वेद का स्वरूप  

भारतीय मान्यता के अनुसार वेद सृष्टिक्रम की प्रथम वाणी है।[1] फलत: भारतीय संस्कृतिका मूल ग्रन्थ वेद सिद्ध होता है। पाश्चात्य विचारकों ने ऐतिहासिक दृष्टि अपनाते हुए वेद को विश्व का आदि ग्रन्थ सिद्ध किया। अत: यदि विश्वसंस्कृति का उद्गम स्तोत्र वेद को माना जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं है।

वेद शब्द और उसका लक्षणात्मक स्वरूप

शाब्दिक विधा से विश्लेषण करने पर वेद शब्द की निष्पत्ति 'विद-ज्ञाने' धातु से 'घञ्' प्रत्यय करने पर होती है।

  • विचारकों ने कहा है कि-जिसके द्वारा धर्मादि पुरुषार्थ-चतुष्टय-सिद्धि के उपाय बतलाये जायँ, वह वेद है।[2]
  • आचार्य सायण ने वेद के ज्ञानात्मक ऐश्वर्य को ध्यान में रखकर लक्षित किया कि- अभिलषित पदार्थ की प्राप्ति और अनिष्ट-परिहार के अलौकिक उपायको जो ग्रन्थ बोधित करता है, वह वेद है।[3] यहाँ यह ध्यातव्य है कि आचार्य सायणने वेद के लक्षण में 'अलौकिकमुपायम्' यह विशेषण देकर वेदों की यज्ञमूलकता प्रकाशित की है।
  • आचार्य लौगाक्षि भास्कर ने दार्शनिक दृष्टि रखते हुए- अपौरुषेय वाक्य को वेद कहा है।[4]
  • आचार्य उदयन ने भी कहा है कि- जिसका दूसरा मूल कहीं उपलब्ध नहीं है और महाजनों अर्थात् आस्तिक लोगों ने वेद के रूप में मान्यता दी हो, उन आनुपूर्वी विशिष्ट वाक्यों को वेद कहते हैं।[5]
  • आपस्तम्बादि सूत्रकारों ने वेद का स्वरूपावबोधक लक्षण करते हुए कहा है कि- वेद मन्त्र और ब्राह्मणात्मक हैं।[6]
  • आचार्यचरण स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज ने दार्शनिक एवं याज्ञिक दोनों दृष्टियों का समन्वय करते हुए वेद का अद्भुत लक्षण इस प्रकार उपस्थापित किया है-' शब्दातिरिक्तं शब्दोपजीविप्रमाणातिरिक्तं च यत्प्रमाणं तज्जन्यप्रमितिविषयानतिरिक्तार्थको यो यस्तदन्यत्वे सति आमुष्मिकसुखजनकोच्चारणकत्वे सति जन्यज्ञानाजन्यो यो प्रमाणशब्दस्तत्त्वं वेदत्वम्।'[7]
  • उपर्युक्त लक्षणों की विवेचना करने पर यह तथ्य सामने आता है कि- ऐहकामुष्मिक फलप्राप्ति के अलौकिक उपाय का निदर्शन करने वाला अपौरुषेय विशिष्टानुपूर्वीक मन्त्र-ब्राह्मणात्मक शब्दराशि वेद है।

