वेणु का विनाश  

ध्रुव जब श्रीहरि के लोक में जाने लगे, तो वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सौंप गए थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र का नाम 'कल्प' था। बहुत से लोग उसे 'उत्कल' भी कहते थे। उत्कल की सांसारिक सुखों और राज्य में बिल्कुल रुचि नहीं थी। वह विरक्त था, समदर्शी था। उसे अपने और दूसरों में बिलकुल भेद मालूम नहीं होता था। वह अपने ही भीतर समस्त प्राणियों को देखता था। अतः उसने राजसिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया। जब ध्रुव के ज्येष्ठ पुत्र ने राजसिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया तो ध्रुव का कनिष्ठ पुत्र राजसिंहासन पर बैठा। वह बड़ा धर्मात्मा और बुद्धिमान था। उसने बहुत दिनों तक राज्य किया। उसके राज्य में चारों ओर शांति थी। प्रजा को बड़ा सुख था।

वत्सर के ही वंश में एक ऐसा राजा उत्पन्न हुआ जो धर्म की प्रतिमूर्ति था। वह सत्यव्रती और बड़ा शूरवीर था। जिस प्रकार वसंत ऋतु में प्रकृति फूली, फली रहती है, उसी प्रकार उस राजा के राज्य में प्रजा फूली और फली रहती थी। उस राजा का नाम अंग था। अंग की कीर्ति−चांदनी चारों ओर छिटकी हुई थी। छोटे−बड़े सभी उसके यश का गान करते थे। वह पुण्यात्मा तो था ही, बड़ा प्रजापालक भी था। उसकी प्रजा उसका आदर उसी प्रकार करती थी, जिस प्रकार लोग देवताओं का आदर करते हैं।

एक बार अंग ने एक बहुत बड़े यज्ञ की रचना की। यज्ञ में बड़े−बड़े ऋषि−मुनि और विद्वान ब्राह्मण बुलाए गए थे। यज्ञ के लिए पवित्र स्थानों से चुन−चुनकर सामग्रियाँ मंगायी गयीं थीं। तीर्थस्थानों से जल मंगाया गया था। शुद्ध और पवित्र लकड़ियाँ इकट्ठी की गई थीं। किंतु विद्वान ब्राह्मणों ने वेदमन्त्रों के साथ देवताओं को आहुतियाँ दीं तो देवताओं ने उन आहुतियों को लेना अस्वीकार कर दिया। केवल यही नहीं, प्रार्थनापूर्वक बुलाए जाने पर भी देवतागण भाग लेने के लिए नहीं आए। विद्वान ब्राह्मणों ने चिंतित होकर कहा, 'महाराज! यज्ञ की सामग्रियाँ पवित्र हैं, जल भी शुद्ध है और यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण भी शुद्ध तथा चरित्रनिष्ठ हैं किंतु फिर भी देवगण आहुतियों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, मन्त्रों से अभिमन्त्रित किए जाने पर भी अपना भाग लेने के लिए नहीं आ रहे हैं।' विद्वान ब्राह्मणों के कथन को सुनकर महाराज अंग चिंतित और दुःखी हो उठे। उन्होंने दुःख भरे स्वर में कहा, 'पूज्य ब्राह्मणों, यह तो बड़े दुःख की बात है। क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है या मुझसे कोई दूषित कर्म हुआ है? मैंने तो अपनी समझ में आज तक कोई ऐसा कार्य किया नहीं।'

