प्लेग  

प्लेग (Pleague) रोग- एक बहुत ही खतरनाक और एक महामारी का रोग है तथा यह संसार की सबसे पुरानी महामारियों में से एक है। यह एक प्रकार का संक्रामक रोग है, अगर संक्रमण की शुरुआत में ही इलाज नहीं किया जाए तो ये बीमारी घातक भी साबित हो सकती है। इस रोग को और भी कई नामों से जाना जाता हैं जैसे - ताऊन, ब्लैक डेथ, पेस्ट, गोटी वाला ज्वर। इसको अग्निरोहिणी तथा संस्कृत में औपसर्गिक सन्निपात के नाम से भी जाना जाता है। भारी पैमाने पर तबाही मचाने के कारण पूरे इतिहास में प्लेग कुख्यात रही है। आज भी विश्व के कुछ भागों में प्लेग महामारी बना हुआ है। प्लेग की वजह से 14 वीं सदी में यूरोप की एक तिहाई आबादी मारी गई थी। सदियों बाद आज भी विश्व में प्रतिवर्ष प्लेग की लगभग 2000 वारदातें सामने आती है। भारत में 1994 में न्यूमॉनिक प्लेग फैल गया था, प्लेग भूमध्य रेखा के अत्यंत उष्ण प्रदेश को छोड़कर संसार के किसी भी प्रदेश में हो सकता है। कोई भी जाति, या आयु का नर-नारी इससे बचा नहीं है।

इतिहास

विश्व में प्लेग

प्राचीन काल में किसी भी महामारी को प्लेग कहते थे। यह रोग कितना पुराना है इसका अंदाज इससे किया जा सकता है कि एफीरस के रूफुस ने, जो ट्रॉजन युग का चिकित्सक था, "प्लेग के ब्यूबों" का ज़िक्र किया है और लिखा है कि यह घातम रोग मिस्र, लीबिया और सीरिया में पाया जाता है। "बुक ऑव सैमुअल" में इसका उल्लेख है। ईसा पूर्व युग में 41 महामारियों के अभिलेख मिलते हैं। ईसा के समय से सन् 1500 तक 109 बढ़ी महामारियाँ हुईं, जिनमें 14वीं शताब्दी की "ब्लैक डेथ" प्रसिद्ध है। सन् 1500 से 1720 तक विश्वव्यापी महामारियाँ (epidemics) फैलीं। फिर 18वीं और 19वीं शताब्दी में शांति रही। सिर्फ़ एशिया में छिटफुट आक्रमण होते रहे। तब सन् 1894 में हांगकांग में इसने सिर उठाया और जापान, भारत, तुर्की होते हुए सन् 1896 में यह रोग रूस जा पहुँचा, सन् 1898 में अरब, फारस, ऑस्ट्रिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमरीका और हवाई द्वीप तथा सन् 1900 में इंग्लैंड, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में इसने तांडव किया। सन् 1898 से 1918 तक भारत में इसने एक करोड़ प्राणों की बलि ली। अब पुन: संसार में शांति है, केवल छिटपुट आक्रमण के समाचार मिलते हैं।[1]

भारत में

एक पुरान कहावत थी कि प्लेग सिंधु नदी नहीं पार कर सकता। पर 19वीं शताब्दी में प्लेग ने भारत पर भी आक्रमण किया। सन् 1815 में तीन वर्ष के अकाल के बाद गुजरात, कच्छ और काठियावाड़ में इसने डेरा डाला, अगले वर्ष हैदराबाद (सिंध) और अहमदाबाद पर चढ़ाई की, सन् 1836 में पाली (मारवाड़) से चलकर यह मेवाड़ पहुँचा। सन् 1823 में केदारनाथ (गढ़वाल) में, सन् 1834 से 1836 तक उत्तरी भारत के अन्य स्थलों पर आक्रमण हुए और सन् 1849 में यह दक्षिण की ओर बढ़ा। सन् 1853 में एक जाँच कमीशन नियुक्त हुआ। सन् 1876 में एक और आक्रमण हुआ और तब सन् 1898 से अगले 20 वर्षों तक इसने बंबई और बंगाल को हिला डाला।[1]

