भारतकोश सम्पादकीय 4 जून 2016  

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शहीद मुकुल द्विवेदी के नाम पत्र -आदित्य चौधरी


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मथुरा के जवाहरबाग़ में दिनांक 2 जून, 2016 को हुई दुखद घटना पर शहीद मुकुल द्विवेदी को श्रृद्धांजलि स्वरूप पत्र


प्रिय मुकुल द्विवेदी!

          मैं जानता हूँ कि तुम इस ख़त को अब कभी नहीं पढ़ पाओगे लेकिन न जाने क्यों फिर भी लग रहा है ये ख़त तुमको लिखना ज़रूर चाहिए। तुम सोच रहे होगे कि मेरी और तुम्हारी तो कभी मुलाक़ात भी नहीं हुई फिर मैं तुमको चिट्ठी क्यों लिख रहा हूँ… बात ये है कि आज की तारीख़ में तो मथुरा का कोई परिवार ऐसा नहीं है कि जिसके तुम अपने नहीं हो। सभी तुमको अपने सगे-संबंधी की ही तरह जानते हैं। यदि मौत को पहले से यह पता चल जाता कि तुम्हारे चाहने वाले इतनी अधिक संख्या में हैं और पूरा मथुरा ही तुम्हारा कुनबा है तो शायद मौत भी रहम करके तुमको हमसे छीनकर न ले जाती। मौत भी तुमको मारकर शर्मिंदा हुई होगी।
          लेकिन तुम नहीं जानते कि तुम्हारे प्रियजनों के साथ-साथ मथुरा की जनता भी तुम्हें असमय खोने के दु:ख को आँसू बहा-बहा कर सहन करने की कोशिश कर रही है। इस अनाचारी युद्ध में तुमको अभिमन्यु की तरह घेरकर मारा जाना उन दरिंदों की मानसिकता को ज़ाहिर करता है।
मुकुल! ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि पुलिस वालों के मरने पर जनता ने आँसू बहाए हों। लोग नेताओं, सेना के सिपाहियों, खिलाड़ियों और फ़िल्मी एक्टरों के मरने पर दु:खी होते हैं, आँसू बहाते हैं। इस बार तुम्हारे और तुम्हारी टीम के कारण यह सौभाग्य पुलिस को भी प्राप्त हुआ है।

          हमारे देश में किसी भी सेना या बल के जवान की जान की क़ीमत कितनी कम है इसका अंदाज़ा तुमको बख़ूबी होगा। हमारे जवान, सन् 62 की चीन की लड़ाई में बिना रसद और हथियारों के लड़ते रहे, कुछ वर्ष पहले मिग-21 जैसे कबाड़ा विमानों में एयरफ़ोर्स के पायलट बेमौत मरते रहे, पड़ोसी देश के दरिंदे हमारे सिपाहियों के सर काटकर ले जाते रहे, कश्मीर के साथ न्याय करने के बहाने भयानक अन्याय को सहते रहे, घटिया स्तर के नेताओं की जान बचाने के लिए अपनी जानें क़ुर्बान करते रहे, इन जवानों की शहादत इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि हमारी सरकारें देश के नौनिहालों को लेकर किस क़दर लापरवाह है।
          तुम तो जानते ही हो मुकुल, कि पुलिस के अच्छे अधिकारियों की स्थिति बहुत अजीब होती है। कभी जनता की दोस्ती और सहानुभूति नहीं मिल पाती तो कभी नेताओं का विश्वास नहीं जीत पाते। पुलिस और जनता का रिश्ता भी बहुत अजीब होता है। पुलिस जनता को अभय प्रदान करने के लिए होती है लेकिन जनता के भयभीत रहने का एक कारण पुलिस भी होती है। पुलिस का व्यवहार जनता के प्रति सामान्यत: रूखा ही होता है। इसलिए जनता में पुलिस को लेकर कभी हमदर्दी की भावना नहीं रहती। कभी किसी गाँव में पुलिस की पिटाई या खदेड़ने की ख़बर अख़बार में आती है तो लोग बड़े मज़े से उसे पढ़कर सुनाते हैं। अब तो जैसे तुमने नज़रिया ही बदल दिया। मथुरा के लोगों में चर्चा है तुम्हारी शहादत की और तुम्हारी उस चुनौती की, जो तुमने कुछ समय पहले दी थी, जिसमें तुमने कहा था कि “मथुरा में या तो ये लोग (अवैध क़ब्ज़ाधारी) रहेंगे या मुकुल द्विवेदी रहेगा।” तुमने जो कहा वो कर भी दिखाया… लेकिन ये तो तय नहीं था कि तुम भी हमें छोड़कर चले जाओगे?
          तुम्हारे साथ अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए। जिनमें से क़रीब 20-25 तो नयति अस्पताल में ही भर्ती हुए। इतने ही लगभग जनता के लोग थे जो घायल थे। वैसे भी एक साथ इतने घायलों को संभालना नयति जैसे अस्पताल के ही बस की बात है। हृदयविदारक दृश्य था वह। कठोर से कठोर हृदय का व्यक्ति भी उस दृश्य को देख कांप जाता। मेरे एक मित्र ने मुझे जब पूरा हाल सुनाया तो में बेहद बेचैन हो गया। तुमको तो डॉक्टर नहीं बचा पाए लेकिन बाक़ी सुरक्षित हैं और उनका अभी भी इलाज ही चल रहा है।
          … ख़ैर… मुझे बताया गया है कि मथुरा में जो अच्छे पुलिस कर्मी हैं उनमें से एक संतोष भी था। ये बात मुझसे ज़्यादा तो तुम्हें मालूम होगी। जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत संबंधों की बात है तो मेरी मुलाक़ात न तो कभी संतोष यादव से हुई और न ही तुमसे। मैं अधिकारियों से बहुत ही कम मिलता-जुलता हूँ। हाँ इतना मुझे पता है कि अगर मेरी मुलाक़ात तुमसे हुई होती तो हम दोस्त बन गए होते।

          यह घटना क्यों घटी और किसकी क्या ग़लती रही इसकी समीक्षा और जांच तो सालों साल चलती रहेगी। सरकारें बदलती रहती हैं सब कुछ वैसा ही चलता रहता है। थोड़ा बहुत बदलाव दिखाई देता है बस।
बदलाव होगा बस मौसम में, कुछ दिन बाद बरसात आएगी। जवाहर बाग़ में पड़े बहुत सारे निशान ख़त्म हो जाएँगे। जले पेड़ों पर फिर कोंपलें फूट पड़ेंगी। बहुत सारे बदलाव होंगे...
लेकिन एक बात है जो नहीं बदलेगी-
तुम्हारे चले जाने के बाद से, जवाहर बाग़ के पास की सड़क से गुज़रने वाला हर शख़्स तुमको याद करता हुआ गुज़रेगा और साथ ही संतोष यादव और उन सभी को जिन्होंने इस मुक़ाबले में तुम्हारे साथ हिस्सा लिया… ये यादें कभी कम नहीं होंगी… कभी कम नहीं होंगी...


-आदित्य चौधरी
संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक




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