ललाटाक्ष  

ललाटाक्ष अथवा 'ललाताक्ष' नामक प्राचीन स्थान का उल्लेख महाभारत, सभापर्व में हुआ है-

'द्वयक्षांस्त्र्यक्षाल्लंलाटाक्षान्[1] नानादिग्भ्य: समागतान्, औष्णीकानन्त वासांश्च रोमकान् पुरुषाकान्।'[2]
  • महाभारत के उपरोक्त प्रसंग में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में विदेशों से भांति-भांति के उपहार लेकर आने वाले विभिन्न लोगों के वर्णन में 'ललाटाक्षों' (ललाताक्षों) का उल्लेख भी किया गया है।
  • विद्वानों के मत में द्वय्क्ष, बदख्शां, त्र्यक्ष, तरखान तथा ललाटाक्ष 'लदाख' या 'लद्दाख' है। *ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने यहाँ विदेशी नामों को संस्कृत में रूपांतरित करके लिखा है। वैसे इन शब्दों को टीकाकारों ने सार्थक बनाने का प्रयत्न किया है, जैसे- ललाटाक्ष को ललाट पर आंखों वाले मनुष्य कहा गया है। उपयुक्त श्लोक में संभवतः इन सभी विदेशी लोगों को पगड़ी धारण करने वाला कहा गया है।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. =ललाताक्षान्
  2. महाभारत, सभापर्व 51,17
  3. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 812 |

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