वायु देव  

वायु देव

वैदिक देवताओं को तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है;

  1. पार्थिव ,
  2. वायवीय एवं
  3. आकाशीय । इनमें वायवीय देवों में वायु प्रधान देवता है । इसका एक पर्याय वात भी है ।
  • वायु , वात दोनों ही भौतिक तत्त्व एवं दैवी व्यक्त्तित्व के बोधक हैं किंतु वायु से विशेष कर देवता एवं वात से आँधी का बोध होता है ।
  • ऋग्वेद में केवल एक ही पूर्ण सूक्त वायु की स्तुति में है [1] तथा वात के लिये दो हैं [2]
  • वायु का प्रसिद्ध विरुद ‘नियुत्वान्’ है जिससे इसके सदा चलते रहने का बोध होता है । वायु मन्द के सिवा तीन प्रकार का होता है:
  1. धूल-पत्ते उड़ाता हुआ
  2. वर्षाकर एवं
  3. वर्षा के साथ चलने वाला झंझावात । तीनों प्रकार वात के हैं जबकि वायु का स्वरूप बड़ा ही कोमल वर्णित है ।
  • प्रात:कालीन समीर (वायु) उषा के ऊपर साँस लेकर उसे जगाता है, जैसे प्रेमी अपनी सोयी प्रेयसी को जगाता हो । उषा को जगाने का अर्थ है प्रकाश को निमन्त्रण देना, आकाश तथा पृथ्वी को द्युतिमान करना । इस प्रकार प्रभात होने का कारण वायु है क्योंकि वायु ही उषा को जगाता है।
  • इन्द्र एवं वायु का सम्बन्ध बहुत ही समीपी है और इस प्रकार इन्द्र तथा वायु युगल देव का रूप धारण करते हैं । विद्युत एवं वायु वर्षाकालीन गर्जन एवं तूफ़ान में एक साथ होते हैं, इसलिए इन्द्र तथा वायु एक ही रथ में बैठते हैं-दोनों के संयुक्त कार्य का यह पौराणिक व्यक्तिकरण है। सोम की प्रथम घूँट वायु ही ग्रहण करता है । वायु अपने को रहस्यात्मक (अदृश्य) पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करता है । इसकी ध्वनि सुनाई पड़ती है किन्तु कोई इसका रूप नहीं देखता । इसकी उत्पत्ति अज्ञात है । एक बार इसे स्वर्ग तथा पृथ्वी की सन्तान कहा गया है [3]
  • वैदिक ॠषि वायु के स्वास्थ्य सम्बन्धी गुणों से सुपरिचित थे । वे जानते थे कि वायु ही जीवन का साधन है तथा स्वास्थ्य के लिए वायु का चलना परमावश्यक है।
  • वात रोगमुक्ति लाता है तथा जीवन शक्ति को बढ़ाता है । उसके घर में अमरत्व का कोष भरा पड़ा है । उपर्युक्त हेतुओं से वायु को विश्व का कारण, मनुष्यों का पिता तथा देवों का श्वास कहा गया है । इन वैदिक कल्पनाओं के आधार पर पुराणों में वायु सम्बन्धी बहुत सी पुराकथाओं की रचना हुई ।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऋग्वेद 1.139
  2. ऋग्वेद 10.168,186.
  3. ऋग्वेद 7.9.3

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