वेद के भाग

वेद के दो भाग मन्त्र और ब्राह्मण-

  • आचार्यों ने सामान्यतया मन्त्र और ब्राह्मण-रूप से वेदों का विभाजन किया है।[8]
  • इसमें मन्त्रात्मक वैदिक शब्दराशि का मुख्य संकलन संहिता के नाम से प्राचीन काल से व्यवहृत होता आया है।
  • संहितात्मक वैदिक शब्दराशि पर ही पदपाठ, क्रमपाठ एवं अन्य विकृतिपाठ होते हैं।
  • यज्ञों में संहितागत मन्त्रों का ही प्रधान रूप से प्रयोग होता है।[9]
  • आचार्य यास्क के अनुसार 'मन्त्र' शब्द मननार्थक 'मन्' धातु से निष्पन्न है।[10]
  • पाञ्चरात्र-संहिता के अनुसार मनन करने से जो त्राण करते हैं, वे मन्त्र हैं।[11]अथवा मत- अभिमत पदार्थ के जो दाता हैं, वे मन्त्र कहलाते हैं।
  • महर्षि जैमिनि ने मन्त्र का लक्षण करते हुए कहा है- 'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या।'
  • इसी को स्पष्ट करते हुए आचार्य माधव का कथन है कि-याज्ञिक विद्वानों का 'यह वाक्य मन्त्र है'-ऐसा समाख्यान(- नाम निर्देश) मन्त्र का लक्षण है। तात्पर्य यह है कि याज्ञिक लोग जिसे मन्त्र कहें, वही मन्त्र है। वे याज्ञिक लोग अनुष्ठान के स्मारक आदि वाक्यों के लिये मन्त्र शब्द का प्रयोग करते हैं।[12]
  • आचार्य लौगाक्षि भास्करने, अनुष्ठान (प्रयोग)- से सम्बद्ध (समवेत) द्रव्य-देवतादि (अर्थ) का जो स्मरण कराते हैं, उन्हें मन्त्र कहा है। [13] इस प्रकार तत्तत् वैदिक कर्मों के अनुष्ठान काल में अनुष्ठेय क्रिया एवं उसके अंगभूत द्रव्य देवतादिका प्रकाशन (स्मरण) ही मन्त्र का प्रयोजन है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि शास्त्रकारों के अनुसार 'प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्व' मन्त्रों का दृष्ट प्रयोजन है, अत: यज्ञकाल में मन्त्रों का उच्चारण अदृष्ट प्रयोजक है- यह कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि दृष्ट फल की सम्भावना के विद्यमान रहने पर अदृष्ट फल की कल्पना अनुचित होती है।[14] यहाँ यह प्रश्न उठता है कि मन्त्रों का जो अर्थ-स्मरण-रूप दृष्ट प्रयोजन बतलाया गया है, वह प्रकारान्तर से अर्थात् ब्राह्मण-वाक्यों से भी प्राप्त हो जाता है; फिर तो मन्त्रोच्चारण व्यर्थ हुआ? इस आक्षेप का समाधान शास्त्रकारों ने नियम- विधि के आश्रयण से किया है। उनका पक्ष है कि 'स्मृत्वा कर्माणि कुर्वीत' इस विधायक वाक्य से तत्तत्कर्मों के अनुष्ठानकाल में विहित स्मरण के लिये उपायान्तर के अवलम्बन से तत्तत्प्रकरणपठित मन्त्रों का वैयर्थ्य आपतित होता, अत: 'मन्त्रैरेव स्मृत्वा कर्माणि कुर्वीत' (मन्त्रों से ही स्मरण करके कर्म करना चाहिये,)- यह नियम विधि द्वारा स्वीकृत किया जाता है।इसी प्रसंग को आचार्य यास्क ने अपने निरूक्त ग्रन्थ में उठाकर उसके समाधान में एक व्यावहारिक युक्ति प्रस्तुत की है। उनका तर्क है कि मनुष्यों की विद्या (ज्ञान) अनित्य है, अत: अविगुण कर्म के द्वारा फलसम्प्राप्ति –हेतु वेदों में मन्त्र- व्यवस्था है।[15] तात्पर्य यह है कि इस सृष्टि में प्रत्येक मनुष्य बुद्धि ज्ञान, शब्दोच्चारण एवं स्वभावादि में एक-दूसरे से नितान्त भिन्न एवं न्यूनाधिक है। ऐसी स्थिति में यह सर्वथा सम्भव है कि सभी मनुष्य विशुद्धतया एक-जैसा कर्मानुष्ठान नहीं कर सकते। यदि कर्मानुष्ठान एक-रूप में नहीं किया गया तो वह फलदायक नहीं होगा- इस दुरवस्था को मिटाने के लिये वैदिक मन्त्रों के द्वारा कर्मानुष्ठान का विधान किया गया। चूँकि वेदों में नियतानुपूर्वी हैं एवं स्वर वर्णादि की निश्चित उच्चारण-विधि है, अत: बुद्धि, ज्ञान एवं स्वभाव में भिन्न रहने पर भी प्रत्येक मनुष्य उसे एकरूपतया गुरुमुखोच्चारणानुच्चारण विधि से अधिगत कर उसी तरह कर्म में प्रयोग करेगा, जिसके फलस्वरूप सभी को निश्चित फल की प्राप्ति होगी। इस प्रकार मन्त्रों के द्वारा ही कर्मानुष्ठान किया जाना सर्वथा तर्कसंगत एवं साम्यवादी व्यवस्था है। याज्ञिक दृष्टि से मन्त्र चार प्रकार के होते हैं-
  1. करण मन्त्र,
  2. क्रियमाणानुवादि मन्त्र,
  3. अनुमन्त्रण मन्त्र और
  4. जपमन्त्र।

इनमें जिस मन्त्र के उच्चारणानन्तर ही कर्म किया जाता है, वह करण मन्त्र' है। यथा-याज्या पुरोऽनुवाक् आदि। कर्मानुष्ठान के साथ-साथ जो मन्त्र पढ़ा जाता है, वह 'क्रियमाणानुवादि मन्त्र' होता है। यथा-युवा सुवासा0 आदि। जब यज्ञ में यूप-संस्कार किया जाता है तभी यह मन्त्र पढ़ा जाता है। कर्म के ठीक बाद जो मन्त्र पढ़ा जाता है, वह 'अनुमन्त्रण मन्त्र' कहलाता है। यथा- एको मम एका तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि0 आदि। यह मन्त्र द्रव्यत्याग रूप याग किये जाने के ठीक बाद यजमान द्वारा पढ़ा जाता है। इनके अतिरिक्त जो 'मयीदमिति यजमानो जपति'[16] इत्यादि वाक्यों द्वारा विहित सन्निपत्योपकारक[17]

मन्त्रों कें लक्षण

  • मन्त्रों कें लक्षण के सम्बन्ध में वस्तु-स्थिति का विचार किया जाय तो ज्ञात होता है। कि कोई भी लक्षण सटीक नहीं है। ऐसा इसलिये है कि वैदिक मन्त्र नानाविध हैं। [18]
  • ही कारण है कि आपस्तम्बादि आचार्यों ने ब्राह्मण भाग एवं अर्थवाद का लक्षण करने के अनन्तर कह दिया- 'अतोऽन्तये मन्त्रा:'[19] अर्थात इनके अतिरिक्त सभी मन्त्र हैं।
  • विधिभाग-मन्त्रातिरिक्त वेद-भाग 'ब्राह्मण' पद से अभिहित किया जाता है। ब्राह्मण शब्द 'ब्रह्मन्' शब्द से 'अण्' प्रत्यय करने पर नपुंसक लिंग में वेदराशि के अभिधायक अर्थ में सिद्ध होता है।
  • आचार्य जैमिनि ने ब्राह्मण का लक्षण करते हुए कहा है कि – मन्त्र से बचे हुए भाग में 'ब्राह्मण' शब्द का व्यवहार जानना चाहिये।[20] *आचार्य भट्ट-भास्कर के अनुसार कर्म और कर्म में प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों के व्याख्यान- ग्रन्थ ब्राह्मण हैं। [21]
  • म0म0 विद्याधर शर्मा जी के अनुसार- चारों वेदों के मन्त्रों के कर्मों में विनियोजक, कर्मविधायक, नानाविधानादि इतिहास- आख्यानबहुल ज्ञान- विज्ञानपूर्ण वेदभाग ब्राह्मण है [22]

