वृक्षोत्सवविधि  

  • भारत में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित हिन्दू धर्म का एक व्रत संस्कार है।
  • वृक्षारोपण को अती महत्ता प्राप्त थी।
  • मत्स्य पुराण[1] में वृक्ष के उत्सव की विधि दी हुई है, संक्षेप में यों है–वृक्षोत्सवविधि में वाटिका में वृक्षों पर सर्वोषधियुक्त जल छिड़का जाता है, उनके चारों ओर वस्त्र बाँधे जाते हैं।
  • स्वर्णिम सुई से वृक्षों में छेद किया जाता है (कर्ण भेदन के समान)।
  • स्वर्णिम शलाका से अंजन लगाया जाता है।
  • वृक्षों के थालों पर 7 या 8 स्वर्णिम फल रखे जाते हैं।
  • वृक्षों के तलों में सोने के टुकड़ों से युक्त घट रखे जाते हैं।
  • इन्द्र, लोकपालों एवं वनस्पति का होम किया जाता है।
  • वृक्षों के बीच से श्वेत वस्त्रों, स्वर्णाभूषणों से युक्त तथा सींगों के पोरों पर स्वर्ण से सुसज्जित गायें ले जायी जाती हैं।
  • वृक्षों का स्वामी पुरोहितों की गोदान, स्वर्णिम सिकड़ियाँ, अँगूठियाँ, वस्त्र आदि देता है और दिनों तक दूध से ब्रह्मभोज करता है।
  • जौ, काले तिल, सरसों एवं पलाश की समिधा से होम एवं चौथे दिन उत्सव किया जाता है।
  • कर्ता की सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • मत्स्य पुराण[2] में ऐसा आया है कि एक पुत्र दस गहरे जलाशयों के तथा एक वृक्ष का रोपण दस पुत्रों के समान है।
  • वराह पुराण[3] में ऐसा कहा गया है कि एक अच्छा पुत्र कुल की रक्षा करता है।
  • उसी प्रकार पुष्पों एवं फलों से लदा एक वृक्ष स्वामी को नरक में गिरने से बचाता है, जो व्यक्ति 5 आम्र के वृक्ष लगाता है वह नरक में नहीं जाता है।
  • विष्णुधर्मोत्तरपुराण[4] ने वृक्षों के विषय में कहा है कि–"एक व्यक्ति के द्वारा पालित वृक्ष वही कार्य करता है जो एक पुत्र करता है, वह अपने पुष्पों से देवों को प्रसन्न करता है, छाया से यात्रियों को, अपने फलों से मनुष्यों को संतुष्ट करता है। वृक्ष के रोपने वाले को नरक में नहीं जाना पड़ता।"

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मत्स्यपुराण 59|1-20, पद्म पुराण 5|24|192-211
  2. मत्स्य पुराण 154-512
  3. वराह पुराण 172|36-37
  4. विष्णुधर्मोत्तरपुराण 3|297-13

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