यात्रा साहित्य  

मनुष्य जातियों का इतिहास उनकी यायावरी प्रवृत्ति से सम्बद्ध है। सम्भवत: यह मानव की एक मूल प्रवृत्ति है। प्रारम्भ में यह उसके लिए आवश्यक भी थी। परंतु उसके सौन्दर्यबोध के विकास के साथ चतुर्दिक फैले हुए जगत् का आकर्षण भी उसके लिए बढ़ता गया है। यहाँ के देशों में विविधता है, ऋतुओं में परिवर्तन होता है और साथ-साथ ही प्रकृति के रूपों में विभिन्नता और सौन्दर्य का वैचित्र्य है। इसके अतिरिक्त सर्जन में स्वत: एक गति है, जिसके साथ ताल मिलाकर चलना स्वत: एक उल्लास है। इस प्रकार सौन्दर्यबोध की दृष्टि से उल्लास की भावना से प्रेरित होकर यात्रा करने वाले यायावर एक प्रकार से साहित्यिक मनोवृत्ति के माने जा सकते हैं और उनकी मुक्त अभिव्यक्ति को यात्रा साहित्य कहा जाता है।

साहित्यिक यायावर

साहित्यिक यायावर को एक अद्भुत आकर्षण अपनी और खींचता है। वह मंत्रमुग्ध की भाँति उसकी और खिंच जाता है। संसार के लोग इस पुकार को सुन नहीं पाते या सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। वे चलते हैं, यात्रा करते हैं, पर वे तेली के बैल की तरह अपने भार के साथ कोल्हू के चारों ओर घूमने में ही अपने परिश्रम की सार्थकता मान बैठते हैं। पर साहित्यिक यायावर मुक्त मनोवृत्ति के साथ घूमता है, उसकी यात्रा घुमक्कड़ी का अर्थ अपने आप पूर्ण होता है।[1]

घुमक्कड़

संसार के बड़े-बड़े यायावर अपनी मनोवृत्ति में साहित्यिक थे। फ़ाह्यान, ह्वेन त्सांग, इत्सिंग, इब्न बतूता, अलबेरूनी, मार्कोपोलो, बर्नियर और टॅवरनियर आदि जितने भी प्रसिद्ध घुमक्कड़ हुए हैं अथवा देश-विदेश के साहसी अन्वेषक हुए हैं, सब में 'साहित्यिक यायावर' का रूप रक्षित है। वे नि:संगभाव से घूमते रहे हैं। घूमना ही उनके लिए प्रधान उद्देश्य रहा है। यात्रा करने मात्र से कोई साहित्यिक यायावर की संज्ञा नहीं प्राप्त कर सकता और ना ही यात्रा का विवरण प्रस्तुत कर देना मात्र 'यात्रा साहित्य' है।

पिछले युग के यात्री

पिछले युगों के यात्रियों में राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक अथवा सांस्कृतिक दृष्टि को प्रधानता मिली है, परंतु इनके बीच में ऐसे संस्मरणीय अंश भी हैं, जिनसे उनकी आंतरिक प्रेरणा का आभास मिल जाता है। भारत में यात्रियों की कमी नहीं रही है, क्योंकि तिब्बत, चीन, ब्रह्म देश(बर्मा) , मलाया और सुदूर पूर्व के द्वीपों में भारतीय धर्म और संस्कृति का सन्देश इन यात्रियों के पीछे गया होगा, पर भारतीय दृष्टि में इतिहास, विवरण, संस्मरण तथा आत्मचरित के प्रति विचित्र अनास्था आरम्भ से रही है। सम्भत: यही प्रधान कारण है कि भारतीय साहित्य में उपर्युक्त अंगों के साथ यात्रा-विवरणों का नितांत अभाव है। परंतु कालिदास के विभिन्न देशों तथा प्राकृतिक रूपों के वर्णनों से उनकी यायावरी मनोवृत्ति का परिचय मिलता है। बाण की घुमक्कड़ प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति उनके 'हर्षचरित' तथा 'कादम्बरी' के देश-देश की प्रकृति और नाना प्रकार के लोगों के वर्णनों में हुई है। आधुनिक हिन्दी साहित्य में यह रूप भी कई अन्य रूपों के साथ पाश्चात्य साहित्य के सम्पर्क में आने के बाद ही विकसित हुआ है।[1]

यात्रा साहित्य का विकास

प्रारम्भिक लेखकों ने यात्रा विवरण लेख रूप में प्रस्तुत किये हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने इस प्रकार के उल्लेख किये हैं। परंतु यात्रा साहित्य का विकास शुद्ध निबन्धों की शैली से माना जा सकता है। निबन्ध शैली के व्यक्तिपरकता, स्वच्छन्दता तथा आत्मीयता आदि गुण यात्रा साहित्य में भी पाये जाते हैं। निबन्धकार जिस प्रकार अपने विषय को अपनी मानसिक संवेदक स्थिति में ग्रहण करता और उसी की प्रेरणा से विस्तार भी देता हैं, बिल्कुल उसी प्रकार यात्री भी अपनी यात्रा के प्रत्येक स्थल और क्षणों में से उन्हीं क्षणों को सँजोता है, जिनको वह अनुभूत सत्य के रूप में ग्रहण करता है। वह सर्वसाधारण की दृष्टि से प्रत्येक बात का विवरण देकर नहीं चलता और यदि विवरण तथा विस्तार देना ही होता है तो वह उन्हें अपने भावावेश में प्रस्तुत करता है अथवा आत्मीयता के वातावरण में उपस्थित करता है।