ब्राह्मण के दो भेद हैं

  1. विधि और
  2. अर्थवाद।
  • आचार्य आपस्तम्बने दोनों का भेद प्रदर्शित करते हुए कहा है- कर्म की ओर प्रेरित करने वाली विधियाँ ब्राह्मण है तथा ब्राह्मण का शेष भाग अर्थवाद है।[23]
  • आचार्य लौगाक्षि भास्कर के अनुसार अज्ञात अर्थ को अवबोधित करानेवाले वेदभाग को विधि कहते हैं। [24] यथा- 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम:' अर्थात स्वर्गरूपी फल की प्राप्ति करने के लिये अग्निहोत्र करना चाहिये-यह विधिवाक्य, अन्य प्रमाण से अप्राप्त स्वर्ग फलयुत होम का विधान करता है, अत: अज्ञातार्थ-ज्ञापक है।
  • आचार्य सायण ने विधि के दो भेद बतलाये हैं- 1- अप्रवृत्तप्रवर्तन-विधि और 2- अज्ञातार्थ-ज्ञापन-विधि। इनमें 'आग्नवैष्णवं पुरोडाशं निर्वर्णनादीक्षणीयम्' इत्यादि कर्मकाण्डगत विधियाँ अप्रवृत्त की ओर प्रवृत्त करने वाली हैं। 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्' इत्यादि ब्रह्मकाण्डगत विधियाँ प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से अज्ञात विषय का ज्ञान कराने वाली हैं।
  • यहाँ यह ध्यातव्य है कि आचार्य लौगाक्षि भास्कर कर्मकाण्ड एवं ब्रह्मकाण्डगत सभी विधियों को अज्ञातार्थ ज्ञापन मानते हैं, किंतु आचार्य सायण ने सूक्ष्म दृष्टि अपनाते हुए कर्मकाण्डगत विधियों को 'अप्रवृत्तवर्तन-विधि' कहा और ब्रह्मकाण्डगत विधियों को 'अज्ञातार्थ-ज्ञापन-विधि' माना।[25]
  • मीमांसादर्शन में याज्ञिक विचार की दृष्टि से विधि- भाग के चार भेद माने गये हैं-
  1. उत्पत्तिविधि,
  2. गुणविधि या विनियोग विधि,
  3. अधिकारविधि और
  4. प्रयोगविधि। इनमें जो वाक्य 'यह कर्म इस प्रकार करना चाहिये' एवंविध कर्मस्वरूप-मात्र के अवबोधन में प्रवृत्त हैं, वे 'उत्पत्तिविधि' कहे जाते हैं, यथा-'अग्निहोत्रं जुहोति'। जो उत्पत्तिविधि से विहित कर्मसम्बन्धी द्रव्य और देवता के विधायक हैं, वे 'गुणविधि' ('विनियोगविधि') कहे जाते हैं। यथा- 'दध्रा जुहोति'। जो उन-उन कर्मों में किस का अधिकार है तथा किस फल के उद्देश्य से कर्म करना चाहिये- यह बतलाते हैं, वे 'अधिकारविधि' कहे जाते हैं। यथा- 'यस्याहिताग्नेरग्निर्गृहान् दहेत् सोऽग्नये क्ष्मावतेऽष्टाकपालं निर्वपेत्'। जो कर्मों के अनुष्ठानक्रमादिका बोधन कराते हैं, वे 'प्रयोगविधि' हैं। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि प्रयोगविधि के वाक्य साक्षात उपलब्ध नहीं होते, अपितु प्रधान वाक्य (दर्शपूर्णमासाभ्याम्)- के साथ अंग-वाक्यों (सामधेयजति0)- की एकवाक्यता होकर कल्पित वाक्य (प्रमाणानुयाजादिभिरूपकृतवद्भ्यां दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत) ही प्रयोगविधि का परिचायक होता है।

