याज्ञवल्क्य  

याज्ञवल्क्य को वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों तथा उपदेष्टा आचार्यों में सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। ये महान् अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा तथा श्री राम की कथा के मुख्य प्रवक्ता थे। भगवान सूर्य की प्रत्यक्ष कृपा इन्हें प्राप्त थी। पुराणों में इन्हें ब्रह्मा जी का अवतार बताया गया है। श्रीमद्भागवत[1] में आया है कि ये देवरात के पुत्र थे। महर्षि याज्ञवल्क्य के द्वारा वैदिक मन्त्रों को प्राप्त करने की रोचक कथा पुराणों में प्राप्त होती है। तदनुसार याज्ञवल्क्य वेदाचार्य महर्षि वैशम्पायन के शिष्य हुए थे। इन्हीं से उन्हें मन्त्र शक्ति तथा वेद आदि का ज्ञान प्राप्त हुआ था।

ब्रह्मा के अवतार

ऐसी मान्यता है कि याज्ञवल्क्य ब्रह्मा जी के अवतार थे। यज्ञ में पत्नी सावित्री की जगह गायत्री को स्थान देने पर सावित्री ने क्रोधवश इन्हें श्राप दे दिया। इस शाप के कारण ही वे कालान्तर में याज्ञवल्क्य के रूप में चारण ऋषि के यहाँ उत्पन्न हुए। वैशम्पायन जी से यजुर्वेद संहिता एवं ऋगवेद संहिता वाष्कल मुनि से पढ़ी। वैशम्पायन के रुष्ट हो जाने पर यजुः श्रुतियों को वमन कर दिया, तब सुरम्य मन्त्रों को अन्य ऋषियों ने तीतर बनकर ग्रहण कर लिया। तत्पश्चात् सूर्यनारायण भगवान से वेदाध्ययन किया। श्री तुलसीदास जी ने इन्हें परम विवेकी कहा।[2] इनके वेद ज्ञान हो जाने पर लोग बड़े उत्कृष्ट प्रश्न करते थे, तब सूर्य ने कहा, "जो तुमसे अतिप्रश्न तथा वाद-विवाद करेगा, उसका सिर फट जायेगा।" शाकल्य ऋषि ने उपहास किया तो उनका सिर फट गया।

गुरु से विवाद

महर्षि वैशम्पायन अपने शिष्य याज्ञवल्क्य से बहुत स्नेह रखते थे और इनकी भी गुरु में अनन्य श्रद्धा एवं सेवा-निष्ठा थी; किंतु दैवयोग से एक बार गुरु से इनका कुछ विवाद हो गया, जिससे गुरु रुष्ट हो गये और कहने लगे- "मैंने तुम्हें यजुर्वेद के जिन मन्त्रों का उपदेश दिया है, उन्हें तुम उगल दो।" गुरु की आज्ञा थी, मानना तो था ही। निराश हो याज्ञवल्क्य ने सारी वेद मन्त्र विद्या मूर्तरूप में उगल दी, जिन्हें वैशम्पायन जी के दूसरे अन्य शिष्यों ने 'तित्तिर' (तीतर पक्षी) बनकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लिया, अर्थात वे वेद मन्त्र उन्हें प्राप्त हो गये। यजुर्वेद की वही शाखा, जो तीतर बनकर ग्रहण की गयी थी, 'तैत्तिरीय शाखा' के नाम से प्रसिद्ध हुई।

सूर्य से ज्ञान प्राप्ति

याज्ञवल्क्य जी अब देवज्ञान से शून्य हो गये थे, गुरु भी रुष्ट थे, अब वे क्या करें? तब उन्होंने प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि 'हे भगवन! हे प्रभो! मुझे ऐसे यजुर्वेद की प्राप्ति हो, जो अब तक किसी को न मिली हो।[3] भगवान सूर्य ने प्रसन्न हो उन्हें दर्शन दिया और अश्वरूप धारण कर यजुर्वेद के उन मन्त्रों का उपदेश दिया, जो अभी तक किसी को प्राप्त नहीं हुए थे।[4] अश्वरूप सूर्य से प्राप्त होने के कारण शुक्ल यजुर्वेद की एक शाखा 'वाजसनेय' और मध्य दिन के समय प्राप्त होने से 'माध्यन्दिन' शाखा के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। इस शुक्ल यजुर्वेद-संहिता के मुख्य मन्त्रद्रष्टा ऋषि आचार्य याज्ञवल्क्य हैं।

इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद हमें महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने ही दिया है। इस संहिता में चालीस अध्याय हैं। आज प्राय: अधिकांश लोग इस वेद शाखा से ही सम्बद्ध हैं और सभी पूजा अनुष्ठानों, संस्कारों आदि में इसी संहिता के मन्त्र विनियुक्त होते हैं। 'रुद्राष्टाध्यायी' नाम से जिन मन्त्रों द्वारा भगवान रुद्र (सदाशिव) की आराधना होती है, वे इसी संहिता में विद्यमान हैं। इस प्रकार महर्षि याज्ञवल्क्य का लोक पर महान् उपकार है। इस संहिता का जो ब्राह्मण भाग 'शतपथ ब्राह्मण' के नाम से प्रसिद्ध है और जो बृहदारण्यकोपनिषद' है, वह भी महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा ही हमें प्राप्त है। गार्गी, मैत्रेयी और कात्यायनी आदि ब्रह्मवादिनी नारियों से जो इनका ज्ञान-विज्ञान एवं ब्रह्मतत्व-सम्बन्धी शास्त्रार्थ हुआ, वह भी प्रसिद्ध ही है। विदेहराज जनक जैसे अध्यात्म-तत्त्ववेत्ताओं के ये गुरुपद्भाक रहे हैं। इन्होंने प्रयाग में भारद्वाज जी को श्री रामचरितमानस सुनाया। साथ ही इनके द्वारा एक महत्त्वपूर्ण धर्मशास्त्र का प्रणयन हुआ है, जो 'याज्ञवल्क्यस्मृति' के नाम से प्रसिद्ध है, जिस पर मिताक्षरा आदि प्रौढ़ संस्कृत टीकाएँ हुई हैं।

सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक

यह प्राय: सर्वविदित है कि समस्त भारतीय दर्शनों के मूल उपनिषदों में मिलते हैं। ये उपनिषद स्वयं वेद के अंतिम भाग और तात्पर्य हैं। इन उपनिषदों में सबसे प्राचीन तथा आकार में सबसे बड़ा और गौरव युक्त 'बृहदारण्यक' उपनिषद है। इस उपनिषद के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक याज्ञवल्क्य हैं। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि याज्ञवल्क्य का स्थान भारतीय दर्शन में कितना ऊँचा है। उन्होंने विदेहराज जनक के दरबार में तत्कालीन समस्त महान् दार्शनिकों से शास्त्रार्थ करके अपने दर्शन को सर्वोच्च दर्शन सिद्ध किया था। उनका अद्वैत वेदान्त के रूप में आज भी सुरक्षित है। यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं है कि याज्ञवल्क्य समस्त अद्वैत वेदान्तियों की माला के सुमेरु हैं। उन्हीं से अद्वैत वेदान्त का शास्त्रीय रूप आरम्भ होता है।

समय काल

याज्ञवल्क्य का समय लगभग 1200 ई.पू. है। इनके विचार मुख्यत: बृहदारण्यक उपनिषद के याज्ञवल्क्यीय काण्ड में उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त वहीं मधुकाण्ड में भी उनके विचार मिलते हैं। वे यजुर्वेदी ब्राह्मण थे, किन्तु वे ऋग्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद भी पढ़ाते थे। इसलिए शंकराचार्य ने लिखा है कि वे चारों वेदों के ज्ञाता थे। इससे सिद्ध होता है कि कर्मकांड, उपासनाकांड और ज्ञानकांड तीनों में पूर्ण निष्णात थे। विष्णुपुराण[5] के अनुसार स्वयं याज्ञवल्क्य ने शुक्ल यजुर्वेद को सूर्य से प्राप्त किया था और शुक्ल यजुर्वेद की समस्त शाखाएं याज्ञवल्क्य द्वारा ही प्रवर्तित की गयी हैं। कुछ भी हो, याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेद के सर्वश्रेष्ठ ऋषि हैं।

