मदालसा  

मदालसा एक पौराणिक चरित्र है जो ऋतुध्वज की पटरानी थी और विश्वावसु गन्धर्वराज की पुत्री थी। शत्रुजित नामक एक राजा था। उसके यज्ञों में सोमपान करके इंद्र उस पर विशेष प्रसन्न हो गये। शत्रुजित को एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम ऋतुध्वज था। उस राजकुमार के विभिन्न वर्णों से संबंधित अनेक मित्र थे। सभी इकटठे खेलते थे। मित्रों के अश्वतर नागराज के दो पुत्र भी थे जो प्रतिदिन मनोविनोद क्रीड़ा इत्यादि के निमित ऋतुध्वज के पास भूतल पर आते थे। राजकुमार के बिना रसातल में वे रात भर अत्यंत व्याकुल रहते। एक दिन नागराज ने उनसे पूछा कि वे दिन-भर कहाँ रहते हैं? उनके बताने पर उनकी प्रगाढ़ मित्रता से अवगत होकर नागराज ने फिर पूछा कि उनके मित्र के लिए वे क्या कर सकते हैं। दोनों पुत्रों ने कहा ऋतुध्वज अत्यंत संपन्न है किंतु उसका एक असाध्य कार्य अटका हुआ है।

कथा

एक बार राजा शत्रुजित के पास गालब मुनि गये थे। उन्होंने राजा से कहा था, कि एक दैत्य उनकी तपस्या में विघ्न प्रस्तुत करता है। उसको मारने के साधनस्वरूप यह कुवलय नामक घोड़ा आकाश से नीचे उतरा और आकाशवाणी हुई, राजा शत्रुजित का पुत्र ऋतुध्वज घोड़े पर जाकर दैत्य को मारेगा। यह घोड़ा बिना थके आकाश, जल, पृथ्वी, पर समान गति से चल सकता है। राजा ने हमारे मित्र ऋतुध्वज को गालब के साथ कर दिया। ऋतुध्वज उस घोड़े पर चढ़कर राक्षस का पीछा करने लगा। राक्षस सूअर के रुप में था। राजकुमार के वाणों से बिंधकर वह कभी झाड़ी के पीछे छुप जाता, कभी गड्ढे में कूद जाता। ऐसे ही वह एक गड्ढे में कूदा तो उसके पीछे-पीछे घोड़े सहित राज कुमार भी वहीं कूद गया। वहाँ सूअर तो दिखायी नहीं दिया किंतु एक सुनसान नगर दिखायी पड़ा। एक सुंदरी व्यस्तता में तेजी से चली आ रही थी। राजकुमार उसके पीछे चल पड़ा। उसका पीछा करता हुआ राजा एक अनुपम सुंदर महल में पहुँचा वहाँ सोने के पलंग पर एक राजकुमारी बैठी थी। जिस सुंदरी को उसने पहले देखा था, वह उसकी दासी कुंडला थी। राजकुमारी का नाम मदालसा था। कुंडला ने बताया-'मदालसा प्रसिद्ध गंधर्वराज विश्वावसु की कन्या है। व्रजकेतु दानव का पुत्र पातालकेतु उसे हरकर यहाँ ले आया है। मदालसा के दुखी होने पर कामधेनु ने प्रकट होकर आश्वासन दिया था कि जो राजकुमार उस दैत्य को अपने वाणों से बींध देगा, उसीसे इसका विवाह होगा। ऋतुध्वज ने उस दानव को बींधा है, यह जानकर कुंडला ने अपने कुलगुरु का आवाहन किया। कुलगुरु तंबुरु ने प्रकट होकर उन दोनों का विवाह संस्कार करवाया। मदालसा की दासी कुंडला तपस्या के लिए चली गयी तथा राजकुमार मदालसा को लेकर चला तो दैत्यों ने उस पर आक्रमण कर दिया। पातालकेतु सहित सबको नष्ट करके वह अपने पिता के पास पहुँचा। निविंध्न रुप से समस्त पृथ्वी पर घोड़े से घूमने के कारण वह कुवलयाश्व [1] तथा घोड़ा (अश्व) कुवलय नाम से प्रसिद्ध हुआ। पिता की आज्ञा से वह प्रतिदिन प्रात: काल उसी घोड़े पर बैठकर ब्राह्मणों की रक्षा के लिए निकल जाया करता था। एक दिन वह इसी संदर्भ में एक आश्रम के निकट पहुँचा। वहाँ पाताल केतु का भाई तालकेतु ब्राह्मण वेश में रह रहा था। भाई के द्वेष को स्मरण करके उसने यज्ञ में स्वर्णार्पण के निमित्त राजकुमार से उसका स्वर्णहार मांग लिया। तदनंतर उसे अपने लौटने तक आश्रम की रक्षा का भार सौंपकर उसने जल में डुबकी लगायी। जल के भीतर से ही वह राजकुमार के नगर में पहुँच गया। वहाँ उसने दैत्यों से युद्ध और राजकुमार की मृत्यु के झूठी खबर की पुष्टि हार दिखा कर की। ब्राह्मणों ने उनका अग्नि-संस्कार कर दिया। मदालसा ने भी अपने प्राण त्याग दिये। तालकेतु पुन: जल से निकलकर राजकुमार के पास पहुँचा और धन्यवाद कर उसने राजकुमार को विदा किया। घर आने पर ऋतुध्वज को समस्त समाचार विदित हुए, अत: मदालसा के चिरविरह से आतप्त वह शोकाकुल है। वह हम लोगों के साथ थोड़ा मन बहला लेता है। पुत्रों की बात सुनकर उनके मित्र का हित करने की इच्छा से नागराज ने तपस्या से सरस्वती को प्रसन्न कर अपने तथा अपने भाई कंबल के लिए संगीतशास्त्र की निपुणता का वर प्राप्त किया। तदनंतर शिव को तपस्या से प्रसन्न कर अपने फन से मदालसा के पुनर्जन्म का वर प्राप्त किया। अश्वतर के मध्य फन से मदालसा का जन्म हुआ। नागराज ने उसे गुप्त रुप से अपने रनिवास में छुपाकर रख दिया। तदनंतर अपने दोनों पुत्रों से ऋतुध्वज को आमंत्रित कर वाया। ऋतुध्वज ने देखा कि दोनों ब्राह्मणवेशी मित्रों ने पाताल लोक पहुँचकर अपना छद्मवेश त्याग दिया। उनका नाग रूप तथा नागलोक का आकर्षक रुप देख वह अत्यंत चकित हुआ। आतिथ्योपरांत नागराज से उससे मनवांछित वस्तु मांगने के लिए कहा। ऋतुध्वज मौन रहा। नागराज ने मदालसा उसे समर्पित कर दी। उसने अत्यंत आभार तथा प्रसन्नता के साथ अश्वतर को प्रणाम किया तथा अपने घोड़े कुवलय का आवाहन कर वह मदालसा सहित अपने माता-पिता के पास पहुँचा। पिता की मृत्यु के उपरांत उसका राज्याभिषेक हुआ। मदालसा से उसे चार पुत्र प्राप्त हुए। पहले तीन पुत्रों के नाम क्रमश: विक्रांत, सुबाहु तथा अरिमर्दन रखा गया। मदालसा प्रत्येक बालक के नामकरण पर हंसती थी। राजा ने कारण पूछा वह बोली कि नामानुरूप गुण बालक में होने आवश्यक नहीं हैं। नाम तो मात्र चिह्न है। आत्मा का नाम भला कैसे रखा जा सकता है। चौथे बालक का नाम मदालसा ने 'अलर्क' रखा। मदालसा के अनुसार हर नाम उतना ही निरर्थक है जितना 'अलर्क' उसके पहले तीनों बेटे विरक्तप्राय थे। राजा ने मदालसा से कहा कि इस प्रकार तो उसकी वंश परंपरा ही नष्ट हो जायेगी। चौथे बालक को प्रवृत्ति मार्ग का उपदेश देना चाहिए। मदालसा ने अलर्क को धर्म, राजनीति व्यवहार आदि अनेक क्षेत्रों की शिक्षा दी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कु=भूमि, वलय=मंडल

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