अर्थवाद

  • आचार्य आपस्तम्ब ने ब्राह्मण (कर्म की ओर प्रवृत्त करने वाली विधियों)- से अतिरिक्त को शेष अवशिष्ट अर्थवाद कहा हैं।[26]
  • अर्थसंग्रहकार ने अर्थवाद का लक्षण करते हुए कहा है- प्रशंसा अथवा निन्दापरक वाक्य को अर्थवाद कहते हैं।[27] यथा- वायुर्वैं क्षेपिष्ठा देवता। स्तेनं मन: अनृतवादिनी वाक्, आदि।
  • अर्थवाद-वाक्यों को लेकर पाश्चात्य वेद-विचार कों एवं कतिपय भारतीय विचारकों ने वेद के प्रामाण्य एवं उसकी महत्ता पर तीखे प्रहार किये हैं। इसके मूल में आलोचकों का भारतीय चिन्तन-दृष्टि से असम्पर्कित रहना है। भारतीय चिन्तन-दृष्टि (मीमांसा)- में अर्थवाद विधेय अर्थ की प्रशंसा करता है। तथा निषिद्ध अर्थ की निन्दा। किंतु इस कार्य (प्रशंसा और निन्दा)- में अर्थवाद मुख्यार्थद्वारा अपने तात्पर्यार्थ की अभिव्यक्ति नहीं करता, अपितु शब्द की लक्षणा शक्ति का आश्रय ग्रहण करता है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि मीमांसक-दृष्टि से समस्त वेद क्रियापरक है[28] तथा यागादि क्रिया द्वारा ही अभीष्ट-प्राप्ति एवं अनिष्टका परिहार किया जा सकता है। यत: 'स्वाध्यायोऽध्येतव्य:' इस विधान से वेद के अन्तर्गत ही अर्थवाद भी है, अत: उनको भी क्रियापरक मानना उचित है। जैसा कि पहले कहा गया है कि अर्थवाद का प्रयोजन विधेयकी प्रशंसा एवं निषिद्ध की निन्दा में प्रकट होता है। विधान एवं निषेध क्रिया का ही होता है, अत: परम्परया अर्थवाद-वाक्य क्रिया (याग या धर्म) परक होते हैं, अतएव उनका प्रामाण्य एवं उपादेयता सर्वथा सिद्ध है। इसी बात को आचार्य जैमिनि ने इन शब्दों में कहा है- विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्यु:।[29] उन्नीसवीं शती के पूर्वार्ध के बाद से पाश्चात्य नव्य वेदार्थ- विचार कों- बर्गाइन आदि ने भारतीय चिन्तन की इस दृष्टि को समझा तथा उसके आलोक में नये सिरे से वेदार्थ-विचार में दृष्टि डाली।
  • प्राशस्त्य और निन्दा से सम्बन्धित अर्थवाद-वाक्य क्रमश: विधिशेष एवं निषेधशेष-रूप से अभिहित किये गये हैं।[30] विधि अर्थात विधायक वाक्य, शेष- अर्थवाद-वाक्य दोनों मिलकर एक समग्र वाक्य की रचना करते हैं, जो कि विशिष्ट प्रभावोत्पादक बनता है। उदाहरणार्थ-'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकाम:' यह विधि-वाक्य है। इसका शेष- अर्थवाद वाक्य है- 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता'। यहाँ वायु की प्रशंसा विधिशेषात्मक अर्थवाद से गयी है। उपर्युक्त दोनों वाक्यों की एकवाक्यता करके लक्षणा द्वारा यह विदित होता है कि वायुदेवता शीघ्रगामी हैं, अत: वे ऐश्वर्य भी शीघ्र प्रदान करते हैं। अब इस विशिष्ट प्रभावोत्पादक अर्थ को सुनकर अधिकारी व्यक्ति की प्रवृत्ति होना स्वाभाविक है। इसी प्रकार निषेध-शेषात्मक अर्थवाद का भी साफल्य जानना चाहिये।
  • अर्थवाद द्वारा प्रतिपादित विषय-परीक्षण की दृष्टि से शास्त्र में इसके तीन भेद माने गये हैं-
  1. गुणवाद,
  2. अनुवाद और
  3. भूतार्थवाद।
  • गुणवाद नामक अर्थवाद में प्रतिपाद्य अर्थ का प्रमाणान्तर से विरोध होता है। यथा- 'आदित्यो यूप:'। यहाँ यूप का आदित्य के साथ अभेद प्रतिपादित है, जो कि प्रत्यक्षतया बाधित है। अत: अर्थ सिद्धि के लिये ऐसे स्थलों पर लक्षणा का आश्रय लेकर यूप का 'उज्ज्वलवादिगुणयोगेनादित्यात्मकत्वम्' अर्थ किया जाता है।
  • अनुवाद-संज्ञक अर्थवाद में पूर्वपरिज्ञात या पूर्वानुभूत प्रमाण से अर्थ का बोध होता है, जबकि प्रतिपाद्य विषय में केवल उसका 'अनुवाद' मात्र रहता है। उदारणार्थ- 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' इस वाक्य में प्रत्यक्षतया सिद्ध है कि अग्नि शैत्य का औषध है। इस पूर्वपरिज्ञात या पूर्वानुभूत विषय (यत्र यत्राग्निस्तत्र तत्र हिमनिरोध:)- का प्रकाशन इस दृष्टान्त में है, अत: यह अनुवाद है।
  • तृतीय भूतार्थवाद में भूतार्थ का अर्थ पूर्वघटित किसी यथार्थ वस्तु के ज्ञापन से है। यहाँ गुणवाद अर्थवाद की भाँति न तो किसी प्रमाणान्तर से विरोध होता है और न ही अनुवाद अर्थवाद की भाँति प्रमाणान्तरावधारण होता है। अतएव शास्त्र में इसका लक्षण किया गया है- 'प्रमाणान्तर विरोधतत्प्राप्तिरहितार्थबोधकोऽर्थवादो भूतार्थवाद:।' इसका दृष्टान्त है-'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्।' कहीं भी ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं होता जिससे इस कथन का विरोध हो, अत: प्रमाणान्तर-अविरोध है, साथ ही ऐसा भी प्रमाण नहीं है जिससे इसका समर्थन हो, अत: प्रमाणान्तरावधारण भी नहीं है। इस प्रकार उभय पक्ष के अभाव में यह वाक्य भूतार्थवाद का उदाहरण है।
  • अर्थवाद- भाग को आचार्य पारस्करने 'तर्क' शब्द से अभिहित किया है।[31] आचार्य कर्कने 'तर्क' पद की व्याख्या करते हुए कहा कि जिसके द्वारा संदिग्ध अर्थ का निश्चय किया जा सके, वह तर्क अर्थात अर्थवाद है।[32] इसका उदाहरण देते हुए कहा कि-'अक्ता शर्करा उपदधाति तेजो वै घृतम्' इस वाक्य में प्राप्त अञ्जन, तैल तथा वसा आदि द्रव्यों से भी सम्भव है, किंतु 'तेजो वै घृतम्' इस घृतसंस्तावक अर्थवाद-वाक्य से संदेह निराकृत होकर घृत से अञ्जन करना यह स्थिर होता है। इस प्रकार अर्थवाद भाग महदुपकारक है।