बृहदारण्यकोपनिषद[6] से ज्ञात होता है कि याज्ञवल्क्य कुरु पांचाल प्रदेश के निवासी थे। वे विवाहित थे और मैत्रेयी तथा कात्यायनी उनकी दो पत्नियां थीं। मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी और जिज्ञासु थी तथा कात्यायनी घर-गृहस्थी में ही रुचि लेने वाली साधारण महिला थी। मैत्रेयी का यह वाक्य आज भी दार्शनिकों के लिए प्रेरणादायी है-

'येनाहं नामृता स्याम किमहं तेन कुर्याम्'

अर्थात् 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी'? यह बात मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य के इस कथन के प्रति कही थी कि 'अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन', अर्थात् वित्त से अमरत्व को नहीं प्राप्त किया जा सकता। फिर अमरतत्व को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। एक शब्द में उत्तर है- त्याग से।

वर्णाश्रम धर्म का पालन

पुनश्च याज्ञवल्क्य ने वर्णाश्रम धर्म का पूर्ण पालन किया था। ब्रह्मचर्य से गृहस्थ और फिर वानप्रस्थ तथा अन्त में सन्न्यास आश्रम में उन्होंने प्रवेश किया था। उनकी पत्नी मैत्रेयी भी वानप्रस्थ आश्रम में उनके साथ ही थी, और लगता है कि उसने भी सन्न्यास लिया था। याज्ञवल्क्य का सन्न्यास विद्वत सन्न्यास था। वे ब्रह्मानिष्ठ या ब्रह्मावेत्ता अर्थात् जीवनमुक्त थे। सन्न्यास कब लेना चाहिए। इस विषय पर याज्ञवल्क्य ही प्रमाण हैं। वे कहते हैं कि सामान्यत: मातृऋण, पितृऋण तथा गुरुऋण अदा करके पुत्रैषणा, वितैषणा तथा लोकैषणा से मुक्त होकर सन्न्यास लिया जाना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि सामान्यत: गृहस्थाश्रम के बाद ही सन्न्यास लेना चाहिए। किन्तु विशेष परिस्थितियों में ब्रह्मचर्य के बाद भी सन्न्यास लिया जा सकता है। क्योंकि जिस क्षण वैराग्य हो जाये, उसी क्षण सन्न्यास लिया जा सकता है। 'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रर्जेत्।' उनके इस सिद्धांत ने बहुत बड़ी क्रान्ति की है और अनेक महात्माओं को पैदा किया, जिन्होंने वैराग्य होते ही सन्न्यास लिया और आत्म साक्षात्कार किया। इस वैराग्य से समस्त बंधन या कर्तव्य पाश अपने आप टूट जाते हैं।

दर्शन की अभिव्यक्ति

बृहदारण्यक उपनिषद में मैत्रेयी (2/4, 4/5), अश्वल (3/1), आर्तमार्ग (3/2), भुज्यु (3/3), उषस्त (3/4), कहोल (3/5), गार्गी (3/6, 3/8), आरूणि (3/8, 3/7), शाकल्य (3/9) और जनक (4/1-4) के साथ याज्ञवल्क्य के संवाद हैं। इन्हीं में उनका दर्शन अभिव्यक्त हुआ है। इनके अतिरिक्त जाबाल, बृहद्जाबाल, रामोत्तरतापिनी, पैंगल, तारक, याज्ञवल्क्य आदि उपनिषदों में भी प्रमुख उपदेशक ऋषि के रूप में याज्ञवल्क्य आते हैं। किन्तु ये उपनिषद बृहदारण्यक से अर्वाचीन है, जो मंत्रशास्त्र और भक्तिशास्त्र के अनुकूल है। तुलसीदास के रामचरितमानस में जो याज्ञवल्क्य और भारद्वाज संवाद लिया गया है, उसका मूल रागोत्तर-तापिनी उपनिषद है, जहाँ याज्ञवल्क्य ने भारद्वाज को बतलाया है कि रामचन्द्र ही अद्वैत परमानन्द ब्रह्म हैं। किन्तु ये सब मत परवर्ती दार्शनिकों ने याज्ञवल्क्य के नाम मढ़े हैं। मूल रूप से याज्ञवल्क्य का दर्शन बृहदारण्यकोपनिषद में ही है। अत: उसी के आधार पर उनके दर्शन का विवेचन यहाँ किया जाएगा।

