मारिशस का हिन्दी साहित्य -डॉ. लता  

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लेखक- डॉ. लता

मारिशस विश्व के रंगमंच पर सुपरिचित और महत्त्वपूर्ण राष्ट्र है। इस देश की संस्कृति संश्लिष्ट है। यहाँ अधिकांश निवासी भारतीय मूल के हैं। हिन्दी में इनका कृतित्व उल्लेखनीय हैं। इन लेखकों की लगभग दो सौ कृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें साहित्य, इतिहास, संस्कृति और धर्म विषयक सभी प्रकार की रचनाएँ हैं। इन कृतियों में मारिशस के जीवन मूल्यों का भी पता चलता है। इन्हीं प्रवासी भारतीयों के द्वारा हिन्दी साहित्य का सर्वाधिक सृजन हुआ है। यह साहित्य हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के प्रति सजग है। यह अपने परिवेश के प्रति भी प्रतिबद्ध है। भारतीय पाठकों के प्रति भी प्रतिबद्धता इस साहित्य की विशेषता है। अत: इस साहित्य की अपनी अलग अस्मिता है।
डॉक्टर रामेश्वर ओरी ने अपने भाषा वैज्ञानिक सर्वेक्षण में यहाँ बोली जाने वाली ग्यारह भाषाओं का उल्लेख किया है। इस देश में भारत, चीन, इंग्लैंड, फ्रांस, सेशल, रेयुनियन, मोजाबिक, पूर्व अफ्रीका और पश्चिम अफ्रीका इन नौ देशों की संस्कृतियों का संश्लिष्ट रूप मिलता है। केवल 61 किलोमीटर लंबे और 47 किलोमीटर चौड़े मारिशस में इतनी विविधता को समेटना मानवीय सौहार्द्र की अभूतपूर्व उपलब्धि है।
साहित्य सर्जन या तो शासकों की भाषा में हुआ है या सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सजग प्रवासियों की भाषा में। हिन्दी का साहित्य दूसरे वर्ग में है। क्रियोली और भोजपुरी यहाँ की संपर्क भाषाएँ रही हैं। वर्तमान भाषा स्थिति यह है कि क्रियोली भोजपुरी की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। भोजपुरी का स्थान हिन्दी खड़ीबोली ने ले लिया है। फिर भी भोजपुरी पुरानी पीढ़ी की भाषा के रूप में जीवित है। यही कारण है कि वहाँ की हिन्दी का अधिकतर रचनात्मक साहित्य खड़ीबोली में है। काव्य, उपन्यास, कहानी और नाटक अधिक लिखे गए हैं। इस साहित्य का विकास पिछले 50 वर्षों में हुआ है। इसमें भी 1960 तक विकास की गति बहुत मंद रही है। कारण यह था कि हिन्दी मारिशस में शोषित मज़दूरों की भाषा रही।

के. हज़ारी सिंह ने अपने ग्रंथ 'मारिशस में भारतीयों का इतिहास' में जिस दर्दनाक इतिहास पर से परदा उठाया है वह विस्मयकारी है। इतने उग्र दमन और और प्रतिरोध के बावजूद भारतीय संस्कृति मरी क्यों नहीं? भारत में आर्य समाज ने देश में पुनर्जागरण में जो योगदान दिया था, उसकी चिनगारी मारिशस में भी प्रज्ज्वलित रखा और इसकी रोशनी में हिन्दी साहित्य लिखा गया। प्रारंभिक साहित्यकारों में प्रो. वासुदेव विष्णुदयाल, जयनारायण राय तथा ब्रजेंद्र जगत मधुकर रहे। वस्तुत: यह त्रयी ही मारिशस में हिन्दी साहित्य की प्रारंभिक कर्णधार है। अन्य हिन्दी सेवकों की भूमिका भाषा प्रचारक की रही। पाठक तैयार करने और हिन्दी प्रसार के लिए ये भी स्मरणीय हैं। स्वाधीनता के पूर्व ही कुछ और साहित्यकारों का उदय हो गया था। स्वाधीनता के पश्चात् तो रचनाकारों की बाढ़ सी आ गई। विविध विधाओं में लेखन होने लगा। इधर महात्मा गांधी संस्थान की 'वंसत' पत्रिका ने नई पत्रिकाओं को प्रोत्साहन दिया, पुरानी पत्रिकाओं में 'अनुराग' की भूमिका उल्लेखनीय रही है।
 