आपस्तम्ब, पारस्कर आदि आचार्यों ने वेद के तीन ही भाग माने हैं- विधि, मन्त्र और अर्थवाद। अर्थ- संग्रहकारने वेद के पाँच भाग माने हैं- विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध और अर्थवाद।[33] नामधेय- जैसा कि संज्ञा से स्पष्ट हैं, नामधेय-प्रकरण में कतिपय नामों से जुड़े हुए विशेष भागों की आलोचना होती है। इनमें 'उद्भिदा यजेत पशुकाम:','चित्रया यजेत पशुकाम:','अग्निहोत्रं जुहोति', 'श्येनेनाभिचरन् यजेत'- ये चार वाक्य ही प्रमुख हैं। नामधेय विजातीय की निवृत्तिपूर्वक विधेयार्थ का निश्चय कराता है।[34] यथा- 'उद्भिदा यजेत पशुकाम:' इस वाक्य में पशु-रूप फल के लिये याग का विधान किया गया है। यह याग वाक्यान्तर से अप्राप्त है और इस वाक्य द्वारा विहित किया जा रहा है। यदि इस वाक्य से 'उद्भिद्' शब्द हटा दिया जाय तो 'यजेत पशुकाम:' यह वाक्य होगा, जिसका अर्थ है-'यागेन पशुं भावयेत्', किंतु इससे याग-सामान्य का विधान होगा जो कि अविधेय है, क्योंकि याग विशेष का नाम अभिहित किये बिना अनुष्ठान सम्भव नहीं है। 'उद्भिदा' पदद्वारा इस प्रयोजन की पूर्ति होती है, अत: 'उद्भिद्' याग का नाम हुआ तथा याग-विशेष का निर्देशक होने से विधेयार्थ-परिच्छेद भी हुआ। नामधेयत्व चार कारणों से होता है-

  1. मत्वर्थ-लक्षणा के भय से,
  2. वाक्य भेद के भय से,
  3. तत्प्रख्यशास्त्र से और
  4. तद्व्यपदेश से।
  • निषेध- जो वाक्य पुरुष को किसी क्रिया को करने से निवृत्त कराता है, उसे 'निषेध' कहते हैं।[35] शास्त्रों ने नरकादिको अनर्थ माना है। इस नरक-प्राप्ति का हेतु कलञ्जभक्षणादि है, अत: पुरुष को ऐसे कार्यों से 'निषेध-वाक्य' निवर्तित करते हैं इस प्रकार अनर्थ उत्पन्न करने वाली क्रियाओं से पुरुष का निवर्तन कराना ही निषेध-वाक्यों का प्रयोजन है। मन्त्र-ब्राह्मणात्मक (विधिमन्त्र-नामधेय-निषेधार्थवाद-रूप) वेद में कतिपय विचारकों ने ब्राह्मणभाग को वेद नहीं माना है। उनके प्रधान तर्क ये हैं-
  1. ब्राह्मण-ग्रन्थ वेद नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हीं का नाम इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी भी है।
  2. एक कात्यायन को छोड़कर किसी अन्य ऋषि ने उनके वेद होने में साक्षी नहीं दी है।
  3. ब्राह्मण-भाग को भी यदि वेद माना जाय तो 'छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि'[36] इत्यादि पाणिनि-सूत्र में 'छन्द:' शब्द के ग्रहण से ही ब्राह्मणों का भी ग्रहण हो जाने से अलग से 'ब्राह्मण' शब्द का उल्लेख करना व्यर्थ होगा।
  4. ब्राह्मण-ग्रन्थ चूँकि मन्त्रों के व्याख्यान हैं, अत: ईश्वरोक्त नहीं हैं, अपितु महर्षि लोगों द्वारा प्रोक्त हैं।

इसके समाधान में यह कहना अत्यन्त संगत है कि ऐतरेय, शतपथ आदि ब्राह्मणों को पुराण अथवा इतिहास नहीं कहा जाता; रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण आदि को ही इतिहास, पुराण कहा जाता है। यदि पुरातन अर्थ के प्रतिपादक होने से तथा ऐतिहासिक अर्थ के प्रतिपादक होने से इनको पुराण-इतिहास कहा जायगा तो इस तरह की संज्ञा से 'वेद' संज्ञा का कोई विरोध नहीं है, 'वेद' संज्ञा के रहते हुए भी ब्राह्मण-भाग की पुराण-इतिहास संज्ञा भी हो सकती है। भारतीय दृष्टि से-भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ वेद से ज्ञात होता है।[37] अत: जिस प्रकार कम्बु-ग्रीवादि से युक्त एक ही पदार्थ के घट, कलश आदि अनेक नामधेय होने से कोई विरोध उपस्थित नहीं होता, उसी तरह एक ही ब्राह्मण-ग्रन्थ के वेद होने में और पुराण-इतिहास होने में कोई विरोध नहीं है।[38]

