विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस  

विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस
विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस
विवरण 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस' पूरे विश्व में फैली गम्भीर बीमारी 'हीमोफ़ीलिया' के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए मनाया जाता है।
मनाने की तिथि 17 अप्रैल
शुरुआत 1989
उद्देश्य इस दिवस को मनाने का उद्देश्य हीमोफ़ीलिया के प्रति लोगों में जागरुकता लाना है।
विशेष 'हीमोफ़ीलिया' रोग का पता सर्वप्रथम उस वक्त लगा, जब ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के वंशज एक के बाद एक इस बीमारी की चपेट में आने लगे। शाही परिवार के कई सदस्यों के हीमोफ़ीलिया से पीड़ित होने के कारण ही इसे 'शाही बीमारी' कहा जाने लगा था।
अन्य जानकारी 'हीमोफ़ीलिया' के प्रति जागरुकता लाने के लिए 1989 से इस दिवस की शुरुआत की गई। तब से हर साल 'वर्ल्ड फ़ेडरेशन ऑफ़ हीमोफ़ीलिया' के संस्थापक फ्रैंक कैनेबल के जन्मदिन 17 अप्रैल के दिन 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस मनाया जाता है।

विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस (अंग्रेज़ी: World Hemophilia Day) 17 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य हीमोफ़ीलिया रोग और रक्त बहने संबंधी अन्य बीमारियों के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना है। प्रत्येक वर्ष '17 अप्रैल' को 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस' के रूप में मनाया जाता है। हीमोफ़ीलिया रक्त से जुड़ी एक ख़तरनाक और जानलेवा बीमारी है। इस बीमारी में चोट लगने या किसी अन्य वजह से रक्त बहना शुरू होने पर बन्द नहीं होता, जिस कारण यह जानलेवा सिद्ध होती है।

इतिहास

'शाही बीमारी' कहे जाने वाले रोग 'हीमोफ़ीलिया' का पता सर्वप्रथम उस वक्त चला था, जब ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के वंशज एक के बाद एक इस बीमारी की चपेट में आने लगे। शाही परिवार के कई सदस्यों के हीमोफ़ीलिया से पीड़ित होने के कारण ही इसे 'शाही बीमारी' कहा जाने लगा था। पुरुषों में इस बीमारी सम्भावना सबसे अधिक होती है। इस समय विश्वभर में लगभग 50 हज़ार से ज़्यादा लोग इस रोग से पीड़ित हैं।[1]

जागरुकता

पूरे विश्व में इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए 17 अप्रैल को 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस' मनाया जाता है। 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस' का लक्ष्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना और सभी के लिए उपचार उपलब्ध कराना है। हीमोफ़ीलिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जो महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक होती है। इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति में ख़ून के थक्के आसानी से नहीं बन पाते हैं। ऐसे में जरा-सी चोट लगने पर भी रोगी का बहुत सारा ख़ून बह जाता है। दरअसल, इस बीमारी की स्थिति में ख़ून के थक्का जमने के लिए आवश्यक प्रोटीनों की कमी हो जाती है।

शुरुआत

इसके प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 1989 से 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस' मनाने की शुरुआत की गई। तब से हर साल 'वर्ल्ड फ़ेडरेशन ऑफ़ हीमोफ़ीलिया' (डब्ल्यूएफएच) के संस्थापक फ्रैंक कैनेबल के जन्मदिन 17 अप्रैल के दिन 'विश्व हीमोफ़ीलिया दिवस मनाया जाता है। फ्रैंक की 1987 में संक्रमित ख़ून के कारण एड्स होने से मौत हो गई थी। डब्ल्यूएफएच एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जो इस रोग से ग्रस्त मरीजों का जीवन बेहतर बनाने की दिशा में काम करता है।

हीमोफ़ीलिया

हीमोफ़ीलिया रक्त से जुड़ी ख़तरनाक बीमारी है। इस बीमारी में चोट लगने या किसी अन्य वजह से रक्त का बहना शुरू तो हो जाता है, लेकिन फिर उसे रोकना मुश्किल हो जाता है। अलग-अलग मरीजों में रोग की गंभीरता में अंतर होता है। कुछ मरीजों में रक्त के जमने की क्षमता कम होती है, जबकि बीमारी बिगड़ने पर यह बिल्कुल समाप्त हो जाती है। यह बीमारी लाइलाज जरूर है, पर सही इलाज द्वारा नियंत्रित की जा सकती है। इस रोग का एक कारण रक्त प्रोटीन की कमी बताई जाती है, जिसे 'क्लॉटिंग फैक्टर' कहा जाता है। इस फैक्टर के कारण ही बहते हुए रक्त का थक्का जमता है और ख़ून बहना रुकता है।[1]

प्रकार

हीमोफ़ीलिया दो प्रकार का होता है। इनमें से एक हीमोफ़ीलिया 'ए' और दूसरा हीमोफ़ीलिया 'बी' है। हीमोफ़ीलिया 'ए' सामान्य रूप से पाई जाने वाली बीमारी है। इसमें रक्त में थक्के बनने के लिए आवश्यक 'फैक्टर 8' की कमी हो जाती है। हीमोफ़ीलिया 'बी' में ख़ून में 'फैक्टर 9' की कमी हो जाती है। पांच हज़ार से दस हज़ार पुरुषों में से एक के हीमोफ़ीलिया 'ए' ग्रस्त होने का खतरा रहता है, जबकि 20,000 से 34,000 पुरुषों में से एक के हीमोफ़ीलिया 'बी' ग्रस्त होने का खतरा रहता है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

महिलाओं के इस बीमारी से ग्रस्त होने का खतरा बहुत कम होता है। वे ज्यादातर इस बीमारी के लिए जिम्मेदार आनुवांशिक इकाइयों की वाहक की भूमिका निभाती हैं। वर्तमान में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस रोग से ग्रस्त 70 प्रतिशत मरीजों में इस बीमारी की पहचान तक नहीं हो पाती और 75 प्रतिशत रोगियों का इलाज नहीं हो पाता। इसकी वजह लोगों के पास स्वास्थ्य जागरुकता की कमी और सरकारों की इस बीमारी के प्रति उदासीनता तो है ही साथ ही एक महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि इस बीमारी की पहचान करने की तकनीक और इलाज महंगा है। परिणामस्वरूप इस बीमारी से ग्रस्त ज्यादातर मरीज बचपन में ही मर जाते हैं और जो बचते हैं, वे विकलांगता के साथ जीवनयापन करने को मजबूर होते हैं।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 हीमोफ़ीलिया (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 09 अप्रैल, 2014।

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