याज्ञवल्क्य की दार्शनिक प्रणाली

याज्ञवल्क्य का दर्शन उपपत्ति प्रधान है। मुख्यत: वे दार्शनिक वाद-विवाद द्वारा तत्व विवेचन करते हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपनी पत्नी मैत्रेयी, राजा जनक तथा अन्य विद्वान् दार्शनिकों से संवाद करके अपने तत्वज्ञान को विकसित किया और उसे उनके द्वारा स्वीकृत भी करवाया। विद्वान् दार्शनिकों के प्रश्नों के जो उत्तर याज्ञवल्क्य ने दिए हैं, उनसे उनका शास्त्र ज्ञान तथा आर्ष-दृष्टि दोनों सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए अश्वल और शकल्य के साथ हुए विवाद से उनका यज्ञ तथा देव सम्बन्धी शास्त्र ज्ञान सिद्ध होता है और भुज्यु के साथ हुए विवाद से उनका आर्ष ज्ञान और त्रिकालज्ञता सिद्ध होते हैं। अर्थात् वे भूत, भविष्य तथा वर्तमान की समस्त वस्तुओं को हस्तामलकवत् जानते थे। किन्तु वे मानते थे कि कुछ ऐसा ज्ञान है, जिसे जत्पन्याय से या वाद-विवाद से नहीं प्राप्त किया जा सकता तथा उसको एकान्त में ही समझा तथा समझाया जा सकता है। इसलिए आर्तभाग को वे एकान्त में ले जाकर समझते हैं और उससे वह शान्त हो जाता है। यही कारण है कि वे गार्गी को परम सत्य के बारे में सभा में नहीं बतलाते और उसे फटकारते हैं। वे कुछ प्रश्नों को अव्याकृत मानते हैं, प्रश्नों की भी अपनी सीमाएं हैं।

ज्ञान के साधन

ज्ञान के तीन साधन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन हैं, जिनका प्रथम विवेचन और प्रयोग याज्ञवल्क्य ने ही किया है। उनका कहना है कि आत्मा का श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए और निदिध्यासन करना चाहिए। आत्मा के श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन से सब कुछ ज्ञात हो जाता है।

अत: स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र तथा प्रातिभज्ञान याज्ञवल्क्य के लिए ज्ञान के साधन हैं। उनकी दार्शनिक प्रणाली पूर्णत: वैदिक दर्शन की प्रणाली है। ऋषिर्दर्शनात के आधार पर वे सच्चे ऋषि थे। उनके पास कुछ आलौकिक ज्ञान था। कुछ योग की सिद्धियां भी थीं। इस ज्ञान से उन्होंने गंधर्व और भुज्यु के बीच हुए संवाद को जान लिया था। इसी ज्ञान से उन्हें वाक् सिद्धि भी प्राप्त हुई थी और वे अमोध शाप भी दे सकते थे। किन्तु उन्होंने अपने दर्शन को यथासंभव यौक्तिक धरातल पर रखा है। उपस्त, कहोय, मैत्रेयी तथा जनक से हुए संवाद में उन्होंने अपने को यथासंभव बुद्धिवादी के रूप में स्थापित किया है। वे अनुभववाद तथा भौतिकवाद के आलोचक हैं और उस बुद्धिवाद के समर्थक हैं, जिसका पर्यवसान प्रातिभज्ञान में होता है। वे ज्ञानमार्ग के शास्त्रीय रूप के सर्वप्रथम प्रवर्तक हैं। उनका मत है कि मुक्ति बिना ज्ञान संभव है : ऋते ज्ञानान्नमुक्ति।

