युधिष्ठिर  

संक्षिप्त परिचय
युधिष्ठिर
Yudhishthir-Birla-mandir.jpg
अन्य नाम धर्मराज
अवतार यम का अंशावतार
वंश-गोत्र चंद्रवंश
कुल यदुकुल
पिता पाण्डु
माता कुन्ती, माद्री(विमाता)
जन्म विवरण कुन्ती द्वारा यम(धर्मराज) का आवाहन करने से प्राप्त पुत्र युधिष्ठिर
समय-काल महाभारत काल
परिजन भाई भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कर्ण पत्नी द्रौपदी और देविका और पुत्र धौधेय, प्रतिविंध्य
गुरु द्रोणाचार्य
विवाह द्रौपदी और देविका
संतान द्रौपदी से प्रतिविंध्य और देविका से धौधेय
विद्या पारंगत भाला चलाने में निपुण
महाजनपद कुरु
शासन-राज्य हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ
संदर्भ ग्रंथ महाभारत
मृत्यु सशरीर स्वर्गारोहण
संबंधित लेख महाभारत

युधिष्ठिर पाण्डु के पुत्र और पांच पाण्डवों में से सबसे बड़े भाई थे। महाभारत के नायकों में समुज्ज्वल चरित्र वाले ज्येष्ठ पाण्डव थे। युधिष्ठिर धर्मराज के पुत्र थे। वे सत्यवादिता एवं धार्मिक आचरण के लिए विख्यात हैं। अनेकानेक धर्म सम्बन्धी प्रश्न एवं उनके उत्तर युधिष्ठिर के मुख से महाभारत में कहलाये गये हैं। शान्तिपर्व में सम्पूर्ण समाजनीति, राजनीति तथा धर्मनीति युधिष्ठिर और भीष्म के संवाद के रूप में प्रस्तुत की गयी है। युधिष्ठिर भाला चलाने में निपुण थे। वे कभी मिथ्या नहीं बोलते थे। उनके पिता ने यक्ष बन कर सरोवर पर उनकी परीक्षा भी ली थी। महाभारत युद्ध में धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए थे, जबकि परम क्रोधी दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेना का स्वामी था।

जीवन परिचय

इनका जन्म धर्मराज के संयोग से कुंती के गर्भ द्वारा हुआ था। वयस्क होने पर इन्होंने कौरवों के साथ द्रोणाचार्य से धनुर्वेद सीखा। समय आने पर जब इनको युवराज-पद मिला तब इन्होंने अद्भुत धैर्य, दृढ़ता, सहनशीलता, नम्रता, दयालुता और प्राणिमात्र पर कृपा आदि गुणों का परिचय देते हुए प्रजा का पालन उत्तम रीति से किया। इसके पश्चात दुर्योधन आदि के षड्यंत्र से ये अपने भाइयों और माता समेत वारणावत भेज दिये गये। वहाँ पर ये जिस भवन में ठहराये गये थे। वह भड़क उठने वाली वस्तुओं से बनाया गया था, अतएव उससे निकल भागने को इन्होंने गुप्त रीति से सुरंग खुदवाई और भवन में पुरोचन के आग लगाकर उस सुरंग की राह निकल भागे। फिर ये लोग व्यासजी के सलाह से एकचक्रा नगरी में जाकर रहने लगे। यह नगरी इटावा से 16 मील दक्षिण-पश्चिम में है। यहाँ रहते समय भीमसेन ने बक राक्षस को मारा था। यहाँ से दूसरे स्थान को जाते समय रास्ते में अंगारपर्ण गन्धर्वराज के साथ अर्जुन की मुठभेड़ हुई थी। अन्त में युधिष्ठिर की कृपा से, अंगारपर्ण को छुटकारा मिला था।

उत्कोचक तीर्थ में पहुँचने पर पाण्डवों ने धौम्य मुनि को अपना पुरोहित बनाया। फिर ये लोग द्रुपद राजा की स्वयंवर-सभा में पहुँचे। वहाँ अर्जुन के लक्ष्यभेद करने पर द्रौपदी की प्राप्ति हुई। कुंती ने भिक्षा में मिली हुई वस्तु को देखे बिना ही आज्ञा दे कि पाँचों भाई बाँट लो। अंत में सब हाल मालूम होने पर कुंती बड़े असमंजस में पड़ीं। तब युधिष्ठिर ने कहा कि माता के मुँह से जो बात निकल गई है उसी को हम लोग मानेंगे। विवाह हो चुकने पर पाण्डव लोग दुबारा हस्तिनापुर पहुँच गये। सदा धर्म के मार्ग पर चलने वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने राजा शैव्य की पुत्री देविका को स्वयंवर में प्राप्त किया और उनसे विवाह किया था। पाण्डवों को खाण्डवप्रस्थ हिस्से में मिला। वहीं राजधानी बनाकर वे निवास करने लगे।

