मौलिद  

मौलिद इस्लाम में किसी पवित्र व्यक्ति के जन्मदिन को कहा जाता है। इसे 'मौलूद' या 'मिलाद' भी हैं। विशेषकर पैगम्बर मुहम्मद का जन्मदिवस।[1] मुहम्मद का जन्म दिवस परंपरानुसार अनुमानित रूप से रबी 1 माह का 12वाँ दिन नियत है, यानी मुहम्मद की मृत्यु का दिवस, मुसलमान धर्मावलंबी जनसमूह द्वारा इसे 13वीं शताब्दी तक नहीं मनाया जाता था। 11वीं शताब्दी के अंत में मिस्र में शासक शियाई फ़ातिमी[2] मुहम्मद, अली, फ़ातिमा व शासक ख़लीफ़ा के चार मौलिदों को मनाते थे। यह त्योहार दरबारियों के साधारण जुलूस होते हैं, जो दिन के समय निकाले जाते थे व जिनका समापन ख़लीफ़ा की मौजूदगी में तीन धर्मोपदेशों[3] के पाठ के साथ ही समाप्त होता था।[4]

प्रथम मौलिद त्योहार

सुन्नी, जो इस्लाम की मुख्य शाखा है, 1207 में हुए एक मौलिद समारोह को प्रथम मौलिद त्योहार मानते हैं। उस अवसर का आयोजन मुज़फ़्फ़र अद-दीन गोकबुरी ने 'मोसल'[5] के निकट इरबिल में किया था, जिनका मिस्र के सुल्तान सलादीन के साथ जीजा-साले का संबंध था। यह लगभग आधुनिक मौलिद के समान था। मुहम्मद के वास्तविक जन्म दिवस से पूर्व पूरे एक माह तक उत्सव हुए। जादूगर, बाज़ीगर और चुनिंदा मनोरंजनकर्ताओं ने बग़दाद व 'निसिबिन'[6] जितने दूर के इलाक़ों के लोगों को आकृष्ट किया व मुस्लिम विद्वानों, विधिशास्त्रियों, अध्यात्मवादियों और शायरों ने दो माह पूर्व से ही वहां पहुंचना शुरू कर दिया था। औपचारिक मौलिद से दो दिन पूर्व बड़ी संख्या में ऊंटों, भेड़ों व बैलों की बलि दी गई और मौलिद की संध्या पर नगर में एक मशाल जुलूस निकला। मौलिद की सुबह एक विशेष रूप से बनाए गए भक्तगण व सेना मंच के समक्ष धर्माख्यान सुनने के लिए उपस्थित हुए। उसके बाद धर्मगुरुओं को विशेष कपड़े भेंटकर उनका सम्मान किया गया व सभी उपस्थितजनों को राजकुमार की ओर से भोज हेतु आमंत्रित किया गया।

प्रसार

मौलिद त्योहार मुस्लिम विश्व में तेज़ी से फैला, जो कुछ हद तक सूफ़ीवाद[7] के प्रति समकालीन उत्साह का परिणाम था, जिसने इस्लाम को एक व्यक्तिगत अनुभव बना दिया। अरब में भी, जहाँ पैगम्बर का जन्म स्थन व मक़बरा केवल धार्मिक तीर्थयात्रा का स्थान थे, मौलिद उत्सवों ने अपनी जड़ें मज़बूत कर लीं। कई मुसलमान ब्रह्मविज्ञानी नए आनंदोत्सवों को स्वीकार नहीं कर पाए व उन्होंने उन्हें 'बिदा' कहा। ऐसा नवाचार, जो संभवत: पाप की ओर ले जाता है। मौलिद वास्तव में ईसाई प्रभाव दर्शाते थे; मुस्लिम क्षेत्रों के ईसाई इसी ढंग से 'क्रिसमस' मनाते थे व मुस्लिम अक्सर इन उत्सवों में भाग लेते थे। आधुनिक मूल तत्त्वदासी मुसलमान, जैसे वहाबी अब भी मौलीद आनंदोत्सवों को मूर्तिपूजा के समान ही मानते हैं।[4]

  • अब तो अन्य संतों व सूफ़ी भ्रातृसंघों के संस्थापकों तक के मौलिद मनाए जा रहे हैं। मौलिद कविताएं, जो मुहम्मद के जीवन और सद्गुणों का वर्णन करती हैं, जलसों के समय के अलावा भी बहुत लोकप्रिय हैं। मौलिद मृत रिश्तेदारों की याद में भी गाए जाते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मौलिद अन-नबी
  2. चौथे ख़लीफ़ा अली व उनकी पत्नी तथा मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशज
  3. ख़ुत्बा
  4. 4.0 4.1 भारत ज्ञानकोश, खण्ड-4 |लेखक: इंदु रामचंदानी |प्रकाशक: एंसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली और पॉप्युलर प्रकाशन, मुम्बई |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 448 |
  5. इराक़
  6. आधुनिक नुसैबिन, तुर्की
  7. इस्लाम के रहस्यवाद

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