आत्मा का दर्शन

याज्ञवल्क्य के संवादों से आज भी इस मुक्तिदायक या तारक ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। इस ज्ञानमार्ग की दो प्रक्रियाएं हैं, जो कि साथ-साथ चलती हैं। एक अन्वय की प्रक्रिया है और दूसरी व्यक्तिरेक की। अन्वय प्रक्रिया के अनुसार आत्मा अंतर्यामी है। यही नहीं, वह सब विषयों में भी निहित है। इस दृष्टि से देखने पर आत्मा का दर्शन सर्वत्र होता है। जैसे वह सभी वस्तुओं का एकायन या परायण है, वैसे वह सभी ज्ञेय विषयों का प्रकाशक भी है। प्रत्येक विषय मे आत्मा का प्रकाश है। फिर व्यतिरेक दृष्टि से आत्मा को किसी सीमित वस्तु से अभिन्न नहीं किया जा सकता। जब किसी ने आत्मा को इस रूप में समझा, तब याज्ञवल्क्य ने 'नेति-नेति' कहा। अर्थात् आत्मा का वर्णन सीमित वस्तुओं के ज्ञान का निषेध करके किया जाता है- 'स एष नेति नेत्यात्मा'। याज्ञवल्क्य ने सर्वान्तर की कल्पना तथा नेति-नेति की प्रतिक्रिया द्वारा आत्मा का सही ज्ञान अनेक जिज्ञासुओं को प्रदान किया था। आत्मा की ये ही दो प्रणालियां हैं। नेति-नेति प्रणाली का ही विकास नागार्जुन ने शून्यकाल में किया। शंकराचार्य ने नागार्जुन का खंडन करते हुए याज्ञवल्क्य की सर्वान्तर प्रणाली का सहारा लिया और कहा कि नेति-नेति की प्रणाली का आश्रय अंतर्यामी आत्मा का बोध है।

आत्मवाद का निरूपण

याज्ञवल्क्य ने अनेक दृष्टांतों तथा युक्तियों से आत्मवाद का निरूपण किया है। वे आत्मा के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की पारमार्थिक सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं। आत्मा के अतिरिक्त जो कुछ है, वह आर्त, अनृत और मृत्युपरक है तथा अज्ञान पर आधारित है। अत: वह स्वप्नवत है। वे कहते हैं-

  1. आत्मा सर्वान्तर है और इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह नाशवान है। आत्मा सत्यम् सत्यम् है। वह परम सत्य है। महान् और अद्वितीय है। वह अणु से भी अणुतर और महान् से भी महत्तर है।
  2. आत्मा साक्षात् अपरोक्षात् ब्रह्मा है। यही सर्व है। यह सब का परायण है अर्थात् जो कुछ है, उसकी प्रतिष्ठा आत्मा में ही है। वह आत्मा में ही ओत-प्रोत है। वह स्वप्रतिष्ठित है, स्वयंज्योति है।
  3. आत्मा ज्ञाता है। ज्ञाता का विपरिलोप कभी भी नहीं होता। घोर सुषुप्ति की अवस्था में भी रहता है। शरीर की मृत्यु के उपरान्त भी वह ज्ञाता रहता है। विद्या, कर्म और पूर्व प्रज्ञा मृतक मनुष्य की आत्मा के साथ मृत्यु के बाद भी रहते हैं।
  4. ज्ञाता को ज्ञेय रूप में जाना नहीं जा सकता। 'विज्ञातरामरे केन विजानीयात्' ज्ञाता को कैसे जाना जा सकता है। याज्ञवल्क्य का यह मत आत्मा को अविषय सिद्ध करता है। जो आत्मा सबको जानती है, उसको किसके द्वारा जाना सकता है। अर्थात् किसी के द्वारा नहीं।
  5. आत्मा सर्वत्र अविभक्त है। उसके अतिरिक्त कुछ अन्य (दूसरा) है ही नहीं, जिसको उससे विभक्त माना जाये।
  6. जो आत्मा के अतिरिक्त दीख पड़ता है, वह वस्तुत: अन्य-सा है, वह अन्य या इतर नहीं है। बुद्धि पूर्वक देखने पर ज्ञात होता है कि दृश्यमान नानात्व का अस्तित्व है ही नहीं। जो इस नानात्व को देखता है, वह जन्म मरण के चक्र में पड़ा है, अर्थात् वह बंधन में है।