राजसूय यज्ञ

मय दानव बड़ा होशियार इंजीनियर था। उसने अर्जुन के कहने से युधिष्ठिर के लिए राजधानी इन्द्रप्रस्थ में बड़ा सुन्दर सभा भवन बना दिया। इसके कुछ समय पीछे युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का विचार किया। श्रीकृष्ण ने उनके इस संकल्प का अनुमोदन किया। इधर तो इन्द्रप्रस्थ में धूमधाम से यज्ञ की तैयारी की जाने लगी और उधर चारों भाई नाना देशों में जा-जाकर राजाओं से कर वसूल करने लगे। उनके लौट आने पर यज्ञ किया गया। निमंत्रण पाकर प्रभृति कौरव भी यज्ञ में सम्मिलित हुए। ठीक समय पर ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर को यज्ञ की दीक्षा दी। इस यज्ञ के उत्सव में उस समय के प्रायः सभी नरेश एकत्र हुए थे। यज्ञ में निमंत्रित होकर जाने वालों के ठहरने आदि के लिए अलग-अलग भवन बनाये गये थे। उन लोगों की खासी खातिर की गई और उन्हें यथायोग्य विदाई भी दी गई। यज्ञ के अंत में भीष्म की सलाह से युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को अर्घ्य दिया। इसके सिलसिले में चेदि-नरेश शिशुपाल से झगड़ा हो गया। उसे श्रीकृष्ण ने मार डाला। शुभ अवसर पर इसे अशुभ घटना कहना चाहिए। यज्ञ पूरा हो चुकने पर दुर्योधन आदि हस्तिनापुर लौट गये। वहाँ बेटों के मुँह से पाण्डवों के ऐश्वर्य का हाल सुनकर के मन में कुढ़न हुई।

द्युतक्रीड़ा

अंत में दुर्योधन की बातों में आकर पाण्डवों को जुआ खेलने का प्रबन्ध किया। युधिष्ठिर को जुआ खेलना पसन्द नहीं था किंतु बुलाये जाने पर न जाना नियम-विरुद्ध समझकर वे उस व्यसन में लिप्त हो गये। इस जुए ने उनको कहीं का न रखा। एक-एक करके वे अपनी सब वस्तुएँ खो बैठे। हाथ में कुछ न रह जाने पर वे अपने चारों भाइयों को, अपने को और द्रौपदी को भी, दाँव में लगाकर, हार गये। इस सिलसिले में द्रौपदी तक की धर्षणा की गई। अंत में धृतराष्ट्र ने आगा-पीछा सोचकर पाण्डवों को, उनकी सम्पत्ति देकर, और समझा-बुझाकर विदा कर दिया।

किंतु इस व्यवस्था को दुर्योधन आदि ने ठीक न समझा। युधिष्ठिर दुबारा जुआ खेलने को बुला भेजे गये। वे भी सब कुछ जान-बूझकर लौट आये। इस बार शर्त यह लगाई गई कि हारने वाला बारह वर्ष तक वनवास करके एक वर्ष अज्ञातवास करे और यदि अज्ञातवास में उसका पता लग जाय तो दुबारा यहीं सिलसिला शुरू हो। कहना अनावश्यक है कि जुए में पाण्डवों की हार हुई। मृगछाला पहनकर पाण्डव लोग, द्रौपदी के साथ, वनवास करने गये। वहाँ पर उनके रिश्तेदार मिलने-भेंटने को अक्सर जाते थे। पाण्डवों ने वन में बारह वर्ष बिता दिये। वन के क्लेशों से ऊबकर द्रौपदी ने युधिष्ठिर को कौरवों से बदला लेने के लिए बहुत उभाड़ा परंतु उन्होंने तरह-तरह से उपदेश देकर द्रौपदी को समझाया और अवसर की प्रतीक्षा करने के लिए कहा। वनवास के समय महर्षि धौम्य इन लोंगो के साथ ही थे। वहाँ पर जो ऋषि-मुनि और साधु-महात्मा पाण्डवों से मिलने आते थे उनके उपदेश से युधिष्ठिर आदि ने अनेक तीर्थों की यात्रा की। वनवास की अवधि में ही अर्जुन, अस्त्रों की प्राप्ति के लिए, तपस्या करने गये।