पीठिका

यात्री अपने साहित्य में संवेदनशील होकर भी निरपेक्ष करता है। ऐसा न होने पर यात्रा के स्थान पर यात्री के अधिक प्रधान हो उठने की सम्भावना है। यात्रा में स्वत: स्थान, दृश्य, प्रदेश, नगर, ग्राम आदि मुखरित होते हैं। उनका अपना व्यक्तित्व उभरता है। इस पथ पर मिलने पर मिलने वाले नर-नारी, बच्चे-बूढ़े अपने नानाविध चरित्रों के साथ उसके व्यक्तित्व को अधिक स्पन्दित और मुखरित करते हैं। मार्ग में पड़ने वाले मन्दिरों, मस्जिदों, मीनारों, विजय-स्तम्भों, स्मारकों, मक़बरों, क़िलों और पुराने महलों से संस्कृति, कला और इतिहास के उपकरणों को जुटाकर यात्रा की पीठिका तैयार होती है। फिर भी अपने को अदृश्य भाव से सर्वत्र रखना ही होता है। यात्री अपनी यात्रा को मानसिक प्रतिक्रियाओं के रूप में ही ग्रहण करता है। अपने को केन्द्र में रखकर भी प्रमुख न होने देना साहित्यिक यायावर का कर्तव्य है, क्योंकि यदि लेखक का व्यक्तित्व उभरेगा तो अन्य सब गौण हो जायगा और यात्रा साहित्य न होकर आत्मचरित ही रह जायगा। यात्रा संस्मरण न रहकर आत्म-संस्मरण हो जायगा।[1]

गायकों का भावावेश व निबन्धकार की मस्ती

यात्री में, प्रगीतों के गायकों का-सा भावावेश और निबन्धकार की-सी मस्ती रहती है। वह लापरवाही और मौज से जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रखता है। इस बात को आधुनिक यात्रा साहित्य के यात्रियों ने मुक्त कण्ठ से घोषित भी किया है। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार-

"जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उसे पैशन कहाँ, उसे विश्राम कहाँ? आखिर में हड्डियाँ कटते ही बिखर जायँगी।" - 'किन्नर देश में'
  • देवेन्द्र सत्यार्थी यात्रा के आह्वान को सुन रहे हैं-
"मेरा पथ मेरे सामने है। मैं जीवित मानव का पक्ष लेता हूँ।... जीवन आज उसी यात्रा के लिए आह्वान कर रहा है।" - 'रथ के पहिये'
  • देवेशचन्द्र दास यात्रा को मुक्ति के रूप में ग्रहण करते हैं-
"आज छुट्टी है, छुट्टी। मन-ही-मन जिस वसंत-व्याकुलता का अनुभव करता था, उससे आज बन्धन मुक्त होऊँगा। काम की बाधा दूर हो गयी, वह किसी प्रकार क्यों न हुई हो- आँधी में उड़कर अथवा वर्षा में घुलकर- और मैं अनिर्दिष्ट पथ पर बाहर निकल आया हूँ।" - 'यूरोपा'
  • 'अज्ञेय' जीवन को यायावर का चिरंतन पथ मानकर कहते हैं-
"यायावर को भटकते चालीस बरस हो गये, किंतु इस बीच न तो वह अपने पैरों-तले घास जमने दे सका है, न ठाठ जमा सका है, न क्षितिज को कुछ निकट ला सका है। उसके तारे छूने की तो बात ही क्या। यायावर ने समझा है कि देवता भी जहाँ मन्दिरों में रुके कि शिला हो गये, और प्राण-संचार की पहली शर्त है गति: गति: गति।" - 'अरे यायावर, रहेगा याद'

शैली तथा उद्देश्य

यात्रा साहित्य विभिन्न शैलियों में लिखा गया है और उसके विभिन्न रूप पाये जाते हैं। इस विषय में कुछ ऐसा साहित्य है, जो केवल यात्रोपयोगी साहित्य कहा जा सकता है और जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों अथवा स्थानों का विस्तृत और व्यापक परिचय देना रहता है। इनमें भी कुछ परिचयात्मक अधिक रहता है और कुछ यात्रा के लिए अन्यों को प्रेरणा देने के लिए होता है। राहुल सांकृत्यायन[2], स्वामी प्रणवानन्द[3], शिवनन्दन सहाय[4], गोपाल नेवटिया[5], भिक्षु धर्मरक्षित[6] आदि का यात्रा साहित्य इसी कोटि में आता है। परंतु इनके यात्रा वर्णनों में भी स्थान-स्थान पर भावावेग, उल्लास, आत्मीयता आदि की अभिव्यक्ति पायी जाती है।