विश्व में प्लेग
यूरोप में 14वीं शताब्दी में "काली मौत"

प्लेग महामारियों के चक्र चलाते रहे हैं। छठी शताब्दी में पचास वर्षों तक यूरोप में इसका एक दौर चला। समूचे रोमन साम्राज्य में प्लेग बदंरगाहों से आरंभ होकर दूरवर्ती नगरों की ओर फैला था। सातवीं शताब्दी में 664 से 680 तक फैली महामारियाँ, जिनका उल्लेख बेडे ने किया है, शायद प्लेग ही थी। 14वीं शताब्दी में "काली मौत" के नए दौर आरंभ हुए, जिनमें मृत्युसंख्या भयावह थी। प्रथम दौर में अनेक नगरों की दो तिहाई से तीन चौथाई आबादी तक साफ़ हो गई। कहते हैं, इस चक्र में यूरोप में ढाई करोड़ (अर्थात कुल आबादी के चौथाई) व्यक्ति मर गए। 1664-65 में इतिहास प्रसिद्ध "ग्रेट प्लेग" का लंदन नगर पर आक्रमण हुआ। लंदन की आबादी साढ़े चार लाख थी, जिसमें से दो तिहाई लोग डरकर भाग गए और बचे लोगों में से 68,596 प्लेग का शिकार हो गए। कहते हैं, इसी के बाद हुए लंदन के बृहत अग्निकांड ने नगर से प्लेग को निकाल बाहर किया। पर संभवत: यह चमत्कार सन् 1720 में लगाई गई कठोर क्वांरटीन का फल था। इसके बाद थी यूरोप में प्लेग के आक्रमण होते रहे और अंत में सन् 1720 में मार्सेई में 87,500 प्राणों की बलि लेकर यह शांत हुआ।
सन 1675 से 1684 तक उत्तरी अफ्रीका, तुर्की, पोलैंड, हंगरी, जर्मनी, आस्ट्रिया में प्लेग का एक नया उत्तराभिमुख दौरा हुआ, जिसमें सन् 1675 में माल्टा में 11,000 सन् 1679 में विएना में 76,000 और सन् 1681 में प्राग में 83,000 प्राणों की आहुति पड़ी। इस चक्र की भीषणता की कल्पना इससे की जा सकती है कि 10,000 की आबादीवाले ड्रेस्डेन नगर में 4,397 नागरिक इसके शिकार हो गए। सन् 1833 से 1845 तक मिस्र में प्लेग का तांडव होता रहा। पर इसी समय यूरोप में विज्ञान का सूर्योदय हो रहा था और मिस्र के प्लेग का प्रथम बार अध्ययन किया गया। फ्रेंच वैज्ञानिकों ने बताया कि वास्तव में जितना बताया जाता है यह उतना संक्रामक नहीं है। सन् 1878 में वोल्गा महामारी से यूरोप संशक हो उठा और सभी राज्यों ने जाँच आयोग भेजे, जो महामारी समाप्त होने के बाद घटनास्थल पर पहुँचे। प्लेग के स्थायी गढ़ अरब, मेसोपोटामिया, कुमाऊँ, हूनान (चीन) पूर्वी तथा मध्य अफ्रीका हैं। प्लेग की महामारियों की कहानी विश्व इतिहास के साथ पढ़ने पर ज्ञात होती है कि इतिहास की धाराएँ मोड़ने में इस रोग ने कितना बड़ा भाग लिया है।