सत्यवादी तथा धर्मनिष्ठ

धर्मराज युधिष्ठिर पांडवों में सबसे बड़े थे। वे सत्यवादी, धर्ममूर्ति, सरल, विनयी, मदमान-मोहवर्जित, दम्भ-काम-क्रोधरहित, दयालु, गो-ब्राह्मण-प्रतिपालक, महान् विद्वान् ज्ञानी, धैर्यसम्पन्न, क्षमाशील, तपस्वी, प्रजावत्सल, मातृ-पितृ-गुरु-भक्त और श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। धर्म के अंश से उत्पन्न होने के कारण वे धर्म के गूढ़ तत्व को खूब समझते थे। धर्म को सत्य की सूक्ष्मतर भावना का यदि पांडवों में किसी के अन्दर पूरा विकास था तो वह धर्मराज युधिष्ठिर में ही था। सत्य और क्षमा तो इनके सहजात सद्गुण में ही था। बडे़-से-बडे़ विकट प्रसंगों में इन्होंने सत्य और क्षमा को खूब निहारा था। द्यूतक्रीड़ा में युधिष्ठिर की पराजय के पश्चात जब द्रौपदी का वस्त्र उतर रहा था। भीम-अर्जुन सरीखे योद्धा भाई का इशारा पाते ही सारे कुरुकुल का नाश करने के लिये तैयार थे। भीम वाक्य प्रहार करते हुए भी बड़े भाई के संकोच से मन मसोस रहे थे; परन्तु धर्मराज धर्म के लिये चुपचाप सब सुन और सह रहे थे।

नित्यशत्रु दुर्योधन अपना ऐश्वर्य दिखलाकर दिल जलाने के लिये द्वैतवन में जाता है। अर्जुन का मित्र चित्रसेन गन्धर्व कौरवों की बुरी नीयत जानकर उन सबको जीतकर स्त्रियों सहित कैद कर लेता है। युद्ध से भागे हुए कौरवों के अमात्य युधिष्ठिर की शरण आते हैं और दुर्योधन तथा कुरुकुलकामिनियों को छुड़ाने के लिये अनुरोध करते हैं। भीम प्रसन्न होकर कहते हैं- "अच्छा हुआ, हमारे करने का काम दूसरों ने ही कर डाला।" परन्तु धर्मराज दूसरी ही धुन में हैं, उन्हें भीम के वचन नहीं सुहाते; वे कहते हैं- "भाई ! यह समय कठोर वचन कहने का नहीं है। प्रथम तो ये लोग हमारी शरण आये हैं, भयभीत आश्रितों की रक्षा करना क्षत्रियों का कर्तव्य है, दूसरे अपनी जाति में आपस में चाहे कितना कलह हो, जब कोई बाहर का दूसरा आकर सताये या अपमान करे, तब उसका हम सबको अवश्य प्रतीकार करना चाहिये। हमारे भाइयों और पवित्र कुरुकुल की स्त्रियों को गन्धर्व कैद करें और हम बैठे रहें, यह सर्वथा अनुचित है। आपस में विवाद होने पर वे सौ भाई और हम पांच भाई हैं। परन्तु दूसरों का सामना करने के लिये तो हमें मिलकर एक सौ पांच होना चाहिये।" युधिष्ठिर ने फिर कहा- "भाइयों ! पुरुषसिंहो ! उठो ! जाओ ! शरणागत की रक्षा और कुल के उद्धार के लिये चारों भाई जाओ और शीघ्र कुलकामिनियों सहित दुर्योधन को छुड़ाकर लाओ।"