मारिशस की हिन्दी कविता

मारिशस बाहरी देशों के निवासियों के द्वारा बसाया गया देश है। यही कारण है कि प्रत्येक प्रवासी अपने देश के संस्कारों से जुड़कर लिखता रहा है। बड़ी-बड़ी शास्त्रीय परिभाषाओं और वादों के मानदंडों पर यहाँ के हिन्दी काव्य को जाँचना अन्याय होगा। यहाँ लोगों ने हिन्दी में काव्य सृजन के उद्देश्य से कविताएँ लिखी हैं। अभी तक एक भी महाकाव्य या खंडकाव्य यहाँ के कवियों ने नहीं लिखा है। यहाँ के कवियों की बंधी कलम से अब तक यह सम्भव भी नहीं था पर भविष्य का क्षितिज आशा की अरुणिमा लिए हुए है।
ठाकुर प्रसाद मिश्र की एक कथा कविता 1962 में छपी है। इसका रचना काल द्वितीय विश्व युद्ध का रहा है। 'दीपावली' शीर्षक यह रचना देवी भगवती की वंदना के रूप में है। ब्रजेंद्र भगत मधुकर ने पहली बार सामान्य मानव को कथा काव्य का नाटक बनाकर 'एक कहानी कुली की' लिखी। सर शिवसागर रामगुलाम पर भी लंबी कविताएँ लिखी गई हैं। फ्रेंच से अनूदित एक लंबी कविता 'सीता' भी मिलती है। कुछ लंबे जीवनीपरक भोजपुरी गीत भी हैं।
यदि प्रकाशन तिथि को मापदंड मानें तो मुनीश्वरलाल चिंतामणि ने अपनी पुस्तक 'मारिशस का हिन्दी साहित्य तथा अन्य निबंध' में लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी की 'रस पुंज कुंडलियाँ' (1923) को पहला काव्य संग्रह माना है। परन्तु मुझे लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी को मारिशसीय हिन्दी का कवि मानना ठीक नहीं लगता। वे कुछ दिनों के लिए ही भारत से मारिशस गए थे। वास्तव में मारिशस की भूमि पर जन्मा पहला कवि मुसलमान था। इसका नाम अज्ञात है। इसने 1890 के तूफान पर हिन्दी कविता लिखी थी। वहाँ की जनता में आज भी उसका नाम 'साइक्लोन मियाँ' के रूप में है। मुनीश्वरलाल चिंतामणि के निबंध में इसका उल्लेख है।
प्रकाशित कविताओं का पहला संग्रह 'मधुपर्क' है। मधुकर जी की यह रचना अब अप्राप्य है। इसका काल चिंतामणि ने 1942 तथा सोमदत्त बखौरी ने 1948 बताया है। इस कवि के कोई बीस कविता संग्रह हैं। ये यहाँ की हिन्दी के प्राचीनतम कवि हैं। रणभेरी, स्वराज्य, गीतांजलि, मधुमास, रसवन्ती, हिन्दी गौरववान आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। मारिशसीय हिन्दी का राष्ट्र कवि, स्वाधीनता आंदोलन का यह अग्रणी कवि नेता अपने ओजस्वी गीतों के कारण अमर है। इन्होंने भोजपुरी में भी राष्ट्रीय गीत लिखे हैं। इनकी सभी रचनाएँ छंदोबद्ध है।
मुक्त छंद की कविता का आरंभ 1961 में मुनीश्वरलाल चिंतामणि की कविता 'शांतिनिकेतन की ओर' से माना जा सकता है। सोमदत्त बखौरी के दो संग्रह प्रकाशित हुए- 'मुझे कुछ कहना है' (1967) और 'बीच में बहती धारा' (1971)। ये मुक्त छंद के प्रौढ़तम कवि हैं। अब तो अभिमन्यु अनत भी इस विधा के सशक्त रचनाकार हैं। हरिनारायण सीता, गिरिजानन रंगू, रविशंकर कौले सर, पूजानंद नेमा, सूर्यदेव सिवरत आदि भी नए खेवे के कवि हैं।
पहला काव्य संकलन 1966 में प्रकाशित हुआ जिसमें कवियों की कविताएं संकलित हैं। 1970 में 'आकाशगंगा', 1971 में प्रावासी स्वर, 1975-86 में 'तरंगिणी' और 'मारिशस की हिन्दी कविता' नामक सामूहिक संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कुछ बालगीतों के भी संग्रह निकले हैं। वसंत पत्रिका में भी बहुत से नए हस्ताक्षर आ रहे हैं। कौन कितना टिकेगा, कहना मुश्किल है। गजल लिखने वालों में मुकेश जी बोध अपना स्थान बना चुके हैं।
मारिशस के कवि विषय और शिल्प दोनों के प्रति सतर्क हैं। जहाँ संतुलन है वहाँ रचना उत्कृष्ट है। इनकी रचनाओं में आशा, आस्था और विश्वास के स्वर प्रमुख हैं। मारिशस के कवि भारतीय संस्कारों के प्रति विशेष निष्ठावान हैं। बदलते मूल्यों से तालमेल बिठाना कठिन है। ठाकुरदत्त पांडेय इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। शोषण के बदलते संदर्भ और हथियार के बारे में अनत का कहना है।

