विष्टि व्रत  

  • भारत में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित हिन्दू धर्म का एक व्रत संस्कार है।
  • करणों का वर्णन 'काल' के अंतर्गत किया गया है। दो प्रकार के हैं- चर (चलायमान) एवं स्थिर।
  • चर करण सात हैं, जिनमें विष्टि भी परिगणित है।[1] विष्टि एक तिथि का अर्धांश है।
  • ज्योतिष के ग्रन्थों ने इसे कुरूप राक्षसी रूप में माना है।
  • विष्टि में 30 घटिकाएँ होती हैं, जो कि असमान रूप में उसके मुख, गला, ह्दय, नाभि, कटि एवं पूँछ में वितरित की गयी हैं।[2]
  • हेमाद्रि, कालनिर्णय, स्मृतिकौस्तुभ[3] ने इसे सूर्य की पुत्री, शनि की बहन माना है। उसका मुख गधे का है, उसके तीन पाँव हैं, आदि।
  • विष्टि सामान्यत: नाशकारिणी है और उसे शुभ कृत्यों के लिए त्याज्य ठहराया गया है।
  • किन्तु इसका काल शत्रुओं के नाश एवं विष देने के लिए उपयुक्त माना गया है।[4]
  • यह व्रत विष्टि दिन पर करना चाहिए।
  • किन्तु यदि विष्टि रात्रि में हो तो दो दिनों तक एकभक्त रहना चाहिए।
  • देवों एवं पितरों की पूजा के उपरान्त दर्भ घास से निर्मित विष्टि प्रतिमा का पुष्पों आदि से पूजा करनी चाहिए।
  • कृशर (चावल, मटर एवं मसाले से बनी खिचड़ी) का नैवेद्य, काले वस्त्र, काली गाय एवं काले कम्बल का दान करना चाहिए।
  • विष्टि एवं भद्रा का अर्थ एक ही है।[5]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बृहत्संहिता (99|1)।
  2. क्रम से 5, 1, 11, 4, 6 एवं 3 घटिकाएँ
  3. हेमाद्रि (व्रतखण्ड 2, 719-724, भविष्योत्तरपुराण से उद्धरण); कालनिर्णय (330), स्मृतिकौस्तुभ (565-566
  4. बृहत्संहिता 99|4
  5. हेमाद्रि (व्रतखण्ड 2, 719-724); कालनिर्णय (330); स्मृतिकौस्तुभ (565-568)।

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