कैसी अजातशत्रुता, धर्मप्रियता और नीतिज्ञता है! धन्य! अजातशत्रु धर्मराज के वचन सुनकर अर्जुन प्रतिज्ञा करते हैं कि- "यदि दुर्योधन को उन लोगों ने शांति और प्रेम से नहीं छोड़ा तो अब गन्धर्वराज के तत्प रूधिर से पृथ्वी की प्यास बुझायी जायेगी।" परस्पर लड़कर दूसरों की शक्ति बढ़ाने वाले भारतवासियों! इस चरित्र से शिक्षा ग्रहण करो। वन में द्रौपदी और भीम के लिये धर्मराज को वे तरह-तरह से उत्तेजित करते हैं और मूंह आयी सुनाते हैं; पर धर्मराज सत्य पर अटल हैं। वे कहते हैं- "बारह वर्ष वन और एक साल के अज्ञातवास की मैंने जो शर्त स्वीकार की है, उसे मैं नहीं तोड़ सकता। मेरी सत्य प्रतिज्ञा को सुनो; मैं धर्म को अमरता और जीवन से श्रेष्ठ मानता हूं। सत्य के सामने राज्य, पुत्र, यश और धन आदि का कोई मूल्य नहीं है। एक बार युद्ध के समय द्रोणाचार्य के वध के लिये असत्य बोलने का काम पड़ा; पर धर्मराज शेष तक पूरा असत्य न रख सके, सत्य शब्द ‘कुंजर’ का उच्चारण हो ही गया। कैसी सत्यप्रियता है।

निष्काम धर्मात्मा

युधिष्ठिर महाराज निष्काम धर्मात्मा थे। एक बार उन्होंने अपने भाइयों और द्रौपदी से कहा- "सुनो ! मैं धर्म का पालन इसलिये नहीं करता कि मुझे उसका फल मिले; शास्त्रों की आज्ञा है, इसलिये वैसा आचरण करता हूं। फल के लिये धर्माचरण करने वाले धार्मिक नहीं हैं, परन्तु धर्म और उसके फल का लेन-देन करने वाले व्यापारी हैं।" वन में यक्षरूप धर्म के प्रश्नों का यथार्थ उत्तर देने पर जब धर्म युधिष्ठिर से कहने लगे कि- "तुम्हारे इन भाइयों में से तुम कहो किस एक को जीवित कर दूं"। तब युधिष्ठिर ने कहा- "आप मेरे प्रिय भ्राता नकुल को जीवनदान दीजिए।" यक्ष ने कहा- "तुम्हें कौरवों से लड़ना है, भीम और अर्जुन अत्यन्त बलवान हैं; तुम उनमें से एक को न जिलाकर नकुल के लिये क्यों प्रार्थना करते हो?" युधिष्ठिर ने कहा- "मेरी दो माताएं थीं- कुन्ती और माद्री; कुन्ती का तो मैं एक पुत्र जीवित हूं, माद्री का भी एक रहना चाहिये। मुझे राज्य की लालसा नहीं हैं।" युधिष्ठिर की समबुद्धि देखकर धर्म ने अपना असली स्वरूप प्रकट कर सभी भाइयों को जीवित कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने जब वन में उपदेश दिया, तब हाथ जोड़कर युधिष्ठिर बोले- "केशव ! निस्संदेह पांडवों की आप ही गति हैं। हम सब आपकी ही शरण हैं, हमारे जीवन के अवलम्बन आप ही हैं। कैसी अनन्यता है। द्रौपदी सहित पांचों पांडव हिमालय जाते हैं। एक कुत्ता भी साथ है। द्रौपदी और चारों भाई गिर पड़े, इन्द्र रथ लेकर आते हैं और कहते हैं- "महाराज ! रथ पर सवार होकर सदेह स्वर्ग पधारिये।" धर्मराज कहते हैं- "यह कुत्ता मेरे साथ आ रहा है, इसको भी साथ ले चलने की आज्ञा दे।" देवराज इन्द्र ने कहा- "धर्मराज ये मोह कैसा! आप सिद्धि और अमरत्व को प्राप्त हो चुके हैं, कुत्ते को छोडि़ये।" धर्मराज ने कहा- "देवराज ! ऐसा करना आर्यों का धर्म नहीं है; जिस ऐश्वर्य के लिये अपने भक्त का त्याग करना पड़ता हो, वह मुझे नहीं चाहिये। स्वर्ग चाहे न मिले, इस भक्त कुत्ते को मैं नहीं त्याग सकता।" इतने में कुत्ता अदृश्य हो गया, साक्षात् धर्म प्रकट होकर बोले- "राजन ! मैंने तुम्हारे सत्य और कर्तव्य निष्ठा को देखने के लिये ही ऐसा किया था। तुम परीक्षा में उत्तीण हुए।" इसके बाद धर्मराज साक्षात् धर्म और इन्द्र के साथ रथ में बैठकर स्वर्ग में जाते हैं। वहां अपने भाईयों और द्रौपदी को न देखकर अकेले स्वर्ग में रहना पसन्द नहीं करते। एक बार मिथ्या भाषण के कारण धर्मराज को मिथ्या नरक दिखलाया जाता है। उसमें वे सब भाइयों सहित द्रौपदी का कल्पित आंर्तनाद सुनते हैं और वहीं नरक में दुःखों में रहना चाहते हैं। कहते हैं- "जहां मेरे भाई रहते हैं, मैं भी नहीं रहूंगा।" इतने में प्रकाश छा जाता है, माया निर्मित नरकयन्त्रणा अदृश्य हो जाती है, समस्त देवता प्रकट होते हैं ओर महाराज युधिष्ठिर अपने भ्राताओं सहित भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करते हैं।

