रौप्या नदी  

रौप्या नामक एक नदी का उल्लेख महाभारत, वनपर्व में हुआ है। यह यमुना के निकट बहने वाली नदी थी-

'एतच्चर्चीकपुत्रस्य योगैविचरतो महीम् प्रसर्पण महीपाल रौप्यायाममितौजसः।'[1]

इस प्रसंग में यमुना का उल्लेख 129,2 में हैं-

'अंवरीषश्च नाभाग इष्टवान् यमुनामनु।'
  • रौप्या पर स्थित उपर्युक्त स्थान (प्रसपणं) अशुभ माना गया है तथा वहां एक रात्रि से अधिक ठहरना भी अपवित्र कहा गया है। इसे कुरुक्षेत्र का द्वार बताया गया है-
'अद्यचात्र निवत्स्यामः क्षपांभरतसत्तम, द्वारमेतत् तु कौतेंय कुरुक्षेस्य भारत।'[2]
  • रौप्या नदी का अभिज्ञान अनश्चित है।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, वनपर्व 129,7
  2. महाभारत, वनपर्व 129,11
  3. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 806 |

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