धूप की जलती सलाखों को

नंगी पाठ पर सहता हुआ
तुम्हारी सलीब को ढोये जा रहा हूँ
और, मेरी यात्रा को सुगम बनाने के वास्ते
मेरी रोटी की थैली

तुमने अपने हाथों में ले ली है। ...(वसंत, 11, पृष्ठ 9)

 
युग धर्म के प्रति मारिशसीय हिन्दी कवि सजग है। परिस्थितियों के ठहराव का बोध और क्रांति की संभावना तो विश्व काव्य का स्वर है। इन कवियों की शैली कहीं-कहीं पुस्तकीय है। अनुभवों की विविधता नहीं के बराबर है। प्राय: कवि पुनरावृत्ति के शिकार है। पर नए प्रतीकों का प्रयोग मिलता है। भारतीयों कवियों का असर भी दिखाई पड़ता है। हिन्दी फिल्मों की छाप भी है। कहीं-कहीं तो लगता है कि कवि भारतीय पाठकों के लिए लिख रहा है। उसकी दृष्टि मारिशस के पाठकों पर कम है। हिन्दी कविता की घटती लोकप्रियता का यह भी एक कारण है।
मारिशस के भोजपुरी गीतों का पहला संकलन श्रीमती भगवती देवी ने 1912 में किया था। कई संकलन उसके बाद में हुए पर प्रकाशित बहुत कम हैं। यह गीत परम्परा नारी कंठों में थी, पर वर्तमान पीढ़ी इसके प्रति उदासीन है। श्रीमती सीतारमय्या ने अपने पत्र में (15.04.1980) लिखा है कि (पत्र मेरे पास है)- 'भोजपुरी गीतों को हमारे पूर्वजों ने रचा था... आगे चलकर भोजपुरी गीत का महत्त्व मारिशस में कम होने लगा क्योंकि जो लोग गाते थे, उन गीतों को बिना साज और पोसाग के गाते थे। उनके पास सिंगार सामग्रियाँ न थीं।... लोग इसे मजाक के रूप में देखते थे।' भोजपुरी के प्रति हीन भावना वहाँ की नई पीढ़ी में आ गई है, जो एक कटु सत्य है।
 