कारण

येरसिनिया पेस्टिस बैक्टिरिया

यह एक जीवाणु जनित रोग है। यह येरसिनिया पेस्टिस / बेसीलुस पेस्टिस (पूर्व नाम - पेस्टूरेला पेस्टिस) नामक जीवाणु के संक्रमण से होती है। ब्यूबोनिक प्लेग इसका प्रचलित प्रकार है। वैसिलस पेस्टिस (पास्चुरेला पेस्टिस) की खोज सन् 1894 में हांगकांग के किटा साटो और यर्सिन ने की। आगे के अनुसंधानों ने सिद्ध किया कि यह मुख्यत: कृंतक प्राणियों का रोग है। ये कीटाणु सीलन वाले स्थानों, कूड़ा - करकट तथा सड़ी-गली चीज़ों में पनपता है। ये रोग उन पदार्थों में भी फैलता है जिनमें से गंदी बदबू आती है तथा भाप निकलती हैं। इन कीटाणुओं का हमला पहले - पहले चूहों के पिस्सुओं पर होता है और फिर यह बीमारी चूहों के द्वारा मनुष्यों को भी हो जाती है। जिन व्यक्तियों के शरीर में पहले से ही दूषित द्रव्य जमा रहता है उन व्यक्तियों को यह रोग जल्दी हो जाता है। जिन व्यक्तियों के शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति कम होती है, उन व्यक्तियों को भी यह रोग हो जाता है। जिन व्यक्तियों के शरीर में दूषित द्रव्य नहीं होता है उन व्यक्तियों का ये कीटाणु कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते हैं।[2] मुख्य रूप से यह कृतंक (rodent) प्राणियों (प्राय: चूहे) का रोग है, आदमी को यह रोग प्रत्यक्ष संसर्ग अथवा पिस्सू के दंश से लगता है। प्लेग हमारे देश में पहले मूस (Rattus norvegicus) को होता है। इससे चूहों (Rattus rattus) को लगता है। पिस्सू (जिनापसेल्ला चियोपिस) इन कृंतकों का रक्तपान करता है। जब चूहे मरते हैं तो प्लेग के जीवाणुओं से भरे पिस्सू चूहे को छोड़कर आदमी की ओर दौड़ते हैं। जब आदमी को पिस्सू काटते हैं, तो दंश में आपने अंदर भरा संक्रामक द्रव्य रक्त में उगल देते हैं। चूहों का मरना आरंभ होने के दो तीन सप्ताह बाद मनुष्यों में प्लेग फैलता है।

प्लेग को फैलाने वाले चूहे

प्लेग की बीमारी में चमड़ी में इन्फेक्शन प्रवेश करके लिंफेटिक तक जाता है। जैसा कि प्रायः कीट पतंगों के इन्फेक्शन में होता है, ब्यबोनिक प्लेग में लिंफेटिक संस्थान का इन्फेक्शन होता है। प्रायः संक्रमित मक्खी के काटने से होता है। ये मक्खियॉं चूहों जैसे कृन्तको पर पाई जाती है और इनका मेज़बान कृन्तक मरने पर दूसरे को शिकार बनाती हैं। एक बार जमने पर जीवाणु लिम्फ नोड पर आक्रमण करके बढ़ने लगते हैं। वरसिनिया पेस्टिस फैगोसाइटोसिस से बचते हैं और फैगोसाईट के अन्दर जननकर उसे समाप्त भी कर देते हैं और जैसे जैसे रोग बढ़ता है लिम्फनोड से रक्त का रिसाव होता है इसका पूरा परिगलन हो जाता है।[3]

फैलाव

प्लेग की बीमारी का फैलाव

प्लेग की बीमारी अनेक कारणों से फैलती है। पृथ्वी पर पर्यावरण प्रदूषण जैसे पानी व हवा अधिक दूषित हो जाती है जिससे वातावरण में विषैले जीवाणु फैल जाते हैं। विषैले जीवाणु जब कीट बनकर वातावरण में फैलते हैं तो यह महामारी का रूप ले लेते हैं जो प्लेग की बीमारी के रूप में अन्य जीवों व मनुष्यों में फैल जाते हैं। जब घरों में चूहे मर जाते हैं और मरने के बाद अगर वह कई दिनों तक घर में पड़े रहते है तो उसमें से निकलने वाली विषैली बदबू प्लेग का कारण बन जाती है।[4] चूहों के शरीर पर पलने वाले कीटाणुओं की वजह से भी प्लेग की बीमारी फैलती है और ये अत्यंत संक्रामक होती है। प्लेग के मरीज़ की सांस और थूक के ज़रिए उनके संपर्क में आने वाले लोगों में भी प्लेग के जीवाणुओं का संक्रमण हो सकता है। इसलिए प्लेग के मरीज़़ों का इलाज करते समय या उनके संपर्क में रहते समय एहतियात बरतने की आवश्यकता होती है।