अजगर के शिकंजे से भीमसेन का बचाव

एक बार वन घूमते-फिरते भीमसेन एक अजगर के शिकंजे में फँस गये। उनके लौटने में बहुत देर होने पर युधिष्ठिर पता लगाने को निकले तो उनको अजगर की लपेट में पाया। युधिष्ठिर ने अजगर से भीमसेन को छोड़ देने के लिए प्रार्थना की तो उसने कहा कि यदि मेरे प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर दे दोगे तो छोड़ दूँगा। युधिष्ठिर सहमत हो गये। अजगर ने युधिष्ठिर से धर्म तथा समाज-नीति के संबंध में बहुतेरे प्रश्न किये। उन सबका ठीक-ठीक उत्तर पाकर अजगर ने भीमसेन को छोड़ दिया। एक बार मार्कण्डेयजी ने भी कृपा करके पाण्डवों को दर्शन और उपदेशों के द्वारा कृतार्थ किया था। पाण्डवों के वनवास का समाचार दुर्योधन को मिलता रहता था। वह कर्ण और शकुनि आदि के कहने से, उन लोगों के साथ, वन में पाण्डवों को सताने की इच्छा से पहुँचा। किंतु दैवयोग से ऐसी घटना हो गई जिसमें उसे लेने के देने पड़ गये। बात यह हुई कि उसके नौकरों से नौकरों से गन्धर्वों की मुठभेड़ हो गई। इसी सिलसिले में गन्धर्वराज चित्रसेन ने दुर्योधन और कर्ण आदि को पराजित करके बन्दी कर लिया। यह खबर पाकर युधिष्ठिर के कहने से अर्जुन ने चित्ररथ को परास्त करके अपने विरोधी दुर्योधन आदि को छुटकारा दिलाया।

यक्ष के सवाल

एक दिन युधिष्ठिर ने पीने को पानी लाने के लिए नकुल को भेजा। उनके लौटने में देर होने पर सहदेव को पता लगाने के लिए भेजा। उनके भी न लौटने पर भीमसेन और अर्जुन को भेज दिया। जब कोई भी न लौटा तब युधिष्ठिर स्वयं ढूँढ़ने निकले। उन्होंने जाकर देखा कि चारों भाई सरोवर के तट पर मरे पड़े हैं। वहाँ पर एक यक्ष को देखकर उन्होंने अपने भाइयों की इस विपत्ति का कारण उससे पूछा। उसने बतलाया कि तुम्हारे भाइयों ने मेरी बात न मानकर पानी पी लिया, इसी से उनकी यह दशा हुई है। यदि तुम मेरे प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर दिये बिना पानी पी लोगे तो तुम्हारा भी यहीं हाल होगा। युधिष्ठिर के उत्तर देने को तैयार होने पर यक्ष ने संतुष्ट होकर बहुत से प्रश्न किये और सबका ठीक-ठीक उत्तर पाया। तब उसने युधिष्ठिर से कहा कि इनमें से तुम जिस एक को चाहो वह जीवित हो सकता है। इस पत युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित कर देने का अनुरोध किया। यक्ष ने विस्मित होकर पूछा कि भीमसेन और अर्जुन जैसे महारथियों को जीवन-दान देने की प्रार्थना न करके तुम नकुल को क्यों जीवित देखना चाहते हो। युधिष्ठिर ने इसका बहुत उत्तम उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी दो माताएँ हैं। अपनी माता कुंती के पुत्र हम जीवित हैं ही, अब सौतेली माता माद्री का भी एक बेटा बच जायगा तो हमारी दोनों माताओं की संतान बनी रहेगी। यह उत्तर पाकर यक्ष इतना प्रसन्न हुआ कि उसने युधिष्ठिर के चारों भाइयों को जीवित कर दिया।