  • कात्यायनको छोड़कर किसी अन्य ऋषि ने ब्राह्मणभाग के वेद होने में प्रमाण नहीं दिया है- यह कथन भी आधार रहित है, क्योंकि भारतीय दृष्टि से किसी भी आप्त ऋषि का प्रामाण्य अव्याहत है। फिर ऐसी बात भी नहीं है कि अन्य ऋषियों ने ब्राह्मण-भाग के वेदत्व को नहीं स्वीकारा है। आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, सत्याषाढ श्रौतसूत्र, बौधायन गृह्यसूत्र आदि ग्रन्थों में तत्तत् आचार्यों ने मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद माना है। अत: यह शंका निर्मूल सिद्ध होती है।
  • पाणिनि के 'छन्दोब्राह्मणानि0' इत्यादि सूत्रों में 'छन्द:' शब्द से ही ब्राह्मण का ग्रहण मानने पर 'ब्राह्मणानि' यह पद व्यर्थ होगा, अत: यह कथन भी तर्क-संगत नहीं है। आचार्य पाणिनि ने 'छन्दस्' पद से मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का ग्रहण किया है, क्योंकि 'छन्दस्' इस अधिकार में जो-जो आदेश, प्रत्यय, स्वर आदि का विधान किया गया है, वे दोनों में पाये जाते हैं। जो कार्य केवल मन्त्र-भाग में इष्ट था, उनके लिये सूत्रों में 'मन्त्रे' पद तथा जो ब्राह्मण में इष्ट था उनके लिये 'ब्राह्मण' पद दिया है। यह भी ध्यातव्य है कि 'छन्द:' पर यद्यपि मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद का बोधक है, किंतु कभी-कभी वे इनमें से किसी एक अवयव के भी बोधक होते हैं। महाभाष्य पस्पशाह्निक एवं ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य में यह स्पष्ट किया गया है कि समुदायार्थक शब्दों की कभी-कभी उनके अवयवों के लिये भी प्रवृत्ति देखी जाती है। यथा-'पूर्वपाञ्चाल, उत्तरपाञ्चाल आदि का प्रयोग।' अत: शास्त्र में छन्द अथवा वेद शब्द केवल मन्त्रभाग, केवल ब्राह्मण-भाग अथवा दोनों भागों के लिये प्रसंगानुसार प्रयुक्त होते हैं।
  • ब्राह्मण-भाग मन्त्रों के व्याख्यान हैं, अत: वे वेदान्तर्गत नहीं हो सकते- यह कथन भी सर्वथा असंगत है। मीमांसा एवं न्यायशास्त्र में वेद के जो विषय-विभाग किये गये हैं- विधि, अर्थवाद, नामधेय और निषेध, वे सभी मुख्यतया ब्राह्मण में ही घटित होते हैं। कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय-संहिता आदि में तो मन्त्र और ब्राह्मण सम्मिलित-रूप में ही हैं। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि महाभाष्यकार पतञ्चलि ने यह विचार उठाया है कि व्याकरण केवल सूत्रों को कहना चाहिये या व्याख्यासहित सूत्रों को? इसका सिद्धान्त यही दिया गया है कि व्याख्यासहित सूत्र ही व्याकरण है। इसी प्रकार व्याख्या (ब्राह्मण)-सहित मन्त्र वेद है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-भाग मात्र मन्त्रों का व्याख्यान नहीं करता; अपितु यज्ञादि कर्मों की विधि, इतिकर्तव्यता, स्तुति तथा ब्रह्मविद्या आदि का स्वतन्त्रतया विधान करता है। अत: ब्राह्मण-भाग का वेदत्व सर्वथा अव्याहत है।
  • मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद के विषय-सम्बन्धी तीन भेद परम्परा से चले आ रहे हैं। इनमें कर्मकाण्ड के प्रतिपादक भाग का नाम 'ब्राह्मण', उपासनाकाण्ड के प्रतिपादक भाग का नाम 'आरण्यक' तथा ज्ञानकाण्ड के प्रतिपादक भाग का नाम 'उपनिषद' है।

वेद का विभाजन

भारतीय वाड्मय में बतलाया गया है कि सृष्टि के प्रारम्भ में ऋग्यजु:साम-अथर्वात्मक वेद एकत्र संकलित था। सत युग, त्रेता युग तथा द्वापर युग की लगभग समाप्ति तक एकरूप वेद का ही अध्ययन-अध्यापन यथाक्रम चलता रहा।

द्वापर युग की समाप्ति के कुछ वर्षों-पूर्व महर्षि व्यास ने भावी कलि युग के व्यक्तियों की बुद्धि, शक्ति और आयुष्य के ह्रास की स्थिति को दिव्य-दृष्टि से जानकर ब्रह्मपरम्परा से प्राप्त एकात्मक वेद का यज्ञ-क्रियानुरूप चार विभाजन किया। इन चार विभाजनों में उन्होंने होत्र कर्म के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन ऋग्वेद के नाम से, यज्ञ के आध्वर्यव कर्म (आन्तरिक मूलस्वरूप-निर्माण) के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन यजुर्वेद के नाम से, औद्गात्र कर्म के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन सामवेद के नाम से और शान्तिक-पौष्टिक अभिलाषाओं (जातविद्या)- के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन अथर्ववेद के नाम से किया। इस विभाजन में भगवती श्रुति के वचन को ही आधार रखा गया। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि सम्प्रति प्रवर्तमान वेद-शब्दराशि का वैवस्वत मन्वन्तर में कृष्ण द्वैपायन महर्षि व्यास द्वारा यह 28वाँ विभाजन है। अर्थात्