लक्षण

प्लेग का लक्षण

प्लेग की बीमारी के जीवाणु सबसे पहले ख़ून को प्रभावित करते हैं जिसके कारण रोगी को जाड़ा देकर तेज़ बुखार जकड़ लेता है और अनियमित ढंग से घटता-बढ़ता है। इस प्रकार की बीमारी होने पर कुछ समय में ही बुखार बहुत ही विशाल रूप ले लेता है और रोगी के हाथ - पांव में अकड़न होने लगती है। इस रोग के होने पर रोगी के सिर में तेज़ दर्द, पसलियों का दर्द, उल्टियां एवं दस्त होते रहते हैं। इसके साथ-साथ रोगी की आंखे लाल हो जाती है और कफ व पेशाब के साथ ख़ून निकलने लगता है। इस रोग के होने पर रोगी को बेचैनी बढ़ जाती है। हृदयदौर्बल्य तथा अवसन्नता, तिल्ली बढ़ना और रक्तस्त्रावी दाने निकलना, जिससे शरीर काला पड़ जाता है और रोग का काली मौत नाम सार्थक होता है। प्लेग की बीमारी पनपने में एक से सात दिन लग सकते हैं।[4]

प्रकार

प्लेग 4 मुख्य प्रकार का होता है -

  1. ब्यूबोनिक - जब प्लेग के रोग में रोगी को गिल्टी निकल आती है तो उसे बेबक्यूनिंग कहते हैं।
  2. न्यूब्योनिक - प्लेग रोग होने पर रोगी के फेफड़ों में जलन उत्पन्न होने लगता है तो उसे न्यूब्योनिक कहते हैं।
  3. सेप्टिसम - प्लेग रोग से ग्रस्त रोगी का जब ख़ून दूषित होकर ख़राब हो जाता है तो सेप्टिसम कहते हैं।
  4. इंटेसटिनल - जब प्लेग रोग से ग्रस्त रोगी की अन्तड़ियों में विकार उत्पन्न होने लगता है तो इंटेसटिनल कहते हैं।
  • और दूसरे प्रकार भी -

1. रक्तपूतित प्लेग घातक प्रकार है, जिसमें रक्त में जीवाणु वर्तमान होते हैं,
2. कोशिका त्वचीय प्लेग, जिसमें त्वचा पर कारबंकल से फोड़े निकल आते हैं,
3. स्फोटकीय प्लेग, जिसमें शरीर में दाने निकलते हैं,
4. गुटिका प्लेग, जिसमें रोग कंठ में होता है,
5. अवर्धित प्लेग तथा जो प्लेग का हल्का आक्रमण है और जिसमें केवल गिल्टी निकलती है,
6. प्रमस्तिष्कीय प्लेग[2]

ब्यूबोनिक प्लेग (गिल्टी प्लेग) -
ब्यूबोनिक प्लेग के लक्षण

जब किसी व्यक्ति को प्लेग रोग हो जाता है तो उसकी जांघ, गर्दन आदि अंगों की ग्रन्थियों में दर्द के साथ सूजन हो जाती है, इस रोग से पीड़ित रोगी की गिल्टी एक के बाद दूसरी फिर तीसरी सूजती है और फिर फूटती है। कभी-कभी एक साथ कई गिल्टियां निकल आती है और दर्द करने लगती है। जिसे ब्यूबोज कहते हैं और बुख़ार आता है। यदि गिल्टियां 4-5 दिनों में फूट जाती है और बुखार उतर जाता है तो उसे अच्छा समझना चाहिए नहीं तो इस रोग का परिणाम और भी ज़्यादा खतरनाक हो सकता है। लेकिन कुछ समय में ये 7-10 दिनों के बाद फूटती है। इस प्रकार का प्लेग रोग अधिक होता है। ब्यूबॉनिक प्लेग मुख्यतया चूहों के शरीर पर पलने वाले पिस्सुओं के काटने की वजह से फैलती है। ये बीमारी केवल मरीज़ के संपर्क में आने से तो नहीं लगती लेकिन मरीज़ की ग्रंथियों से निकले द्रव्यों के सीधे संपर्क में आने से ब्यूबॉनिक प्लेग हो सकता है।