मारिशस के हिन्दी उपन्यास

मारिशस में उपन्यास के विकास के लिए जितनी परिस्थितियाँ, संस्कृतियाँ और विषय हैं, उस अनुपात में उपन्यास का विकास नहीं हुआ है। 1980 तक कुल पंद्रह उपन्यास लिखे गए हैं। ग्यारह उपन्यासों के लेखक श्री अभिमन्यु अनत है। पहला उपन्यास 1960 में कृष्णलाल बिहारी ने लिखा था। 'पहला कदम' नामक यह उपन्यास असफल प्रेम की कथा है। कथा सौष्ठव और चरित्र विकास पंगु है, पर वर्णन शैली में औपन्यासिकता है। ग्रामीण और शहरी वातावरण का अंतर तथा सामाजिक रूढ़ियों के सांकेतिक चित्र हैं। इसकी भूमिका में लेखक ने कहा है- 'मैंने यह पुस्तक सिर्फ़ हिन्दू जाति को जीवित रखने और हिन्दी भाषा की धारा बहाने के उद्देश्य से बनाई है।
'फट गई धरती' नामक एक उपन्यास 1976 में विष्णुदत्त मधुचंद्र का छपा है। वसंत में धारावाहिक 'सगाई' हीरालाल लीलाधर का एक लघु उपन्यास छपा है। पाल एंड वार्जिनी का एक पुराना अनुवाद भी मिलता है। अभिमन्यु अनत के सभी उपन्यास भारत में छपे हैं- और नदी बहती रही, आंदोलन, एक बीघा प्यार, जम गया सूरज, हड़ताल कल होगी, लाल पसीना, चौथा प्राणी, कुहासे का दायरा, तीसरे किनारे पर, शेफाली आदि।
अनत की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 'लाल पसीना' है। इसमें मारिशस का तीन पीढ़ियों का भारतीय प्रवासी समाज बोलता है। अस्पताल का वर्णन पढ़कर तो सोलफ़ेनित्सिन के कैंसर वार्ड की याद ताजा हो जाती है। इस उपन्यास का दूसरा भाग कुछ शिथिल है। फिर भी यह मारिशस के हिन्दी साहित्य की सर्वोत्तम उपलब्धि है। 'आंदोलन' में ग्रामीण और शहरी जीवन धारा के अलगाव बिंदुओं की खोज है। 'एक बीघा प्यार' में शहरी अजनबीपन और संपन्न समाज का छायांकन है। सभी उपन्यासों में मारिशस का समाज चित्रित है। संश्लिष्ट संस्कृति की झलक भी है, पर अच्छा होता यदि अनत मारिशस में रहने वाले अन्य देशों के निवासियों तथा संस्कृतियों को भी उपन्यास का विषय विशुद्ध रूप से बनाते। इस से हिन्दी पाठकों को सामासिक संस्कृति की और व्यापक जानकारी होती। उनकी भाषा में वहाँ बोली जाने वाली अन्य भाषाओं के शब्द हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय बनाते हैं।
 

मारिशस की हिन्दी कहानी

कहानी विश्व की सबसे विकसित साहित्य विधा है। मारिशस में नवविकसित शैली की कहानियाँ ही लिखी गई हैं। यहाँ कहानी साहित्य का जन्म संघर्ष और आंदोलनों के युग में हुआ। शिल्प अधिकतर समानांतर कहानी का है। कहानी संग्रह हम है। पत्र-पत्रिकाओं में ही अधिकांश कहानियाँ छपी हैं। 'अनुराग' और 'वसंत' ने इस विधा को सर्वाधिक स्वर दिया है। प्रमुख कहानी संग्रह 'सागर पार', 'स्वर्ग में क्या रखा है' (दीपचंद्र, बिहारी) 'परख', (बृजलाल रामदीन), 'चिराग और तूफान' (प्रेमचंद मूली), 'खामोशी के चित्कार' (अभिमन्यू अनत) और 'मिनिस्टर' (भानुमती नागदान) है। 'नए अंकुर', 'मारिशस की हिन्दी कहानी' आदि सामूहिक कहानी संग्रह हैं, जिसमें कई लेखकों की रचनाएँ हैं।
मारिशस की कहानियों में वर्ग संघर्ष और मानव मन की जुझारू प्रवृत्तियों का विश्लेषण है। मनोवैज्ञानिक कहानियाँ अपनी जमीन से जुड़ी है। इनमें शोषण के इतिहास के साथ मेहनती वर्ग की विवशता की कथा है। वर्ग भेद, वर्ण भेद और कुंठित संस्कारों की बात कहने में संकोच नहीं है। जीवन मूल्य भारतीय संस्थाकारों से जुड़े हैं। ऐसी कहानियों में 'माथे का टीका' (अनत), 'बिगड़ा हुआ यंत्र' (दीपचंद्र बिहारी), 'एक कदम' (रघुनाथ दयाल), 'मोड़' (रामदेव धुरंधर), 'ओवर टाइम' (कृष्णलाल बिहारी), 'अनुबंधन' (भानुमती नागदान) उल्लेखनीय हैं।
सदियों के प्रवास में भी भारतीय अस्मिता सुरक्षित है। शैली और शिल्प पर भारतीय हिन्दी कहानी का प्रभाव है। मारिशसीय कहानियों में नाटकीयता अधिक है, क्योंकि प्राय: लेखक कहानी और नाटक दोनों लिखते हैं। कथा संयोजन की दृष्टि से दीपचंद्र बिहारी सर्वाधिक सजग और तटस्थ कलाकार हैं। रामदेव धुंरधर का शिल्प कैमरे से खीचा गया चित्र है। कुछ लेखकों ने लोक कथाएँ और बाल कथाएँ भी लिखी हैं। महिला लेखिकाओं में भानुमती नागदान ने संवेदनशील दृष्टि से आस पास के समाज को परखा है।
 

