लकुलीश  

Disamb2.jpg लकुलीश एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- लकुलीश (बहुविकल्पी)

लकुलीश हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक भगवान शिव के 24वें अवतार माने गये हैं। इन्होंने पाशुपत शैव धर्म की स्थापना की थी। अनुमान किया जाता है कि इनका आविर्भाव दूसरी शताब्दी में बड़ौदा के दभोई ज़िले के कायावरोहन[1] में हुआ था। माना जाता है कि 'लकुलीश सम्प्रदाय' की लोकप्रियता के साथ-साथ योगीश्वर शिव के स्वरूप का बैठे हुए लकुलीश में रुपान्तरण हो गया। इसमें लकुलीश की दो भुजाएँ, जिनमें एक में 'लकुट' तथा दूसरे में 'मातुलिंग' फल अंकित किया जाता है।

पुरा विवरण

'लकुलीश' के मन्दिर का सबसे प्राचीन उदाहरण 'चन्द्रभागा'[2] के शीतलेश्वर मंदिर के ललाटबिम्ब पर उत्कीर्ण लकुलीश मूर्ति में दिखाई देता है। इस तथ्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लकुलीश की मूर्तियों का अंकन एवं पूजन सातवीं शताब्दी से प्रारम्भ हो गया था, तथा लकुलीश शैव मन्दिरों में प्रमुख देव के रुप में माने जाते थे। हालाँकि गर्भगृह का प्रमुख पूजा प्रतीक अभी भी लिंग ही था। राजस्थान के उदयपुर क्षेत्र में लकुलीश की पूजा दसवीं शताब्दी में भी प्रचलन में रही थी। एकलिंग मंदिर के 971 ई. तथा 1274-1276 ई. के अभिलेख, उदयपुर के 'वामेश्वर मन्दिर' का 1116 ई. का अभिलेख तथा एकलिंग, चित्तौड़गढ़ में पाये गए आठवीं शताब्दी की लकुलीश प्रतिमाएँ आदि यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि आठवीं शाताब्दी में लकुलीश की पूजा प्रचलित थी। इतिहासकार भंडारकार ने अनेक लकुलीश मन्दिरों का भी वर्णन किया है।[3]

मूर्ति स्वरूप

नौवीं शताब्दी की शुरुआत में लकुलीश की मूर्तियों में लकुलीश तथा योगीश्वर शिव दोनों के स्वरूपों को अंकित किया जाता था। लकुलीश चार भुजाओं, श्रीवत्स लांछन, जटामुकुट तथा पद्मासन मुद्रा में बैठे हुए उत्कीर्ण किए जाते थे। ग्याहरवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक लकुलीश का प्रतिमा वैज्ञानिक विधान निश्चित रुप को प्राप्त हो चुका था। अब उनकी प्रतिमा तपस्वी के रुप में उत्कीर्ण की जाती थी, जो बुद्ध तथा तीर्थंकर की मूर्तियों से समानता धारण किये रहती थी।

भगवान शिव के योगीश्वर रुप का अंकन लकुलीश के रुप में राजस्थान के मूर्तिकारों में भी प्रचलित था। नागदा के सास मंदिर में एक शिव की प्रतिमा योगासन में बैठी हुई, ऊपरी दो भुजाओं में त्रिशूल, सर्प लिए हुए और निचली भुजाओं में एक में अक्षमाला तथा दूसरी में मातुलिंग फल लिये हुए प्रदर्शित है। पद्मासन के पास दोनों ओर दो बृहदोदर आकृतियाँ बैठी हुई मुद्रा में है, यह सम्भवतः लकुलीश के दो शिष्य हों। यह मूर्ति योगीश्वर स्वरूप का लकुलीश में परिवर्तन के संक्रमण की अवस्था की दिग्दर्शिका है। राजस्थान में बुद्ध तथा जिन के समान मुड़े हुए बालों वाले सिर के स्थान पर जटामुकूट से युक्त लकुलीश मूर्तियों की प्राप्ति भी इस धारणा को सिद्ध करने में मददगार है। इस प्रकार लकुलीश तथा योगीश्वर स्वरूपों की साम्यता एवं पहचान के लिए ही लकुलीश जटामुकुट युक्त अंकित होने लगे थे।[3]

प्रमुख पूज्य केन्द्र

लकुलीश की पूजा के प्रमुख केन्द्र राजस्थान में 'एकलिंग', उदयपुर; 'बाडोली', कोटा तथा 'चन्द्रभागा', झालरापाटन थे, लेकिन पश्चिमी राजस्थान के कुछ भागों में भी लकुलीश की मूर्तियाँ मिली हैं। बेलार, नाना, छोटन तथा आबू के मन्दिरों में लकुलीश की प्रतिमाएँ गर्भगृह के द्वारों पर उत्कीर्ण प्राप्त होती हैं। नान[4] तथा छोटन[5] से प्राप्त मूर्तियाँ अभिलेख से युक्त हैं, इस कारण ये प्रमाणित करती हैं कि लकुलीश की पूजा इस क्षेत्र में 13वीं शताब्दी तक प्रचलित थी। बाड़ोली के एक ध्वस्त द्वार के सिरदल पर ललाट-बिम्ब के स्थान पर लकुलीश की प्रतिमा अंकित है। इस प्रतिमा में बैठे हुए लकुलीश के दोनों पार्श्वों में भगवान ब्रह्मा एवं विष्णु की मूर्तियाँ हैं। इन मूर्तियों की चार भुजाएँ दिखाई गयीं हैं, लेकिन भुजाओं के अस्त्र-शस्त्र् आदि के निशान नष्ट हो गए हैं।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आधुनिक कारवण
  2. झालरापाटन, 7वीं शताब्दी ईस्वी
  3. 3.0 3.1 3.2 कुमार, अमितेश। मूर्तिकरण की प्रक्रिया (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल.)। । अभिगमन तिथि: 28 मार्च, 2012।
  4. 1290 विक्रम संवत, 1233 ई.
  5. 1365 विक्रम संवत, 1308

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