  • पौराणिक मान्यता के अनुसार इकहत्तर चतुर्युगी का एक मन्वन्तर होता है। प्रत्येक चतुर्युगी के अन्तर्गत द्वापरयुग की समाप्ति में विशिष्ट तप:सम्पन्न महर्षि के द्वारा एकात्मक वेद का चार विभाजन अनवरत होता रहता है। यह विभाजन कलि युग के लिये होता है और कलि युग के अन्त तक ही रहता है। सम्प्रति मन्वन्तरों में सप्तम वैवस्वत नामक मन्वन्तर का यह 28वाँ कलि युग है। इसके पूर्व 27 कलियुग एवं 27 ही वेद विभाग कर्ता वेदव्यास (विभिन्न नामों के) हो चुके हैं। वेदों का यह 28वाँ उपलब्ध विभाजन महर्षि पराशर के पुत्र कृष्णद्वैपायन के द्वारा किया गया है। वेदों का विभाजन करने के कारण ही उन महर्षि को 'वेदव्यास' शब्द से जाना जाता है।

चार वेद और उनकी यज्ञपरकता

वेदविभागकर्ता व्यासोपाधि-विभूषित महर्षि कृष्णद्वैपायन ने यज्ञ-प्रयोजन की दृष्टि से वेद का ऋग्वेद-यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-यह विभाजन प्रसारित किया; क्योंकि भारतीय चिन्तन में वेदों का अभिप्रवर्तन ही यज्ञ एवं उसके माध्यम से समस्त ऐहिकामुष्मिक फलसिद्धि के लिये हुआ है। वैदिक यज्ञों का रहस्यात्मक स्वरूप क्या है एवं साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों ने किन बीजों द्वारा प्रकृति से अभिलषित पदार्थों का दोहन इस भौतिक यज्ञ के माध्यम से आविष्कृत किया, यह पृथक् विवेचनीय विषय है। यहाँ स्थूलदृष्टया यह जानना है कि प्रत्येक छोटे (इष्टि) और बड़े (सोम, अग्निचयन) यज्ञों में मुख्य चार ऋत्विक्- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा होते हैं। बड़े यज्ञों में एक-एक के तीन सहायक और होकर सोलह ऋत्विक् हो जाते हैं, किंतु वे तीन सहायक उसी मुख्य के अन्तर्गत मान लिये जाते हैं। इनमें 'अध्वर्यु' नामक ऋत्विक् द्रव्य-देवतात्यागात्मक यज्ञस्वरूप का निर्माण यजुर्वेद से करता है। 'होता' नामक ऋत्विक् यज्ञ के अपेक्षित शस्त्र (अप्रगीत मन्त्रसाध्य स्तुति) एवं अन्य अंगकलापों का अनुष्ठान ऋग्वेद द्वारा तथा 'उद्गाता' नामक ऋत्विक् स्तोत्र (गेय मन्त्रसाध्य स्तुति) और उसके अंगकलापों का अनुष्ठान सामवेद द्वारा करता है।'ब्रह्मा' नामक चतुर्थ ऋत्विक् यज्ञिय कर्मों के न्यूनादि दोषों का परिहार एवं शान्तिक-पौष्टिक-आभिचारिकादि सर्वविध अभिलाषा-सम्पूरक कर्म अथर्ववेद द्वारा सम्पादित करता है। वेद-त्रयी- कतिपय अर्वाचीन वेदार्थ-विचारक 'सैषा त्रय्येव विद्या तपति' [39], 'त्रयी वै विद्या' [40], 'इति वेदास्त्रयस्त्रयी' इत्यादि वचनों के द्वारा वेद वस्तुत: तीन हैं तथा कालान्तर में अथर्ववेद को चतुर्थ वेद के रूप में मान्यता दी गयी-ऐसी कल्पना करते हैं, किंतु यह कल्पना भारतीय परम्परा से सर्वथा विपरीत है। भारतीय आचार्यों ने रचना-भेद की दृष्टि से वेदचतुष्टयी का त्रित्वमें अन्तर्भाव कर उसे लक्षित किया है।