न्यूमोनिक प्लेग -
न्यूमोनिक प्लेग के लक्षण

न्यूमॉनिक प्लेग की वारदातें अपेक्षाकृत कम होती हैं, न्यूमोनिक प्लेग रोग जब किसी व्यक्ति को हो जाता है तो इसका आक्रमण सबसे पहले फेफड़ों पर होता है जो फेफड़ों का इन्फेक्शन होता है। इसके परिणाम स्वरूप निमोनिया पनपकर तेजी से फैलता है और रोगी व्यक्ति को कई प्रकार के रोग हो जाते हैं जैसे- खांसी, सांस लेने में कष्ट, सॉंस का भारीपन, छाती में दर्द, दम फूलना, शरीर में ठंड लगकर सिर में दर्द होना, नाड़ी में तेज़ दर्द, कलेजे में दर्द, प्रलाप, पीठ में दर्द तथा फेफड़ों से रक्त का स्राव होना आदि और चिकित्सा न किये जाने पर तीव्र श्वसन फेलयर हो जाता है। न्यूमोनिक प्लेग रोग गिल्टी वाले प्लेग रोग से बहुत अधिक घातक होता है तथा रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक परेशान करता है। आमतौर पर यह कम घातक होता है किन्तु यह खतरनाक और चिकित्सा न करने पर घातक होता है। न्यूमॉनिक प्लेग ज़्यादा संक्रामक है। ये बीमारी रोगी के सीध संपर्क में आने से उसकी सांसों या खांसी से निकले बैक्टीरिया के संक्रमण से हो सकता है।

सेप्टीसिमिक प्लेग (शरीर में सड़न पैदा करने वाला प्लेग) -

जब यह प्लेग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी के शरीर के कई अंग सिकुड़ कर सड़ने लगते हैं और रोगी के शरीर का ख़ून ज़हरीला हो जाता है। रोगी की शारीरिक क्रियाएं बंद हो जाती हैं। इस रोग के होने के कारण रोगी को बहुत अधिक परेशानी होती है। जब यह प्लेग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो वह व्यक्ति 2-3 दिनों से अधिक जीवित नहीं रह पाता है।

इंटेस्टिनल प्लेग (आंत्रिक प्लेग) -

इस रोग का प्रकोप रोगी व्यक्ति की आंतों पर होता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लग जाता है और उसके पेट और कमर में दर्द होने लगता है तथा उसे दस्त भी होने लगते हैं। जब रोगी व्यक्ति को यह रोग होने वाला होता है तो उसकी तबियत गिरी-गिरी सी रहने लगती है तथा उसके शरीर में सुस्ती और कमज़ोरी बढ़ जाती है। रोगी की यह अवस्था 1 घण्टे से लेकर 7 दिनों तक रह सकती है। फिर इसके बाद रोग का प्रकोप और भी तेज़ हो जाता है। जब रोगी की अवस्था ज़्यादा गम्भीर हो जाती है तो उसे ठंड लगने लगती है तथा तेज़ बुखार हो जाता है, रोगी के सिर में दर्द होता है, रोगी के हाथ-पैर ऐठने लगते हैं। रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द होता है तथा उसे बहुत अधिक कमज़ोरी आ जाती है। रोगी व्यक्ति के गालों का रंग पीला पड़ जाना, आंखों के आगे गड्ढें हो जाना, नाड़ी और श्वास में तीव्रता, भूख कम हो जाना, आवाज़ धीमा हो जाना, चैतना शून्य, प्रलाप, पेशाब का कम बनना या बिल्कुल न बनना, मुंह तथा जननेन्द्रियों से रक्तस्राव होना, अनिंद्रा तथा जीभ का लाल हो जाना तथा सूजन हो जाना आदि लक्षण रोगी में दिखने लगता है।