मारिशस की अन्य विधाएँ

मारिशस का हिन्दी गद्य भोजपुरी गद्य का विकसित रूप नहीं है, जैसा कि यहाँ के परिवेश में होना चाहिए था। खड़ीबोली का यह गद्य हिन्दी शिक्षा प्राप्त मारिशसीय लेखक की भाषा है, जिसका संबंध उसकी घरेलू भोजपुरी से नहीं है। 1940 से 1960 तक इसका आरंभिक विकास हुआ। 1960 के बाद के लेखक भी अधिकतर कथा साहित्य ही लिखते रहे। कुछ विधाओं का विकास नहीं के बराबर है। जीवनी, संस्मरण, नाटक, एकांकी, यात्रा विवरण, समालोचना, इतिहास, धार्मिक साहित्य, पत्रकारिता और पाठ्य पुस्तकों को इसके अंतर्गत गिना जा सकता है।
प्रकाशित नाटकों में पहला नाटक जयनारायण राय का 'जीवन संगिनी' है, जो 1941 में प्रकाशित हुआ था। इसकी कथा में नारी जीवन के परंपरागत मूल्य सुरक्षित हैं। भाषा पर भारतेन्दु काल की-सी छाप है। 1951 में ब्रजेन्द्र भगत मधुकर का 'आदर्श बेटी' नामक दो एकांकी नाटकों का संग्रह प्रकाशित हुआ। इसकी शैली समस्या नाटकों की है। 1954 में अभिमन्यु अनत का उदय रंगमंच के इतिहास की क्रांतिकारी घटना है। टेलीविजन और रंगमंच के लिए कई लेखकों ने अनेक एकांकी और नाटक लिखे हैं। प्रकाशित नाटकों में सबसे प्रमुख है अनत का 'विरोध'। युवा वर्ग की मान्यताओं को स्वर दिया है इस नाटक ने। दूसरा प्रकाशित एकांकी संग्रह ठाकुर दत्त पांडेय का 'पांच एकांकी : एक सपना है' है। 'वसंत' पत्रिका में भी समय समय पर एकांकी प्रकाशित हो रहे हैं।
निबंध और समालोचना का विकास नहीं के बराबर है। अधिकांश निबंध धार्मिक और सांस्कृतिक हैं, जिन्हें प्रवचन कहना अधिक उपयुक्त होगा। इस दिशा में प्रो. वासुदेव विष्णुदयाल ने लेखावली-निबंधावली आदि लिखकर जटिल विषयों को सरल ढंग से प्रस्तुत किया है। कुछ शीर्षक 'मनुष्य आत्मा है', पश्चिम को भारत प्रस्तुत किया है। कुछ शीर्षक, 'मनुष्य आत्मा है, 'पश्चिम को भारत की देन', 'संसार वृक्ष', 'गीता और उपनिषद'- विषय के स्पष्टीकरण के लिए पर्याप्त है। हिन्दी के प्रसार और विकास में इनका योग अवस्मिरणीय है। एक और निबंध संग्रह है प्रसादगण पंत का 'जीवन प्रदीप'। इसमें कुछ निबंध मनोभावों की संख्या काफ़ी है। समालोचकों की संख्या नगण्य है। कुछ साहित्यिक आलोचनाएँ छिटपुट पत्रिका में छपी हैं। गंगा दत्त, मुनीश्वर लाल चिंतामणि, पूजानंद नेमा आदि दो-चार हस्ताक्षर यदा-कदा दीखते हैं।
जीवनी और संस्करण साहित्य के नाम पर डॉक्टर शिवसागर राम गुलाम के संबंध में कुछ रचनाएँ लिखी गई हैं। पं. रामलगन शर्मा की 'मारिशस के निर्माता सर शिवसागर रामगुलाम' तथा सुरेश रामवर्ण की 'चाचा रामगुलाम के संस्मरण, उल्लेख योग्य हैं। निबंध रूप में कुछ अन्य लोगों के जीवन परिचय भी पत्रिकाओं में छपे हैं।
यात्रा विवरण के रूप में सब से महत्त्वपूर्ण रचना है, सोमदत्त बखौरी की 'गंगा की पुकार'। भारत-मारिशस संबंध और भारत के प्रति मारिशसवासी की धारणाएँ इस से स्पष्ट होती हैं। यहाँ यात्रा साहित्य की बहुत संभावनाएँ हैं। प्राय: सभी मारिशस भारतीय विश्व के कई देशों की यात्रा कर चुके हैं। वे चाहें तो विश्व के अनेक देशों के बारे में विपुल जानकारी दे सकते हैं। पर यह विद्या उपेक्षित है। प्रहलादराम शरण ने डॉक्टर रामगुलाम की राजस्थान यात्रा का वर्णन अवश्य किया है।
इतिहास ग्रंथों की तो मारिशसीय हिन्दी में भरमार है। मारिशसीय हिन्दी की प्राचीनतम विधा यही है। 1929 से ही इतिहास ग्रंथ लिखे जाते रहे हैं। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्मारिका में सोमदत्त बखौरी ने नाम गिनाए हैं। इधर का सर्वाधिक प्रशंसनीय प्रयास है- 'मारिशस में भारतीयों का इतिहास' जिसके लेखक हैं के. हज़ारी सिंह। हिन्दी में लिखित सारा इतिहास भारतीय प्रवासियों की भाषिक और सांस्कृतिक चेतना का इतिहास है।
पत्रकारिता का आरंभ 1903 में हुआ। अनगिनत पत्र-पत्रिकाएं बनती और मिटती रही हैं। पत्रों में 'आर्योदय' और 'जनता' अभी भी जीवित है। पत्रिकाओं में केवल वसंत चल रही है। अनुराग का विलयन इसी में हो गया है।
भोजपुरी गद्य बोलचाल में है। इसमें साहित्य नहीं है। यह लोक-गीतों की भाषा है। एकाध कहानी या प्रचार पुस्तक को साहित्य नहीं कहा जा सकता। भोजपुरी गद्य जहाँ कहीं लिखित है, वह अप्रकाशित या छोटी पुस्तिका के रूप में है। सब मिलाकर मारिशस का हिन्दी गद्य साहित्य विकासशील है और इसकी भविष्यत संभावनाएं अनंत हैं।
 