विद्वान ब्राह्मणों ने उत्तर में कहा, 'आप तो बड़े धर्मात्मा और पुण्यात्मा हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि आपके द्वारा कभी कोई पाप कर्म हुआ होगा। इस जन्म में तो आपने कभी कोई दूषित कर्म किया नहीं। हो सकता है, पूर्वजन्म में आपने कोई पाप कर्म किया हो। मनुष्य को पूर्वजन्म में किए हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल भी भोगना पड़ता है।' महाराज अंग ने दुःख के साथ निवेदन किया, 'यज्ञ मंडप में बड़े−बड़े विद्वान ब्राह्मण और ऋषि व मुनि एकत्र हैं। यहाँ ऐसे भी ऋषि और मुनि हैं जो तीनों कालों के ज्ञाता हैं। मेरी प्रार्थना है कि वे मुझे अवगत कराएं, इस जन्म में या पूर्वजन्म में मुझसे कौन−सा दूषित कर्म हुआ है?' महाराज अंग की प्रार्थना को सुनकर ऋषिगण विचारों में डूब गए। कुछ क्षणों के पश्चात् ऋषियों ने कहा, 'महाराज, इस जन्म में या पूर्वजन्म में आपसे कोई पाप कर्म नहीं हुआ है। सच बात तो यह है कि आप पुत्रहीन हैं। जो पुत्रहीन होता है, देवगण उसके यज्ञ की आहुतियाँ स्वीकार नहीं करते। अतः यदि आप देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ करें। जब तक आप पुत्र प्राप्त नहीं कर लेंगे, देवगण आपकी आहुतियों को स्वीकार नहीं करेंगे।' ऋषियों और मुनियों की सलाह से महाराज अंग ने 'पुत्रेष्टि यज्ञ' किया। यज्ञकुंड में एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ जो अपने हाथों में खीर का पात्र लिए हुए था। उसने खीर के पात्र को महाराज अंग की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'महाराज, पात्र की खीर को अपनी रानी को खिला दीजिए। आपको अवश्यमेव पुत्र की प्राप्ति होगी।'

दिव्य पुरुष अंग को खीर का पात्र देकर अदृश्य हो गया। अंग की प्रसन्नता की सीमा नहीं थी। उन्होंने पात्र की खीर को अपनी रानी को खिला दिया। रानी गर्भवती हुईं। उन्होंने समय पर एक बालक को जन्म दिया। ज्योतिषियों ने बालक की कुण्डली बनाकर, उसके ग्रहों के अनुसार उसका नाम वेणु रखा। वेणु का अर्थ होता है − बांस। जहाँ बांस पैदा होता है, वहाँ दूसरे पौधे पैदा नहीं होते। यों भी कहा जा सकता है कि, बांस दूसरे पौधों को उगने नहीं देता है। बांसों की रगड़ से कभी−कभी आग लग जाती है तो सारे बांस अपनी ही आग में जल जाया करते हैं व दूसरों को भी जला देते हैं। वेणु की कुण्डली में भी इसी प्रकार के ग्रह पड़े थे। वेणु धीरे−धीरे बड़ा हुआ। वह जब बड़ा हुआ, तो अंग के उलटे रास्ते पर चलने लगा। जुआ खेलने लगा, मद्यपान करने लगा और परायी स्त्रियों की लज्जा को लूटने लगा। उसके अत्याचारों से प्रजा कांप उठी। अंग के कानों में जब वेणु के बुरे कर्मों के समाचार पड़े, तो वे बड़े दुःखी हुए। उन्होंने वेणु को समझाने का प्रयत्न किया, किंतु वह क्यों मानने लगा? उसकी जन्मकुण्डली में तो ग्रह ही बुरे पड़े थे। किसी ने ठीक ही कहा है−

फूलहि फलहिं न बेंत, जदपि सुधा बरसहिं जलद।
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं विरंच सम।।