उपाय

प्लेग रोग चूहे के द्वारा ही एक से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचता है। ऐसे में प्लेग रोग से ग्रस्त चूहे मरने लगते हैं। प्लेग रोग से बचने का सबसे अच्छा उपाय है, जिस घर में प्लेग रोग के जीवाणु फैल गये हो उस घर को छोड़ दें। यदि उस घर को छोड़ नहीं सकते तो घर को अच्छी तरह साफ़ व स्वच्छ रखें। चूहों को अपने घर से दूर रखना चाहिए तथा नालियों, बाथरूम आदि को फिनायल से धुलवा लेना चाहिए। घर को स्वच्छ रखने के लिए हवन करना चाहिए और कभी-कभी नीम की सूखी पत्तियों को जलाकर घर के कोने-कोने में धुंआ लगाना चाहिए। यदि चूहा मर जाए तो उसे दूर फेंकवा देना चाहिए या मिट्टी में गड्ढ़ा खोदकर गढ़वा देना चाहिए।

प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा उपाय

इन सभी प्लेग रोगों से बचने के लिए कुछ प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा उपाय:-

  • प्लेग रोग से बचने के लिए व्यक्तियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जैसे ही घर में चूहें मर जाएं उसे घर से बाहर छोड़ देना चाहिए तथा जहां पर रह रहे हो उस जगह पर साफ-सफाई का ध्यान देना चाहिए।
  • व्यक्तियों को सादा तथा जल्दी पचने वाले भोजन करना चाहिए तथा पेट में कब्ज नहीं होने देना चाहिए।
  • एनिमा क्रिया के द्वारा पेट को साफ़ करते रहना चाहिए।
  • बाज़ार की चीज़ें, मिठाइयां, दूषित दूध, सड़ी-गली भोज्य पदार्थ आदि नहीं खाने चाहिए।
  • यदि शरीर में विजातीय द्रव्य (दूषित द्रव) जमा हो गया है तो उसे जल्दी ही शरीर से बाहर निकालने के उपाय करना चाहिए। शरीर से दूषित द्रव को बाहर निकालने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए। वह व्यक्ति जिसके शरीर में दूषित द्रव नहीं होता उसके शरीर में चाहें कितने ही ताऊन कीड़े चले जाऐ, उस व्यक्ति को यह रोग नहीं हो सकता है।
  • जिन घरों के आस-पास के व्यक्तियों को यदि प्लेग का रोग हो गया हो तो स्वस्थ्य लोगों को कपूर का एक टुकड़ा सदैव अपने पास रखना चाहिए और भोजन के साथ प्याज अवश्य खाना चाहिए।
  • सुबह के समय में उठते ही एक गिलास पानी में नीबू के रस को मिलाकर पीना चाहिए इससे प्लेग रोग नहीं होता है।
  • शौच करने के बाद रोगी व्यक्ति को अपने हाथ-पैर को अच्छी तरह से धोकर खुले स्थान में वायु का सेवन करने के लिए निकल जाना चाहिए।
  • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 20 मिनट तक धूप से अपने शरीर की सिकाई करनी चाहिए और फिर स्नान करना चाहिए।
  • व्यक्तियों को प्रतिदिन गहरी सांस लेने वाले व्यायाम करना चाहिए।[2]

उपचार

लिंफ ग्रन्थि और रक्त के नमूनों में प्लेग के जीवाणु देखे जाते हैं। रोग का निदान लाक्षणिक ब्यूबोज के प्रकट होने से हो जाता है।[3] नई औषधियों के आगमन से पूर्व प्लेग का उपचार था, चूहों का विनाश और चूहे गिरने पर स्थान छोड़ देना। आज रोकथाम के लिए प्लेग का टीका सक्षम है। प्लेग की सवारी जीवाणु, पिस्सू और चूहे के त्रिकोण पर बैठकर चलती है और जीवावसादक से जीवाणु, कीटनाशक (10ऽ डी.डी.टी.) से पिस्सू, और चूहा विनाशक उपायों से चूहों को मारकर प्लेग का उन्मूलन संभव है। जीवावसादकों में स्ट्रेप्टोमाइसिन तथा सल्फा औषधियों में सल्फाडाज़ीन और सल्फामेराज़ीन इनके विरुद्ध कारगर है। आधुनिक चिकित्सा ने प्लेग की घातकता नष्टप्राय कर दी है।