सर्वेक्षण

मारिशस में स्वाधीनता से पूर्व हिन्दी की भूमिका अधिक सबल रही। स्वाधीनता के बाद भी दस वर्षों तक यह गति शीघ्र थी। इधर कई कारणों से हिन्दी के प्रति यहाँ के लोग उदासीन हो रहे हैं। क्रियोल को सरकारी संरक्षण प्राप्त है। संपर्क भाषा के रूप में उसके प्रचार-प्रसार के आधिक्य से मारिशस का हिन्दी लेखक अपने को हीन और असुरक्षित महसूस कर रहा है। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन वाला उत्साह अब नहीं रह गया। पड़ाव को मंजिल मानका वे राहत की साँस ले रहे हैं, यद्यपि यह सबसे कठिन परीक्षा का समय है। भारत से पढ़कर गए हुए छात्रों की साहित्यिक उदासीनता भी एक कारण है। अभिमन्यु अनत ने नव उपनिवेशवादी षड़यंत्रों को भी इसका कारण माना है। वहाँ की एक प्रसिद्ध लेखिका भानुमती जी ने 13 जुलाई 1981 के एक पत्र में मुझे लिखा है- 'इन दिनों मारिशस में हिन्दी का स्तर काफ़ी नीचे चला गया है। इसे अपने स्थान पर कुछ हद तक पुन: लाने के लिए हम परिषदों में आंदोलन चलाने का प्रययास कर रहे हैं।
अत: अब आवश्यकता है कि हिन्दी का अधिक से अधिक विकास किया जाए।'


टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
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