विराट का आश्रय

बारह वर्ष बीत जाने पर पाण्डवों को एक वर्ष छिपकर रहना था। इसके विषय में पाँचों भाइयों ने मिलकर सलाह की। उन लोगों ने निश्चय किया कि रूप बदलकर हम लोग मत्स्य राज विराट के यहाँ यह समय बिता देंगे। युधिष्ठिर ने कहा कि हम उक्त राजा दरबार में अक्षक्रीड़ा-कुशल ब्राह्मण बनकर रहेंगे। बस पाण्डव लोग भेष बदल-बदलकर राजा विराट के यहाँ जाकर रहने लगे। इस रूप में वहाँ युधिष्ठिर ने अपना नाम कंक रख लिया था। इन लोगों के वहाँ रहते समय एक घटना दुर्घटना हो गई कि राजा का सेनापति कीचक बल्लव (भीमसेन) के हाथों मारा गया। उसके मारे जाने की खबर पाकर त्रिगर्तराज सुशर्मा ने विराट का गोधन छीनने के लिए आक्रमण कर दिया। किंतु उसे छद्मवेषधारी पाण्डवों की सहायता से बलवान विराट के आगे हार माननी पड़ी। इस विषय से राजा विराट इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कंक क्प ही राजगद्दी पर बिठाना चाहा। युधिष्ठिर ने राजा के इस प्रस्ताव को धन्यवादपूर्वक अस्वीकार कर दिया, क्योंकि समय दूसरा था। इसी समय कौरवों ने दूसरी ओर से गोधन हरण करने को चढ़ाई की तो बृहन्नला बने हुए अर्जुन ने राजा के पुत्र उत्तर को सारथि बनाकर उस आपत्ति से मत्स्य राज्य की रक्षा की। इसी समय उत्तर को अर्जुन के बतलाने से, मालूम हुआ कि उसके यहाँ पाण्डव लोग छिपे हुए हैं। जिस समय ये लोग युद्ध में विजयी होकर राजधानी में पहुँचे उस समय राजा विराट अपने मुसाहब कंक के साथ जुआ खेल रहे थे। उसी दशा में अपने कुमार उत्तर की वीरता की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि मेरे बेटे ने कौरवों को मार भगाया। इस पर कंक ने कहा कि भीष्म और द्रोण जैसे महारथियों को बृहन्नला के सिवा और कोई परास्त नहीं कर सकता। इस उत्तर से क्रुद्ध होकर विराट ने कंक के मुँह में पाँसे मार दिये। इस चोट से युधिष्ठिर की नाक से रक्त निकलने लगा। पीछे विराट को उत्तर से मालूम हुआ कि वास्तव में बृहन्नला ने ही कौरवों के दाँत खट्टे किये हैं। इससे अपने अपराध के लिए खिन्न होकर विराट ने कंक से क्षमा माँगी। अंत में पाण्डवों का प्रकृत परिचय पाने पर राजा विराट ने उन लोगों से अपनी भूल-चूक क्षमा करने के लिए प्रार्थना की। उन्होंने पाण्डवों को उनका राज्य दिलाने के लिए अपनी शक्ति-भर सहायता देने का वचन दिया।

कुरुक्षेत्र में युद्ध

युधिष्ठिर ने आरम्भ में बिना ही लड़ाई-झगड़े के अपना हिस्सा पाने की भी पूरी चेष्टा की, किंतु जब दुर्योधन ने इसका निर्णय युद्ध की हार-जीत पर ही टाला तब लाचार होकर उनको युद्ध की तैयारी करनी पड़ी। कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ने के लिए तैयार कौरवों की अपार सेना और भीष्म आदि की बनाई हुई व्यूह-रचना को देखकर युधिष्ठिर घबरा गये। अर्जुन और श्रीकृष्ण के समझाने पर उनके हृदय से आतंक दूर हुआ। इसके पश्चात, युद्ध छिड़ने से पहले, युधिष्ठिर ने रथ से उतरकर, पैदल जाकर, भीष्म आदि गुरुजनों की वन्दना करके उनसे विजय के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया। वहाँ पर चार ही ऐसे पुरुष थे जिनसे आशीर्वाद लेना आवश्यक था। वे थे-भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और मामा शल्य। उन चारों ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद देकर स्पष्ट कह दिया कि यदि तुम हमारे पास न आते तो हमको बुरा लगता- हम शाप दे देते। युधिष्ठिर की इस सूझ की प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जाता। कहाँ तो मार-काट का मौका और कहाँ यह शिष्टाचार का पालन। अस्तु, इसके बाद युद्ध का आरम्भ हुआ। युद्ध में युधिष्ठिर ने पर्याप्त परिश्रम किया। बहुत से सैनिकों और सेनापतियों का उन्होंने संहार किया। उन्होंने स्वयं भी बहुत-सी चोटें झेलीं। कर्ण की मार से बेतरह घायल होकर उन्हें शिविर में लौट जाना पड़ा।

