कहता है, मैं बाकी बच्चों की तरह काम कर सकता हूं लेकिन मुश्किलें तब बढ़ने लगती हैं, जब शरीर और जोड़ों में दर्द ज़्यादा होने लगता है। जिसके लिए नियमित रूप से दर्द निवारक दवाएं लेनी पड़ती हैं। मेरे लिए ज़्यादातर समय बिस्तर पर रहना काफ़ी दुखदायी है। लोगों का मुझे घूरना परेशान करता है और अस्पताल जाना भी पसंद नहीं।[7]

प्रोजेरिया पर खोज और शोध

महाभारत में दर्ज है ‘पा’ वाला ‘प्रोजेरिया’!

आश्चर्य की बात यह है कि जिस प्रोजेरिया नामक बीमारी की चर्चा आज हो रही है, उसके संकेत हज़ारों वर्ष पूर्व महाभारत में वेद व्यास ने दर्ज कर दिये थे। महाभारत के वनपर्व (महाभारत, गीता प्रेस-गोरखपुर, द्वितीय खंड-वनपर्व, मारकण्डेय-युधिष्ठिर संवाद, पृ.1481-1494) अध्याय में एक प्रसंग है। शेष पेज नौ परमहाभारत में.. इस प्रसंग में युधिष्ठिर ने मारकण्डेय ऋषि से कलियुग में प्रलयकाल और उसके अंत के बारे में जानना चाहा था, जिसका उत्तर विस्तार से मारकण्डेय ऋषि ने दिया था। उन्होंने कहा था कि कलियुग में युवावस्था देखना स्वप्न सा होगा. युवक, युवावस्था में ही बूढ़े हो जायेंगे। सोलह वर्ष में ही उनके बाल पकने लगेंगे, उनका स्वभाव बचपन व किशोरावस्था में ही बूढ़ों जैसा दिखने लगेगा। सात-आठ वर्ष की बच्चियां स्त्री बन जायेंगी। गर्भधारण भी करने लगेंगी और 10-12 साल के लड़के भी पिता बनेंगे। इसी अध्याय में यह भी दर्ज है कि कलियुग में इंसान की अधिकतम उम्र 20-30 साल की हो जायेगी।[8]


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शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. प्रोजेरिया: बुढ़ापे की जकड़न में बचपन (हिन्दी) (पी.एच.पी) नव भारत टाइम्स। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  2. ..गुम हो गई किलकारी (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) जागरण याहू इण्डिया। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  3. "ऑरो" सा अमित (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) डेली न्यूज़। अभिगमन तिथि: 9 मार्च, 2011
  4. छत्तीसगढ़ का अमिताभ बच्चन उर्फ़ "पा" असल नाम "कुलजीत" (हिन्दी) (पी.एच.पी) insight tv। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  5. प्रोजेरिया बीमारी से ग्रसित ब्यूटी की हत्या करना चाहतें है उसके पिता" (हिन्दी) (पी.एच.पी) चौथा खंभा। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  6. फिर मिला प्रोजेरिया का एक और मरीज़ (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल.) जागरण याहू इण्डिया। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  7. 5 गुना तेजी से बढ़ रहा है हैरी (हिन्दी) (ए.एस.पी.) पत्रिका। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  8. महाभारत में दर्ज है ‘पा’ वाला 'प्रोजेरिया' (हिन्दी) (ए.एस.पी) प्रभात खबर। अभिगमन तिथि: 7 दिसंबर, 2010।

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