कुछ यात्रियों का उद्देश्य देश-विशेष के व्यापक जीवन को उसके सम्पूर्ण परिप्रेक्षों में उभारना रहता है। इनमें सत्यनारायण[7], यशपाल[8], जगदीशचन्द्र जैन[9], राजवल्लभ ओझा[10], गोविन्द दास[11] आदि लेखक हैं। इन्होंने देश के प्राकृतिक रूप और सांस्कृतिक जीवन को एक साथ अभिव्यक्त करने का प्रयत्न किया है, देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थितियों पर अपने निजी विचारों या प्रभावों को व्यक्त किया है। इन लेखकों की शैली प्राय: यथार्थ चित्रण की है और ये क्रमश: यात्रा में पड़ने वाले नगरों, स्थानों, दृश्यों का वर्णन प्रस्तुत करते चलते हैं और उन स्थानों के जीवन पर भी प्रकाश डालते हैं। परंतु इनमें कई स्थलों पर लेखक अपने प्रभावों और भावात्मक प्रतिक्रियाओं का भी समावेश करता है।

संस्मरणात्मक साहित्य

अधिकतर यात्रा साहित्य संस्मरणात्मक होता है और इसमें यात्री अपने प्रभावों, प्रतिक्रियाओं और संवेदनाओं को महत्त्व देता है। भगवतशरण उपाध्याय[12], अमृत राय[13], रांगेय राघव[14] तथा रामवृक्ष बेनीपुरी[15] आदि इसी कोटि के लेखक हैं, जिन्होंने अपनी यात्रा में अपनी दृष्टि, अपनी प्रतिक्रियाओं तथा संवेदनाओं को अधिक महत्त्व दिया और देश के जीवन, परिस्थितियों तथा पात्रों को इसी दृष्टि से देखा है। इसी कारण अपेक्षाकृत इन कृतियों में अधिक साहित्यिक आकर्षण है।[1]

प्रकृति सौन्दर्य

कुछ यात्री प्रकृति सौन्दर्य तथा उसके जीवन से अधिक आकर्षित तथा अभिभूत होते हैं। उनके साहित्य में उसी की अभिव्यक्ति प्रधान होती है। काका कालेलकर की 'हिमालय यात्रा', हंस कुमार तिवारी का 'भूस्वर्ग कश्मीर', श्रीनिधि की 'शिवालिक की घाटियों' में अधिकतर यही सौन्दर्य है। सामान्यत: यात्रा साहित्य में प्रकृति का सौन्दर्य सर्वत्र एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

समग्र जीवन की अभिव्यक्ति

कुछ ऐसे यायावर भी हैं, जो अपने यात्रा साहित्य को समग्र जीवन की अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण करते हैं। उनके लिए प्रकृति सजीव है, यात्रा में मिलने वाले पात्र आत्मीय, स्वजन हो जाते हैं। वे देश की आत्मा का साक्षात्कार करते हैं। वे देश-देश में बिखरे हुए इतिहास को, संस्कृति को, समाज को अपनी अनुभूति का अंग बनाकर अभिव्यक्त करते हैं। उनके यात्रा साहित्य में महाकाव्य और उपन्यास का विराट तत्त्व, कहानी का आकर्षण, गीतिकाव्य की मोहक भावशीलता, संस्मरणों की आत्मीयता, निबन्धों की मुक्ति, सब एक साथ मिल जाती है। उत्कृष्ट यात्रा साहित्य ऐसा ही होता है। 'अज्ञेय' के 'अरे यायावर रहेगा याद' में ऐसा ही सौन्दर्य तथा आकर्षण है। इसके साथ देवेशचन्द्र दास की 'यूरोपा' तथा 'रजवाड़े', मोहन राकेश की 'आखिरी चट्टान तक', 'हरी घाटी', 'एक बूँद सहसा उछली', 'गेटे के देश में' आदि का नाम भी लिया जा सकता है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 हिन्दी साहित्य कोश, भाग 1 |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: डॉ. धीरेंद्र वर्मा |पृष्ठ संख्या: 512 |
  2. 'हिमालय-परिचय', 'मेरी यूरोप-यात्रा' आदि।
  3. 'कैलास-मानसरोवर'
  4. 'कैलास-दर्शन'
  5. 'भूमण्डल-यात्रा'
  6. 'नेपाल-यात्रा, लंका-यात्रा'
  7. 'आवारे की यूरोप-यात्रा'
  8. 'लोहे की दीवार के दोनों ओर'
  9. चीनी जनता के बीच
  10. 'बदलते दृश्य'
  11. 'सुदूर दक्षिण-पूर्व'
  12. 'वो दुनिया'
  13. 'सुबह के रंग'
  14. 'तूफानों के बीच'
  15. 'पैरों मे पंख बाँधकर' तथा 'हवा पर'

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