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रसिक गोविंद  

  • रीति काल के कवि रसिक गोविंद निंबार्क संप्रदाय के एक महात्मा हरिव्यास की गद्दी के शिष्य थे और वृंदावन में रहते थे। हरिव्यास जी की शिष्य परंपरा में 'सर्वेश्वरशरण देव' जी बड़े भारी भक्त हुए हैं। रसिक गोविंद उन्हीं के शिष्य थे। ये जयपुर (राजपूताना) के रहने वाले और नटाणी जाति के थे। इनके पिता का नाम 'शालिग्राम', माता का 'गुमाना' और बड़े भाई का नाम 'बालमुकुंद' था।
  • इनका कविता काल संवत 1850 से 1890 तक अर्थात विक्रम की उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर अंत तक प्रतीत होता है। अब तक इनके 9 ग्रंथों का पता चला है -

(1) रामायण सूचनिका 33 दोहों में अक्षरक्रम से रामायण की कथा संक्षेप में कही गई है। यह संवत 1858 के पहले की रचना है। इसका पता इन दोहों से लग सकता है -

चकित भूप बानी सुनत, गुरु बसिष्ठ समुझाय।
दिए पुत्र तब, ताड़का मग में मारी जाय
छाँड़त सर मारिच उड़्यो, पुनि प्रभु हत्यो सुबाह।
मुनि मख पूरन, सुमन सुर बरसत अधिक उछाह

(2) रसिक गोविंदानंद घन - यह सात आठ सौ पृष्ठों का बड़ा भारी रीति ग्रंथ है जिसमें रस, नायक-नायिका भेद, अलंकार, गुण, दोष आदि का विस्तृत वर्णन है। यह इनका प्रधान ग्रंथ है। इसका निर्माणकाल वसंत पंचमी संवत 1858 है। यह चार प्रबंधों में विभक्त है। इसकी बड़ी विशेषता यह है कि लक्षण गद्य में है और रस, अलंकार आदि के स्वरूप पद्य में समझाने का प्रयत्न किया गया है। संस्कृत के बड़े-बड़े आचार्यों के मतों का उल्लेख भी स्थान स्थान पर है।

  • इसके आगे अभिनवगुप्ताचार्य का मत कुछ विस्तार से दिया है। सारांश यह कि यह ग्रंथ आचार्यत्व की दृष्टि से लिखा गया है और इसमें संदेह नहीं कि और ग्रंथों की अपेक्षा इसमें विवेचन भी अधिक है और छूटी हुई बातों का समावेश भी। दोषों का वर्णन हिन्दी के लक्षण ग्रंथों में बहुत कम पाया जाता है, इन्होंने काव्यप्रकाश के अनुसार विस्तार से किया है। रसों, अलंकारों आदि के उदाहरण कुछ तो अपने हैं, पर बहुत से दूसरे कवियों के भी हैं। उदाहरणों को चुनने में इन्होंने बड़ी सहृदयता का परिचय दिया है। संस्कृत के उदाहरणों के अनुवाद भी बहुत सुंदर करके रखे हैं। साहित्यदर्पण के मुग्धा के उदाहरण (दत्तोसालसमंथर...इत्यादि) को हिन्दी में बहुत ही सुंदरता से लाए हैं -

आलस सों मंद मंद धारा पै धारति पाय,
भीतर तें बाहिर न आवै चित्त चाय कै।
रोकति दृगनि छिन छिन प्रति लाज साज,
बहुत हँसी की दीनी बानि बिसराय कै
बोलति बचन मृदु मधुर बनाय, उर
अंतर के भाव की गंभीरता जनाय कै।
बात सखी सुंदर गोविंद की कहात तिन्हैं,
सुंदर बिलोकै बंक भृकुटी नचाय कै

(3) लछिमन चंद्रिका, 'रसिक गोविंदानंदघन' में आए लक्षणों का संक्षिप्त संग्रह जो संवत 1886 में लछिमन कान्यकुब्ज के अनुरोध से कवि ने किया था।

(4) अष्टदेशभाषा , इसमें ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी, पूरबी आदि आठ बोलियों में राधाकृष्ण की श्रृंगारलीला कही गई है।

(5) पिंगल

(6) समयप्रबंध , राधा कृष्ण की ऋतुचर्या 85 पद्यों में वर्णित है।

(7) कलियुगरासो , इसमें 16 कवित्तों में कलिकाल की बुराइयों का वर्णन है। प्रत्येक कवित्त के अन्त में कीजिए सहाय जू कृपाल श्रीगोविंदराय, कठिन कराल, कलिकाल चलि आयो है यह पद आता है। निर्माणकाल संवत 1865 है।

(8) रसिक गोविंद , चंद्रालोक या भाषाभूषण के ढंग की अलंकार की एक छोटी पुस्तक जिसमें लक्षण और उदाहरण एक ही दोहे में हैं। रचनाकाल संवत 1890 है।

(9) युगलरस माधुरी , रोलाछंद में 'राधाकृष्ण विहार' और वृंदावन का बहुत ही सरल और मधुर भाषा में वर्णन है जिससे इनकी सहृदयता और निपुणता पूरी पूरी टपकती है कुछ पंक्तियाँ हैं -

मुकलित पल्लव फूल सुगंधा परागहि झारत।
जुग मुख निरखि बिपिन जनु राई लोन उतारत
फूल फलन के भार डार झुकि यों छबि छाजै।
मनु पसारि दइ भुजा देन फल पथिकन काजै
मधु मकरंद पराग लुब्धा अलि मुदित मत्ता मन।
बिरद पढ़त ऋतुराज नृपति के मनु बंदीजन


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