विशु

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विशु केरल का प्राचीन उत्सव है। यह केरलवासियों के लिए नववर्ष का दिन है। यह मलयालम महीने मेष की पहली तिथि को मनाया जाता है। केरल में विशु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है। इस दिन को यहाँ "मलयाली न्यू ईयर विशु" के नाम से पुकारा जाता है। बसन्त ऋतु में सुखद आशा व अपेक्षा की भावनाओं को संजोए केरल में विशु (विषु) पर्व भी अन्य पर्वों की भाँति हर्षोल्लास से मनाया जाता है। प्रातःकाल में विशुकनी के शुभ दर्शन की रीति का अनुसरण करते आए केरलवासी इस पर्व का शुभारम्भ करते हैं। केरल के प्रत्येक हिन्दू परिवार में लोगों को जितनी प्रतीक्षा अपने नववर्ष 'विशु' की होती है, उतनी शायद ही किसी अन्य त्योहार की होती है। विशु उनके नये वर्ष का त्योहार है। मेष संक्रान्ति अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से केरल में नववर्ष का शुभारम्भ होता है। इस अवसर पर नये पंचांग की पूजा करके उसे उपस्थित जनसमुदाय के बीच में पढ़ा जाता है और नये वर्ष का भविष्य फल बताया जाता है।

उत्सव का प्रारम्भ

मलयाली मास 'मेदम' के प्रथम दिन ही विशु का त्योहार हर्ष व उल्लास से मनाया जाता है। विशु की सुबह ही सोते बच्चों के कान में 'कणी'-'कणी' 'कणी'-ऐसे गुंजाया जाता है कि बच्चा नींद को छोड़कर उठ खड़ा हो। मलयालम भाषा में 'कणी' शब्द का अर्थ है-'फल'। इसके बाद बच्चों को फलों की दावत दी जाती है। विशु के इस शुभ दिन पर केरल के हर घर में संगीत की लहरियाँ गूँजती हैं। लोग भक्ति-संगीत में लीन होकर नये वर्ष का स्वागत करते हैं। एक तरह से किसानों के लिए यह पर्व आशापुंज है। इस दिन वे सुखी व समृद्ध जीवन की कामना करते हैं। अंग्रेज़ी कलेन्डर के अनुसार यह दिन अप्रैल-मई में आता है। हिन्दुओं के लिए यह अवसर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि विशु का त्योहार नववर्ष का शुभारम्भ घोषित करता है। विशु के दिन परम्पराबद्ध केरलवासी अनेक रंगारंग अनुष्ठान व विधियों का पालन करते हैं। अधिकतर ये परम्पराएँ इस विश्वास पर आधारित हैं कि विशुपर्व धूम–धाम से मनाना चाहिए, क्योंकि नववर्ष के प्रथम दिन के शुभकार्य पूरे वर्ष भी जारी रहेंगे।

पूजा

मलयालम समाज में इस दिन मंदिरो में विशुक्कणी के दर्शन कर समाज के लिये नव वर्ष का स्वागत किया जाता है। केरल में विशु उत्सव पर पारंपरिक नृ्त्य गान के साथ आतिशबाज़ी का आनन्द लिया जाता है। इस दिन विशेषकर अय्यापा मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। विशु यानी भगवान "श्री कृष्ण" और कणी यानी "टोकरी"। विशु पर्व पर भगवान श्री कृष्ण को टोकरी में रखकर उसमें कटहल, कद्दू, पीले फूल, कांच, नारियल और अन्य चीज़ों से सजाया जाता है। इस दिन सबसे पहले घर का मुखिया आँखें बंद कर विशुक्कणी के दर्शन करता है। कई जगहों पर घर के मुखिया से पहले बच्चों को देव विशुक्कणी के दर्शन कराये जाते हैं। नव वर्ष के दिन सबसे पहले देव के दर्शन करने का उद्देश्य अपने पूरे वर्ष को शुभ करने से जुड़ा हुआ है।

पूजा अर्चना का सामान

धार्मिक अनुष्ठान

विशु के दिन अनेक धार्मिक कर्मकाण्ड आयोजित किए जाते हैं। विशु के पहले उत्तरी केरल के मन्दिरों में 'ब्रैटम' का आयोजन होता है। ब्रैटम एक तरह से पुरुषों के द्वारा अपने इष्टदेव को रिझाने के लिए प्रार्थना है। इस आराधना में दो विभिन्न जातियों के लोग देवी और देवता का रूप धारण करके रंग–बिरंगे वस्त्र पहन कर मन्दिर के समक्ष नृत्य करते हैं। आकर्षक रंगों से रंगे उनके मुखोटे की छवि तथा नृत्य की लय के साथ 'छेंदा', ढोलों की तेज़ ध्वनि एक निराला समा बाँध देती है। विशु के दिन 'कनिकनल' अनुष्ठान केरल की महत्त्वपूर्ण धार्मिक परम्परा है।