भीष्म से सलाह

अंत में युधिष्ठिर ने देखा कि भीष्म तो पाण्डव-पक्ष को बिलकुल चौपट किये देते हैं तब उन्होंने पितामह के पास पहुँचकर उनके वध का उपाय पूछा और तदनुसार कार्य करके अपने पक्ष की रक्षा की। इसके बाद उन्हें अभिमन्यु के वध का असह्य क्लेश सहना पड़ा। भीष्म के पश्चात जब द्रोणाचार्य पाण्डवों की सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे। तब श्रीकृष्ण ने इस संकट से बचने का उपाय सुझाया। भीमसेन ने अवंतिराज इन्द्रवर्मा के हाथी को मारा और अश्वत्थामा के मारे जाने की खबर फैलाकर उछल-कूद मचा दी। इन्द्रवर्मा के हाथी का नाम भी अश्वत्थामा था और द्रोणाचार्यजी के पुत्र का भी यही नाम था। पहले-पहल द्रोणाचार्य ने अपने बेटे के मारे जाने की अफवाह पर विश्वास नहीं किया। यह देखकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि यदि द्रोणाचार्य क्रुद्ध होकर आधे दिन तक मार-काट करते रहेंगे तो फिर पाण्डव-कुल की समाप्ति ही समझिए। अतएव ऐसा कीजिए जिसमें आचार्य हथियार रख दें। जब तक उनके हाथ में हथियार रहेगा तब तक उनको पराजित नहीं कर सकता। यदि आप उनको अश्वत्थामा के मारे जाने का विश्वास करा दें तो वे हथियार रख देंगे। श्रीकृष्ण का यह प्रस्ताव युधिष्ठिर को पसन्द नहीं था। किंतु एक तो रक्षा का दूसरा उपाय नहीं था, दूसरे सब ओर से उन पर ऐसा करने के लिए दबाव डाला जा रहा था। इसलिए विवश होकर उन्होंने द्रोणाचार्य के समीप जाकर ज़ोर से कहा, "अश्वत्थामा मारा गया" और धीरे-से कह दिया, "इस नाम का हाथी"। यह बात कहने से पहले तक सत्य-भाषण करने के प्रभाव से, उनका रथ पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर रहता था, किंतु इस अर्ध-सत्य बात के कहते ही उनका रथ पृथ्वी पर चलने लगा- विशेषता जारी रही।

महाभारत में युधिष्ठिर

राजसूय यज्ञ के बाद युधिष्ठिर ने सम्राट-पद प्राप्त किया। उन्हें बधाई देने के लिए द्वैपायन व्यास आये। बात-ही-बात में उन्हेंने कहा कि प्रत्येक उत्पात का फल 13 वर्ष तक चलता है। अत: शिशुपाल वध के फलस्वरूप युधिष्ठिर को निमित्त बनाकर एक युद्ध होगा जिसमें क्षत्रियों का विनाश होगा। इस भविष्यवाणी को सुनकर युधिष्ठिर स्वयं मरने का निश्चय करने के लिए उद्यत हो उठे किंतु अर्जुन ने उन्हें समझा-बुझाकर शांत किया।

कौरवों से द्युतक्रीड़ा में हारने के बाद पांडव तथा द्रौपदी काम्यक वन में चले गये। दिव्यास्त्रों की प्राप्ति के लिए अर्जुन तपस्या करने इन्द्रकील पर्वत पर चले गये। शेष पांडव तथा द्रौपदी उनकी चिंता में रत थे। उन्हीं दिनों वृहदश्व मुनि ने युधिष्ठिर को भांति-भांति का उपदेश दिया। उन्होंने अश्वविद्या और द्युतक्रीड़ा का रहस्य भी चारों पांडवों को बता दिया।[1]