रचना-शैली

रचना-शैली तीन ही प्रकार की होती है-

  1. गद्य,
  2. पद्य और
  3. गान। इस दृष्टि से-छन्द में आबद्ध, पादव्यवस्था से युक्त मन्त्र 'ऋक्' कहलाते हैं; वे ही गीति-रूप होकर 'साम' कहलाते हैं तथा वृत्त एवं गीति से रहित प्रश्लिष्टपठित (-गद्यात्मक) मन्त्र 'चजुष्' कहलाते हैं।[41] यहाँ यह ध्यातव्य है कि छन्दोबद्ध ऋग्विशेष मन्त्र ही अथर्वागिंरस हैं, अत: उनका ऋग्रूपा (पद्यात्मिका) रचना-शैली में ही अन्तर्भाव हो जाता है और इस प्रकार वेदत्रयी की अन्वर्थता होती है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै (श्वेताश्वतरोपनिषद 6।18)।
  2. वेद्यन्ते ज्ञाप्यन्ते धर्मादिपुरुषार्थचतुष्टयोपाया येन स वेद: (का0 श्रौ0 भू0, पृ0 4)।
  3. इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेद: (का0 भा0 भू0)।
  4. अपौरुषेयं वाक्यं वेद: (अर्थसंग्रह, पृ0 36)।
  5. अनुपलभ्यमानमूलान्तरत्वे सति महाजनपरिगृहीतवाक्यत्वं वेदत्वम्।
  6. मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्।
  7. वेदार्थपारिजात, पृ0 20।
  8. आम्राय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि (कौ0 सू0 1।3)।
  9. अपि च यज्ञकर्मणि संहितयैव विनियुज्यन्ते मन्त्रा: (नि0 1।17 पर दुर्ग)।
  10. मन्त्रा मननात्।
  11. मननान्मनुशार्दूल त्राणं कुर्वन्ति वै यत:। ददते पदमात्मीयं तस्मान्मन्त्रा: प्रकीर्तिता:॥ (ई. स0, 3।7।9)।
  12. याज्ञिकानां समाख्यानं लक्षणं दोषवर्जितम्। तेऽनुष्ठानस्मारकादौ मन्त्रशब्दं प्रयुज्यते॥ (जै0न्या0मा0, 2।1।7)।
  13. प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्रा: (अ0 स0, पृ0 157)।
  14. न तु तदुच्चारणमदृष्टार्थत्वम्, सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टकल्पनाया अन्यारूयत्वात् (अं0 सं0, मन्त्र-विचार-प्रकरण)।
  15. पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे (नि0 1।2।7
  16. का0 श्रौ0, 3। 4।12
  17. मीमांसादर्शन के अनुसार अंग दो प्रकार के होते हैं-1-सिद्धरूप और 2-क्रियारूप। इनमें जाति, द्रव्य एवं संख्या आदि 'सिद्धरूप' हैं, क्योंकि इन सबका प्रयोजन प्रत्यक्ष (दिखायी देनेवाला) है। क्रियारूप अंग के दो भेद हैं- (1) गुणकर्म और (2) प्रधान कर्म। इनमें गुणकर्म को' सन्निपत्योपकारक' कहते हैं। 'सन्निपत्य द्रव्यादिषु सम्बध्य उपकुर्वन्ति तानि' अर्थात जो साक्षात न होकर किसी के माध्यम से मुख्य भाग के उपकारक होते हैं। यथा- 'व्रीह्यवघात एवं सेचनादि।' जो साक्षात रूप में प्रधान क्रिया के उपकारक होते हैं, उन्हें 'प्रधानकर्म' या 'आरादुपकारक' कहते हैं। होते हैं, वे 'जपमन्त्र' हैं। इनमें प्रथम त्रिविध मन्त्रों का अनुष्ठेयस्मारकत्व-रूप दृष्अ प्रयोजन है। जपमन्त्रों का अदृष्ट मात्र प्रयोजन है, ऐसा याज्ञिकों एवं मीमांसकों का सिद्धान्त है।
  18. बृहद्देवता- (1 ।34)।
  19. आप0 श्रौ0 सू0, (24 । 1 ।34)।
  20. 'शेषे ब्राह्मणशब्द:'। (मी0 2।1।33)।
  21. 'ब्राह्मणनाम कर्मणस्तन्मन्त्राणाञ्च व्याख्याग्रन्थ:' (तै0 सं0 1।5।1 पर भाष्य)।
  22. 'वेदचतुष्टयमन्त्राणां कर्मसु विनियोजक: कर्मविधायको नानाविधानादीतिहासाख्यानबहुलो ज्ञानविज्ञानपूर्णो भागो ब्राह्मणभाग:। (श0ब्रा0भू0, पृ0 2
  23. कर्मचोदना ब्राह्मणानि। ब्राह्मणशेषोऽर्थवाद: (आप0 परि0 34।35) 'चोदनेति क्रियाया: प्रवर्तकवचनमाहु:' (भाष्य)।
  24. तत्राज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधि: (अ0 सं0, पृ0 36
  25. ऋ0 भा0 भू0 विधिप्रामाण्य-विचार।
  26. ब्राह्मणशेषोऽर्थवाद:।
  27. प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरं वाक्यमर्थवाद: (अ0 सं0)।
  28. आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्0 (जै0 सू0)।
  29. जै0 सू0 (1।2।7
  30. स द्विविध:- विधिशेषो निषेधशेषश्चेति।
  31. विधिर्विधेयस्तर्कश्च वेद: (पा0 गृ0 सू0 2।6।6)।
  32. तर्कशब्देनार्थवादोऽभिधीयते। तर्क्यते ह्यनेन संदिग्धोऽर्थ: (पा0 गृ0 सू0 2।6।5 पर कर्क)।
  33. स च विधिमन्त्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात् पञ्चविध:।
  34. नामधेयानां च विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम् (अ0 स0)।
  35. पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेध: (अ0 स0)।
  36. पा0 सू0 (4।2।66)।
  37. भूंत भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति॥ (मनु0 12।97)।
  38. वेदार्थपारिजात।
  39. श0 ब्रा0 10।3।6।2
  40. श0 ब्रा0 4।6।7।1
  41. पादेनार्थेन चोपेता वृत्तबद्धा मन्त्रा ऋच:। गीतिरूपा मन्त्रा: सामानि। वृत्तगीतिवर्जितत्वेन प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा: यजूंषि।

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