अंग के बहुत समझाने पर भी जब वेणु ने बुरे कर्मों का परित्याग नहीं किया, तो वे बड़े दुःखी हुए। वे सब कुछ छोड़कर तप करने के लिए वन में चले गए। मनुष्य का जब कोई बस नहीं चलता, तो वह ईश्वर को छोड़कर और किसी का सहारा नहीं लेता। महाराज के चले जाने पर वेणु राजसिंहासन पर आसीन हुआ। वह अतिचारी और अविचारी तो पहले से ही था, जब राजसिंहासन पर बैठा, तो उसके बुरे विचारों को पंख लग गए। वह अपने आप को सर्वेश्वर और अखिलेश्वर समझने लगा। उसने अपने राज्य में चारों ओर आदेशपत्र प्रचारित किया− 'कोई भी मनुष्य यज्ञ न करे, पूजा−पाठ न करे, ईश्वर का नाम न ले, ईश्वर के गुणों का गुणगान न करे। जो मनुष्य ऐसा करेगा, उसे दण्ड दिया जाएगा। प्रत्येक प्रजाजन को ईश्वर की जगह पर वेणु की ही पूजा करनी चाहिए। वेणु के ही यश−गुणों का गान करना चाहिए, क्योंकि वेणु ही परमात्मा है, अखिलेश्वर है।' वेणु की घोषणा ने सारे राज्य में हलचल उत्पन्न की दी। किंतु कोई कर क्या सकता था? उसके सैनिक और सिपाही राज्य में चारों ओर घूम−घूमकर उसकी आज्ञा का पालन करवा रहे थे। जो मनुष्य उसके आदेश का उल्लंघन करता था, उसे तलवार के घाट उतार दिया जाता था, उसके घर को जला दिया जाता था। वेणु और उसके सिपाहियों के अत्याचारों से चारों ओर हाहाकार पैदा हो उठा, दुःख और पीड़ा के बादल छा गए।

राज्य में रहने वाले ऋषि, मुनि और ब्राह्मण चिंतित हो उठे। वे वेणु को समझाने के लिए उसकी सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने वेणु को समझाते हुए कहा, 'महाराज, आप जो कुछ कर रहे हैं, वह आपके पूर्वजों के विपरीत है। आपके पूर्वजों में स्वयंभू मनु और ध्रुव प्रजा को पुत्रवत मानते थे। वे प्रजा का पालन करना ही अपना सबसे बड़ा धर्म समझते थे। आपके पूर्वज ईश्वरानुरागी थे। वे अपने को ईश्वर का तुच्छ सेवक समझते थे। जो राजा प्रजा का पालन नहीं करता, उसे नर्क की यातना भोगनी पड़ती है।' किंतु वेणु के हृदय पर ऋषियों और मुनियों के कथन का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। वह उनके कथन के उत्तर में बोला, 'ऋषियों, राजा के शरीर में देवता वास करते हैं। अतः वही सर्वश्रेष्ठ है। प्रजा को उसी का गुणानुवाद करना चाहिए, उसी को सर्वेश्वर मानना चाहिए। मैंने जो कुछ किया है, ठीक ही किया है। तुम सबको मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए। मेरे बताये हुए मार्ग पर चलना चाहिए।' वेणु का खरा उत्तर सुनकर ऋषियों और मुनियों ने सोचा, वेणु के हृदय पर किसी भी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। मनुष्य जब उन्मत्त हो जाता है, तो वह अपने हाथों से ही अपना विनाश कर डालता है।

ऋषि और मुनिगण दुःखी होकर वन में चले गए। वेणु निडर होकर पापाचार से खेलने लगा। अत्याचार का व्यापार करने लगा। प्रजा उसके अत्याचारों से दुःखी होकर करुण क्रंदन करने लगी, चीत्कार करने लगी, सकरुण स्वरों में भगवान को पुकारने लगी। प्रजा की पुकार ऋषियों के कर्णकुहरों में पड़ी। ऋषियों ने एकत्र होकर सोचा, वेणु जब तक जीवित रहेगा, उसका अत्याचार बंद न होगा। अतः उसे मार डालना चाहिए। अत्याचारी और अधर्मी को मार डालने से पाप नहीं लगता। ऋषियों और मुनियों ने अपने मन्त्रों की शक्ति से वेणु को मृत्यु के मुख में पहुँचा दिया। जो अत्याचार करता है, जो अधर्म के पथ पर चलता है, एक न एक दिन सज्जनों के हाथों से वेणु के समान ही मारा जाता है।

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=वेणु_का_विनाश&oldid=611576" से लिया गया