महाभारत युद्ध

महाभारत-युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व युधिष्ठिर क्रमश: भीष्म, द्रोण तथा कृपाचार्य के पास गये। उन्हें प्रणाम कर उनसे विजय-प्राप्ति का वरदान लिया तथा उनसे उन लोगों की मृत्यु का उपाय भी पूछा। भीष्म ने कहा कि वे बाद में बतायेंगे, क्योंकि अभी उनका मृत्युकाल भी नहीं आया है। द्रोण ने कहा-"अप्रिय समाचार' प्राप्त कर मेरे हाथ से शस्त्र गिर जाते हैं- ऐसे समय में कोई मेरा हनन कर सकता है।" कृपाचार्य ने कहा कि युधिष्ठिर की विजय निश्चित है। तदुपरांत युधिष्ठिर ने शल्य को प्रणाम कर प्रार्थना की कि यदि वह कर्ण का सारथी बने और उसे हतोत्साहित करता रहे। शल्य ने स्वीकार कर लिया। महाभारत-युद्ध में द्रोण की इच्छा युधिष्ठिर को बंदी बना लेने की थी। कृष्ण ने यह बात भांप ली थी। घटोत्कच के वध के उपरांत युधिष्ठिर बहुत कातर हो उठे। घटोत्कच ने वनवास काल से ही पांडवों का बहुत साथ दिया था। कृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाया कि यदि कर्ण ने घटोत्कच पर शक्ति का प्रयोग न किया होता तो अर्जुन का वध निश्चित था। युद्ध के चौदहवें दिन व्यास मुनि ने प्रकट होकर बताया कि तब से पांचवें दिन पांडवगण विजयी हो जायेंगे तथा वसुधा पर उनका एकछत्र राज्य होगा। अगले दिन द्रोण ने महाभयंकर युद्ध का श्रीगणेश किया। जो रथी सामने आता, वही मारा जाता। श्रीकृष्ण ने पांडवों को समझा-बुझाकर तैयार कर लिया कि वे द्रोण तक अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार पहुंचा दें जिससे कि युद्ध में द्रोण की रुचि समाप्त हो जाय। भीम ने मालव नरेश इन्द्रवर्मा के अश्वत्थामा नामक हाथी का वध कर दिया। उसने द्रोण को 'अश्वत्थामा मारा गया' समाचार दिया। द्रोण ने उसपर विश्वास न कर युधिष्ठिर से समाचार की सच्चाई जाननी चाही। युधिष्ठिर अपनी सत्यप्रियता के लिए विख्यात थे। श्रीकृष्ण के अनुरोध पर उन्होंने ज़ोर से कहा "अश्वत्थामा मारा गया है।" और धीरे से यह भी जोड़ दिया कि "हाथी का वध हुआ है।" द्रोण ने उत्तरांश नहीं सुना। अत: उनका समस्त उत्साह मंद पड़ गया। युधिष्ठिर इतने धर्मात्मा थे कि उनका रथ पृथ्वी से चार अंगुल ऊंचा रहता था किंतु उस दिन के असत्य भाषण के उपरांत उनके घोड़े पृथ्वी का स्पर्श करके चलने लगे।

कर्ण-वध के उपरांत राजा शल्य ने कौरवों का सेनापतित्व ग्रहण किया। युद्ध में युधिष्ठिर ने चंद्रसेन तथा द्रुमसेन को मार डाला।

महाभारत युद्ध की समाप्ति पर बचे हुए कौरवपक्षीय नर-नारी, जिनमें धृतराष्ट्र तथा गांधारी प्रमुख थे, तथा श्रीकृष्ण, सात्यकि और पांडवों सहित द्रौपदी, कुन्ती तथा पांचाल विधवाएं कुरुक्षेत्र पहुंचे। वहां युधिष्ठिर ने मृत सैनिकों का (चाहे वे शत्रु वर्ग के हों अथवा मित्रवर्ग के) दाह-संस्कार एवं तर्पण किया। कर्ण को याद कर युधिष्ठिर बहुत विचलित हो उठे। माँ से बार-बार कहते रहे-"काश, कि तुमने हमें पहले बता दिया होता कि कर्ण हमारे भाई हैं।" अंत में हताश, निराश और दुखी होकर उन्होंने नारी-जाति को शाप दिया कि वे भविष्य में कभी भी कोई गुह्य रहस्य नहीं छिपा पायेंगी। युधिष्ठिर को राज्य, धन, वैभव से वैरागय हो गया। वे वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहते थे किंतु समस्त भाइयों तथा द्रौपदी ने उन्हें तरह-तरह से समझाकर क्षात्रधर्म का पालन करने के लिए उद्यम किया। [2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, सभापर्व, 46,80
  2. महाभारत, भीष्मवधपर्व, ।992, द्रोणपर्व, 162, 183, 190, स्त्रीपर्व, 26, 27, शांतिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः