महाराज व्रत  

  • भारत में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित हिन्दू धर्म का एक व्रत संस्कार है।
  • जब चतुर्दशी तिथि (शुक्ल या कृष्ण) आर्द्रा नक्षत्र में हों या यह पूर्वाभाद्रा एवं उत्तरा भाद्रपदा से युक्त हो तो वह शिव को आनन्द देती है।
  • त्रयोदशी तिथि को संकल्प किया जाता है।
  • चतुर्दशी तिथि को एक के उपरान्त दूसरे से, यथा–तिल, गोमूत्र, गोबर, मिट्टी, पंचगव्य तथा अन्त में शुद्ध जल से स्नान किया जाता है।
  • इसके उपरान्त शिव संकल्प मंत्र 'यज्जाग्रतो दूरम्' (शिवसंकल्पोनिषद्, 8) का 1000 बार जप तीन वर्षों के लिए तथा 'ओं नमः शिवाय' शूद्रों के लिए; पंचामृत, ईख के रस से शिव एवं उमा की प्रतिमाओं को स्नान कराना तथा कस्तूरी, कुंकुम आदि लगाना, दीप मल्लिका, शिव संकल्प या 'त्रयम्बक यजामहे' मन्त्र के साथ सहस्त्रों बिल्वदलों से होम किया जाता है।
  • मन्त्रों के साथ में अर्ध्य भी दिया जाता है।
  • इस व्रत में रात्रि भर जागरण किया जाता है।
  • इसमें 5 या 2 या 1 गाय का दान दिया जाता है।
  • पंचगव्य पान के उपरान्त मौन रूप से भोजन किया जाता है।
  • इस व्रत से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और परम पद की प्राप्ति होती है।[1]

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हेमाद्रि (व्रत0 2, 1039-1147, स्कन्द पुराण से उद्धरण

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