कनिकनल की परम्परा

यह अनुष्ठान सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसका शाब्दिक अर्थ है, "प्रथम दर्शन"। कनिकनल रीति के अनुसार अनेक वस्तुओं का विधान है, जिन्हें शुभ की आशा रखने वाले व्यक्ति को प्रातः सर्वप्रथम देखना चाहिए। इन वस्तुओं में सम्मिलित हैं-पत्र–पुस्तक, आभूषण, स्वच्छ श्वेतवस्त्र, चावल या धान की कुछ मात्रा, कोन्ना, वृक्ष के पुष्प, आधा कटा सीताफल, नारियल तथा पीला खीरा। ये सभी वस्तुएँ एक बड़े पात्र में रखी जाती हैं। इस पात्र के पीछे लघु घंटियों से युक्त शीशा व माला धारण किए कृष्ण की मूर्ति रखी जाती है तथा उर्ध्व दिशा में उन्मुख तेल के दीपक, मूर्ति के निकट रखे जाते हैं। कनि की तैयारियाँ गृहलक्ष्मी एक रात पूर्व करती है। कनि के लिए सर्वप्रथम घर का मुखिया आता है तथा अन्य परिवारीजन उसके बाद आते हैं। बच्चों की आँखों पर पट्टी बाँधकर उन्हें कमरे से प्रातः सबसे पहले कनिकनल दिखाने के लिए लाया जाता है। विशुकनि को बाद में निर्धनों व ज़रूरत मंद लोगों में बाँटा जाता है। इस रीति के पीछे यह अटूट विश्वास है कि इस दिन सर्वप्रथम धन सम्पत्ति के दर्शन से वर्षभर धन-सम्पत्ति मिलती है।

विशु कैनितम

इस त्यौहार पर परिवार के छोटे बच्चों को कुछ नगद धन देने की भी परम्परा है। इसे "विशु कैनीतम" कहा जाता है। लोगों में मान्यता है कि यह कार्य भविष्य में उनके बच्चों की समृद्धि सुनिश्चित् करता है।

मन्दिर में विशुकनि

बहुत से लोग विशुकनि मन्दिर में देखना पसंद करते हैं। गुरुवयूर, अम्बलपूढ़ा व सबरीमाला के मन्दिरों में भारी भीड़ देखी जा सकती है। इन मन्दिरों में इस दिन विशेष प्रार्थनाएँ की जाती हैं। लोग मन्दिरों के प्रांगण में विशु से एक दिन पहले ही रात बिताते हैं, ताकि वे विशु के दिन सर्वप्रथम कनि को देख सकें। श्रद्धालु अपनी आँखें बन्द कर मन्दिर के कपाट खुलने की प्रतीक्षा करते हैं। द्वार खुलते ही वे सर्वप्रथम कनि पर ध्यान केन्द्रित करते हैं।

समारोह और स्वादिष्ट व्यंजन

गृहस्थियाँ "सदया" नामक भोज तैयार करती हैं। जिसे दोपहर के समय सभी लोग ग्रहण करते हैं। पकवान प्रायः कद्दू, आम, घिया, करेला, अन्य शाकाहारी वस्तुओं व फलों से बनाए जाते हैं। ये सभी वस्तुएँ इस ऋतु में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। लोग कोडिवस्त्रम् (नए कपड़े) भी इस दिन पहनते हैं। नृत्य, संगीत के बीच पटस्सु (पटाखे) बजाए जाते हैं।

विशुवेला

विशुवेला नववर्ष मेला है, जिसे उत्साह से मनाया जाता है। युवक–युवतियों का समूह चोच्झी के रूप में लुंगी व केले के पत्रों को पहन तथा अपने मुख को ढककर गाँव में घर घर–घर जाता है। ये लोग कुछ धनराशि एकत्रित करते हैं। विशु के दिन इन्हें अपने प्रदर्शन के लिए अच्छा इनाम मिल जाता है। इस धन को विशुवेला में खर्च किया जाता है।


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