मनवेसानुद्रष्टाव्यं नेह नानास्ति किंचन।
मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।

आत्मा न केवल परम सत् और परम ज्ञार है, अपितु वह परम मूल्य भी है। आत्मा के लिए ही सब कुछ प्रिय होता है। 'आत्मानस्तु कामाय सर्व प्रियं श्वति'। जो कुछ प्रिय है, उसका आश्रय आत्मा ही है। वही परमार्थ है। अन्य मूल्यों की उपलब्धि में जो आनन्द या सुख है, वह आत्मोपलब्धि का ही अंश मात्र है। सच्चा आनन्द आत्म-लाभ है। आत्मा एक रस तथा आनन्द मात्र है।

  1. इस प्रकार आत्मा ही सर्व है- 'इदम् सर्वत्र यदयमात्मा।' आत्मा ब्रह्म है- 'अयम् आत्मा ब्रह्मा।'
  2. आत्मा का ज्ञान अद्वैत दर्शन है। जब तक द्वैत-सा दीख पड़ता है, तब तक एक दूसरे को देखता है। किन्तु जब अद्वैत दर्शन हो जाता है, तो फिर भेद या द्वैत संभव नहीं रहता है। अत: भेद-ज्ञान द्वैत-ज्ञान अज्ञानमूलक है।

अन्य दार्शनिकों से तुलना

उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि याज्ञवल्क्य का दर्शन कट्टर अद्वैतवाद है। पाल डॉयसन ने इसकी तुलना पारमेनिडीज अद्वैतवाद तथा कांट के आत्मवाद से की है। आधुनिक अनेक विद्वानों ने इसकी तुलना प्लोटिनम, स्पिनोजा, हेगल, ग्रीन, ब्रैडली आदि के अद्वैतवादों से की है। प्रोफ़ेसर रानाडे ने याज्ञवल्क्य के दर्शन की तुलना फाइइंगर के इववाद से की है। इससे स्पष्ट है कि याज्ञवल्क्य विश्व के मूर्धन्य अद्वैतवादी दार्शनिकों में से एक हैं। उनका अद्वैतवाद आत्माद्वैतवाद है। वह द्रव्याद्वैतवाद, सत्ताद्वैतावाद या विज्ञानद्वैतवाद नहीं है। अत: जिन पाश्चात्य दार्शनिकों के अद्वैतवाद के साथ याज्ञवल्क्य के दर्शन की तुलना की गयी है, याज्ञवल्क्य का अद्वैतवाद उनके अद्वैतवाद से प्रकारतया भिन्न है। यदि उनके आत्म निरूपण की समीक्षा की जाये तो पता चलेगा कि वास्वत में उन्होंने अपने आत्माद्वैतवाद के लिए सत्तामूलक, ज्ञानमूलक युक्तियां दी हैं, जिनकी प्रासंगिकता शाश्वत है। याज्ञवल्क्य विश्व के अध्यात्मवादी, प्रत्ययवादी और परमवादी दार्शनिकों में अग्रण्य हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी) |लेखक: प्रो. संगमलाल पाण्डेय |प्रकाशक: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 684। |पृष्ठ संख्या: 430 |

  1. श्रीमद्भागवत 12।6।64
  2. जागबलिकमुनि परम विवेकी
  3. अहमयातयामयजु:काम उपसरामीति' (श्रीमद्भागवत 12।6।72)
  4. एवं स्तुत: स भगवान वाजिरूपधरो हरि:। यजूंष्ययातयामानि मुनयेऽदात् प्रसादित:॥ (श्रीमद्भागवत 12।6।73)
  5. विष्णुपुराण (315)
  6. बृहदारण्यकोपनिषद (3/1/1)

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