मैत्रेयी  

मैत्रेयी (अंग्रेज़ी: Maitreyi) वैदिक काल की एक विदुषी एवं ब्रह्मवादिनी स्त्री थीं। वे मित्र ऋषि की कन्या और महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी थीं।

याज्ञवल्क्य द्वारा सम्पत्ति का बंटवारा

महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी भारद्वाज ऋषि की पुत्री कात्यायनी और दूसरी मित्र ऋषि की कन्या मैत्रेयी थी। याज्ञवल्क्य उस दर्शन के प्रखर प्रवक्ता थे, जिसने इस संसार को मिथ्या स्वीकारते हुए भी उसे पूरी तरह नकारा नहीं। उन्होंने व्यावहारिक धरातल पर संसार की सत्ता को स्वीकार किया। एक दिन याज्ञवल्क्य को लगा कि अब उन्हें गृहस्थ आश्रम छोड़कर वानप्रस्थ के लिए चले जाना चाहिए। इसलिए उन्होंने दोनों पत्नियों के सामने अपनी संपत्ति को बराबर हिस्से में बांटने का प्रस्ताव रखा। कात्यायनी ने पति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, पर मैत्रेयी बेहद शांत स्वभाव की थीं। अध्ययन, चिंतन और शास्त्रार्थ में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। वह जानती थीं कि धन-संपत्ति से आत्मज्ञान नहीं खरीदा जा सकता। इसलिए उन्होंने पति की संपत्ति लेने से इंकार करते हुए कहा कि- "मैं भी वन में जाऊंगी और आपके साथ मिलकर ज्ञान और अमरत्व की खोज करूंगी।" इस तरह कात्यायनी को ऋषि की सारी संपत्ति मिल गई और मैत्रेयी अपने पति की विचार-संपदा की स्वामिनी बन गई।[1]

आत्मज्ञान की प्राप्ति

बृहदारण्य तथा उपनिषद में मैत्रेयी का अपने पति के साथ बड़े रोचक संवाद का उल्लेख मिलता है। मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से यह ज्ञान ग्रहण किया कि हमें कोई भी संबंध इसलिए प्रिय होता है, क्योंकि उससे कहीं न कहीं हमारा स्वार्थ जुड़ा होता है। मैत्रेयी ने अपने पति से यह जाना कि आत्मज्ञान के लिए ध्यानस्थ, समर्पित और एकाग्र होना कितना ज़रूरी है। याज्ञवल्क्य ने उन्हें उदाहरण देते हुए यह समझाया कि जिस तरह नगाड़े की आवाज के सामने हमें कोई दूसरी ध्वनि सुनाई नहीं देती। वैसे ही आत्मज्ञान के लिए सभी इच्छाओं का बलिदान ज़रूरी होता है।

याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा कि- "जैसे सारे जल का एकमात्र आश्रय समुद्र है, उसी तरह हमारे सभी संकल्पों का जन्म मन में होता है। जब तक हम जीवित रहते हैं, हमारी इच्छाएं भी जीवित रहती हैं। मृत्यु के बाद हमारी चेतना का अंत हो जाता है और इच्छाएं भी वहीं समाप्त हो जाती हैं।" यह सुनकर मैत्रेयी ने पूछा कि- "क्या मृत्यु ही अंतिम सत्य है? उसके बाद कुछ भी नहीं होता?" यह सुनकर याज्ञवल्क्य ने उन्हें समझाया कि- "हमें अपनी आत्मा को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए। शरीर नश्वर है, पर आत्मा अजर-अमर है। यह न तो जन्म लेती है और न ही नष्ट होती है। आत्मा को पहचान लेना अमरता को पा लेने के बराबर है। वैराग्य का जन्म भी अनुराग से ही होता है। चूंकि मोक्ष का जन्म भी बंधनों में से ही होता है, इसलिए मोक्ष की प्राप्ति से पहले हमें जीवन के अनुभवों से भी गुजरना पडेगा।" यह सब जानने के बाद भी मैत्रेयी की जिज्ञासा शांत नहीं हुई और वह आजीवन अध्ययन-मनन में लीन रहीं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विद्वता और विमन्रमता की प्रतिमूति मैत्रेयी (हिंदी) jagran.com। अभिगमन तिथि: 10 दिसम्बर, 2016।

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