एलोपैथिक इलाज
  • एंटीबायोटिक का उपयोग ही इसकी चिकित्सा है। ये एंटीबायोटिक हैं - एमानोग्लाइकोसाईड, स्ट्रेप्टोमाइसिन और जेन्टामाइसिन, टेट्रासाइक्लिन, डॉक्सिसाइक्लिन और फ्लूरोक्यूनिलोन समूह के सिप्रोफ्लोक्सिन। इन दवाइयों से प्लेग का प्रभावी ढंग से इलाज किया जा सकता है।
  • लेकिन अगर इलाज ना किया जाए तो बीमारी से पीड़ित लोगों की मृत्यु दर 90 प्रतिशत तक हो सकती है।
  • प्लेग से बचने के लिए टीका विकसित करने के लिए शोधकार्य जारी हैं लेकिन अभी तक कोई टीका उपलब्ध नहीं है।
  • भारत में 1994 में पश्चिमी क्षेत्रों में 50 से ज़्यादा लोगों की ब्यूबॉनिक प्लेग से मौत हो गई थी।
प्राकृतिक चिकित्सा

इन सभी प्लेग रोगों को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

  • जैसे ही व्यक्ति को प्लेग रोग होने का लक्षण दिखाई दें, चाहे सूजन हो या न अथवा बुखार हो या न, तुरंत ही पेट को साफ़ करने के लिए एनिमा क्रिया करनी चाहिए। फिर इसके बाद पूरे शरीर पर एक बार स्टीमबाथ कम से कम आधे घण्टे तक करना चाहिए।
  • रोगी व्यक्ति को तुरन्त मुंह में भाप देना चाहिए तथा इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को चार-चार घण्टे बाद स्टीमबाथ करना चाहिए। फिर इसके बाद मेहनस्नान और उदरस्नान करना चाहिए। पहला स्नान तो स्टीमबाथ के बाद लेना चाहिए तथा दूसरा स्नान तीन से चार घण्टे के अंतराल पर लेना चाहिए। यदि पहले दिन के स्टीमबाथ से पर्याप्त पसीना आए तो दूसरे दिन एक और स्टीमबाथ सावधानी के साथ लेना चाहिए। यदि पसीना न निकले तो पेडू पर गीली पट्टी लगानी चाहिए। यदि गिल्टी निकल आई हो तो उस पर दो-दो घण्टे के बाद 15 मिनट तक भाप देकर बाकी समय उस पर मिट्टी की गीली पट्टी, बर्फ़ का जल या खूब ठंडे जल से भीगे कपडे की उष्णकर पट्टी या ठंडी पट्टी ही बांधनी चाहिए।
  • रोगी व्यक्ति को आसमानी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 25 ग्राम की मात्रा में प्रत्येक 5 मिनट के अंतराल पर रोगी व्यक्ति को पिलाना चाहिए।
  • प्लेग रोग से पीड़ित रोगी का जब तक रोग ठीक न हो जाए तब तक रोगी को उपवास रखना चाहिए। यदि रोगी की अवस्था बहुत अधिक गम्भीर हो गई है तो शरीर पर गीले कपड़े की पट्टी एक घण्टा तक बांधना चाहिए। फिर इसके बाद स्पंजबाथ करना चाहिए इससे रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
  • यदि रोगी न्यूमोनिया प्लेग से पीड़ित है तो उसकी छाती पर मिट्टी की गीली पट्टी दिन में दो से तीन बार बांधनी चाहिए। रोगी के सिर में दर्द हो रहा हो तो उसके सिर पर भी मिट्टी की गीली पट्टी या फिर कपड़े की ठंडी पट्टी बांधनी चाहिए और इन पटि्टयों को थोड़े-थोड़े समय पर बदलते रहना चाहिए।
  • इस प्रकार से रोगी व्यक्ति का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करें तो उसका प्लेग रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जायेगा।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 प्लेग (हिन्दी) (पी.एच.पी) wapedia। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 प्लेग (हिन्दी) (पी.एच.पी) JKhealthworld.com। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011
  3. 3.0 3.1 प्लेग (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) HELP। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011
  4. 4.0 4.1 प्लेग (हिन्दी) (पी.एच.पी) JKhealthworld.com। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011

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